Category: देश

  • आधार कार्ड आयु के निर्धारण का आधार नहीं- हाईकोर्ट

    आधार कार्ड आयु के निर्धारण का आधार नहीं- हाईकोर्ट

    जुवेनाइल जस्टिस पर महत्वपूर्ण निर्णय

    जबलपुर // मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय कहा है कि आयु निर्धारण के लिए आधार कार्ड स्वीकार नहीं है . इस मामले में उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर भरोसा किया जिसमे कहा गया कि आधार केवल UIDAI द्वारा जारी किया गया एक दस्तावेज है और इस प्रकार जेजे अधिनियम के वैधानिक प्रावधानो का अधिक्रमण नही कर सकता है।
    मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने हाल ही में कहा है कि आधार कार्ड नाबालिग बलात्कार पीड़िता की उम्र निर्धारित करने का प्रमाण नहीं है। [मनोज कुमार यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य]।

    एकल न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल ने कहा कि नाबालिग बलात्कार पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए अदालतों को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया पर विचार करना होगा।

    मामले में तथ्य यह है कि याचिकाकर्ता पर नाबालिग से कथित रूप से बलात्कार करने का मुकदमा चल रहा है .सुनवाई के दौरान उसने ट्रायल कोर्ट के समक्ष आवेदान दिया ,जिसमे नाबालिग शिकायतकर्ता के आधार कार्ड की मूल प्रति लाने का निर्देश देने की मांग की गई ,कोर्ट ने यह आवेदन निरस्त कर दिया ,इसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट का रुख किया .

    पीठ ने कहा कि जेजे एक्ट किसी व्यक्ति की आयु निर्धारित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र और स्कूल छोड़ने के प्रमाण पत्र पर निर्भर होने का प्रावधान करता है। बेंच ने कहा कि उन दस्तावेजों की अनुपस्थिति में, अधिनियम में किसी व्यक्ति की उम्र निर्धारित करने के लिए अस्थि परीक्षण का प्रावधान है।

    पीठ ने 19 अप्रैल के आदेश में कहा, “इसलिए, उपलब्ध वैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए और अधिनियम के तहत निर्धारित अनुमान और आयु के निर्धारण के लिए आधार कार्ड को आयु के प्रमाण के रूप में लेने का कोई प्रावधान नहीं है, मेरी राय है कि इस उच्च न्यायालय के पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप की मांग करने वाले आक्षेपित आदेश में कोई अवैधता नहीं है।”

    न्यायमूर्ति अग्रवाल को एक विशेष अदालत द्वारा 8 अप्रैल, 2023 को आयु के प्रमाण के रूप में आधार कार्ड को स्वीकार करने से इनकार करने के आदेश में संशोधन की मांग करने वाली एक याचिका जब्त की गई थी।

    अपीलकर्ता ने जब्बार बनाम राज्य के मामले में दिए गए दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें उच्च न्यायालय ने कहा था कि आधार एक श्रेष्ठ दस्तावेज है और उम्र का निर्धारण करते समय इस पर विचार किया जाना चाहिए।

    पीठ ने, हालांकि, जरनैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों पर भरोसा किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि जेजे अधिनियम के तहत वैधानिक नियमों को केवल इसलिए नहीं बदला जा सकता है क्योंकि भारत सरकार द्वारा एक विशेष दस्तावेज जारी किया गया है। .

    वास्तव में वह दस्तावेज भारत सरकार द्वारा जारी नहीं किया जाता है, बल्कि एक स्वतंत्र एजेंसी, अर्थात् भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) द्वारा जारी किया जाता है।

    शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा,

    “इस प्रकार, मेरी राय में चूंकि आधार कार्ड अभियोजिका की उम्र का प्रमाण नहीं है और उसकी उम्र को जेजे अधिनियम के अनुसार आवश्यक रूप से निर्धारित किया जाना है, यह पुनरीक्षण याचिका विफल होती है और खारिज की जाती है।”

  • इमा कैथल  यानी  500 साल पुराना अनोखा बाज़ार

    इमा कैथल यानी 500 साल पुराना अनोखा बाज़ार

    सिर्फ बाज़ार ही नहीं संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की पूरी कहानी है

     इम्फाल // भारत विविधताओं से भरा देश है. इसका इतिहास,भूगोल,धर्म और संस्कृति का मिल जुल कर कई बार इसे ऐसा रूप दे देती है कि हैरानी होती है . ऐसी ही एक हैरान करने वाली जगह है इमा कैथल

