Category: नर्मदापुरम

  • इस राज्य में लोग मेगा स्टायलिश अंत्येष्टि पर लाखों रूपये खर्च करने को तैयार ?

    इस राज्य में लोग मेगा स्टायलिश अंत्येष्टि पर लाखों रूपये खर्च करने को तैयार ?

    तिरुवनंतपुरम// अभी तक आपने शादी और अन्य समारोहों को भव्य और महंगा होने की बाते सुनी होगीं पर अब लोग अंत्येष्टि को भी भव्य बनाने के लिए खासी रकम खर्च करने को तैयार हैं .

    हिन्दू में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार इन दिनो केरल में अंतिम संस्कार का बाजार फल-फूल रहा है और लोग मेगा स्टाइलिश अंत्येष्टि पर लाखों रुपये तक खर्च करने को तैयार हैं। बढ़ते प्रवासी भारतीयों , विशेषकर ईसाई समुदाय के कारण, केरल में  अत्येष्टि का कार्यक्रम “लार्जर दें लाइफ”  बनाता जा रहा है

    कोरोना महामारी के बाद अंतिम संस्कार सेवाओं में विशेषज्ञता रखने  वाली कई इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां सामने आई हैं . महामारी से पहले केवल कुछ ही कंपनियां थीं जो ये सेवाएं प्रदान करती थीं,पर कोविड के चरम पर कुछ इवेंट मैनेजमेंट फर्मों ने अपने कारोबार को इसके लिए खोल दिया, क्योंकि  विवाह सहित सभी सार्वजनिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

    आम तौर पर ये कंपनियां अंतिम संस्कार की सेवाओं के लिए 50,000 से 10 लाख रुपये के बीच शुल्क लेती हैं, पर अतिरिक्त मांग लागत को बढ़ा देता है । उदाहरण के लिए, एक ताबूत ₹4,500 में उपलब्ध है, लेकिन लकड़ी और अन्य सामान के आधार पर ₹ 1 लाख में भी उपलब्ध है।

    इरिंजलाकुडा की कायरोस फ्यूनरल सर्विस, जिसे गूगल  पर पांच सितारा रेटिंग प्राप्त है, के पास ग्लास पैनल और साटन पर्दे वाले एम्बुलेंस और कस्टम-निर्मित शव वाहन का एक बड़ा बेड़ा है।

    रिपोर्ट के अनुसार एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं में शव की ड्रेसिंग, लाइव अंतिम संस्कार बैंड, कार्यक्रम की लाइव-स्ट्रीमिंग, ताबूत और कब्र को सजाना और वह सब कुछ शामिल है जो एक परिवार मांग सकता है। मृतक का मेकअप ‘पैकेज’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस तरह की सेवा दे रही कम्पनी कोकोनाडु इवेंट मैनेजमेंट, तिरुवल्ला की संजय जॉर्ज मैथ्यू कहते हैं, “विदेशी रिश्तेदार और मृतक के करीबी लोग शव को अधिक जीवंत रूप में देखना चाहते हैं।” लिपस्टिक और आईशैडो के साथ-साथ फाउंडेशन भी लगाया जाता है। अधिकांश हल्के टच-अप के लिए कहते हैं, लेकिन कई लोग भारी मेकअप के लिए कहते हैं, यह देखते हुए कि यह आखिरी बार होगा जब किसी व्यक्ति को देखा जाएगा।  इसके अलावा अंतिम संस्कार सेवाओं के लिए आम अनुरोध में अक्सर मृतक को ब्लेज़र, सूट या जैकेट जैसी औपचारिक पोशाक पहनाना शामिल होता है, हालांकि कुछ विचित्र  अनुरोध भी होते हैं, जैसे कि मृतक को रे-बैन धूप का चश्मा पहनना।

    ताबूत को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, जरूरत पड़ने पर और मेहमानों को  सुरक्षा प्रदान की जाती है देखभाल के लिए कर्मचारी तैनात किए जाते हैं। चर्च या श्मशान तक जुलूस और उसके बाद दावत की जिम्मेदारी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की होती है।

    त्रिशूर के निवासी पॉल जिफ़ी, जिन्होंने हाल ही में एक अंतिम संस्कार सेवा कंपनी का उपयोग किया है को लगता है कि इस तरह की सर्विस और सहायता व्यावहारिक है.उनका मानना है कि

    एकल या छोटे परिवार या शहर से बाहर से आए परिवार दुखी होते हैं और इस तरह के कई काम अक्सर उनको भारी पड़ सकते हैं । मिस्टर जिफ़ी को लगता है कि मृतक का हल्का मेकअप इसे  गरिमापूर्ण बनाता है, क्योंकि शव को सार्वजनिक श्रद्धांजलि के लिए रखा जाता  है। कंपनी परिवार के सदस्यों से इनपुट लेकर लेती है यह सेवा का एक महत्वपूर्ण पहलू है.

