Category: देश

  • पत्रकार फर्जी खबरों पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को अधिकार देने के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहे हैं?

    पत्रकार फर्जी खबरों पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को अधिकार देने के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहे हैं?

    सरकार की अधिकृत सूचना इकाई पीआईबी को सोशल मीडिया मंचों पर फ़र्ज़ी ख़बरों की निगरानी का अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव पर विभिन्न मीडिया संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. इससे पहले एडिटर्स गिल्ड ने कहा था कि फ़र्ज़ी ख़बरों का निर्धारण सिर्फ़ सरकार के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है, इसका नतीजा प्रेस को सेंसर करने के रूप में निकलेगा.

    नई दिल्ली//  संपादकों की शीर्ष संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर उनसे आईटी नियमों में संशोधन को ‘हटाने’ का आग्रह किया है, जो सरकार की मीडिया शाखा ‘पत्र सूचना कार्यालय’ (पीआईबी) की फैक्ट चेकिंग इकाई द्वारा ‘फर्जी’ के रूप में पहचाने गए समाचार या सूचना को हटाने का निर्देश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को देता है. वैष्णव को भेजे गए एक पत्र में गिल्ड ने मंत्रालय से डिजिटल मीडिया के लिए नियामक ढांचे पर प्रेस निकायों, मीडिया संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ परामर्श शुरू करने के लिए कहा, ताकि प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर न किया जा सके.

    समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, गिल्ड ने कहा कि वह प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) को व्यापक अधिकार देने वाले प्रस्तावित संशोधन से ‘बेहद चिंतित’ है.

    पत्र में कहा गया है, ‘यह नई प्रक्रिया मूल रूप से स्वतंत्र प्रेस को दबाने का काम करती है और पीआईबी या तथ्य जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी अन्य एजेंसी को व्यापक अधिकार देगी, ताकि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को ऐसी किसी भी सामग्री को हटाने के लिए मजबूर किया जा सके, जिससे सरकार को परेशानी हो सकती है.’ इस प्रस्तावित संशोधन से इस एजेंसी को व्यापक नियामक शक्तियां देने की मांग की गई है, जो स्पष्ट रूप से अवैध और असंवैधानिक है.’ गिल्ड ने नोट किया कि पीआईबी की भूमिका सरकार के मामलों पर समाचार संगठनों को सूचना प्रसारित करने तक सीमित है .

    गिल्ड ने दोहराया कि प्रक्रियाओं की परवाह किए बिना संशोधन अपने आप में एक अवैध कदम था, क्योंकि पीआईबी के पास किसी भी क्षमता में प्रेस का नियामक होने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है.

    इससे पहले बीते 18 जनवरी को भी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक बयान में इस प्रस्ताव पर गहरी चिंता जताते हुए ने कहा था कि फर्जी खबरों का निर्धारण सिर्फ सरकार के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है, क्योंकि इसका नतीजा प्रेस को सेंसर करने के रूप में निकलेगा.

    दरअसल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बीते 17 जनवरी को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (आईटी नियम) के मसौदे में संशोधन जारी किया, जिसे पहले सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया था.

    इसमें सोशल मीडिया पर गलत, फर्जी या भ्रामक सामग्री की पहचान का जिम्मा पीआईबी या किसी अन्य सरकारी एजेंसी को देने का जिक्र है. इसे ऑनलाइन मीडिया के एक हिस्से ने सरकारी नियंत्रण की कोशिश बताया है.

    इसमें कहा गया है कि पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की फैक्ट-चेकिंग इकाई द्वारा ‘फर्जी (फेक)’ मानी गई किसी भी खबर को सोशल मीडिया मंचों समेत सभी मंचों से हटाना पड़ेगा.

    ऐसी सामग्री जिसे ‘फैक्ट-चेकिंग के लिए सरकार द्वारा अधिकृत किसी अन्य एजेंसी’ या ‘केंद्र के किसी भी कार्य के संबंध में’ भ्रामक के रूप में चिह्नित किया गया है, उसे ऑनलाइन मंचों (Intermediaries) पर अनुमति नहीं दी जाएगी.

    नए संशोधन प्रस्ताव को लेकर विभिन्न मीडिया संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अलावा प्रेस एसोसिएशन, डिजिपब फाउंडेशन ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन जैसे मीडिया संगठनों ने भी सरकार से संशोधन को वापस लेने की मांग की है.

    इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन ने ‘फर्जी समाचार’ पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को सशक्त बनाने के कदम का विरोध किया और सभी पार्टियों के सांसदों से हस्तक्षेप की मांग की है .  सांसदों को लिखे एक खुले पत्र में, IJU ने सांसदों से “संविधान में निहित सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार” की रक्षा के प्रयासों के लिए अपनी आवाज़ देने की अपील की है। पत्रकारों के निकाय ने ऑनलाइन सामग्री के नियमन के लिए भारतीय प्रेस परिषद की तर्ज पर एक स्वतंत्र निकाय के गठन की भी मांग की है।

    इस बीच इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) ने सरकार से अनुरोध किया कि आईटी नियमों में उस मसौदा संशोधन को वापस लिया जाए, जिसके तहत सोशल मीडिया मंचों के लिए पीआईबी की फैक्ट चैकिंग इकाई द्वारा फर्जी घोषित खबर या सूचना को हटाना जरूरी होगा.संगठन  ने कहा, ‘अपने स्वयं के मामले में न्यायाधीश बनने के लिए कानून बनाकर, सरकार नियमों के एक सेट में प्रस्तावित संशोधन के माध्यम से, जो अन्यथा भी चिंता का कारण बनता है, प्रभावी रूप से आलोचना और यहां तक ​​कि निष्पक्ष टिप्पणी को दबाने के लिए कदम उठा रही है.’

    आईएनएस के अलावा न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (एनबीडीए) ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों के संशोधनों के मसौदे को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि  बिना किसी नियंत्रण और संतुलन के सरकार को इस तरह की शक्तियां प्रदान करने से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गला घोंट दिया जाएगा और मीडिया पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.

    एनबीडीए ने कहा कि समाचार मीडिया को विनियमित करने के लिए पर्याप्त कानून, विनियम और वैधानिक निकाय हैं तथा इस तरह के संशोधन से सरकार द्वारा अत्यधिक विनियमन होगा जो न तो वांछनीय और न ही स्वीकार्य है. एनबीडीए ने कहा, ‘संविधान में इस तरह की सेंसरशिप की परिकल्पना नहीं की गई है.’

    मालूम हो कि इससे पहले डिजिटल मीडिया संगठनों के एक संघ ‘डिजीपब’ ने बीते 19 जनवरी को कहा था कि आईटी नियमों में प्रस्तावित संशोधन संभावित रूप से प्रेस की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाने के लिए एक सुविधाजनक संस्थागत तंत्र बन सकता है.

    इसके अलावा, प्रेस एसोसिएशन ने एक बयान में कहा था, ‘प्रेस काउंसिल पहले से ही फर्जी समाचार की कई शिकायतों पर फैसला कर रही है. पीआईबी जैसी विशुद्ध रूप से सरकारी संस्था को फर्जी समाचार को निर्धारित करने और कार्रवाई करने की शक्ति मिलने से प्रेस काउंसिल का अधिकार, स्वतंत्रता कम हो जाएगी, जो 1966 से सुचारू रूप से काम कर रही है.’

    गौरतलब है कि 2019 में स्थापित पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई, जो सरकार और इसकी योजनाओं से संबंधित खबरों को सत्यापित करती है, पर वास्तविक तथ्यों पर ध्यान दिए बिना सरकारी मुखपत्र के रूप में कार्य करने का आरोप लगता रहा है.

    मई 2020 में  वेब साईट न्यूज़लॉन्ड्री ने ऐसे कई उदाहरण बताए थे, जहां पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई वास्तव में तथ्यों के पक्ष में नहीं थी, बल्कि सरकारी लाइन पर चल रही थी.

    फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के संस्थापक प्रतीक सिन्हा का भी कहना है कि समस्या यह भी है कि पीआईबी किन खबरों का फैक्ट-चेक करने का फैसला करता है और किनको नजरअंदाज करता है.

    उन्होंने वेब साईट न्यूजलॉन्ड्री से कहा था कि , ‘मुद्दा यह है कि पीआईबी फैक्ट चेक इकाई क्या सत्यापित करने का फैसला करती है. यदि आप पीआईबी द्वारा किए गए फैक्ट-चेक देखते हैं तो कुछ अपवादों को छोड़कर वे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचने से बचाने की कोशिश करते हैं. वे उन चुनिंदा खबरों का फैक्ट-चेक करते हैं, जो स्वभाव से राजनीतिक हैं और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए आलोचनात्मक हैं.’