    क्या है इमा कैथल

    इमा कैथल मणिपुर की राजधानी इम्फाल का एक ऐसा बाजार है जो हमारे देश की अनमोल और अनूठी सांस्कृतिक विरासत का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है. इस अनोखे  बाजार की खास बात यह थी कि यहां दुकानदार केवल और केवल महिलाएं हैं । इस बाजार में  पारंपरिक वेशभूषा में हजारों महिलाएं अपनी दुकानें सजाकर बैठती हैं। इस बाजार में करीब 5000 महिलाएं दुकानदारी करती हैं। इसे एशिया का सबसे बड़ा महिला बाजार माना जाता है।

    मैतेई (मणिपुरी) शब्द ‘इमा’ का अर्थ है माँ और ‘कैथल’ का अर्थ है ‘बाज़ार’. इसे नुपी कैथल (महिलाओं का बाज़ार) भी कहते हैं . इस बाज़ार में केवल विवाहित महिलाओं को व्यापार करने की अनुमति है. परम्परा को जीवित रखने के लिए यहाँ पुरुषों को किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि करने की इजाजत नहीं है . 

    संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की कहानी

    इस बाजार का इतिहास 500 साल पुराना है, जो संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की पूरी कहानी है ।  माना जाता है कि मणिपुर में 16 वीं शताब्दी में लुलुप-काबा यानी बंधुवा मजदूरी की प्रथा थी, जिसमें 17 से 60 वर्ष के पुरुषों को खेती करने और युद्ध लड़ने के लिए दूर भेज दिया जाता है। ऐसे में महिलाएं ही घर चलाती थी। खेतों में काम करती थी और बोए गए अनाज को बेचती थी। इससे एक ऐसे बाजार की जरूरत महसूस हुई जहां केवल महिलाएं ही सामान बेचती हों। प्रारंभ में यह महिलाओं के लिए घरेलू सामान , करघे उपकरण, खाने की चीजें ,कपड़े आदि उत्पाद बेचने का मुख्य केंद्र बना

     1904 और 1939 में अंग्रेजी शासन के दौर में जब मणिपुर में जबरन आर्थिक सुधार लागू करने की कोशिश की तो इमा कैथल की इन साहसी महिलाओं ने इसका खुलकर विरोध किया। इन महिलाओं ने एक आंदोलन शुरू किया जिसे नुपी लेन (औरतों की जंग) कहा गया। नुपी लेन के दौरान महिलाओं ने अंग्रेजों की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, चक्काजाम और जुलूस आयोजित किए। यह आंदोलन दूसरे विश्र्वयुद्ध तक चलता रहा। इमा कैथल केवल एक बाजार न रहकर मणिपुर की मातृशक्ति का पर्याय बन गया  । आजादी के बाद भी यह सामाजिक विषयों पर चर्चा की एक जगह के रूप में स्थापित हुआ। यह भी कहा जाता है कि प्रिंट मीडिया की अनुपस्थिति में लोग यहां इसलिए भी आते थे ताकि उन्हें आस-पास की खबरें पता चल सकें। इस बाजार में केवल विवाहित महिलाएं ही दुकान चला सकती हैं। इन महिलाओं का अपना एक संगठन भी है जो जरूरत पड़ने पर इन्हें लोन भी देता है।अगर आप यहां रात में आएंगे तो बिजली की रोशनी में महिलाओं के उजले जगमगाते चेहरे आपका मन मोह लेंगे। गजब का आत्मविश्र्वास होता है इन महिलाओं में। आस-पास के चहल-पहल को देखना भी एक अनूठा अनुभव होता है। यहां महिलाओं को पारंपरिक फेनेक (एक तरह की लुंगी जिसे शरीर के निचले हिस्से में पहना जाता है) और ऊपर इनेफिस (एक तरह का शॉल) पहने हुए नजर आती हैं।

    आज ऐसा है बाज़ार

    वर्तमान मैं इमा कैथल परिसर में तीन बड़ी इमारतें हैं। हर इमारत के भूतल इमाओं के लिए निर्धारित किए गए हैं । प्रत्येक मंजिल को बाजार में बेची जाने वाली वस्तुओं के आधार पर अलग-अलग बांटा गया है।  लैमरेल सिदवी इमाया (पुराना बाजार) इस परिसर की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी संरचना है । यहां की दुकानों पर बांस से बनी वस्तुएं ,शुद्ध रुई के धागों और गहनों से लेकर अलग-अलग प्रकार के फल ,फूल मछलियां, मसाले आदि बेचे जाते हैं। 

    पुराना बाजार में मैतेइयो यानी मणिपुरी लोगों की देवी कैथल लैरेंबी और उनके पति लैरेंबा का एक छोटा सा तीर्थ स्थान भी है। मैतेई  लोगों की पौराणिक कथाओं में देवी कैथल लैरेंबी का एक महत्वपूर्ण स्थान है और माना जाता है कि वह कैथल लैरेंबी बाज़ार और महिला वर्ग की रक्षक हैं।