    (हिन्दू में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर )(फोटो हिन्दू से साभार )

  • गौ शालाओं में बनेंगी गायों की समाधी, गायों के शवों के सम्मानजनक तरीके से निष्पादन की योजना 

    गौ शालाओं में बनेंगी गायों की समाधी, गायों के शवों के सम्मानजनक तरीके से निष्पादन की योजना 

     भोपाल//  गायों की मौत को लेकर किरकिरी झेलने वाली मध्य प्रदेश सरकार ने अब गायों के शवों को खुले में छोड़ने के बजाय सम्मानजनक तरीके से निष्पादन की योजना बनाई है । सरकार ने ऐलान किया है कि अब मृत गोवंश पशुओं को गौशाला में समाधि दी जाएगी । 

     शिवराज सरकार दवारा इसके लिए मनरेगा से गो समाधिया बनवाई जाएंगी। 

     इसमें 6 फीट लंबा 4 फीट चौड़ा और इतने ही ऊंचाई का गड्ढा खोदकर समाधि दी जाएगी। सबसे पहले गड्ढे के तल में ताजे गोवर की आधी फिट की तह बिछाई जाएगी इसमें 20 किलो नमक और इतना ही चुना डाला जाएगा। जिससे 6 माह बाद शव खाद बन जाएगा।

    जिसके बाद वो खाद सरकार किसानों के साथ-साथ अन्य लोगों को देगी। यह फैसला सरकार ने लिया है, गौ संवर्धन बोर्ड इस स्कीम का क्रियान्वयन कराएगा।

     पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने इस संबंध में सभी जिला कलेक्टरों और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं ।

    पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि गौशालाओं में 1 वर्ष में 15% पशुओं की मौत होती है प्रदेश में 1772 गौशालाओं में 2, लाख 87हजार गोवंशीय पशु हैं ।इस अनुमान से हर वर्ष लगभग 43हजार, 50 पशुओं की मौत होती है। अभी तक शव खुले में फेंक दिया जाता था। जिससे गंदगी होती थी ।कई बार विवाद की स्थिति भी बनती है। गौशालाओं के आसपास वर्षों तक कंकाल पड़ा रहता है। गोवंशीय पशुओं के शव का सम्मानजनक तरीके से निष्पादन के लिए उन्हें समाधि दी जाएगी।

     दिल्ली ने दिखाई राह

     दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए लंपी स्कीन डिसीज से पीड़ित पशुओं का निष्पादन व्यवस्थित तरीके से करने के लिए दिल्ली सरकार को निर्देशित किया था । साथ ही कहा था कि समाधि की प्रक्रिया जन भावनाओं के अनुरूप होनी चाहिए।

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    पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने मनरेगा के अंतर्गत गो समाधि बनाने के लिए सभी जिलों को निर्देशित किया है जिसमें गोवंश पशुओं के समूह को व्यवस्थित तरीके से निष्पादित किया जा सके

     गुलशन बामरा प्रमुख सचिव पशुपालन

  • कौन फाइनल करेगा कांग्रेस के टिकट ? दिग्विजय सिंह ने किया बड़ा खुलासा !

    कौन फाइनल करेगा कांग्रेस के टिकट ? दिग्विजय सिंह ने किया बड़ा खुलासा !

    भोपाल// मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने तैयारियां तेज कर दी हैं। वहीं टिकटों को लेकर दावेदारों में घमासान मचा हुआ है इस बीच टिकट को लेकर फार्मूले पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्य मंत्री  दिग्विजय सिंह ने भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में साफ किया कि इस बार कमलनाथ ही सर्वे-सर्वा हैं। उन्हीं के सर्वे के आधार पर उम्मीदवार फाइनल किया जाएगा। इस दिग्विजय ने कार्यकर्ताओं से अपील करते हुए कहा-  आपस में लड़ाई नहीं करें!

    मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जल्द ही उम्मीदवारों की घोषणा कर सकती है। कांग्रेस उम्मीदवारों के चयन के लिए अलग-अलग सर्वे कर रही है। कांग्रेस के सीनियर नेता और एमपी के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने बड़ा खुलासा किया है। भोपाल में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस बार के विधानसभा चुनाव के लिए नेता आपस में लड़ें नहीं। उन्होंने कहा कि उम्मीदवार वही फाइनल होगा जिसे कमलनाथ फाइनल करेंगे। दिग्विजय सिंह ने कहा कि विधानसभा चुनाव के लिए कमलनाथ ही सर्वेसर्वा हैं। उन्होंने कहा कि इस बार बीजेपी सरकार को हराना है।
    दिग्विजय सिंह ने कार्य कर्ताओं और नेताओं से कहा कि समझ जाओ भैया,  लड़ो मत। उन्होंने कहा कि टिकट के कई दावेदार मुझसे मिले। उम्मीदवार इतने खड़े हो गए हैं कि मुसीबत हो रही है किस-किस को समझाएं किसको ना समझाएं हमने तो कह दिया है कि हमारे कमलनाथ जी सर्वे सर्वा हैं उनका जो सर्वे है सब पत्थर की लकीर है उनके हिसाब से टिकट मिलेगा किसी और के पास जाने की जरूरत नहीं है।क्योंकि फाइनल टिकट कमलनाथ के सर्वे के आधार पर ही मिलेगा।टिकट हमारे बस का काम नहीं है सर्वे से ही काम होगा। इसीलिए एकजुट हो जाओ लड़ो मत, डरो मत और भाजपा की सरकार मिटाओ । यही आप से मेरी प्रार्थना है ..!

