Category: देश

  • ऐसे पढ़ेगा भारत तो कैसे बढ़ेगा भारत ?

    सरकारी दावों के बीच स्कूली शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर सामने आई

     प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट में खुलासा – प्राथमिक में 6.18 करोड़ बच्चों का नामांकन, सीनियर सेकेंडरी तक पहुंचते-पहुंचते संख्या घटकर 1.64 करोड़ रह जाती है रह जाती है

    नई दिल्ली।

    सरकारी दावों के बीच स्कूली शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। संसद की प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्कूल में प्राथमिक स्तर पर दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 27 ही सीनियर सेकेंडरी (12वीं) तक पहुंच पाते हैं। 73% बच्चे 12वीं से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।

    समिति ने चेतावनी दी है कि अगर बच्चों को स्कूल में रोके रखने की चुनौती का समाधान नहीं किया गया तो सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ आंकड़ों तक सीमित रह जाएगा।

    आंकड़ों में गिरावट – कहां कितने बच्चे?

    रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार –

    स्तरनामांकित बच्चे (करोड़ में)स्कूलों की संख्या (लाख में)
    प्राथमिक6.189.11
    उच्च प्राथमिक4.084.12
    माध्यमिक2.361.61
    उच्च माध्यमिक1.640.90

    प्राथमिक के मुकाबले सीनियर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या सिर्फ 10% है। 2014-15 से 2024-25 के बीच स्कूलों की कुल संख्या 15.17 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई, जबकि शिक्षकों की संख्या 85.62 लाख से बढ़कर 1.01 करोड़ हो गई। इसके बावजूद माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 11.5% बनी हुई है।

    बच्चे स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं? रिपोर्ट में 4 बड़े कारण

    1. कमजोर बुनियादी नींव: प्राथमिक स्तर पर पढ़ने-लिखने और गणित की बुनियादी क्षमता कमजोर।
    2. स्कूलों की दूरी: गांव-देहात में सीनियर सेकेंडरी स्कूल दूर होने से बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
    3. आर्थिक-सामाजिक दबाव: गरीब परिवार के लड़कों पर मजदूरी का दबाव, लड़कियों के लिए सुरक्षा और दूरी बड़ी बाधा।
    4. शिक्षक प्रशिक्षण में गिरावट: 2022 में 53 लाख से अधिक शिक्षकों ने ऑनलाइन प्रशिक्षण लिया था, 2025 में यह घटकर मात्र 1.63 लाख रह गया।

    समिति की 3 बड़ी सिफारिशें

    1. ‘निपुण भारत’ योजना कड़ाई से लागू हो: ताकि शुरुआती कक्षाओं में ही बच्चों की बुनियादी समझ मजबूत हो।
    2. मजबूत स्टूडेंट ट्रैकिंग सिस्टम: हर बच्चे की उपस्थिति और प्रगति की रियल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग हो।
    3. शिक्षक प्रशिक्षण का सालाना लक्ष्य: ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रशिक्षण को निरंतर जारी रखा जाए।

  • विदेश जाने की चाह, लेकिन लौटने का इरादा भी… 10 में 8 भारतीय छात्र बोले- पढ़ाई के बाद लौटेंगे वतन

    ऑक्सफोर्ड सर्वे में बदली सोच की तस्वीर: अब विदेश की डिग्री को ‘बसने’ नहीं, ग्लोबल एक्सपीरियंस हासिल करने का रास्ता मान रहे युवा; 49% ने कहा- विदेश जाने का फैसला हमारा अपना

    विदेश मे पढ़ाई के लिए भारतीय छात्रों का रुझान बढ़ रहा है ,लेकिन अब बड़ी संख्या मे छात्र पढ़ाई के बाद भारत लौटकर करियर बनाने की योजना बना रहे है

    नई दिल्ली। विदेश जाना है… लेकिन हमेशा के लिए नहीं! भारतीय युवाओं की विदेश पढ़ाई को लेकर सोच में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के स्टूडेंट ग्लोबल मोबिलिटी इंडेक्स सर्वे में शामिल 81% भारतीय छात्रों ने कहा कि वे विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटना चाहते हैं। यानी करीब 10 में से 8 छात्र विदेशी डिग्री के बाद अपना भविष्य भारत में देख रहे हैं।

    कभी विदेश में पढ़ाई को बेहतर नौकरी और वहीं बसने की पहली सीढ़ी माना जाता था। अब युवा विदेश को शिक्षा, अनुभव, एक्सपोजर और ग्लोबल नेटवर्किंग का ठिकाना मान रहे हैं। पढ़ाई पूरी होगी, अनुभव मिलेगा और फिर उसी अनुभव के साथ भारत लौटकर करियर बनाने की तैयारी है।

    सबसे बड़ा बदलाव: अब पैरेंट्स नहीं, बच्चे तय कर रहे विदेश जाना

    सर्वे में विदेश जाने के फैसले को लेकर भी बड़ा बदलाव सामने आया है। 2025-26 में 49% छात्रों ने कहा कि विदेश जाकर पढ़ाई करने का फैसला उनका अपना था।

    दो साल पहले यह आंकड़ा सिर्फ 29% था। यानी युवाओं में अपने करियर को लेकर निर्णय लेने की स्वतंत्रता तेजी से बढ़ी है।

    विदेश जाने का फैसला खुद लेने वाले छात्र

    2023-24 : 29%

    2024-25 : 34%

    2025-26 : 49%

    यानी 2 साल में फैसला खुद लेने वालों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत अंक बढ़ी।