    इमोएनू इमा कैथल या लक्ष्मी बाजार इस परिसर की सबसे छोटी संरचना है। यहां की दुकानों पर पलंग पोश, मच्छरदानी जैसी घरेलू चीजें शाल तथा पारंपरिक पोशाकों जैसे वस्त्र उत्पाद बेचे जाते हैं। इन दुकानों को मणिपुर के अलग-अलग देशज समुदाय से संबद्ध रंग बिरंगी शालों से सजाया जाता है। फूईबी इमा कैथल या नया बाजार में मुख्य रूप से करघे पर बनी वस्तुएं उसमें भी खासतौर पर मैतई लोगों की पारंपरिक पोशाके  बेची जाती हैं, जिसमें विभिन्न तरह के समय साड़ियां और इनाफी शामिल हैं।

    आज इमा कैथल व्यापार और व्यवसाय का एक समृद्ध केंद्र होने के साथ साथ मणिपुर की महिलाओं को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सहभागी होने में सक्षम बनाता है

  • पूरा फैसला तैयार किये बिना जज नहीं सुना सकते अंतिम निर्णय, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

    पूरा फैसला तैयार किये बिना जज नहीं सुना सकते अंतिम निर्णय, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

    नयी दिल्ली, // उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि एक न्यायिक अधिकारी फैसले के पूरे पाठ को तैयार किए बिना या लिखे बिना, उसके निष्कर्ष वाले हिस्से को खुली अदालत में सुना नहीं सकता।

    साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में निचली अदालत के उस न्यायाधीश को बर्खास्त करने का भी निर्देश दिया, जिन्हें एक मामले में फैसला तैयार किए बिना, उसका निष्कर्ष वाला हिस्सा सुना देने का दोषी पाया गया था।

    उच्चतम न्यायालय की यह व्यवस्था कर्नाटक उच्च न्यायालय के महापंजीयक (रजिस्ट्रार जनरल) की एक अपील पर आई है । इस अपील में पूर्ण अदालत द्वारा न्यायाधीश को बर्खास्त करने संबंधी दिए गए आदेश को रद्द कर उनकी बहाली के लिए दिए गए उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश को चुनौती दी गई थी।

    न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल  की पीठ ने गंभीर आरोपों को ‘‘छिपाने’’ के लिए कर्नाटक उच्च न्यायालय पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि न्यायाधीश का आचरण अस्वीकार्य है।

    पीठ ने कहा ‘‘यह सच है कि कुछ आरोपों का न्यायिक घोषणाओं और न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से संबंध होता है लेकिन वे विभागीय कार्यवाही का आधार नहीं बन सकते हैं।’’

    आगे पीठ ने कहा ‘‘इसलिए, हम उन आरोपों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। ’’ पीठ के अनुसार, लेकिन जो आरोप प्रतिवादी की ओर से निर्णय तैयार करने/लिखने में घोर लापरवाही और उदासीनता से संबद्ध तथा अपरिवर्तनीय हैं, वे पूरी तरह से अस्वीकार्य और एक न्यायिक अधिकारी के लिए अशोभनीय हैं।

    शीर्ष अदालत ने कहा कि जज का अपने बचाव में यह कहना भी पूर्णत: अस्वीकार्य है कि अनुभव की कमी और स्टेनोग्राफर की अक्षमता इसके लिए जिम्मेदार है।

    पीठ के अनुसार, ‘‘लेकिन दुर्भाग्य से, उच्च न्यायालय ने न केवल पंचतंत्र की इस कहानी को स्वीकार किया, बल्कि गवाह के रूप में स्टेनोग्राफर से जिरह नहीं करने के लिए प्रशासन तक को दोषी ठहरा दिया। इस तरह का दृष्टिकोण पूरी तरह से अस्थिर है।’’

    पीठ ने कहा, ‘‘अगर प्रतिवादी का यह मानना था कि सारा दोष स्टेनोग्राफर का है, तो स्टेनोग्राफर को गवाह के रूप में बुलाना उसका जिम्मा था। उच्च न्यायालय ने दुर्भाग्य से सबूत की जिम्मेदारी ही बदल दी।’’

    साथ ही पीठ ने कहा कि उसके सामने ऐसा कोई मामला नहीं आया जिसमें उच्च न्यायालय ने जुर्माने का आदेश खारिज करते हुए यह कहा हो कि कसूरवार के खिलाफ आगे जांच नहीं होगी । ‘‘लेकिन इस मामले में, एक नया उदाहरण तैयार करते हुए उच्च न्यायालय ने वैसा ही किया।’’

  • इंसाफ देने के मामले में कर्नाटक सबसे चुस्त, यूपी सबसे सुस्त… मध्य प्रदेश आठवें स्थान पर …!

    इंसाफ देने के मामले में कर्नाटक सबसे चुस्त, यूपी सबसे सुस्त… मध्य प्रदेश आठवें स्थान पर …!