    पूर्व मुख्यमंत्री ने स भोपाल में महाकाल लोक में भ्रष्ट्राचार ,सतपुड़ा भवन में आग ,महगाई ,बेरोजगारी सहित सरकार की जन विरोधी नीतियों के विरोध में आयोजित धरना प्रदर्शन को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है .
    विधानसभा चुनाव के लिए कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। दिग्विजय सिंह के पास 66 विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी है जहां बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है। दिग्विजय सिंह इन 66 विधानसभा सीटों का दौरा कर चुके हैं।

    दिग्विजय सिंह ने इन 66 विधानसभा सीटों की सर्वे रिपोर्ट पार्टी हाई कमान को सौंप दी थी। इसके बाद से ही अटकलें लगाई जा रही हैं थी कि इसके सर्वे के आधार पर टिकट मिलेगा। कमलनाथ राज्य की 230 विधानसभा सीटों के लिए अलग से सर्वे करवा रहे हैं। माना जा रहा है कि इसी सर्वे रिपोर्ट के आधार पर उम्मीदवारों का टिकट फाइनल होगा।
    राज्य में इसी साल होंगे चुनाव
    मध्यप्रदेश में इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम पहले से घोषित करने की योजना बना रही है जिससे उम्मीदवार को जनसंपर्क करने के लिए अधिक से अधिक समय मिले।

  • कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व का सच उजागर करेगी भाजपा ?

    भोपाल //पांच राज्यों में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों पर गारंटी कार्यक्रमों के साथ हिंदुत्व के मुद्दे को भी लेकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कभी इस तरह की छवि से दूर रहने वाली कांग्रेस अब एक नए अवतार में खुलकर मंचों से’ जय श्री राम, जय बजरंगबली’ जैसे नारे लगा रही है। पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने जबलपुर में  नर्मदा पूजन कर चुनाव अभियान की शुरुआत कर स्पष्ट इशारा कर दिया है कि कांग्रेस के चुनाव की रणनीति क्या होगी। पिछले 1 साल से ज्यादा समय से कमलनाथ प्रदेश में खुलकर सॉफ्ट हिंदुत्व को आगे बढ़ाते नजर आ रहे हैं।

    एंटी इनकंबेंसी और अन्य मामलों के कारण भाजपा के रणनीति कार चिंता में हैं, वहीं कांग्रेस का यह नया अवतार ने उनकी परेशानी को बढ़ा दिया है । अब भाजपा कांग्रेस के इस नए अवतार पर हमला करने की रणनीति बना रही है। 

    हाल ही में कर्नाटक में बनी कांग्रेसी सरकार के कुछ निर्णय ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला और उसे कथित रुप से हिंदू विरोधी साबित करने का के मुद्दे दे दिए हैं। बताया जा रहा है कि भाजपा ने इन फैसलों को आधार बनाकर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने की योजना और रणनीति बना  रही है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने धर्मांतरण विरोधी कानून की वापसी, पाठ्य पुस्तकों में से सावरकर और हेडगेवार सहित विवादित लेखकों के पाठ हटाने के फैसलों  के साथ कर्नाटक के पशु पालन मंत्री के गौ हत्या कानून को लेकर दिए बयान जैसे मामलों को मध्यप्रदेश में भाजपा राजनीति को गरमाने का प्रयास कर रही है।

    प्रदेश के गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा ने कहा है कि कर्नाटक सरकार के फैसले को देखते हुए प्रदेश की जनता को आने वाले समय में फैसला लेना चाहिए कि वह किसके साथ जाना चाहती है। कर्नाटक में धर्मांतरण विरोधी कानून वापस लेने का फैसला लव जिहाद को बढ़ावा देगा । गृहमंत्री का कहना है कि कांग्रेस के फैसले ने उसकी मानसिकता को स्पष्ट कर दिया है ।कांग्रेस   दिखावा करती है ,कहती कुछ है और करती कुछ और है। वही प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा ने कांग्रेस के खून में मुगलों के खून की मिलावट तक का दावा कर दिया है।

    भाजपा के नेताओं का मानना है कि कर्नाटक में कांग्रेस के फैसले यह साबित करते हैं की कांग्रेस हिंदुओं के साथ धोखा कर रही है। कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व एक दिखावा भर है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि भविष्य में पार्टी कांग्रेस के इस दोहरे चरित्र को उजागर करने के लिए पूरे जोर-शोर से काम करेगीऔर इस मुद्दे पर कांग्रेस को सवालों से घेरेगी।

    वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस भी  भाजपा की रणनीति का जवाब देने की तैयारी में जुट गई है।

  • सचिन पायलट नई पार्टी नहीं बनाएंगे ! क्यों है भाजपा के लिए सुकून भरी खबर ?