    10 में 9 के परिवार में पहली बार कोई विदेश पढ़ने जाएगा

    विदेश शिक्षा अब केवल उन परिवारों तक सीमित नहीं है, जहां पहले से कोई विदेश में पढ़ चुका है। सर्वे में करीब 10 में 9 छात्र अपने परिवार में पहली बार विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले होंगे।

    यानी पहली पीढ़ी के विद्यार्थी अब ग्लोबल एजुकेशन की दौड़ में तेजी से शामिल हो रहे हैं। इनके लिए सबसे बड़ा सहारा बना है—इंटरनेट।

    गूगल बना विदेशी यूनिवर्सिटी खोजने का नया ठिकाना

    विदेशी संस्थान चुनने के लिए छात्र एजेंटों से ज्यादा खुद ऑनलाइन रिसर्च कर रहे हैं।

    39% छात्रों को अपनी पसंद का संस्थान गूगल सर्च के जरिए मिला, जबकि 35% ने एजुकेशन एजेंट्स से जानकारी ली।

    भरोसे की बात आई तो भी गूगल सबसे आगे रहा।

    गूगल : 56%

    कॉलेज इवेंट्स : 20%

    इंस्टाग्राम : 9%

    एआई टूल्स : 6%

    यूट्यूब : 5%

    यानी विदेश जाने से पहले अब युवा किसी एजेंट के ऑफिस में बैठकर सिर्फ ब्रोशर नहीं पलट रहे। मोबाइल खोल रहे हैं, गूगल पर सर्च कर रहे हैं, सोशल मीडिया देख रहे हैं और एआई से सवाल पूछ रहे हैं।

    बिजनेस-मैनेजमेंट सबसे पसंदीदा

    विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की पढ़ाई की पसंद भी दिलचस्प है।

    सबसे पसंदीदा क्षेत्र

    बिजनेस-मैनेजमेंट : 75%

    पोस्टग्रेजुएशन : 70%

    हेल्थ और मेडिसिन : 8%

    साइंस : 2%

    इंजीनियरिंग : 1%

    विदेश की डिग्री, भारत में वापसी… आखिर क्यों?

    सर्वे के आंकड़े एक नई कहानी कहते हैं। भारतीय छात्र ग्लोबल एक्सपोजर चाहते हैं, लेकिन अपनी जड़ें छोड़ना जरूरी नहीं समझते।

    विदेश में पढ़ाई अब कई युवाओं के लिए ‘फाइनल डेस्टिनेशन’ से ज्यादा ‘करियर एक्सपीरियंस’ बनती जा रही है।

    यानी सोच कुछ ऐसी है—

    “डिग्री वहां से… अनुभव वहां का… लेकिन करियर अपने देश में।”

    डेटा में छिपी बड़ी तस्वीर

    81% — पढ़ाई के बाद भारत लौटना चाहते हैं49% — विदेश जाने का फैसला खुद लिया10 में करीब 9 — परिवार में पहली बार विदेश पढ़ने जाएंगे56% — जानकारी के लिए गूगल पर सबसे ज्यादा भरोसा75% — बिजनेस-मैनेजमेंट की ओर झुकाव

    बदल रहा है ‘विदेश जाने’ का मतलब

    विदेश जाने की इच्छा कम नहीं हुई है। बल्कि भारतीय युवाओं में ग्लोबल एजुकेशन का आकर्षण बना हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब विदेश जाना ‘वहीं बस जाने’ का पर्याय नहीं रह गया।

    नई पीढ़ी विदेश से सीखना चाहती है, दुनिया देखना चाहती है, अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करना चाहती है और फिर उस अनुभव को भारत में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है।

    यानी मंजिल विदेश नहीं… मंजिल बेहतर करियर है। और रास्ता चाहे जितना लंबा हो, लौटने का रास्ता भारत की ओर भी खुला है।

  • कितने अमेरिकी मोदी को पहचानते हैं ? क्या कहता हैं प्यू रिसर्च का सर्वे ?

    कितने अमेरिकी मोदी को पहचानते हैं ? क्या कहता हैं प्यू रिसर्च का सर्वे ?

    नई दिल्ली //  भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे के बीच प्यू रिसर्च का एक रोचक लेकिन विरोधाभासी सर्वे सामने आया है , जिसके मुताबिक अधिकांश अमेरिकियों ने मोदी के बारे में सुना ही नहीं है और जो अमेरिकी मोदी को जानते हैं उनमे से ज्यादातर की उनके प्रति भावनाए नकारात्मक हैं .हालांकि अधिकतर अमेरिकी भारत को अनुकूल मानते हैं पर उसके नेतृत्व पर भरोसा नहीं है . प्यू ने यह सर्वे 20 से 26 मार्च के बीच किया था . इस सर्वे को सुब्रमण्यम स्वामी में भी अपने ट्विटर हेंडल पर शेयर किया है .

    एबीपी लाइव की खबर बताती है कि प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के अनुसार, है. अमेरिकी नागरिकों (40%) का एक बड़ा हिस्सा कहता है कि उन्होंने भारतीय नेता  मोदी के बारे में कभी नहीं सुना है, जो कि 30 (59%) से कम उम्र के अधिकांश अमेरिकियों में भी परिलक्षित होता है – जब कई अन्य विश्व नेताओं की तुलना की जाती है, तो उनके बारे में सबसे कम सुना जाता है।, अमेरिका के 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 28% वयस्क भी ऐसा ही कहते हैं. कम शिक्षा वाले वयस्कों की भी उच्च स्तर की शिक्षा वाले लोगों की तुलना में मोदी के बारे में कभी न सुनने की बात की है . जिन लोगों ने इस भारतीय नेता के बारे में सुना है, वे मानते हैं कि उनमें आत्मविश्वास की कमी है जिन लोगों ने पीएम मोदी के बारे में सुना है, उनके अंदर मोदी को लेकर भावना नकारात्मक है. जैसे- वहां 37% लोगों को वैश्विक मामलों के संबंध में पीएम मोदी की क्षमता पर बहुत कम या बिल्‍कुल भरोसा नहीं है, जबकि 21% को उन पर भरोसा है.