    नई दिल्ली // भारत में जल्दी इंसाफ देने के मामले में दक्षिणी राज्य कर्नाटक देश के विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे आगे हैं. दूसरा स्थान पर तमिलनाडु है .यह दावा मंगलवार को जारी इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022 में किया गया है . इस रिपोर्ट के मुताबिक अदालतों में  इंसाफ देने के मामले में मध्य प्रदेश देश में आठवें स्थान पर है . वर्ष 2020 के सोलहवें स्थान की तुलना में मध्यप्रदेश  ने इस बार आठ पायदान की लम्बी छलांग लगायी है . इंडिया जस्टिस रिपोर्ट में देश के एक करोड़ से ज्यादा आबादी वाले 18 राज्यों में मध्यप्रदेश का स्कोर 10 में से 5.25 है

    न्याय देने के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे नीचे यानी 18 वें स्थान पर है वहीं राजस्थान 15 वें, बिहार 16 वें, पश्चिम बंगाल 17वें स्थान पर है

    ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ (आईजेआर)-2022  पुलिस, न्यायपालिका, जेल और विधिक सहायता के लिए बजट, संसाधन की उपलब्धता आदि के आधार पर तैयार की गई है।

     रिपोर्ट के अनुसार, न्याय तक सुगम पहुंच प्रदान करने वाले पांच शीर्ष राज्यों में चार दक्षिणी भारत से हैं। एक करोड़ से अधिक आबादी वाले बड़े राज्यों की इस सूची में तीसरा स्थान तेलंगाना ने हासिल किया है, जबकि गुजरात और आंध्र प्रदेश क्रमश: चौथे और पांचवें स्थान पर हैं।

    इंडिया जस्टिस रिपोर्ट की शुरुआत टाटा ट्रस्ट ने 2019 में की थी। यह तीसरी रिपोर्ट है . बता दें कि टाटा ट्रस्ट की अगुवाई में जारी यह रिपोर्ट दक्ष (DAKSH), कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव, कॉमन कॉज, सेंटर फॉर सोशल जस्टिस, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी और टीआईएसएस-प्रयास के सहयोग से तैयार की गई है।

    यह तीसरा आईजेआर रिपोर्ट देश के 25 राज्य मानवाधिकार आयोगों की क्षमता का भी अलग से आकलन करती  है।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत की जेलों में बंद केवल 22 प्रतिशत लोग ही सजायाफ्ता मुजरिम हैं, 77.10 प्रतिशत बंदी विचाराधीन हैं। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022 ने यह दावा कर बताया कि साल 2010 के मुकाबले 2021 तक विचाराधीन बंदियों की संख्या 2.4 लाख से बढ़कर 4.3 लाख पहुंच चुकी है, यानी करीब दोगुनी हुई है।



    रिपोर्ट ने जेलों में क्षमता से अधिक लोगों को रखने पर चिंता जताई। इसके अनुसार 2021 में जेलों में आबादी कुल 5.54 लाख पहुंच चुकी है, जबकि 2020 व 2019 में यह क्रमश: 4.89 लाख व 4.81 लाख थी। केवल 2021 में देश की 1,319 जेलों में 18.1 लाख लोग भेजे गए, जो 2020 के 16.3 लाख से करीब 10.8% अधिक है। मध्यप्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह की जेलों में विचाराधीन बंदियों की संख्या 60% से कम है। अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मेघालय और पुडुचेरी को छोड़ हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में विचाराधीन कैदी बढ़े हैं

  • 8 साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे राहुल ?

    8 साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे राहुल ?

    नई दिल्ली// ‘मोदी उपनाम’ को लेकर की गई टिप्पणी से जुड़े अपराध मानहानि मामले में ऊपरी अदालत द्वारा कांग्रेसी नेता राहुल गांधी की दोष सिद्धि पर रोक न लगाए जाने की सूरत में वे 8 वर्षों के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाएंगे।

     निर्वाचन आयोग के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी एवं चुनावी कानून के विशेषज्ञ ने शुक्रवार को यह बात कही . पूर्व अधिकारी ने जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 का हवाला देते हुए कहा कि राहुल की अयोग्यता 8 साल के लिए होगी इसमें 2 साल के कारावास की अवधि और रिहाई के बाद कानून में निर्धारित 6 साल की अयोग्यता अवधि शामिल है दरअसल जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 के तहत 2 साल या उससे ज्यादा की सजा पाने वाला व्यक्ति दोष सिध्दि की तिथि से अयोग्य हो जाता है और सजा पूरी होने के 6 साल बाद तकअयोग्य रहता है.

  • क्या 2013 के अध्यादेश को जिसे राहुल गांधी ने फाड़ दिया जो उन्हें अयोग्यता से बचा सकता था?