    सचिन पायलट नई पार्टी नहीं बनाएंगे ! क्यों है भाजपा के लिए सुकून भरी खबर ?

    नई दिल्ली/ जयपुर // राजस्थान में इन दिनों सभी की नजर सचिन पायलट के राजनीतिक कदम और भविष्य पर है । फिलहाल कांग्रेस की तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच की खींचतान थम नहीं पा रही है। रविवार को अपने पिता राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर दोसा में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने गहलोत सरकार पर कई तंज किए।  ऐसी खबरें थी इस मौके पर सचिन पायलट नई पार्टी का ऐलान कर सकते हैं , पर ऐसा कुछ नहीं हुआ ।यह जितनी कांग्रेस के लिए राहत भरी खबर है उतनी ही भाजपा के लिए सुकून की बात मानी जा रही है।

     प्रदेश के राजनीतिक समीकरण  और परिदृश्य के मद्देनजर भाजपा आलाकमान सचिन पायलट की राजनीतिक कदमों पर नजर रखे हुए है। पार्टी का मानना है कि यदि सचिन पायलट कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाते हैं तो वह भाजपा के लिए मुफीद नहीं होगा, वे कांग्रेस विरोधी वोट  में हिस्सेदारी करेंगे , यानी भाजपा के ही वोट काटेंगे। पिछली बार पायलट के प्रभाव वाले क्षेत्र राजस्थान में 26 में से 23 सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा किया था, भाजपा इस बार परिणामों को उलटने की कोशिश कर रही है, लेकिन भाजपा ऐसा कुछ कर पाएगी यह पायलट के भविष्य के राजनीतिक कदमों पर निर्भर करेगा।

    छोटे दलों से परेशानी?

    भाजपा आलाकमान प्रदेश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य को लेकर आशंकित और परेशान नजर आ रहा है। प्रदेश में तीसरे मोर्चे  की सुगबुगाहट बढ़ रही है ।पत्रिका में छपी खबर के मुताबिक पार्टी के रणनीतिकारों की लगातार हो रही चुनाव पूर्व बैठक में यह बात उभरकर सामने आई है कि नवम्बर में होने चुनाव में पार्टी को कांग्रेस के साथ सीधी लड़ाई में ही आपेक्षित फायदा हो सकता है। भा ज पा नेतृत्व का मानना है कि तीसरे मोर्चे के आसार प्रदेश में नहीं के बराबर रहते हैं, लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग हो सकती हैं । कुश्ती फेडरेशन के अध्यक्ष भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवानों के आंदोलन का जाट बाहुल्य क्षेत्रों में सांसद हनुमान प्रसाद बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी(रालोपा) के अलावा राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) व हरियाणा की जननायक जनता पार्टी फायदा उठाने की कोशिश करेगी। रालोपा जाट बाहुल्य क्षेत्र में निरंतर असर दिखा रही है । विधानसभा में उसके तीन विधायक हैं। इसके अलावा भारतीय ट्राइबल पार्टी(बीटीपी ) मेवाड़ के आदिवासी अंचल में प्रभाव रखती है । पिछली बार उसके दो विधायक जीते थे। इस बार आम आदमी पार्टी भी चुनावी दंगल में उतरने की पूरी तैयारी में है । ऐसे में सत्ता दल विरोधी वोट बांटना पार्टी की राह में अवरोध पैदा नहीं कर सकता है। उसे यह भी डर है कि टिकट वितरण के बाद संभावित बगावत की स्थिति में यह पार्टियां बागियों का विकल्प बन सकती हैं और उसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ सकता है।

  • दस दलित लोगों की हत्या के मामले में 42 साल बाद आया फैसला,एक मात्र जीवित आरोपी 90 साल के बुजुर्ग को उम्रकैद की सजा !

    दस दलित लोगों की हत्या के मामले में 42 साल बाद आया फैसला,एक मात्र जीवित आरोपी 90 साल के बुजुर्ग को उम्रकैद की सजा !

    लखनऊ // 1981 में उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद थाना क्षेत्र में हुए दलित समुदाय के 10 लोगों के  हत्याकांड में 42 साल बाद फिरोजाबाद की जिला अदालत ने पिछले हफ्ते फैसला दिया है । अदालत ने दस आरोपियों में से 90 साल के एक मात्र जीवित आरोपी को आजीवन कारवास (उम्र कैद ) की सजा सुनाई है ,आरोपी पर 55हजार का जुर्माना भी किया है जिसे नहीं चुकाने पर 13 महीने और जेल में बिताने होंगें .