    उन्होंने कहा था, ‘यह कहना कि केवल पीआईबी फैक्ट-चेकिंग इकाई ही यह तय करेगी कि क्या सच है और क्या झूठ है, बताता है कि केवल सरकार के खिलाफ गलत सूचना को हटाया जाएगा. अन्य सभी गलत सूचनाओं को ऑनलाइन बने रहने की अनुमति होगी.’

    पीआईबी को ऑनलाइन सामग्री की पड़ताल का अधिकार देने पर अगले महीने चर्चा: मंत्री

    इस बीच  इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री चंद्रशेखर मंगलवार को कहा कि सरकार की अधिकृत सूचना इकाई पीआईबी को सोशल मीडिया मंचों पर फर्जी खबरों की निगरानी का अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव पर अगले महीने सभी हितधारकों के साथ चर्चा की जाएगी. हम अगले महीने की शुरुआत में इस पर अलग से चर्चा करेंगे.’

  • एक बार फिर क्यों चर्चा में है पारसनाथ पहाड़ी ?

    एक बार फिर क्यों चर्चा में है पारसनाथ पहाड़ी ?

    पारस नाथ पहाड़ी को मुक्त कराने के लिएआदिवासियों ने शुरू की मारंग बुरु बचाओ यात्रा

    जमशेदपुर// झारखंड राज्य के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पहाड़ी जिस पर जैन समाज का पवित्र तीर्थ स्थल समवेत शिखर स्थित है, एक बार फिर चर्चा और विवादों में है ।अब आदिवासी इस पहाड़ी पर अपना दावा कर रहे हैं उनका कहना है कि यह स्थल संथाल आदिवासियों का सर्वाधिक बड़ा पूजा स्थल है जिससे मरांग बुरु यानी ईश्वर का दर्जा प्राप्त है। पर सरकार ने इसे जैन समुदाय को सौंप दिया है।

    जैन समाज पारसनाथ को पर्यटन स्थल बनाए जाने का विरोध कर रहा है उनकी मांग है कि सम्मेद शिखर जी के 50 किलोमीटर के दायरे में मांस और मदिरा का सेवन और बिक्री प्रतिबंधित की जाए वही आदिवासियों का कहना है कि पारसनाथ पहाड़ी की तलहटी में उनके ईश्वर की पूजा होती है जहां जाहेरथान और माझीथान के रूप में 2 पूजा स्थल हैं और सेहराब तथा वंदना पर्व से पहले वहां मुर्गे और बकरियों की बलि दी जाती है ।आदिवासियों का आरोप है की सरकार ने पूरी पारसनाथ पहाड़ी को जैन समाज को सौंप दिया है जो कि उनका मरांग बुरु है। आदिवासियों के नेता सालखान मुर्मू कहना है कि मरांग बुरु आदिवासियों के लिए अयोध्या के राम मंदिर से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

     पिछ्ले 17 फरवरी को आदिवासी से निकाल अभियान संगठन ने पारसनाथ पहाड़ी को मुक्त कराने के लिए देशभर में “मरांग बुरु बचाओ यात्रा” की शुरुआत की है । यह यात्रा 1 माह तक चलेगी एएसए के अध्यक्ष सलखान मुरमू कहना है कि संगठन के सदस्य असम बिहार उड़ीसा पश्चिम बंगाल और झारखंड के आदिवासी बहुल वाले 50 जिलों में कलेक्टर कार्यालय के बाहर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करेंगे और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन दिए जाएंगे। इन यात्राओं का उद्देश्य पूरे देश का समर्थन प्राप्त करना है।

    10 जनवरी को ‘मरांग बुरु बचाओ’ अभियान के लिए पारसनाथ पहाड़ी पर ‘महाजुटान’ करने का ऐलान किया गया था अपने पुरखों की पारंपरिक धरोहर और आस्था के स्थल से हटाये जाने तथा यहां आकर मांस-मदिरा खाने के विरोध के नाम पर सबके आने पर ही प्रतिबंध लगाने की बात ने आदिवासियों को आक्रोशित कर दिया। उनका कहना था कि यहां कल तक हम इसके घोषित मालिक थे और आज यहां हमारे ही आने जाने पर रोक लगाई जा रही है। इस महाजुटान को संबोधित करते हुए सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा, कल तक हमें विकास के नाम पर विस्थापित किया गया और अब तथाकथित धार्मिक आस्था के नाम पर विस्थापित किया जा रहा है। ऐसा नहीं होने दिया जाएगा।

  • रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    इटारसी। इटारसी से लगभग 7 किलोमीटर पर स्थित रैसलपुर ग्राम  के निवासी राजेन्द्र प्रसाद चौधरी के घर के पीछे बाड़े में पाई गई दुर्लभ बौद्ध प्रतिमा अब नर्मदापुरम जिला पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित की जा सकती है, पिछले दिनों  राज्य के  पुरातत्व विभाग के अधिकारी ने पहुंच कर मूर्ति का निरीक्षण किया उनके साथ दा बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक और सदस्य भी थे।

    पुरातत्व विभाग के सीनियर गाइड  हुकुमचंद मलिक ने बताया की यह  मूर्ति पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है  बुद्ध की मूर्ति का यहां मिलना बहुत  दुर्लभ है और पूरे नर्मदापुरम के लिए गौरव की बात है। 

    इस मूर्ति की यहां उपस्थिति की ओर सबसे पहले वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु मिश्र और ख़बर भारतवर्ष की टीम ध्यान आकर्षित करवाया था, इसके बाद द बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक प्रहलाद निकम ने पुरातत्व विभाग से संपर्क कर इस तरफ़ ध्यान आकर्षित किया, 

    क्या है बुद्ध प्रतिमा की विशेषता ?

    ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण एक बुद्ध प्रतिमा है जो  गाँव के ही एक कृषक के बाड़े में एक सीमेंट के छोटे से चबूतरे पर रखी हुई है । इस प्रतिमा का क्षेत्र में होना दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । बलुआ पत्थर से बनी करीब 4 फुट ऊंची और 3 फुट से ज्यादा चौड़ी यह प्रतिमा करीब डेढ़ फुट मोटे शिलाखंड पर उकेरी गई है । मूर्ति में भगवान बुद्ध ध्यानस्थ मुद्रा में है। चेहरा शांत और सौम्य है, केश विन्यास अद्वितीय है । बुद्ध के दोनों और चँवरधारी पुरुष है और सिर के दोनों और दो मालाधारी स्त्री प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से अंकित है । प्रतिमा के ऊपर त्रीछत्र बना हुआ है । प्रतिमा बीच में से टूटी हुई है जिसे जोड़ कर रखा गया है। 

    देवराज बाबा के नाम से होती थी पूजा

    कृषक श्यामसुंदर चौधरी बताते हैं कि उनके भाई राजेंद्र चौधरी के घर के पीछे यह मूर्ति वर्षों से बाड़े में गड़ी हुई थी । इस मूर्ति का ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता था । हमारे पूर्वज  देवराज बाबा के नाम से कई सदियों तक इसकी पूजा करते रहे पर करीब 20 साल पहले जब आसपास की मिट्टी का क्षरण हुआ  तो मूर्ति का सिर दिखाई दिया । जब खुदाई की तो बुद्ध की चार पांच फीट ऊंची प्रतिमा दो टुकड़े में निकली। जिसे हमने चबूतरा बनाकर स्थापित कर दिया है। 

    क्या कभी यहां भव्य मंदिर था ?

    पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र की ज्यादातर प्रतिमाएं 12 वीं शताब्दी की हैं । इस क्षेत्र में बुद्ध की प्रतिमा का मिलना बहुत ही दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । उनका अनुमान है कि इस स्थान पर कोई भव्य मंदिर रहा होगा जो किसी कारण से नष्ट हो गया या कर दिया गया हो और उसके अवशेष आज भी यहां बिखरे हैं। जिन्हे संरक्षण की जरूरत है।

    पुरातत्व सम्पदा से भरपूर है यह क्षेत्र

    इटारसी और उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्र पुरातत्वीय अवशेषों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। अंचल में प्राचीन प्रतिमाएं बहुतायत में फैली हुई है जो कलात्मक दृष्टि से बहुत ही प्राचीन और महत्वपूर्ण हैं। अनेक मूर्तियों को तो ग्रामीण सिंदूर आदि पोत कर देवी देवताओं की तरह पूज रहे हैं। ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, इसके अलावा गांव में अनेक स्थानों पर प्राचीन मूर्तियां सती शिलाएँ, स्थापत्य खंड, स्तंभ आदि बिखरे पड़े हुए हैं । जिसमें प्रमुख रुप से उमा महेश्वर की प्रतिमा का ऊपरी भाग है इस मूर्ति में पार्वती हाथों में दर्पण है। ऊपर अनेक देव प्रतिमाएं हैं। वक्त के कारण मूर्ति अस्पष्ट हो गई है। गांव के मंदिर प्रांगण में पेड़ के नीचे कई मूर्तियाँ रखी  है।शिव की एक अस्पष्ट और खंडित प्रतिमा है जिसमें वे सर्प पकड़े हुए हैं वही अंबिका की प्रतिमा है।  लगभग 17 वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा मंदिर परिसर में दीवार में जड़ी हुई है । सूंड दाहिनी ओर मुड़ी हुई है। गणेश के  सिर और कान शरीर की तुलना में काफी बड़े हैं। शैली के कारण यह प्रतिमा अन्य प्रतिमाओं से अलग है।  गांव में कई पत्थर के बने स्तंभ यहां-वहां बिखरे हुए हैं । उनमें कई बहुत अच्छी स्थिति में है, जिन पर सुंदर नक्काशी और प्रतिमाएं अंकित हैं । कई स्तंभ जमीन में धँसे हुए हैं और उनके बारे में गांव वालों की अपनी अपनी धारणाएं हैं। कुछ सती स्तंभ है जो बहुत अच्छी स्थिति में है। अन्य प्रतिमाएं भी हैं जिनका संरक्षण किया जाना जरूरी है.