    लगभग आधे अमेरिकी वयस्कों (51%) का भारत के प्रति दृष्टिकोण अनुकूल है, जबकि थोड़े से अन्य (44%) का दृष्टिकोण प्रतिकूल है। डेमोक्रेट और डेमोक्रेटिक-झुकाव वाले स्वतंत्र लोग भारत को अनुकूल रूप से देखने के लिए अपने रिपब्लिकन और रिपब्लिकन-झुकाव वाले समकक्षों की तुलना में कुछ हद तक अधिक हैं (56% बनाम 48%), जैसे स्नातक की डिग्री वाले लोगों की तुलना में जिनके पास स्नातक की डिग्री नहीं है (55% बनाम 50%).

    विश्व स्तर पर भारत की स्थिति को देखते हुए, अधिकांश अमेरिकी वयस्कों (64%) का मानना है कि हाल के वर्षों में इस देश का प्रभाव दुनिया में वैसा ही बना हुआ है. वहीं, अन्य 23% का कहना है कि भारत का प्रभाव बढ़ा है, जबकि 11% का कहना है कि उसका प्रभाव कम हो गया है.

    ज्‍यादातर अमेरिकियों को नहीं पता भारत का ध्‍वज कैसा है!
    प्‍यू रिसर्च सेंटर की 2022 की एक रिपोर्ट में तो ये भी कहा गया कि अमेरिका के लोग भारतीय ध्वज से भी काफी हद तक अपरिचित हैं, यानी उन्‍हें नहीं पता होता कि भारत का राष्‍ट्रीय झंडा कैसा है. अमेरिकियों के अंतरराष्ट्रीय मामलों के ज्ञान का आकलन करने के लिए जब उनके सामने भारत के तिरंगा झंडे की तस्वीर प्रस्तुत की गई, तो केवल 41% अमेरिकी ही उसे पहचान पाए कि ये झंडा भारत का है.

    क्या है प्यू रिसर्च सेंटर ?

    प्यू रिसर्च सेंटर वाशिंगटन, डी.सी. में स्थित एक गैर-पक्षपाती अमेरिकी थिंक टैंक (खुद को “तथ्य टैंक” के रूप में संदर्भित करता है) है। इसकी उत्पत्ति 1990 में टाइम्स मिरर सेंटर फॉर द पीपल एंड द प्रेस नामक एक में हुई थी। 2004 में, प्यू चैरिटेबल ट्रस्ट्स ने अपनी सूचना पहलों को रखने के लिए एक सहायक के रूप में प्यू रिसर्च सेंटर की स्थापना की|

  • गीता प्रेस को गाँधी शांति पुरस्कार पर क्यों उठा विवाद ?

    गीता प्रेस को गाँधी शांति पुरस्कार पर क्यों उठा विवाद ?

    नई दिल्ली//साल 2021 का गांधी शांति पुरस्कार गीता प्रेस गोरखपुर को दिया जाएगा यह फैसला रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने सर्वसम्मति से किया है लेकिन इस फैसले पर सवाल और विवाद उठने लगे हैं. कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने गांधी शांति पुरस्कार के लिए गीता प्रेस के चयन को पुरस्कार का अपमान बताया है।
    इसको लेकर जयराम रमेश ने एक ट्वीट किया है। उन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर को पुरस्कार देने की तुलना गोडसे को सम्मानित करने से की है।  जयराम रमेश ने ट्ववीट में लिखा, “2021 के लिए गांधी शांति पुरस्कार गोरखपुर में गीता प्रेस को प्रदान किया गया है जो इस साल अपनी शताब्दी मना रहा है। अक्षय मुकुल द्वारा इस संगठन के बारे में 2015 की एक बहुत ही बेहतरीन जीवनी है जिसमें वह महात्मा के साथ इसके तूफानी संबंधों और उनके राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक एजेंडे पर उनके साथ चल रही लड़ाइयों का पता लगाता है। यह फैसला वास्तव में एक उपहास है और सावरकर और गोडसे को पुरस्कार देने जैसा है।”