    सजा पाने वाले बुजुर्ग का नाम गंगादयाल है। उम्रकैद की सजा पाए बुजुर्ग की हालत ऐसी है कि वो खुद अपने पैरों में खड़ा नहीं हो सकता। उसे चलने के लिये भी सहारा चाहिए। सजा सुनाए जाने के बाद पुलिस वाले उसे पकड़ कर अदालत से बाहर ले गये.  बुजुर्ग को 90 साल की उम्र में मिली उम्रकैद का ये मामला अब सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है।

    क्या था मामला ?

    मीडिया खबरों के अनुसार मामला 1981 का है उत्तर प्रदेश के  फिरोजाबाद के मक्खनपुर इलाके  के साधुपुर गाँव में दलित ग्रामीणों ने एक राशन दूकान के मालिक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी ,इस बात से नाराज दुकानदार ने अपने साथियों के साथ मिलकर अपने घर में खाना बना रहे इन लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी जिसमे दस लोगों की मौत हो गई थी कुछ घायल हुए थे जिसमे महिलाएं भी थी, इस मामले में दस लोगों को दोषी माना गया था.इस मुकदमे की सुनावी के दौरान 9 आरोपियों की मौत हो गई ,90 साल का गंगादयाल एक मात्र जीवित आरोपी है .

    आज तक के मुताबिक इस मामले को लेकर उस वक्त राजनीतिक गलियारों में खूब बवाल मचा था , देश भर में इस कांड की काफी चर्चा हुई थी ,तत्कालीन प्रधानमंत्री इण्डिया गाँधी भी सधुपुर पहुंची थीं ,अटल बिहारी वाजपेयी ने मक्खनपुर से साधुपुर तक मार्च किया था .

    न्याय प्रणाली पर सवाल ?

    भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली अपनी सुस्ती के लिए जानी जाती है और यह कोई अकेली घटना नहीं है , बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी तक भारतीय अदालतों में लगभग 50 मिलियन मामले लंबित थे, ।

    पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की कमी, पुरानी प्रक्रियाओं और गवाहों के परीक्षण में  लगने वाले समय को न्याय में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।

     डेली ब्रीफ के अनुसार न्याय में देरी से पीड़ित परिवारों को काफी परेशानी हुई है, पीड़ित परिवार के लोग मानते हैं कि अदालत का फैसला उनके लिए कोई अर्थ रखने के लिए बहुत देर से आया है।

    हमले में बची प्रेमवती ने अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया जानने आए पत्रकारों से कहा कि भगवान ही जाने क्या यह न्याय है।’ वहीं हमले में परिवार के एक सदस्य को खोने वाले ग्रामीण महाराज सिंह ने कहा कि “हम सराहना करते हैं कि आखिरकार हमें न्याय मिला है, लेकिन यह सही समय पर नहीं आया। अगर हमें समय पर न्याय मिला होता तो हमें और खुशी होती।

    वकील अक्षत वाजपेयी कहते हैं यह वास्तव में ‘जस्टिस इज डिले ,जस्टिस इज डीनाय’ का मामला है  लोग दो-तीन साल की देरी की तो मान  सकते हैं, लेकिन 40 साल ?  बाजपेयी कहते हैं कि यह भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलता है कि पीड़ित और उनके परिवारों को 42 साल तक पीड़ा में रहना पड़ा।

  • कांग्रेस से नाता तोड़ सकते हैं सचिन पायलट ? 11 जून को कर सकते हैं नई पार्टी का ऐलान

    नई दिल्ली // राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में की उठापटक थमने का नाम नहीं ले रही है ,अब कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा  है कि राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट  ने कांग्रेस छोड़ने का मन बना लिया है, वे 11 जून को राजस्थान के दौसा में अपने पिता की पुण्यतिथि पर एक बड़ी घोषणा कर सकते हैं,

    यह भी कहा जा रहा है कि एक सप्ताह पहले कांग्रेस नेतृत्व द्वारा उनकी राजस्थान इकाई में मुख्यमत्री गेहलोत और सचिन पायलट के बीच लागू किया गया समझौता अब टूटता हुआ दिखाई दे रहा है . वीक की रिपोर्ट के मुताबिक़ पूर्व उपमुख्यमंत्री  सचिन पायलट 11 जून को नई पार्टी की घोषणा कर सकते हैं .

    पायलट  राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ लंबे समय से सत्ता संघर्ष में लगे हुए हैं, 2020 में, पायलट ने गहलोत के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया, जिसके बाद उन्हें पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया था, उसके बाद से कांग्रेस पार्टी की राजस्थान इकाई एक नाजुक से समझोते पर टिकी हुई है,पर  पिछले कुछ महीनों में एक बार फिर तनाव बढ़ता दिखाई दिया है जब  पायलट ने 11 अप्रैल को एक दिन का उपवास किया और 11 मई से पांच दिवसीय पदयात्रा की थी  .