    क्या 2013 के अध्यादेश को जिसे राहुल गांधी ने फाड़ दिया जो उन्हें अयोग्यता से बचा सकता था?

    नई दिल्ली//दस साल पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, गांधी ने अपनी ही सरकार द्वारा पारित अध्यादेश की एक प्रति फाड़ दी थी, जो उन्हें उनकी वर्तमान परेशानी से बचा लेती।

    कांग्रेस  नेता और वायनाड सांसद (सांसद) राहुल गांधी को गुरुवार को आपराधिक मानहानि के अपराध के लिए गुजरात मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद लोकसभा से अयोग्य घोषित कर दिया गया है।

    गांधी के लिए अब एकमात्र विकल्प उच्च न्यायालय से मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश पर रोक लगाना है।

    दिलचस्प बात यह है कि दस साल पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, गांधी ने अपनी ही सरकार द्वारा पारित अध्यादेश की एक प्रति फाड़ दी थी, जो उन्हें उनकी वर्तमान दुर्दशा से बचा लेती।

    2013 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4) को रद्द करने के बाद अध्यादेश पारित किया गया था, जो मौजूदा सांसदों और विधायकों को अयोग्यता से सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत प्रदान करता है, अगर उन्हें कुछ अपराधों के लिए दोषी ठहराया जाता है।

    3 महीने की अवधि के लिए प्रदान किया गया प्रावधान जिसके भीतर सजायाफ्ता मौजूदा सांसद/विधायक को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है। इसके अलावा, यदि मौजूदा सांसद/विधायक को सजा की तारीख से इन तीन महीनों के भीतर अपील या पुनरीक्षण दायर करना होता है, तो उसे तब तक अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि अपील या पुनरीक्षण का निपटारा नहीं हो जाता।

    सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस बनाम भारत संघ के अपने प्रसिद्ध फैसले में इस प्रावधान को रद्द कर दिया था।

    यूपीए सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से जनप्रतिनिधित्व (दूसरा संशोधन और मान्यकरण) विधेयक, 2013 द्वारा फैसले को रद्द करने का प्रयास किया था।

    अध्यादेश कैबिनेट द्वारा पारित किया गया था और राष्ट्रपति को उनकी सहमति के लिए भेजा गया था जब गांधी ने एक संवाददाता सम्मेलन में अध्यादेश को “पूरी तरह से बकवास” के रूप में खारिज कर दिया था।

    अंततः इसे वापस ले लिया गया।

  • लोगों को बेवजह हिरासतों में भेजने वाले  मजिस्ट्रेटों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

    लोगों को बेवजह हिरासतों में भेजने वाले मजिस्ट्रेटों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

    सुप्रीम कोर्ट निचली अदालतों से बेवजह की हिरासत में भेजे जाने के मामलों पर सख्त है। अदालत ने कहा है कि ऐसे मजिस्ट्रेट को ट्रेनिंग की जरूरत है और उन्हें न्यायिक अकादमियों में भेजना चाहिए।
    नई दिल्ली // सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो न्यायिक दंडाधिकारी या न्यायिक मजिस्ट्रेट बेवजह लोगों को हिरासत में भेजते हैं, उन्हें कौशल बढ़ाने के लिए न्यायिक अकादमियों में भेजना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस्ट संजय किशन कौल, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने यह व्यवस्था दी है। अदालत ने कहा है कि ऐसे मैजिस्ट्रेट से न्यायिक कार्य वापस ले लिया जाना चाहिए और ट्रेनिंग के लिए न्यायिक अकादमियों में भेजा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने खासकर उत्तर प्रदेश में इस तरह के मामलों का मुद्दा भी उठाया है।

    बेवजह की हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
    सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा है कि एक तो ऐसे लोगों को हिरासत में भेजा जा रहा है, जिसकी आवश्यकता नहीं है और फिर आगे की मुकदवेबाजी का अवसर पैदा कर दिया जाता है। अदालत ने कहा है कि यह ऐसी बात है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और हमारा मानना है कि यह हाई कोर्ट की ड्यूटी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनकी निगरानी में निचली अदालतें इस देश के कानून का पालन करें।
    ऐसे मजिस्ट्रेट का कौशल अपग्रेड होना जरूरी
    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस्ट संजय किशन कौल, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने कहा है कि ‘अगर कुछ मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसे आदेश पारित किए जाते हैं तो यह जरूरी पड़ने पर न्यायिक कार्य वापस भी लिया जा सकता है और ऐसे मजिस्ट्रेट को न्यायिक अकादमियों में भेजना चाहिए ताकि वे वहां पर कुछ समय के लिए अपने कौशल को अपग्रेड करें।’
    इलाहाबाद हाई कोर्ट को जानकारी दी जाएगी
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे आदेश सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश राज्य में पास किए गए हैं और कहा है कि इसके बारे में इलाहाबाद हाई कोर्ट के कार्यकारी चीफ जस्टिस को जानकारी दी जाए। कोर्ट ने कहा है कि ‘ऐसे आदेश बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश से होते हैं और हमें जानकारी दी जाती है कि खासकर हाथरस, गाजियाबाद और लखनऊ की अदालतों से पारित आदेश इस कानून की अनदेखी करते नजर आते हैं।’ बेंच ने कहा कि ‘हम इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकील को बुलाते हैं, ताकि माननीय ऐक्टिंग चीफ जस्टिस को जानकारी दी जा सके, जिससे वह आवश्यक निर्दश जारी कर सकें, जिससे ऐसी घटनाएं न हों…….’