  • लापता हैं देश भर के 50 पुरातात्विक महत्व के स्मारक !

    लापता हैं देश भर के 50 पुरातात्विक महत्व के स्मारक !

    केंद्र सरकार ने संसद में दी जानकारी

    नई दिल्ली // संस्कृति मंत्रालय ने कहा है कि राष्ट्रीय महत्व के कई स्मारक (Monuments) तेजी से शहरीकरण, जलाशयों और बांधों से जलमग्न होने के कारण पिछले कुछ सालों में लापता हो गए.

     देश में केंद्र सरकार की ओर से संरक्षित 50 स्मारक गायब हो गए हैं. केंद्र सरकार ने इस संबंध में संसद में जानकारी दी है. केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया है कि देश के 3,693 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों (Centrally Protected Monuments) में से 50 स्मारक लापता हैं. केंद्र सरकार ने कहा है कि स्मारकों का गायब होना गंभीर चिंता की बात है.

    लापता स्मारकों में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के 11 स्मारक शामिल हैं. इसके साथ ही दिल्ली और हरियाणा में दो-दो स्मारक गायब बताए गए हैं. . इसके अलावा सूची में असम, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड के स्मारक भी शामिल हैं

    विडम्बना यह है कि इस बात की जानकारी केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संसद में साल 2013, 2016, 2017, 2020 और 2022 में भी दो बार दी गई है। इसके बावजूद स्मारकों के गायब होने का सिलसिला जारी है।

    8 दिसंबर को संसद में जानकारी
    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से 8 दिसंबर को परिवहन, पर्यटन और संस्कृति पर संसदीय स्थायी समिति को एक रिपोर्ट के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने 18 मई 2022 को संस्कृति सचिव गोविंद मोहन, एएसआई महानिदेशक वी विद्यावती और कई वरिष्ठ अधिकारियों के विचार सुने थे.

    संसद में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) की ओर से कहा गया, ”यह गंभीर चिंता का विषय है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (संस्कृति मंत्रालय) के संरक्षण में राष्ट्रीय महत्व के कई स्मारक तेजी से शहरीकरण, जलाशयों और बांधों की वजह से जलमग्न होने के कारण पिछले कुछ सालों में लापता हो गए हैं. दूरस्थ स्थानों और घने जंगलों में पता लगाने में दिक्कतों की वजह से कुछ स्मारक गायब हुए हैं”

    क्यों और कहां से लापता हैं स्मारक?
    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के मुताबिक इन स्मारकों में से 14 तेजी से शहरीकरण के कारण खो गए हैं, जबकि 12 जलाशयों या बांधों से जलमग्न हैं. बाकी 24 स्मारकों के स्थान पता नहीं चल रहे(अनट्रेसेबल या जिसका अस्तित्व नहीं रहा) हैं।

    अधिकारियों ने बताया कि इनमें कई स्मारक शिलालेखों से जुड़े थे, जिनका कोई निश्चित स्थान पता नहीं है. इन्हें स्थानांतरित या क्षतिग्रस्त किया जा सकता है और उनका पता लगाना मुश्किल हो सकता है. अधिकारियों ने ये भी कहा कि 1930, 40 और 50 के दशक में केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों की एक बड़ी संख्या की पहचान की गई थी और आजादी के बाद के दशकों में उन्हें संरक्षित करने के बजाय नए स्मारकों की खोज पर ध्यान केंद्रित किया गया था. पहली बार जब स्मारकों का भौतिक सत्यापन किया जा रहा था तो 2013 में पता चला कि 92 स्मारक गायब हैं। इन 92 स्मारकों में से एएसआई 42 की पहचान करने में कामयाब रहा है ।

    रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारियों ने बताया कि आजादी के बाद की सरकारों की प्राथमिकताएं स्वास्थ्य और विकास रही, इसलिए विरासत को भी नजरअंदाज किया गया. अब भी कई बड़े और छोटे स्मारक (Monuments) देखभाल में कमी की वजह से विलुप्त होने के कागार पर हैं.