    अब एक बार खबरें है कि कि पायलट से 11 जून को अपने पिता, राजेश पायलट की पुण्य  तिथि पर अपनी नई पार्टी के गठन की घोषणा करने की उम्मीद है, जिसका नाम संभवतः ‘प्रगतिशील कांग्रेस’  हो सकता है ।

    डेक्कन हेराल्ड की खबर के  अनुसार प्रशांत किशोर की राजनीतिक परामर्श फर्म, आईपीएसी , कथित तौर पर नई पार्टी के गठन के लिए जमीनी कार्य में पायलट की सहायता कर रही है।

    राजस्थान में पायलट के हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरपीएल) और आप के साथ तीसरे मोर्चे में शामिल होने की भी अटकलें हैं।

    यदि यह खबरें सच है तो यह इस बात  कि और इशारा है कि गहलोत और पायलट के बीच समझौता कराने के कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के प्रयास असफल रहे हैं।

    पायलट के कदम के राजनीतिक मायने ?

    पायलट का ऐसा कोई कदम राज्य में कांग्रेस पार्टी की स्थिति को कमजोर कर सकता है, खासकर अगर अन्य कांग्रेस विधायक भी उनका अनुसरण करने का निर्णय ले लेते हैं। यह राजस्थान में आगामी चुनाव से पहले पार्टी के जन आधार को विभाजित कर देगा । इसके अलावा, यह गुलाम नवी आज़ाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कपिल सिब्बल और अन्य सहित कांग्रेस नेताओं के छोड़ने की प्रवृत्ति को मजबूत करेगा।  लेकिन इंडिया टुडे के अनुसार पॉयलट के पार्टी छोड़ने की संभावना तब नहीं है, जब तक कि गहलोत के साथ बातचीत के दौरान किए गए वादों से इसका नेतृत्व पीछे नहीं हटता।

  • शहरों के स्कूलों में सालों  से जमे शिक्षकों को भेजा जाएगा गावों में,15 जून से होंगे शिक्षा विभाग में ट्रांसफर

    भोपाल // सूबे में स्कूल शिक्षा विभाग की नई ट्रांसफर पॉलिसी के तहत ट्रांसफर का काम शुरू हो गया है इसकी महत्वपूर्ण बात यह बताई जा रही है कि शहरी स्कूलों में सालों से जमे शिक्षकों को अनिवार्य रूप से गांव में भेजा जा सकता है। स्कूली शिक्षा विभाग के तबादले की प्रक्रिया 15 मई तक पूरी होनी थी लेकिन वरिष्ठ पदों पर प्रभार देने की प्रक्रिया के चलते तबादले 15 जून के बाद ही हो सकेंगे। सरकार ने पिछले साल स्कूल शिक्षा विभाग की नई स्थानांतरण नीति को मंजूरी दी है यह व्यवस्था इस साल यानी 2023 24 से लागू होना है वैसे तो स्थानांतरण नीति के अंतर्गत शिक्षा विभाग में सभी संवर्ग ओं के लिए स्थानांतरण की प्रक्रिया 31 मार्च से 15 मई के बीच पूरी की जानी थी लेकिन वरिष्ठ पदों पर प्रभाव की प्रक्रिया में हुई देरी के चलते अब पूरी प्रक्रिया 15 जून के बाद शुरू होगी।
    ऑनलाइन होगी आवेदन की प्रक्रिया
    स्कूल शिक्षा विभाग के तबादलों के लिए आवेदन ऑनलाइन ही लिए जाएंगे उत्कृष्ट स्कूल मॉडल स्कूल और सीएम राइस स्कूलों में स्वैच्छिक स्थानांतरण नहीं होंगे साथ ही प्राचार्य सहायक संचालक गया उससे वरिष्ठ पदों के स्वैच्छिक स्थानांतरण आवेदन ऑनलाइन लिए जाएंगे लेकिन उनका निराकरण ऑफलाइन भी किया जा सकेगा रिलीविंग और जॉइनिंग की कार्यवाही ऑनलाइन होगी।
    इन्हें मिल सकती है छूट?
    ऐसी शिक्षक जिनकी सेवानिवृत्ति 3 वर्ष शेष है और गंभीर बीमारी या विकलांगता से पीड़ित है उन्हें इस प्रक्रिया से मुक्त रखा जाएगा स्थानांतरण प्रक्रिया में वरीयता क्रम निर्धारित किया गया है नई नीति के अनुसार शिक्षकों को निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की निजी पदस्थापना में पदस्थ नहीं किया जाएगा
    3 साल तक तबादला नहीं
    शिक्षा विभाग की नई स्थानांतरण नीति में एक बार स्वैच्छिक स्थानांतरण होने के बाद विशेष परिस्थितियों को छोड़कर 3 वर्ष तक स्थानांतरण नहीं किया जा सकेगा सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई शाला शिक्षक भी ना हो जाए प्रथम श्रेणी अधिकारियों के स्थानांतरण समन्वय मुख्यमंत्री के अनुमोदन से किए जाएंगे।
    नई शिक्षा नीति के अंतर्गत नए नियुक्त शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में कम से कम 3 वर्ष तक और अपने संपूर्ण सेवाकाल में कम से कम 10 साल तक कार्य करना होगा।  10 वर्ष या इससे अधिक अवधि तक एक ही संस्था विशेषकर शहरी क्षेत्रों में पदस्थ शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षक विहीन और शिक्षकों की कमी वाले विद्यालयों में पदस्थ किया जाएगा।
    प्रभारी मंत्रियों की भूमिका खत्म
    अभी तक शिक्षकों के तबादले में प्रभारी मंत्रियों की चलती थी, नई नीति के तहत प्रभारी मंत्रियों की इसमें कोई भूमिका नहीं रहेगी। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन ही होगी शिक्षकों की पोस्टिंग उपलब्ध सीटों के आधार पर होगी