    किस मामले से जुड़ा है मुद्दा
    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियां सतेंदर कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो और अन्य के मामले में सुनवाई के दौरान की है। अदालत इसी मामले में जुलाई 2022 के अपने फैसले की तामील से संबंधित मामले की सुनवाई पर यह बातें कही हैं। अदालत ने अन्य बातों के अलावा गिरफ्तारी और ट्रायल के दौरान सीआरपीसी के प्रावाधनों को लागू करने पर जोर दिया था। अदालत ने उस फैसले में यह भी कहा था कि अदालतें जमानत याचिकाओं पर दो हफ्ते के भीतर फैसला करें, सिर्फ उन मामलों को छोड़कर जिसमें कानून के अलग प्रावधान हैं।

    अगली सुनवाई के लिए भी निर्देश
    अदालत ने फैसला दिया था कि सीआरपीसी की धारा 41 और 41ए की पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए और इसमें कमी रहने पर आरोपी को जमानत लेने का अधिकार होगा। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने यह भी निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई पर अनुपालन रिपोर्ट नहीं दाखिल करने के लिए दिल्ली, तेलंगाना, मेघालय और उत्तराखंड हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार उपस्थित रहें।

  • क्यों बिकती हैं भारत में सफेद कारें ज्यादा ?

    नई दिल्ली // क्या आप जानते हैं भारत में अमूमन लोग सफेद रंग की कार खरीदना पसंद करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल यानी 2022 में देश में बिकने वाली करीब 42.2 फ़ीसदी कारें सफेद रंग की थीं। सफेद रंग के बाद खरीदने वालों की पसंद सिल्वर फिर ग्रे है .

     आर्थिक अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड ने विगत दिनों वाहन सलाहकार कंपनी जाटो डायनामिक्स के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर एक खबर छपी है,  जिसके अनुसार पिछले साल देशभर में बिकने वाली 42.2 फ़ीसदी कारें सफेद थी, जबकि यह संख्या 2021 में थोड़ी अधिक 43.9 फ़ीसदी थी, हां, 2021 की तुलना में 2022 में दूसरे रंग जिनमें काली, सिलेटी, नीले, लाल,हरे और सुनहरे रंगों की  कारों की बिक्री में कुछ फ़ीसदी की वृद्धि हुई है ,

    सफेद कार ज्यादा बिकने के कई हैं कारण

     विशेषज्ञों के मुताबिक सफेद कारों के ज्यादा बिकने के कारणों की फेहरिस्त लंबी है ।सबसे अव्वल तो सफेद रंग की गाड़ियों का रखरखाव आसान होता है। यह रंग दूसरे रंगों की तरह जल्दी अपनी चमक नहीं खोता। यह रंग परिवार के सदस्यों की आम पसंद भी हो जाता है । इस रंग की गाड़ी की रीसेल वैल्यू ज्यादा होती है यानी दोबारा बिक्री करने पर ज्यादा पैसा मिलता है। इसके अलावा सुरक्षा के मामले में भी सफेद रंग के अलग फायदे हैं, यह रात को बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है ।गर्मी के मौसम में कम  गर्मी अवशोषित करता है और छोटी कारें भी सफेद रंग की वजह से बड़ी दिखती हैं। और वास्तु और ज्योतिष कारणों से इस रंग को शुभ नहीं माना जाता है ।

    आखिर कंपनियां क्यों बनाती हैं इतने रंगों की कारें?

