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  • एक साल के तीन मासूम बच्चे चुने गए जगन्नाथ मंदिर के सेवादार, आइए जाने क्या है यह परंपरा ?

    एक साल के तीन मासूम बच्चे चुने गए जगन्नाथ मंदिर के सेवादार, आइए जाने क्या है यह परंपरा ?

    भुवनेश्वर। एक साल के तीन बच्चों को प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी मंदिर  का सेवादार चुना गया है। ये जगन्नाथ मंदिर में पुरोहित सेवा प्रदान करेंगे। इसके लिए इन्हें बाकायदा सालाना एक से दो लाख रुपए सैलरी के रूप में दिए जाएंगे। इनमें से बालादेब दशमोहापात्र तो अभी 10 महीने का ही है, जबकि एकांशु दशमोहापात्रा और बलदेव उम्र का एक साल पूरा कर चुके हैं।
    तीनों बच्चों को जगन्नाथ मंदिर के सेवकों के रूप में शामिल किया गया। बच्चे दैतापति निजोग श्रेणी के सेवादार होंगे,। 

    क्या है परम्परा

    दैतापति निजोग श्रेणी के सेवादार रथयात्रा के दौरान प्रमुख अनुष्ठान करते हैं। परंपरा के मुताबिक रथयात्रा से 15 दिन पहले (अनासार अवधि) या इस अवधि के आसपास जब भी दैतापति सेवक के घर लड़के का जन्म होता है, उसे भगवान की सेवा में शामिल करने के लिए चुना जाता है। इसी परंपरा के तहत इन बच्चों को सेवादार चुना गया। की रथयात्रा के आसपास इन तीनों बच्चों का जन्म हुआ था।
    जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति के सदस्य दुर्गा दशमोपात्रा ने बताया कि बलदेव दशमोहापात्रा  और एकांशु फिलहाल रथयात्रा में सेवाएं देंगे । जब भी 18 साल के हो जाएंगे इन्हें मंदिर के अंदर सेवा की अनुमति मिल जाएगी। बच्चों को मंदिर के अनासार घर में समारोह के दौरान सेवा करने का मौका भी मिलेगा। अनासार घर  वहजगह होती है जहां भगवान जगन्नाथ, बलदेव और देवी सुभद्रा रहते हैं।
    इस बार 20 जून को निकलेगी रथ यात्रा
    इस बार भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा 20 जून को निकलेगी । रथ यात्रा के लिए हर साल नए रथ बनाए जाते हैं। अक्षय तृतीया पर तीनों रथों का निर्माण शुरू किया गया था। रथों को चमकीले रंगों में रंगा जाता है। भगवान जगन्नाथ के लिए लाल पीले, भगवान बलराम के लिए लाल हरे, जबकि सुभद्रा के लिए लाल काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है।

    (मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर )

  • रिलीज होते ही विवादों में घिरी आदिपुरुष, फिल्म के खिलाफ़ दाखिल की गई याचिका।

    नई दिल्ली// ओम राउत के डायरेक्शन में बनी ‘प्रभास और कृति सेनन स्टारर फिल्म ‘आदिपुरुष’ विवादों में घिर गई है। सोशल मिडिया पर तो इसके संवादों को लेकर तहलका मचा हुआ है, साधु संत नाराज हैं और इसे आस्था से खिलवाड़ बता रहे हैं ,वहीं हिंदू सेना ने ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर मांग की है कि फिल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणित नहीं किया जाए. हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने शुक्रवार को ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की. साथ ही आरोप लगाया है कि मूवी में भगवान का काफी मजाक उड़ाया गया है।