    (चित्र प्रतीकात्मक है )

  • क्या भारत नशीली दवाओं और शराब के दुरूपयोग संकट के कगार पर है ?

    क्या भारत नशीली दवाओं और शराब के दुरूपयोग संकट के कगार पर है ?

    नई दिल्ली // एक ताजे सरकारी राष्ट्रीय सर्वेक्षण से यह खुलासा हुआ है है कि भारत के युवाओं की एक बड़ी संख्या शराब, भांग या ओपिओइड की लत से पीड़ित है और नशे के आदी चार में से तीन लोगों को इलाज नहीं मिल पाता है।

    देश में 15.8 मिलियन बच्चे जिनकी  उम्र 10 से 17 वर्ष की है मादक पदार्थों के आदी हैं, पिछले दिनों  भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह आंकड़े पेश किये हैं .

    यह सम्भवत:भारत में मादक द्रव्यों के सेवन की सीमा और पैटर्न पर पहले व्यापक सर्वेक्षण है जिसे , नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर ने किया है . सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, 10 चिकित्सा संस्थानों और 15 गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से देश के सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सर्वेक्षण किया गया था। डेटा संग्रह में 1,500 से अधिक कर्मचारी शामिल थे। यह सर्वे 2017 से 2018 के बीच किया गया था  2019 में जनता के लिए जारी किया गया और इसी महीने सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया.

    यह स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भारत में नशीली दवाओं के दुरुपयोग के आंकड़े वास्तव में बहुत अधिक हैं।

    अध्ययन में क्या पाया गया?

    सर्वेक्षण के अनुसार, शराब भारत में लोगों द्वारा सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला साइकोएक्टिव पदार्थ है, इसके बाद भांग और ओपिओइड का नंबर आता है। भांग के सर्वाधिक प्रचलन वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिक्किम और छत्तीसगढ़ शामिल हैं।

    रिपोर्ट में कहा गया है, “30 मिलियन से अधिक व्यक्ति कैनबिस उत्पादों का उपयोग करते हैं और लगभग 2.5 मिलियन कैनबिस निर्भरता से पीड़ित हैं, ” 22.6 मिलियन लोग ओपिओइड का उपयोग करते हैं और लगभग 7.7 मिलियन व्यक्तियों को ओपिओइड उपयोग की समस्याओं के लिए मदद की आवश्यकता होती है।

    इसमें यह भी पाया गया कि देश की आबादी में 2.06% ओपिओइड उपयोगकर्ता शामिल हैं, और 1.7% बच्चे और किशोर और 0.58% वयस्क इनहेलेंट के उपयोगकर्ता हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अवैध दवाओं पर निर्भरता से पीड़ित लोगों में से चार में से तीन को इलाज नहीं मिल पाता है।

    देश में 14.6 फीसदी (लगभग 160 मिलियन ) लोग शराब का सेवन करते हैं

    2017 के एक अध्ययन के मुताबिक देश में अवैध ड्रग्स के कारण हर साल बाईस हजार से ज्यादा लोगोंकी मौत हो जाती है .अवैध ड्रग्स लेने के आदी चार में से तीन को इलाज नहीं मिल पाटा है .  .

    दवाओं की अन्य श्रेणियां – अर्थात् कोकीन, एम्फ़ैटेमिन प्रकार के उत्तेजक और मतिभ्रम – का उपयोग देश की आबादी के एक छोटे से हिस्से द्वारा किया जाता है।

    जहाँ तक राज्यवार आंकड़ों का सवाल है उत्तर प्रदेश ,पंजाब सिक्किम और छत्तीसगढ़ केनाबिस के प्रयोग में सूची में सबसे ऊपर हैं . पंजाब मे पचहतर फ़ीसदी  से ज्यादा युवा ड्रग्स के दुरुपयोग् का  शिकार है .