  • क्यों खतरे में हैं भाजपा के सत्तर विधायको की टिकट ?

    क्यों खतरे में हैं भाजपा के सत्तर विधायको की टिकट ?

    भोपाल//  मध्यप्रदेश में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा संगठन तक जो जमीनी फीडबैक आ रहा है वो परेशान करने वाला है। राज्य के कई दिग्गज नेताओं के लिए यह फीडबैक अच्छा नहीं है। यही कारण है कि तमाम दावेदारों की नींद उड़ी हुई है।

    खबर है कि इस बार भाजपा तीन  ने तीन सर्वे कराए हैं ।पार्टी के सूत्रों के अनुसार एक फीडबैक सर्वे राज्य स्तर पर हो हुआ है जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी की एक एजेंसी से  कराया गया है। दूसरा सर्वे केंद्रीय नेतृत्व कराया है। एक गुजराती कंपनी को यह जिम्मा सौंपा गया है। तीसरा फीडबैक सर्वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जमीनी स्तर पर सक्रिय स्वयंसेवकों के बीच कराया जा रहा है। इन सर्वे के फीडबैक से केन्द्रीय नेतृत्व को भी अवगत कराया है। बताया जाता है कि सर्वे ने भाजपा नेतृृत्व को चिंता में डाल दिया है।

    मीडिया रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए तो पांच महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्तर विधायकों के टिकट पर संकट के बादल छा गए हैं। पार्टी द्वारा कराए गए सर्वे में इन विधायकों का परफार्मेन्स ठीक नहीं आया है। इनमें से कई अपने क्षेत्र में बेहद निष्क्रिय पाए गए हैं। समय रहते विधायकों की छवि में सुधार न हुआ तो इनके टिकट काटे जा सकते हैं। इसके अलावा ख़बर यह भी है कि आधा दर्जन से अधिक विधायकों के टिकट सत्तर की उम्र पार होने के कारण बदले जाएंगे।

     मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  विधायकों के साथ वन टू वन में उन्हें यह सर्वे रिर्पोट दिखा भी चुके हैं और रिपोर्ट के आधार पर सामने आई कमियों को दूर करने का आग्रह इस चेतावनी के साथ कर चुके हैं कि वक्त है, संभल जाओं वर्ना फिर संभलने का मौका नहीं मिलेगा। संगठन सूत्रों की माने तो करीब तीन दर्जन विधायक ऐसे हैं जो क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय नहीं हैं। इन सालों में इनकी छवि भी पहले जैसी नहीं रही है। बताया जाता है कि सर्वे के दौरान कुछ विधायकों के बारे में जिले के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ही खुलकर विपरीत टिप्पणियां की हैं । इनमें उप चुनाव जीत कर आए ज्योतिरादित्य सिंधिया  के समर्थक मंत्री और विधायक भी शामिल हैं।

    सत्तर पार पर संकट की चर्चा ?

    भाजपा में इस समय करीब तीन दर्जन से अधिक ऐसे विधायक हैं जो तीन और चार बार से लगातार विधायक हैं। इसके अलावा पांच या उससे अधिक बार के विधायकों की संख्या भी एक दर्जन के करीब है। सूत्रों की माने तो ऐसे विधायक जो चार बार से विधायक हैं और उनकी उम्र सत्तर को पार कर रही है, उनके टिकट कट सकते हैं। संगठन इस बारे में नीति तैयार कर रहा है। इसके अलावा कुछ विधायकों के टिकट काट कर उनके परिजन को चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। गौरतलब है कि भाजपा के अभी 126 विधायक हैं। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 148 सामान्य हैं, इसके अलावा 47 अनुसूचित जनजाति और 35 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। सूत्रों की माने तो प्रदेश कार्यसमिति के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल, प्रदेश संगठन प्रभारी मुरलीधर राव, प्रदेश अध्यक्ष वी डी शर्मा, संगठन महामंत्री हितानंद के बीच लंबी मंत्रणा हुई है। इसमें प्रदेश के हर जिले का दौरा कर चुके अजय जामवाल ने भी सीएम को विधायकों को लेकर मिले फीडबैक की जानकारी दी गई, उन्होंने फीडबैक से केन्द्रीय नेतृत्व को भी अवगत कराया है।

    पिछली बार कुछ यूं हुआ था

    भाजपा ने 2018 के विधानसभा चुनावों में पांच मंत्रियों समेत 54 विधायकों के टिकट काटे थे। पिछली बार हुए सर्वे में भी पार्टी के सत्तर विधायकों का प्रर्दशन अच्छा नही माना गया  था। जिन पांच मंत्रियों के टिकट काटे गए थे उनमें कुसुम मेहदेले, डाक्टर गौरीशंकर शेजवार, माया सिंह, सूर्यप्रकाश मीणा और हर्ष सिंह शामिल थे। इनमें शेजवार और हर्ष सिंह के स्थान पर उनके पुत्रों को टिकट दिया गया था।

  • दिग्विजय की सक्रियता से भयभीत है भाजपा ?