    जयराम के ट्वीट से कांग्रेस भी नाराज

    सूत्रों का कहना है कि गीता प्रेस को लेकर जयराम रमेश के ट्वीट से कांग्रेस के कई नेता नाराज हैं। उन्होंने इस मामले में जयराम रमेश के बयान को गैर जरूरी बताया है।
    सियासी बयान बाजी शुरू
    गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार दिए जाने के एलान के बाद सियासी वार-पलटवार का दौर शुरू हो गया है. कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों पर मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने जवाब देते हुए कहा है कि कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति को देश जान चुका है. 
    सांसद भाजपा सांसद रवि किशन ने इसे कांग्रेस की बीमार मानसिकता बताते हुए कहा है कि यह कांग्रेस की सनातन धर्म के खिलाफ मनोवृत्ति का परिचायक है भाजपा प्रवक्ता से शहजाद पुनेवाला, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा और नेता रवि शंकर प्रसाद ने कांग्रेसको हिंदू विरोधी बताया है।
    पुरस्कार राशि नहीं लेगी गीता प्रेस
    गीता प्रेस की ओर से भी इस मामले पर बयान सामने आया है। उसकी ओर से कहा गया है कि वह केंद्र सरकार से इस पुरस्कार लेंगे लेकिन पुरस्कार के लिए मिलने वाली राशि नहीं लेंगे। बता दें कि इस पुरस्कार के साथ पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रुपये की राशि भी दी जाती है।
    100 पहले हुई थी स्थापना
    बता दें कि गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना 1923 में हुई थी। यह अब तक 14 भाषाओं में करीब 42 करोड़ किताबों का प्रकाशन किया है। गीता प्रेस की पहचान प्रमुख रूप से भगवत गीता के प्रकाशन को लेकर है। गीता प्रेस की ओर से अब तक जिन पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है उनमें 16 करोड़ से अधिक श्गीरी मद भगवत गीता हैं।
    गीता प्रेस के संस्थापकों और महात्मा गांधी के संबंध कैसे थे?
    नवभारत टाइम्स के अनुसार गीता प्रेस की स्थापना 1923 में की गई थी। इसके संस्थापक जयदयाल गोयनका और गीता प्रेस की पत्रिका कल्याण के संस्थापक संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार  के साथ महात्मा गांधी के करीबी संबंध थे। हालांकि छुआछूत और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों पर आगे चलकर महात्मा गांधी और गीता प्रेस के संस्थापकों के बीच मतभेद उभर आए। यह भी बताया जाता है कि 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद देशभर में जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उनमें पोद्दार और गोयनका भी शामिल थे। हालांकि 1992 में पी वी नरसिंह राव सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया था।

    अक्षय मुकुल ने गीता प्रेस और महात्मा गांधी के बारे में क्या लिखा है?
    अक्षय मुकुल ने ‘गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया  किताब लिखी है। मुकुल ने लिखा है, ‘पोद्दार 1926 में जमनलाल बजाज के साथ महात्मा गांधी के पास गए। वह कल्याण पत्रिका के लिए उनका आशीर्वाद लेना चाहते थे। गांधी ने उन्हें दो बातें कहीं। एक, विज्ञापन मत प्रकाशित करना। दूसरी, पुस्तक समीक्षा कभी मत छापना। पोद्दार ने ये सलाहें मान लीं। आज भी कल्याण और कल्याण कल्पतरु में न तो विज्ञापन छपता है और न ही पुस्तक समीक्षा छापी जाती है।’
    मुकुल ने लिखा है, ‘गीता प्रेस और महात्मा के रिश्तों में खटास तब आने लगी, जब जाति और सांप्रदायिकता के मुद्दों पर गहरे मतभेद उभरे। इनमें मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश का मामला भी था और पूना पैक्ट भी। गांधी ने छुआछूत पर पोद्दार का नजरिया बदलने की पूरी कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। गांधी के खिलाफ पोद्दार की तीखी बातें कल्याण पत्रिका में 1948 तक छापी जाती रहीं।’
    मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है कि 1948 में गोयनका और पोद्दार की गिरफ्तारी के बाद ‘उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला ने इन दोनों की सहायता करने से मना कर दिया। जब सर बद्रीदास गोयनका ने इन दोनों का केस अपने हाथ में लिया तो बिड़ला ने इसका भी विरोध किया। बिड़ला का कहना था कि ये दोनों लोग सनातन धर्म को नहीं, बल्कि शैतान धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं।’

    महात्मा गांधी की हत्या पर गीता प्रेस का क्या रुख था?
    1948 में हत्यारे नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को मार डाला। 30 जनवरी को हुई उस घटना से पूरा विश्व सिहर गया। दुनिया के तमाम नेताओं और संस्थाओं ने दुख जताया, लेकिन गीता प्रेस ने चुप्पी साध ली। अक्षय मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है, ‘महात्मा की हत्या पर गीता प्रेस ने सोची-समझी चुप्पी साध ली। जिस व्यक्ति के लेख और आशीर्वाद कभी कल्याण पत्रिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण हुआ करते थे, उनके बारे में अप्रैल 1948 तक इस पत्रिका ने एक शब्द भी नहीं लिखा। अप्रैल 1948 में पोद्दार ने गांधी के साथ अपनी विभिन्न मुलाकातों का जिक्र किया।’

    मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है, ‘हिंदू राष्ट्रवाद के दायरे में इसने हिंदुओं को संगठित करने, धार्मिक शुद्धता वाली पहचान बनाने और सांस्कृतिक मूल्यों का एक मानक बनाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह 1923 से ही हर महत्वपूर्ण मोड़ पर हिंदू महासभा, जनसंघ और बीजेपी के विचारों के साथ खड़ा रहा है। जब भी समाज में तीखे सांप्रदायिक मतभेद उभरे, कल्याण पत्रिका ने एक धार्मिक पत्रिका की संजीदा भूमिका छोड़कर नफरत और धार्मिक पहचान की भाषा अपना ली।’

    गीता प्रेस के बारे में पीएम नरेंद्र मोदी ने क्या कहा?
    गीता प्रेस विश्व के बड़े प्रकाशकों में शामिल है। 14 भाषाओं में इसने करीब 42 लाख पुस्तकें प्रकाशित की हैं। इनमें 16 करोड़ 21 लाख प्रतियां श्रीमद भागवत गीता की हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने ट्वीट किया, ‘गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार 2021 मिलने पर मैं बधाई देता हूं। आपने पिछले 100 वर्षों में लोगों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के लिए सराहनीय कार्य किया है।’ यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  ने भी गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी पीस प्राइज मिलने पर बधाई दी।