    स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारियों का ऑफ़ थे रिकार्ड कहना है कि, “परिणाम यह भी संकेत देते हैं कि साइकोएक्टिव पदार्थों की मांग पारंपरिक, कम क्षमता वाले, पौधे-आधारित उत्पादों जैसे अफीम से अधिक शक्तिशाली और हेरोइन जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों की ओर बढ़ रही है।”

    क्यों बढ़ रहा है

    नशीली दवाओं के दुरुपयोग में वृद्धि के पीछे कमजोर नीतियों को दोषी माना जा रहा है ,

    निष्कर्ष बताते हैं कि सख्त दवा नियंत्रण कानूनों के अस्तित्व और पूरे भारत में दवा आपूर्ति नियंत्रण की दिशा में काम करने वाली एजेंसियों की एक बड़ी संख्या के बावजूद, नियंत्रित दवाओं की एक विस्तृत विविधता का अभी भी उपयोग किया जा रहा है।

    कई राज्यों में मादक द्रव्यों के सेवन को रोकने के लिए नीतियों का अभाव है। सरकार द्वारा संचालित स्कूल आमतौर पर नशीली दवाओं के दुरुपयोग के बारे में संवेदीकरण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित नहीं करते हैं।

    एच.एस. फूलका जो बचपन बचाओ आंदोलन के वकील हैं, जो भारत में बच्चों के अधिकारों के लिए एक आंदोलन है, जिसने बच्चों के बीच नशीली दवाओं के दुरुपयोग की चिंताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। उनका मानना है  कि यह मुद्दा राष्ट्रीय सर्वेक्षण के निष्कर्षों से कहीं अधिक गंभीर है। “बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं जो प्रभावित हैं और इस सर्वेक्षण में उनकी गिनती नहीं की गई है… वे नशे के आदी हैं। स्कूलों और इसके आसपास के इलाकों में ड्रग की उपलब्धता एक समस्या है और आखिरकार वे पेडलर बन जाते हैं।”

    ओपियोइड का दुरुपयोग प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गया है. राज्यों के पास इस पदार्थों के दुरूपयोग को रोकने कोई कारगर नीति नहीं है. सरकारों द्वारा चलाये जा रहे जागरूकता अभियान की पहुँच बहुत कम लोगों तक है ,  स्थिति का अंदाज इस बात से लग जाता है कि 57.4 लाख ड्रग की आदि महिलाओं के इलाज के लिए देश भर में मात्र 4 केंद्र  हैं .

    ओपियाड और कैनाबिस क्या हैं ?

    ओपियाड जिस अकसर नशीले पदार्थ के रूप में जाना जाता है ,यह दवाओं का एक वर्ग है जो दर्द से छुटकारा पाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है इसमें दर्द निवारक गुण होता है और आफीम के सत से बनता है , इसको लेने से अआनंद की अनुभूति होती है , ,वहीं कन्नाबिस श्रेणी में भांग ,गांजा और मेरिजुआना जैसे पदार्थ शामिल हैं

  • दक्षिण भारतीय फिल्मों में दिखने वाली भव्य हवेलियाँ कहाँ हैं ?

    दक्षिण भारतीय फिल्मों में दिखने वाली भव्य हवेलियाँ कहाँ हैं ?

    इन दिनों टीवी पर बॉलीवुड के बजाय दक्षिण भारत की फिल्मों की भरमार है, इन फिल्मों में खूबसूरत हवेलियां और कलात्मक और परंपरागत गांव दिखाए जाते हैं ,आप जानते हैं यह हवेलियां कहां स्थित है ? और यह गांव कौन से हैं ? आइए आपको बताते हैं इसके बारे में-

     जी हां ! यह हैं चेट्टियारों की हवेलियां । चेट्टियार दक्षिण भारत या कहें तमिलनाडु की व्यापारिक जाति है । यह मदुरै के करैकुड़ी के आसपास लगभग 72 गांव में बसे हुए हैं । इलाका चेट्टीनाड कहलाता है और यहां रहने वाले चेट्टियार।

    कौन है चेट्टियार?