     भारत के लोग कई तरह की कारों का अनुभव लेने और प्रयोग करने में पीछे नहीं हैं। पिछले साल कुल यात्री वाहन की बिक्री में 1 फ़ीसदी से थोड़ा अधिक हिस्सेदारी सफेद के अलावा दूसरे रंग के वाहनों की हुई थी। कार बिक्री पर नजर रखने वालों का कहना है कि सफेद रंग के अलावा दूसरे रंग की कारों की बिक्री इसलिए बढ़ी है, क्योंकि उनके लिए कम इंतजार करना पड़ता है। इसके अलावा स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) सेग्मेंट के वाहनों की बिक्री में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिल रही है, क्योंकि इस तरह के वाहन लग्जरी सुविधाओं से लैस होने के साथ काफी मजबूत होते हैं इस सेगमेंट में लोग अधिकतर गहरे रंगों वाले मॉडल खरीदते हैं। मारुति सुजुकी इंडिया के वरिष्ठ  कार्याधिकारी ( विपणन और बिक्री) शशांक श्रीवास्तव के मुताबिक किसी भी बढ़ती अर्थव्यवस्था और परिपक्व  कार बाजार में सलेटी के अलावा दूसरे रंग की कारों को कम पसंद किया जाता है

    महिला खरीददारों के कारण चमकीले और गहरे और रंगों के वाहनों की मांग बढ़ी

    जानकारों के मुताबिक आजकल करों की खरीदी में 10 से 12 फीसदी की हिस्सेदारी महिलाओं की है जो ब्राईट रंग खरीदना पसंद करती हैं . अब भारत में रंगीन गाड़ियों को प्राथमिकता मिलना शुरू हो गई हैं, वैसे आंकड़े यह भी बताते हैं कि पिछले 3 दशकों तक भारत में सफेद, सिल्वर और सलेटी गाड़ियों की हिस्सेदारी 65 से 70 फ़ीसदी रही है । एक वक्त सिल्वर कार बहुत खरीदी जाती थी।

     पिछले साल यानी 2022 सबसे अधिक 38 लाख़ यात्री वाहन बिके जो 2018 के पिछले रिकॉर्ड से 4.38 लाख ज्यादा थे।

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  • बाघों पर संकट – देश में डेढ़ माह में 26 बाघों की मौत !

    बाघों पर संकट – देश में डेढ़ माह में 26 बाघों की मौत !

    नई दिल्ली// देश में 1 जनवरी से 11 फरवरी के बीच कुल 26 बाघों की मौत हुई है जो पिछले 3 वर्षों में साल की शुरुआत में बाघों की मौत का सबसे बड़ा आंकड़ा है। सबसे अधिक 9 मौतें मध्य प्रदेश में हुई । इसके बाद महाराष्ट्र में सात राजस्थान में तीन कर्नाटक में दो उत्तराखंड में दो आसाम बिहार और केरल में एक -एक बाघ की मौत हुई है।
    कारणों की तलाश
    फिलहाल सरकार की बाघ संरक्षण से जुड़ी योजनाएं इन मौतों के कारणों की तलाश कर रही है।आम तौर पर कोई अन्य कारण सिद्ध नहीं होने पर हर बाघ की मौत को अवैध शिकार माना जाता है।
    राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पास बाघों की मौत के कारणों के आंकड़े सिर्फ 2020 तक के ही उपलब्ध हैं जो  बताते हैं कि 2020 में अवैध शिकार के कारण कम मौतें हुईं हैं। 2020 में अवैध शिकार के कारण सिर्फ सात बाघों की मौत हुई , जो 2018 की तुलना में काफी कम थे । 2018  में 34 बाघों की मौत हुई थी।।
    पिछले साल इसी अवधि के दौरान 18 मौतें हुई थी और 2021 में 21 मौतें हुई थी। वही पूरे देश में  2020 से अब तक 380 बाघों की मौत हो चुकी है। सबसे अधिक बाघों की मौत 2021 में दर्ज की गई जब 127 बाघों की मौत हुई थी।
    मध्य प्रदेश में ज्यादा मौतें?
    मध्य प्रदेश में 2012 से 2022 के बीच लगभग 270 बाघों की मौत दर्ज की गई है यह आंकड़ा देश में सर्वाधिक है। इसके बाद महाराष्ट्र ( 184 मौत ) और कर्नाटक (150 मौत) का स्थान है।
    दुनिया के बाघों की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी भारत में

    फिलहाल दुनियाभर में साढ़े चार हजार बाघ हैं जिनमें से 2,967 भारत में बताए जाते हैं. प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ  द इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आई यू सी एन) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में बाघों की संख्या 3200 हो गई थी और 2022 में इनकी संख्या 4500 है.
    भारत दुनिया का सबसे अधिक बाघ की आबादी वाला देश है, जहां पूरी दुनिया के 70 फीसदी से ज्यादा बाघ पाए जाते हैं। 2010 में बाघों की संख्या  1,706थी जो  2018 तक बढ़कर 2, 967 पहुंच गई । यह एक उल्लेखनीय वृद्धि मानी जाती है। सरकार ने 2022के आंकड़े जारी नहीं किए हैं, लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि देश में बाघों की आबादी 3000के आंकड़े को पार कर लेगी। भारत में बाघों सबसे ज्यादा मध्य भारत, पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट में पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में दो हजार से ज्यादा बाघ रहते हैं।
    संरक्षण बजट में की गई है कमी
    1973 में बाघों को विलुप्त होने से बचाने और उनके प्राकृतिक आवासों में एक व्यवहार्य आबादी सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की थी ।हाल के वर्षों में इस कार्यक्रम पर होने वाले खर्च में कमी आई है, क्योंकि बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है , 2018-19 में जहां बाघों के संरक्षण पर 323. 44 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे वहीं चालू वित्त वर्ष में केंद्र द्वारा परियोजना पर मात्र 128 करोड खर्च करने का अनुमान है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा“धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं”