    गांधी शांति पुरस्कार में कितनी राशि दी जाती है?
    गांधी शांति पुरस्कार की शुरुआत 1995 में की गई थी। यह हर वर्ष दिया जाने वाला पुरस्कार है। इसे महात्मा गांधी के आदर्शों के लिए काम करने वाले लोगों या संस्थाओं को दिया जाता है। यह पुरस्कार किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति या संस्था को दिया जा सकता है। पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रुपये, एक प्रशस्ति पत्र, एक स्मारक पट्टिका और हैंडलूम या हैंडीक्राफ्ट का एक परंपरागत आइटम दिया जाता है। इससे पहले यह पुरस्कार पाने वालों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और रामकृष्ण मिशन जैसे संगठन शामिल हैं। 2022 के लिए गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा नहीं की गई है।
    (मीडिया की ख़बरों के आधार पर)

  • केदारनाथ मंदिर के अन्दर सोने की परत काम में चढ़ाने के काम 125 करोड़ के घोटाले का आरोप, प्रबंधन ने दिया जवाब

    केदारनाथ मंदिर के अन्दर सोने की परत काम में चढ़ाने के काम 125 करोड़ के घोटाले का आरोप, प्रबंधन ने दिया जवाब

    देहरादून // प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर के एक वरिष्ठ पुजारी ने मंदिर के अंदर सोने की परत चढ़ाने के काम में घोटाले का आरोप लगाकर विवाद खड़ा कर दिया है,  पर इस दावे का मंदिर समिति ने जोरदार खंडन किया है,

    मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक केदारनाथ मंदिर महापंचायत के एक वरिष्ठ पुजारी संतोष त्रिवेदी ने जो  चार धाम महापंचायत के उपाध्यक्ष भी हैं ने श्री बदरीधाम केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी)  पर मंदिर के गर्भगृह के अंदर सोने के काम में 125 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया है। त्रिवेदी का आरोप है कि गर्भगृह के अंदर जो सोने की प्लेटें लगाई गई हैं, वे असल में पीतल की बनी हैं.

    बीकेटीसी ने आरोपों का खंडन किया है, समिति ने दावा किया कि घोटाले के आरोप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैलाई गई गलत सूचना का हिस्सा हैं।और इसे छोटे राजनीतिक तत्वों की साजिश का हिस्सा बताया है, जो यात्रा को प्रभावित करने और केदारनाथ धाम की छवि को खराब करने के लिए अफवाहें फैला रहे हैं,  समिति ने यह भी कहा है कि वह इसे बदनाम करने की कोशिश करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी।

    बीकेटीसी ने कहा है कि सोना चढ़ाने का काम भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण के विशेषज्ञों की देखरेख में किया गया है  गर्भगृह को स्वर्ण जड़ित करने का कार्य स्वयं दानदाता ने अपने स्तर से किया। दानदाता ने अपने स्तर से ज्वेलर्स से तांबे की प्लेटें तैयार करवाई व फिर उन पर सोने की परतें चढ़ाई और अपने ज्वेलर्स के माध्यम से ही इन प्लेटों को मंदिर में स्थापित कराया।

    बीकेटीसी ने स्पष्ट किया है कि बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अधिनियम 1939 में दिए गए प्रावधान और राज्य सरकार से अनुमति के अनुसार दान स्वीकार किया गया था। गर्भगृह में स्थापित सोने और तांबे की प्लेटों के बिल और वाउचर काम पूरा होने के बाद बीकेटीसी को दिए गए थे, और नियमानुसार मंदिर की स्टॉक बुक में दर्ज किए गए हैं। दानस्वरूप किए इस कार्य के लिए दानी व्यक्ति अथवा किसी फर्म की ओर से बीकेटीसी के समक्ष किसी प्रकार की शर्त नहीं रखी गई न ही दानदाता ने बीकेटीसी से आयकर अधिनियम की धारा- 80 जी का प्रमाण पत्र मांगा।

    इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सोने की प्लेटें मुंबई के व्यवसायी द्वारा दान की गई थीं, जो गुमनाम रहना चाहते थे, और राज्य सरकार ने मंदिर को 230 किलो सोना दान करने के उनके प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

  • रिलीज होते ही विवादों में घिरी आदिपुरुष, फिल्म के खिलाफ़ दाखिल की गई याचिका।

    नई दिल्ली// ओम राउत के डायरेक्शन में बनी ‘प्रभास और कृति सेनन स्टारर फिल्म ‘आदिपुरुष’ विवादों में घिर गई है। सोशल मिडिया पर तो इसके संवादों को लेकर तहलका मचा हुआ है, साधु संत नाराज हैं और इसे आस्था से खिलवाड़ बता रहे हैं ,वहीं हिंदू सेना ने ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर मांग की है कि फिल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणित नहीं किया जाए. हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने शुक्रवार को ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की. साथ ही आरोप लगाया है कि मूवी में भगवान का काफी मजाक उड़ाया गया है।