    एनडीटीवी के अनुसार फिल्म को भगवान हनुमान की भूमिका निभाने वाले अभिनेता द्वारा बोले गए ‘टपोरी’ शैली के संवादों के लिए भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. समीक्षकों ने फिल्म की गंभीरता से समीक्षा की और इसे पुरानी फिल्मों का मिला-जुला रूप बताया है. उधर, नेपाल के फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने ‘सीता को भारत की बेटी’ बताने संबंधी संवाद पर आपत्ति जताई है. दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका में, श्री गुप्ता ने कहा, “यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत जनहित याचिका के रूप में एक रिट याचिका है, जिसमें उत्तरदाताओं को निर्देश की प्रकृति में एक उपयुक्त रिट जारी करने की प्रार्थना की गई है. धार्मिक नेताओं/चरित्रों/आकृतियों को गलत तरीके से चित्रित करने वाले आपत्तिजनक दृश्यों को हटाना की मांग की गई है. साथ ही प्रतिवादियों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए फीचर फिल्म आदिपुरुष को प्रमाणित नहीं करने और इस तरह के अन्य या आगे के आदेश को पारित करने का निर्देश देने के लिए मांग की गई है.”याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि फिल्म ‘धार्मिक नेताओं/पात्रों/आंकड़ों को गलत और अनुचित तरीके से चित्रित करके हिंदू समुदाय की भावनाओं को आहत करती है.’ हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने याचिका में रामायण, भगवान राम और देश की संस्कृति का मजाक बनाने का आरोप लगाया है. इसके अलावा उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट से ‘आदिपुरुष’ में रावण, राम, सीता और हनुमान के कई अपमानजनक सीन्स भी हटाने के लिए आदेश देने की मांग की है. 

  • कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व का सच उजागर करेगी भाजपा ?

    भोपाल //पांच राज्यों में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों पर गारंटी कार्यक्रमों के साथ हिंदुत्व के मुद्दे को भी लेकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कभी इस तरह की छवि से दूर रहने वाली कांग्रेस अब एक नए अवतार में खुलकर मंचों से’ जय श्री राम, जय बजरंगबली’ जैसे नारे लगा रही है। पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने जबलपुर में  नर्मदा पूजन कर चुनाव अभियान की शुरुआत कर स्पष्ट इशारा कर दिया है कि कांग्रेस के चुनाव की रणनीति क्या होगी। पिछले 1 साल से ज्यादा समय से कमलनाथ प्रदेश में खुलकर सॉफ्ट हिंदुत्व को आगे बढ़ाते नजर आ रहे हैं।

    एंटी इनकंबेंसी और अन्य मामलों के कारण भाजपा के रणनीति कार चिंता में हैं, वहीं कांग्रेस का यह नया अवतार ने उनकी परेशानी को बढ़ा दिया है । अब भाजपा कांग्रेस के इस नए अवतार पर हमला करने की रणनीति बना रही है। 

    हाल ही में कर्नाटक में बनी कांग्रेसी सरकार के कुछ निर्णय ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला और उसे कथित रुप से हिंदू विरोधी साबित करने का के मुद्दे दे दिए हैं। बताया जा रहा है कि भाजपा ने इन फैसलों को आधार बनाकर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने की योजना और रणनीति बना  रही है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने धर्मांतरण विरोधी कानून की वापसी, पाठ्य पुस्तकों में से सावरकर और हेडगेवार सहित विवादित लेखकों के पाठ हटाने के फैसलों  के साथ कर्नाटक के पशु पालन मंत्री के गौ हत्या कानून को लेकर दिए बयान जैसे मामलों को मध्यप्रदेश में भाजपा राजनीति को गरमाने का प्रयास कर रही है।

    प्रदेश के गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा ने कहा है कि कर्नाटक सरकार के फैसले को देखते हुए प्रदेश की जनता को आने वाले समय में फैसला लेना चाहिए कि वह किसके साथ जाना चाहती है। कर्नाटक में धर्मांतरण विरोधी कानून वापस लेने का फैसला लव जिहाद को बढ़ावा देगा । गृहमंत्री का कहना है कि कांग्रेस के फैसले ने उसकी मानसिकता को स्पष्ट कर दिया है ।कांग्रेस   दिखावा करती है ,कहती कुछ है और करती कुछ और है। वही प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा ने कांग्रेस के खून में मुगलों के खून की मिलावट तक का दावा कर दिया है।

    भाजपा के नेताओं का मानना है कि कर्नाटक में कांग्रेस के फैसले यह साबित करते हैं की कांग्रेस हिंदुओं के साथ धोखा कर रही है। कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व एक दिखावा भर है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि भविष्य में पार्टी कांग्रेस के इस दोहरे चरित्र को उजागर करने के लिए पूरे जोर-शोर से काम करेगीऔर इस मुद्दे पर कांग्रेस को सवालों से घेरेगी।

    वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस भी  भाजपा की रणनीति का जवाब देने की तैयारी में जुट गई है।

  • देश की दो अनफ्रेंडली सिटी मुंबई और दिल्ली ? ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई का सर्वेक्षण तो यही कहता है

    देश की दो अनफ्रेंडली सिटी मुंबई और दिल्ली ? ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई का सर्वेक्षण तो यही कहता है

    नई दिल्ली // आप अपने शहर को छोड़ कर एक बड़े शहर में रहने के लिए जा रहे हैं या जाना चाहते हैं?  और वहां जाकर दोस्त भी बनाना चाहेंगें ?  तो देश के दो शहरों से दूर रहें,  यह शहर हैं मुंबई और दिल्ली . इन शहरों ने दुनिया के सबसे अनफ्रेंडली ‘अमित्रवत’ शहरों की सूची में उच्च स्थान  हासिल किया हैं। ; कम से कम, ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई के एक सर्वेक्षण से तो यही पता चला है। सूची में मुंबई 10 में से 3.91 के स्कोर के साथ चौथे स्थान पर तो  दिल्ली 10 में से 3.27 के स्कोर के साथ छठे स्थान पर है।

    द कम्युनिटी स्पिरिट इंडेक्स: द वर्ल्ड्स फ्रेंडली सिटीज़ फॉर नॉन-नेटिव्स नामक यह सर्वे  53 शहरों में किया गया और इसमें 1,000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था. और मूल्यांकन  गैर-मूल निवासियों के प्रति उनकी मित्रता के आधार पर किया गया था।  विशेष बात यह है  की किसी भी भारतीय शहर ने  फ्रेंडली लिस्ट या “दोस्ताना” सूची में स्थान नहीं बनाया है .

    सूचकांक ने विश्व स्तर पर सबसे अधिक स्वागत करने वाले और अमित्र शहरों को निर्धारित करने के लिए छह प्रमुख मैट्रिक्स पर विचार किया। मेट्रिक्स में आगंतुक वापसी दर, सुरक्षा रेटिंग, एलजीबीटीक्यू + समानता, समग्र खुशी, एक आम भाषा के माध्यम से संचार में आसानी और कर्मचारियों की मित्रता शामिल थी। सर्वेक्षण में पाया गया कि विदेशियों की मित्रता, सहायता और सहनशीलता जैसे कारकों के मामले में मुंबई और दिल्ली ने कम स्कोर किया। मुंबई और दिल्ली में रहने वाले सर्वेक्षण के उत्तरदाताओं ने अपनी कम रेटिंग के कई कारणों का हवाला दिया, जिनमें शामिल हैं: शहरों में बहुत भीड़ और शोर है, जो नए लोगों के लिए भारी हो सकता है। यहाँ लोगों को अक्सर अमित्र और अनुपयोगी के रूप में देखा जाता है। अन्य संस्कृतियों की समझ की कमी है, जिससे भेदभाव हो सकता है। सर्वेक्षण के परिणाम कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक हैं, क्योंकि भारत को अक्सर स्वागत करने वाले और मेहमाननवाज देश के रूप में देखा जाता है। हालांकि, सर्वेक्षण में उन चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है, जिनका भारत के प्रमुख शहरों में रहने पर गैर-मूल निवासियों को सामना करना पड़ सकता है।

    सर्वेक्षण जनवरी से मार्च 2023 तक ऑनलाइन आयोजित किया गया था।

    सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं से मित्रता, सहायता और विदेशियों की सहनशीलता जैसे कारकों के संदर्भ में शहरों को 1 से 10 के पैमाने पर रेट करने के लिए कहा गया।

    मुंबई और दिल्ली ने तीनों कारकों के मामले में कम स्कोर किया।

    सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि मुंबई और दिल्ली गैर-निवासियों के लिए शहरों का स्वागत नहीं कर रहे हैं।

    गैर-मूल निवासियों के लिए मुंबई और दिल्ली को अधिक स्वागत योग्य बनाने के लिए कई चीजें की जा सकती हैं, जैसे कि सांस्कृतिक समझ और सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रमों में निवेश करना, विदेशी कर्मचारियों को अधिक सहायता देना, और नए लोगों के लिए अधिक मित्रवत और सहायक होना।