    दिग्विजय की सक्रियता से भयभीत है भाजपा ?

    भोपाल // वैसे तो प्रदेश में नबंबर  में होने वाले विधान सभा चुनाव में भाजपा के लिए हिंदुत्व मुख्य मुद्दा है, पर वह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल की कमियों को जनता के बीच उजागर करने की भी तैयारी कर रही है और उसे 2003 के दिग्विजय शासन बनाम शिवराज शासन के रूप में पेश करना चाहती है। चुनाव की तैयारी में सब कुछ झोंक देने को आतुर भाजपा ने पिछले दिनों प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में यह लिया गया है । यह निर्णय भाजपा खेमे की घबराहट को दर्शाता है।

    प्रदेश में पिछले 20 साल से भाजपा सत्ता में( इस बार के 18 महीने छोड़ कर) है तो ऐसे में अपनी सरकार की उपलब्धियों पर स्वतंत्र रूप से वोट ना मांग कर शिवराज सरकार की तुलना दिग्विजय सिंह सरकार की कोशिश को क्या कहा जाए?

    राजधानी की राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि अभी तक कमलनाथ के 18 महीने के कार्यकाल को कटघरे में खड़ा कर रही भाजपा का चुनाव के 6 महीने पहले पूर्व मुख्मंयत्री के दो दशक पुराने कार्यकाल को निशाना बनाने का फैसला यूं हीं नहीं है। राजनीतिक पंडितों और भाजपा सूत्रों के आधार पर कहा जा सकता है कि जिस तरह की खबरें आ रही हैं , कि एंटी इंकम्बेंसी के चलते प्रदेश में कांग्रेस सरकार बना सकती है। भाजपा फिलहाल इसकी कोई मजबूत काट नहीं ढूंढ पाई है, और वह अपनी जीत के लिए दिग्विजय सिंह को कारगर मान रही है।

    वैसे तो दिग्विजय सिंह हमेशा से ही भाजपा के निशाने पर रहते आए हैं, क्योंकि आमतौर पर उनकी तल्ख टिप्पणियां भाजपा और आरएसएस को नाराज करती रही हैं। भाजपा उन्हें मि. बंटाधार के रूप में प्रचारित करती रही है। उनके बयान भाजपा को कई बार धार्मिक ध्रुवीकरण करने में मदद कर चुके हैं, जिसका भाजपा चुनाव में फायदा भी उठा कर चुकी है । जानकारों का यह भी कहना है कि दिग्विजय सिंह के पूरे प्रदेश में समर्थक हैं , उनका विरोध करने पर पूरे प्रदेश से प्रतिक्रिया होती है ,जिससे स्थानीय स्तर पर भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं।  इस तरह से वे राष्ट्रीय स्तर के नेता का विरोध करने का मौका पाए जाते हैं। इसलिए दिग्विजय का विरोध भाजपा को ज्यादा फायदेमंद लगता है।

    दिग्विजय की सक्रियता से चिंता ?

    इसके अलावा इस बार कांग्रेस आलाकमान लगातार हार रही लगभग 70 सीटों पर फोकस कर रही है और उसमें से लगभग सभी सीटों पर दावेदारी मजबूत करने की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह को दी गई है। दिग्विजय सिंह पूरी सक्रियता के साथ लगातार इन क्षेत्रों में जाकर कार्यकर्ताओं, नेताओं से बात कर जमीनी हकीकत को जान परख रहे  हैं । उनकी इस कोशिश से कार्यकर्ताओं में उत्साह है और अनेक स्थानों पर जहां पार्टी मृत अवस्था में थी वहां भी कुछ सुगबुगाहट नजर आने लगी है। दिग्विजय सिंह के विरोधी भी उनकी नेतृत्व और संगठन क्षमता एहतराम करते रहे हैं। प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को दिग्विजय की सक्रियता ने चिंतित और भयभीत कर दिया है और उन्हें लगता है कि कहीं दिग्विजय की मेहनत भाजपा के सपनों को ध्वस्त न कर दे।  इसीलिए चुनाव में उनका फोकस कमलनाथ से हटकर दिग्विजय पर हो गया है।

    भाजपा की यह कोशिश दिग्विजय के राजनीतिक कौशल को एक तरह से स्वीकार करती लगती है।