    एनडीटीवी के अनुसार फिल्म को भगवान हनुमान की भूमिका निभाने वाले अभिनेता द्वारा बोले गए ‘टपोरी’ शैली के संवादों के लिए भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. समीक्षकों ने फिल्म की गंभीरता से समीक्षा की और इसे पुरानी फिल्मों का मिला-जुला रूप बताया है. उधर, नेपाल के फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने ‘सीता को भारत की बेटी’ बताने संबंधी संवाद पर आपत्ति जताई है. दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका में, श्री गुप्ता ने कहा, “यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत जनहित याचिका के रूप में एक रिट याचिका है, जिसमें उत्तरदाताओं को निर्देश की प्रकृति में एक उपयुक्त रिट जारी करने की प्रार्थना की गई है. धार्मिक नेताओं/चरित्रों/आकृतियों को गलत तरीके से चित्रित करने वाले आपत्तिजनक दृश्यों को हटाना की मांग की गई है. साथ ही प्रतिवादियों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए फीचर फिल्म आदिपुरुष को प्रमाणित नहीं करने और इस तरह के अन्य या आगे के आदेश को पारित करने का निर्देश देने के लिए मांग की गई है.”याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि फिल्म ‘धार्मिक नेताओं/पात्रों/आंकड़ों को गलत और अनुचित तरीके से चित्रित करके हिंदू समुदाय की भावनाओं को आहत करती है.’ हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने याचिका में रामायण, भगवान राम और देश की संस्कृति का मजाक बनाने का आरोप लगाया है. इसके अलावा उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट से ‘आदिपुरुष’ में रावण, राम, सीता और हनुमान के कई अपमानजनक सीन्स भी हटाने के लिए आदेश देने की मांग की है. 

  • देश की दो अनफ्रेंडली सिटी मुंबई और दिल्ली ? ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई का सर्वेक्षण तो यही कहता है

    देश की दो अनफ्रेंडली सिटी मुंबई और दिल्ली ? ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई का सर्वेक्षण तो यही कहता है

    नई दिल्ली // आप अपने शहर को छोड़ कर एक बड़े शहर में रहने के लिए जा रहे हैं या जाना चाहते हैं?  और वहां जाकर दोस्त भी बनाना चाहेंगें ?  तो देश के दो शहरों से दूर रहें,  यह शहर हैं मुंबई और दिल्ली . इन शहरों ने दुनिया के सबसे अनफ्रेंडली ‘अमित्रवत’ शहरों की सूची में उच्च स्थान  हासिल किया हैं। ; कम से कम, ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई के एक सर्वेक्षण से तो यही पता चला है। सूची में मुंबई 10 में से 3.91 के स्कोर के साथ चौथे स्थान पर तो  दिल्ली 10 में से 3.27 के स्कोर के साथ छठे स्थान पर है।

    द कम्युनिटी स्पिरिट इंडेक्स: द वर्ल्ड्स फ्रेंडली सिटीज़ फॉर नॉन-नेटिव्स नामक यह सर्वे  53 शहरों में किया गया और इसमें 1,000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था. और मूल्यांकन  गैर-मूल निवासियों के प्रति उनकी मित्रता के आधार पर किया गया था।  विशेष बात यह है  की किसी भी भारतीय शहर ने  फ्रेंडली लिस्ट या “दोस्ताना” सूची में स्थान नहीं बनाया है .

    सूचकांक ने विश्व स्तर पर सबसे अधिक स्वागत करने वाले और अमित्र शहरों को निर्धारित करने के लिए छह प्रमुख मैट्रिक्स पर विचार किया। मेट्रिक्स में आगंतुक वापसी दर, सुरक्षा रेटिंग, एलजीबीटीक्यू + समानता, समग्र खुशी, एक आम भाषा के माध्यम से संचार में आसानी और कर्मचारियों की मित्रता शामिल थी। सर्वेक्षण में पाया गया कि विदेशियों की मित्रता, सहायता और सहनशीलता जैसे कारकों के मामले में मुंबई और दिल्ली ने कम स्कोर किया। मुंबई और दिल्ली में रहने वाले सर्वेक्षण के उत्तरदाताओं ने अपनी कम रेटिंग के कई कारणों का हवाला दिया, जिनमें शामिल हैं: शहरों में बहुत भीड़ और शोर है, जो नए लोगों के लिए भारी हो सकता है। यहाँ लोगों को अक्सर अमित्र और अनुपयोगी के रूप में देखा जाता है। अन्य संस्कृतियों की समझ की कमी है, जिससे भेदभाव हो सकता है। सर्वेक्षण के परिणाम कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक हैं, क्योंकि भारत को अक्सर स्वागत करने वाले और मेहमाननवाज देश के रूप में देखा जाता है। हालांकि, सर्वेक्षण में उन चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है, जिनका भारत के प्रमुख शहरों में रहने पर गैर-मूल निवासियों को सामना करना पड़ सकता है।

    सर्वेक्षण जनवरी से मार्च 2023 तक ऑनलाइन आयोजित किया गया था।

    सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं से मित्रता, सहायता और विदेशियों की सहनशीलता जैसे कारकों के संदर्भ में शहरों को 1 से 10 के पैमाने पर रेट करने के लिए कहा गया।

    मुंबई और दिल्ली ने तीनों कारकों के मामले में कम स्कोर किया।

    सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि मुंबई और दिल्ली गैर-निवासियों के लिए शहरों का स्वागत नहीं कर रहे हैं।

    गैर-मूल निवासियों के लिए मुंबई और दिल्ली को अधिक स्वागत योग्य बनाने के लिए कई चीजें की जा सकती हैं, जैसे कि सांस्कृतिक समझ और सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रमों में निवेश करना, विदेशी कर्मचारियों को अधिक सहायता देना, और नए लोगों के लिए अधिक मित्रवत और सहायक होना।

    डेटा से पता चलता है कि केवल 12% लोगों ने मुंबई को मित्रवत माना, जबकि दिल्ली के लिए यह आंकड़ा 17% से थोड़ा अधिक था। इस बीच, फ्रेंडली स्टाफ श्रेणी के तहत सर्वेक्षण के अनुसार, मुंबई ने 3.91% की रेटिंग हासिल की, जबकि दिल्ली ने 3.27% स्कोर किया। साथ ही, मुंबई को 3.78 का हैप्पीनेस स्कोर प्राप्त हुआ, जबकि दिल्ली ने इस संबंध में 4.01 स्कोर किया।

    दुनिया के शीर्ष 10 मित्र सूची वाले शहर:

    टोरंटो कनाडा)

    ऑस्ट्रेलिया (सिडनी)

    एडिनबर्ग (यूके)

    मैनचेस्टर (यूके)

    न्यूयॉर्क (अमेरिका)

    मॉट्रियल कनाडा)

    मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया)

    सैन फ्रांसिस्को (यूएस)

    डबलिन, आयरलैंड)

    कोपेनहेगन, डेनमार्क)

  • केरल हाईकोर्ट ने कहा- नग्नता और अश्लीलता हमेशा एक नहीं होती..!