    डेटा से पता चलता है कि केवल 12% लोगों ने मुंबई को मित्रवत माना, जबकि दिल्ली के लिए यह आंकड़ा 17% से थोड़ा अधिक था। इस बीच, फ्रेंडली स्टाफ श्रेणी के तहत सर्वेक्षण के अनुसार, मुंबई ने 3.91% की रेटिंग हासिल की, जबकि दिल्ली ने 3.27% स्कोर किया। साथ ही, मुंबई को 3.78 का हैप्पीनेस स्कोर प्राप्त हुआ, जबकि दिल्ली ने इस संबंध में 4.01 स्कोर किया।

    दुनिया के शीर्ष 10 मित्र सूची वाले शहर:

    टोरंटो कनाडा)

    ऑस्ट्रेलिया (सिडनी)

    एडिनबर्ग (यूके)

    मैनचेस्टर (यूके)

    न्यूयॉर्क (अमेरिका)

    मॉट्रियल कनाडा)

    मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया)

    सैन फ्रांसिस्को (यूएस)

    डबलिन, आयरलैंड)

    कोपेनहेगन, डेनमार्क)

  • सचिन पायलट नई पार्टी नहीं बनाएंगे ! क्यों है भाजपा के लिए सुकून भरी खबर ?

    सचिन पायलट नई पार्टी नहीं बनाएंगे ! क्यों है भाजपा के लिए सुकून भरी खबर ?

    नई दिल्ली/ जयपुर // राजस्थान में इन दिनों सभी की नजर सचिन पायलट के राजनीतिक कदम और भविष्य पर है । फिलहाल कांग्रेस की तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच की खींचतान थम नहीं पा रही है। रविवार को अपने पिता राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर दोसा में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने गहलोत सरकार पर कई तंज किए।  ऐसी खबरें थी इस मौके पर सचिन पायलट नई पार्टी का ऐलान कर सकते हैं , पर ऐसा कुछ नहीं हुआ ।यह जितनी कांग्रेस के लिए राहत भरी खबर है उतनी ही भाजपा के लिए सुकून की बात मानी जा रही है।

     प्रदेश के राजनीतिक समीकरण  और परिदृश्य के मद्देनजर भाजपा आलाकमान सचिन पायलट की राजनीतिक कदमों पर नजर रखे हुए है। पार्टी का मानना है कि यदि सचिन पायलट कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाते हैं तो वह भाजपा के लिए मुफीद नहीं होगा, वे कांग्रेस विरोधी वोट  में हिस्सेदारी करेंगे , यानी भाजपा के ही वोट काटेंगे। पिछली बार पायलट के प्रभाव वाले क्षेत्र राजस्थान में 26 में से 23 सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा किया था, भाजपा इस बार परिणामों को उलटने की कोशिश कर रही है, लेकिन भाजपा ऐसा कुछ कर पाएगी यह पायलट के भविष्य के राजनीतिक कदमों पर निर्भर करेगा।

    छोटे दलों से परेशानी?

    भाजपा आलाकमान प्रदेश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य को लेकर आशंकित और परेशान नजर आ रहा है। प्रदेश में तीसरे मोर्चे  की सुगबुगाहट बढ़ रही है ।पत्रिका में छपी खबर के मुताबिक पार्टी के रणनीतिकारों की लगातार हो रही चुनाव पूर्व बैठक में यह बात उभरकर सामने आई है कि नवम्बर में होने चुनाव में पार्टी को कांग्रेस के साथ सीधी लड़ाई में ही आपेक्षित फायदा हो सकता है। भा ज पा नेतृत्व का मानना है कि तीसरे मोर्चे के आसार प्रदेश में नहीं के बराबर रहते हैं, लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग हो सकती हैं । कुश्ती फेडरेशन के अध्यक्ष भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवानों के आंदोलन का जाट बाहुल्य क्षेत्रों में सांसद हनुमान प्रसाद बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी(रालोपा) के अलावा राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) व हरियाणा की जननायक जनता पार्टी फायदा उठाने की कोशिश करेगी। रालोपा जाट बाहुल्य क्षेत्र में निरंतर असर दिखा रही है । विधानसभा में उसके तीन विधायक हैं। इसके अलावा भारतीय ट्राइबल पार्टी(बीटीपी ) मेवाड़ के आदिवासी अंचल में प्रभाव रखती है । पिछली बार उसके दो विधायक जीते थे। इस बार आम आदमी पार्टी भी चुनावी दंगल में उतरने की पूरी तैयारी में है । ऐसे में सत्ता दल विरोधी वोट बांटना पार्टी की राह में अवरोध पैदा नहीं कर सकता है। उसे यह भी डर है कि टिकट वितरण के बाद संभावित बगावत की स्थिति में यह पार्टियां बागियों का विकल्प बन सकती हैं और उसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ सकता है।