    हवेलियों पर बात करने से पहले हम चेट्टियारो के इतिहास पर नजर डालते हैं। चेट्टियार चेट्टिनाड इलाके में रहने वाली  व्यावसायिक जाति है । यह सदियों पहले नमक का कारोबार करते थे, फिर जवाहरात का कारोबार करने लगे। 19वीं सदी तक यह इलाके में बड़े साहूकार बन गए। पैसा उधार देने और ब्याज लेने  लगे। 1826 में जब अंग्रेजों ने म्यांमार (वर्मा ) पर कब्जा किया तो चेट्टियार वहां गए और साहूकारी करने लगे, इससे दक्षिण पूर्व एशिया में बसने वाले चेट्टियार  मालामाल हो गए, एक समय ऐसा आया कि इन देशों के स्थानीय लोग इनसे असुरक्षा महसूस करने लगे ।

    इन चेट्टियारों ने  विदेशों में कमाई अपनी पूंजी का बड़ा हिस्सा तमिलनाडु के अपने क्षेत्र में भव्य हवेलिया बनाने में खर्च किया।

    चेट्टियारों की हवेलियाँ

     चेट्टियारों की हवेलियां का स्थापत्य अपनी भव्यता , मन मोह लेने वाले रंगों और स्थानीय और विदेशी वास्तुशिल्प के मिश्रण या तालमेल की खूबसूरत मिसाल है। चटख रंगों का इस्तेमाल इन्हें और भी आकर्षक बना देता है। चेट्टियारों ने हवेलियों के निमार्ण में स्थानीय हस्तकला को बहुत अहमियत दी । विशेष तौर पर रंग-बिरंगे अंथगुड़ी टाइल्स और प्लास्टर और लकड़ी की स्थानीय नक्काशी को खूब बढ़ावा दिया।इसके साथ ही जापानी टेल्स और इटेलियन मार्वल का भी प्रयोग है .

    कन्नाडुकाथन में स्थित राजा मुथैया की हवेली चेट्टियारों की हवेलियों की सुंदरता को समझने या परखने का आदर्श नमूना है । ऊंची दीवारें लंबे-लंबे बरामदे और बड़े-बड़े हाल चारों तरफ आता और झुकी हुई इलाहाबादी टाइल्स के अंदाज में बनी छत इन मकानों की खासियत है. अंदर बाहर दोनों तरफ बरामदे (कुछ-कुछ उत्तर भारत के पारंपरिक मकानों की तरह जैसे आंगन में लगी परछी  हुआ करती थी और जिन में बैठी महिलाएं सब्जी भाजी काटने छापने को लेकर बड़ी पापड़ अचार बनाने जैसे दिन भर सारे काम बातचीत करते हुए निपटा लिया करती थी।) इस तरह इस हवेली में भी दोनों तरफ  दुमंजले बरामदे हैं, बरामदे में सुंदर और गजब की फिनिशिग और चिकने खंबे। खम्बों पर ऊपर नीचे गजब की नक्काशी। घर के अंदर इस बरामदे से होकर ही जाया जा सकता है पहला हाल कुछ निजी किस्म का तो है, पर यहां परिवार के अलावा  कुछ खास लोगों को भी आने की इजाजत होती थी। इन हवेलियों के हाल का निमार्ण यूरोपीय शैली और सजावट वाला होता  हैं । अंग्रेजों के बंगलों के समान बड़ी बड़ी खिड़कियां।

    इन भव्य हवेलियों  को स्थानीय भाषा में “पेरिया वीडू” यानी बड़ा मकान कहलाते हैं।

    चेट्टियार जहांअपनी हवेलियों के  बाहरी बरामदों और हॉल की भव्य सजावट करते हैं , वहीं भीतरी हिस्सों में सादगी नजर आती है। घर की महिलाओं की सुविधा और निजता का ज्यादा ख्याल रखा जाता था क्योंकि घर के मर्द अक्सर विदेश में रहते थे, घर पूरी तरह से महिलाओं के हवाले हुआ करते थे।

    अंथगुड़ी टाइल्स ?

    चेट्टिनाड के मकानों के रंग-बिरंगे बेल बूते  वाले फर्श खास किस्म के टाइल्स से बनते हैं  । यह टाइल्स स्थानीय स्तर आथनगुड़ी गांव तैयार किए जाते हैं । इसलिए इसे अथंगुड़ी टाइल कहा जाता है

     यह टाइल्स  सस्ते मिलते हैं और डिजाइन के हिसाब से इनकी कीमत बढ़ती जाती है। इनकी खासियत है इनकी अलग किस्म की चमक होती है पर इनमें भड़कीला पन नहीं होता।  यह टाइल्स किसी मशीन से नहीं बनते बल्कि इन्हें हाथ से तैयार किया जाता है। इसके लिए इलाके की साधारण मिट्टी इस्तेमाल होती है मिट्टी से बने यह टाइल्स एक कांच के तले वाले खास कांचे में रखकर धूप में सुखाया जाते हैं इन खातों में पहले से रंग भरे रहते हैं सूखने पर मिट्टी के स्टाइल पर कांच की सतह वाली डिजाइन बन जाती है।