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा“धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं”

    नई दिल्ली // “धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं है।” ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस केएम जोसेफ ने की है । दरअसल, उनके नेतृत्व वाली बेंच एक व्यक्ति द्वारा यूपी पुलिस की निष्क्रियता के खिलाफ दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में शिकायत की गई थी कि वह जुलाई 2021 में नोएडा में हेट क्राइम का शिकार हुआ था। इस मामले में यूपी पुलिस ने घटना के डेढ़ साल बाद ही प्राथमिकी दर्ज की, वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई की तारीख पर केस डायरी पेश करने को कहा। पीठ ने यूपी पुलिस की ‘ढिलाई’ पर ‘दुख’ जताया।

    हेट स्पीच के दुष्परिणामों की ओर इशारा करते हुए जस्टिस जोसेफ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, “जब आप एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहां आप हेट स्पीच को बढ़ावा देते हैं, इसे प्रोत्साहित करते हैं, इसे रोकते नहीं हैं, तो यह बहुत गंभीर बात हो जाती है। इसे अपने जीवन से जड़ से खत्म करना होगा। इसमें कोई जगह नहीं है। अगर यह हेट क्राइम है तो हमें इसका सामने से सामना करना होगा और तेजी से कार्रवाई करनी होगी। हम इसमें लीपापोती नहीं कर सकते। हर राज्य अधिकारी की कार्रवाई कानून के प्रति सम्मान बढ़ाती है।“  जस्टिस जोसेफ ने यह भी कहा, “जब आप कानून के शासन को प्रभावित करते हैं, तो इसका प्रभाव समाज, इसकी राजनीति और सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रुपये में उतार-चढ़ाव का एक कारण, आर्थिक सिद्धांत में, वे इसे कानून और व्यवस्था कहते हैं। कानून और व्यवस्था का मुद्रा पर प्रभाव पड़ता है। हमें इसे रोकना होगा।” राजस्थान की एक हालिया घटना का जिक्र करते हुए जस्टिस जोसेफ ने कहा, “हाल ही में राजस्थान में एक गूंगे आदमी को पीटा गया और फिर पता चला कि वह हिंदू है।” जस्टिस जोसेफ ने चिंताजनक रूप से कहा, “आप इसे अनदेखा नहीं कर सकते हैं। आम आदमी पर इसका असर पड़ता है। हम उनकी सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकते। अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक, कुछ अधिकार ऐसे होते हैं जो मनुष्य में निहित होते हैं। आप एक परिवार में पैदा हुए हैं और उसी में पले-बढ़े हैं। लेकिन हम एक राष्ट्र के रूप में खड़े हैं। आपको इसे गंभीरता से लेना होगा।“ राज्य को सलाह देते हुए जस्टिस जोसेफ ने आगे टिप्पणी की, “समाधान तभी पाया जा सकता है जब आप समस्या को पहचानते हैं। पहला कदम समस्या को पहचानना और स्वीकार करना है। अगर कोई समस्या है तो कानून समाधान प्रदान करता है।” जस्टिस जोसेफ ने कहा, “घृणास्पद भाषण के बारे में आम सहमति बढ़ रही है। अगर कोई व्यक्ति आता है और कहता है कि मैंने टोपी पहनी है, मैं मुस्लिम हूं, मुझ पर आरोप लगाया गया है और दाढ़ी खींची गई है, इस तरह से व्यवहार किया गया है और फिर भी कोई शिकायत दर्ज नहीं की जाती है .. तो यह एक समस्या।” कई बार जस्टिस केएम जोसेफ हेट स्पीच को लेकर चिंता व्यक्त कर चुके हैं।


    दो साल पहले मुस्लिम होने की वजह से व्यक्ति की पिटाई की गई
    साल 2021 में 62 साल के व्यक्ति ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि 4 जुलाई को वह नोएडा के सेक्टर 37 में अलीगढ़ जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था। जब उन्हें कुछ लोगों ने लिफ्ट देने की पेशकश की। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम होने पर टारगेट किया और गाली देते हुए मारपीट की। पीड़ित नोएडा के सेक्टर 37 में एक पुलिस चौकी गया। वहां कोई सीनियर पुलिस अफसर नहीं थे। केवल कांस्टेबल मौजूद थे। इसलिए कोई केस दर्ज नहीं किया गया।