    केरल हाईकोर्ट ने कहा- नग्नता और अश्लीलता हमेशा एक नहीं होती..!

    कोर्ट ने अर्धनग्न शरीर पर बच्चों से पेंटिंग करवाने वाली महिला को किया बरी

    कोच्चि // केरल हाईकोर्ट ने पास्को कानून से जुड़े एक मामले में महिला अधिकार कार्यकर्ता को बरी कर दिया! 33 वर्षीय रेहाना फातिमा नाम की इस महिला अधिकार एक्टिविस्ट के विरुद्ध बच्चों का यौन शोषण से संरक्षण (पॉक्सो ) कानून किशोर न्यायालय और सूचना एवं प्रौद्योगिकी कानून के तहत मुकदमा चल रहा था।

    क्या है पूरा मामला?

     कुछ महीनों पहले रेहाना फातिमा का एक वीडियो सामने आया था जिसमें वे अपने नाबालिग बच्चों के सामने अर्धनग्न (सेमी न्यूड) खड़ी थी और उन्होंने उन्हें अपने शरीर पर पेंटिंग की अनुमति दी थी।  इसका वीडियो वायरल होने के बाद उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था । रेहाना आरोपों का सामना कर रही थी । निचली अदालत ने फातिमा को दोष मुक्त करने वाली याचिका को खारिज कर दिया था । फातिमा ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी । 

    उच्च न्यायालय में फातिमा ने कहा था कि “बॉडी पेंटिंग” समाज के उस दृष्टिकोण के खिलाफ एक राजनीतिक बयान के रूप में थी, जिनमें सभी मानते हैं कि महिलाओं के शरीर का नग्न उपरी हिस्सा किसी भी रूप में यौन संतुष्टि या यौन क्रियाओं से जुड़ा है, जबकि पुरुषों के शरीर के निर्वस्त्र ऊपरी हिस्से को इस रूप में नहीं देखा जाता ।

    उच्च न्यायालय ने क्या कहा ?

    केरल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति कौसर एदाप्पागथ  ने फातिमा को आरोप मुक्त करते हुए कहा कि -आधी आबादी को अपने शरीर पर स्वायत्तता का अधिकार नहीं मिलता, अपने शरीर व जीवन के संबंध में फैसले लेने के कारण उन्हें परेशानी व दंड का सामना करना पड़ता है और अलग-थलग कर दिया जाता है।

     जस्टिस कौसर एदाप्पागथ ने कहा कि महिला कार्यकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप के आधार पर किसी के लिए यह तय करना संभव नहीं है कि बच्चों का किसी भी रूप से यौन संतुष्टि के लिए उपयोग हुआ है। उन्होंने बस अपने शरीर को कैनवास के रूप में अपने बच्चों को इस्तेमाल करने दिया था।  अदालत ने कहा कि अपने शरीर के बारे में फैसले लेने का अधिकार महिलाओं की समानता और निजता के मौलिक अधिकार के मूल में  है।

    उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसी” निर्दोष कलात्मक” अभिव्यक्ति को किसी भी रूप में यौन क्रिया से जोड़ना क्रूर है।  अभियोजन पक्ष ने अपनी दलील में इसे अश्लील और असभ्य बताया था । इस दलील को नकारते हुए अदालत ने कहा कि नग्नता और अश्लीलता हमेशा पर्यायवाची नहीं होते।  नग्नता को अनिवार्य रूप से अश्लील , असभ्य या अनैतिक करार देना गलत है। अदालत ने कहा कि एक समय में केरल की निचली जाति की महिलाओं ने अपने स्तन ढकने के अधिकार की लड़ाई लड़ी थी। देश के विभिन्न प्राचीन और सार्वजनिक स्थानों पर तमाम देवी-देवताओं और प्रतिमाएं और कलाकृतियां हैं जो अर्धनग्न अवस्था में है उन्हें पवित्र माना जाता है । अदालत ने कहा कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो महिलाओं की नग्नता को कलंक मानते हैं और उसे सिर्फ यौन तुष्टी से जोड़कर भर देखते हैं । फातिमा द्वारा जारी वीडियो का मकसद समाज में मौजूद इस दौरे में मापदंड का पर्दाफाश करना था। न्यायालय ने कहा कि नग्नता को सेक्स के साथ जोड़ना नहीं जोड़ना चाहिए।

    (नवभारत टाइम्स और एजेंसी खबरों के आधार पर )

  • प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के दम पर चुनाव रण में उतरेगी भाजपा? कमल मित्र के जरिए आधी आबादी तक पहुंचने की कवायद

    प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के दम पर चुनाव रण में उतरेगी भाजपा? कमल मित्र के जरिए आधी आबादी तक पहुंचने की कवायद

    नई दिल्ली// भाजपा सिर्फ पांच राज्यों के चुनाव की तैयारी ही नहीं कर रही है, उसने 2024 के लोकसभा चुनाव की भी जोरदार तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने नेताओं को अगले 8 महीने तक जमीन पर काम करने की हिदायत दी है।

     गांव गांव तक पहुंचने के लिए भाजपा का जनसंपर्क अभियान शुरू हो गया है जो 30 मई से 30 जून तक चलाया जाएगा।

     जमीनी तैयारी के रूप में चुनाव के लिए प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारने की तैयारी है। बताया जाता है कि इन प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की मदद से पार्टी गांव गांव अपनी रणनीतियों को मूर्त रूप देगी। यह कार्यकर्ता हर संसदीय क्षेत्र में तैनात किए जाएंगे और इनकी भूमिकाएं तय होंगी।

     तैयारी में जुटी राष्ट्रीय टीम ने सभी प्रदेश इकाइयों को प्रशिक्षण के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं की सूची बनाने का निर्देश दिए हैं । इन सक्रिय कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के लिए बाकायदा कैंप लगाए जाएंगे। राष्ट्रीय पदाधिकारी इन कार्यकर्ताओं को सिखाएंगे कि मोदी सरकार की नीतियों को घर-घर पहुंचा कर कैसे वोट मांगा जाए।  यह कार्यकर्ता भाजपा सरकार की सभी योजनाओं की जानकारी और आंकड़ों से लैस होंगे।

      कमल मित्र के जरिए आधी आबादी के बीच जाने की कवायद

     वहीं दूसरी ओर भाजपा महिला मोर्चा पूरे देश में एक लाख का महिला कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने जा रही है। इस अभियान को कमल मित्र नाम दिया गया है न्यू 18 के मुताबिक बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष वानाती श्रीनिवासने ने बताया कि इस अभियान के लिए हर लोकसभा सीट से 200 महिला कार्यकर्ताओं को डिजिटली प्रशिक्षित किया जाएगा। प्रशिक्षण के बाद एक टेस्ट होगा। टेस्ट पास करने के बाद ही कार्यकर्त्ता महिला को कमल मित्र सर्टिफिकेट पार्टी की तरफ से दिया जाएगा । इस अभियान के तहत मोदी सरकार की 15 प्रमुख योजनाएं जिसमें पीएम आवास ,सुकन्या समृद्धि योजना, उज्जवला योजना, मातृत्व वंदना योजना जैसी योजनाएं शामिल है को इन कार्यकर्ताओं के जरिए महिलाओं तक पहुंचाया जाएगा।  यह कार्यकर्ता पूरे देश में महिला लाभार्थियों को इन योजनाओं की जानकारी देकर योजनाओं का फायदा दिलायेंगीं।

  • पांच राज्यों के लिए नए सिरे से चुनावी रणनीति बनाने में जुटी भाजपा ?

    पांच राज्यों के लिए नए सिरे से चुनावी रणनीति बनाने में जुटी भाजपा ?

    नई दिल्ली // कर्नाटक चुनाव मिली हार के बाद भाजपा इस साल होने वाले पांच राज्यों के चुनाव को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाएगी सूत्रों के मुताबिक 28 मई के बाद भाजपा महासचिव इस मुद्दे पर विचार करने के लिए बैठेंगे पार्टी नेताओं का मानना है कि मध्य प्रदेश राजस्थान, छत्तीसगढ़ में मुकाबला आसान नहीं है । पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि किसी भी राज्य का चुनाव आसान नहीं होता है, भाजपा ना सिर्फ जीतने के लिए बल्कि अपना वोट शेयर और जनाधार बढ़ाने के लिए भी चुनाव लड़ती है। 

    इन तीनों राज्यों में राजस्थान में भाजपा खुद को सबसे मजबूत मानती है बावजूद इसके पार्टी यहां अपनी कमियों को दूर करने के लिए अभी से तैयारी कर रही है।  मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को लेकर पार्टी अभी तक जिस रणनीति के साथ आगे बढ़ रही थी वर्तमान परिस्थितियों और पार्टी की भीतरी खींचतान को देखते हुए इसमें कुछ बदलाव हो सकते हैं । पार्टी अपनी रणनीति में क्या बदलाव करने जा रही है ? इसके ज़बाब में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि इन राज्यों में मिले फीडबैक से जो खामियां सामने दिख रही हैं उसे दूर करने के लिए रणनीति में बदलाव होगा। मसलन किस राज्य में सीएम प्रत्याशी घोषित करना है इसमें नहीं।  कहां के लिए किन किन मुद्दों को प्राथमिकता से उठाना है। जैसी बातें में बदलाव किए जा सकते हैं।

    ब्रांड मोदी पर ही होगा जोर

    चुनावी राज्यों में वैसे तो भाजपा अपने  हिन्दुत्व जैसे परंपरागत मुद्दों को लेकर ही आगे बढ़ने की बात कर रही है पर 2024 की तैयारी को इसमें जोड़ते हुए पार्टी मोदी सरकार के 9 साल के कार्यकाल को का रिपोर्ट कार्ड लेकर गांव गांव पहुंचने की योजना बना रही है। इसके लिए पाई पाई जनहित में खर्च का स्लोगन रखा गया है भाजपा नेताओं का कहना है की पार्टी कार्यकर्ता इन योजनाओं को लेकर देश के गांव-गांव तक पहुंचेंगे और लोगों को यह बताएंगे कि किस तरह मोदी के 9 साल के कार्यकाल में भारत ने बुलंदियां हासिल की है 30 मई से 30 जून तक यह कार्यक्रम देशभर में चलेगा।