  • रोज महज  60 सेकंड बदल सकता है आपकी जिन्दगी ।यानि काइज़न: खुद को बेहतर बनाने की जापानी तकनीक

    रोज महज  60 सेकंड बदल सकता है आपकी जिन्दगी ।यानि काइज़न: खुद को बेहतर बनाने की जापानी तकनीक

    क्या आपको लगता है कि आलस्य आपके जीवन को बर्बाद कर रहा है? क्या आपने कभी खुद को बेहतर बनाने और बेहतर जीने के लिए आलस्य पर काबू पाने के बारे में कभी सोचा है?  यदि आप अपने जीवन से आलस्य को दूर करना चाहते हैं चाहते हैं तो आलस्य पर काबू पाने के लिए एक जापानी तकनीक है – काइज़न।

    क्या आपने महसूस किया है कि आपका जीवन स्थिर हो गया है ? जीवन में  कोई बदलाव नहीं है । आप जीवन में बदलाव लाने के लिए तय करते हैं कि आप एक फिटनेस की कोशिश करेंगे, या एक नई भाषा सीखेंगे, एक वाद्य यंत्र बजाना सीखंगे या ऐसा ही कोई काम करने की कोशिश करेंगें – लेकिन हर बार आप इसे स्थगित कर देते हैं। आज नहीं कल से करेंगें सोमवार से, अगले महीने या अगले साल भी… आपका संकल्प या लक्ष्य दिन b दिन दूर होता चला जाता है। हम अपने रोज मर्रा के रूटीन से बाहर नही आ पाते , हम बस आराम से प्यार करते हैं,अपने कम्फर्ट जोन को छोड़ नहीं पाते हैं ,वैसे  पुरानी आदतों को छोड़ना और उन्हें नई आदतों या रूटीन में बदलना,ढालना सहज नहीं होता इसमें समय और धैर्य लगता है।

    कुछ करने के लिए खुद को चुनौती देना काफी बड़ा काम है। हम किसी भी काम की शुरुआत में उत्साह से भरे होते हैं पर  धीरे-धीरे वह  फीका पड़ता जाता है । हम तेजी से बहुत कुछ हासिल करने की कोशिश करते हैं, जो इसे और भी कठिन बना देता है। जादू से सपना पूरा होने का इन्तजार करने के बजाय  हमे अपने सपने या इच्छित बात को हासिल करने के लिए कभी कभी योजना बनाने और उस पर विचार करने जी जरूरत होती है .

    तो ऐसा क्यों होता है?

    अपने इरादे पर टिके न रह पाना या आलस का एक निश्चित कारण का पता लगाना असंभव है। यदि बचपन से ही आपके निर्णय हमेशा दूसरों द्वारा लिए जाते रहे हैं, तो संभावना है कि आपको जीवन में अपने उद्देश्य के बारे में या आपके पास जो कुछ भी है उसे बदलने की शक्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं है । मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जो व्यक्ति बहुत प्रेरित नहीं होता है, वह कम समय में किसी भी आदत को विकसित करने में सक्षम नहीं होता है।

    व्यक्ति में आदत विकसित करने में कम से कम 21 दिन लगते हैं। स्थायी आदत बनने में 90 दिन । किसी भी व्यवसाय को करने के लिए कौशल और अनुशासन की आवश्यकता होती है। शुरुआत में छोटे-छोटे कदम उठाना “प्लान्स ग्रोमाड्यो” युवाओं के लिए एक तकनीक है ।  दृढ़ विश्वास और खून में हॉर्मोन के तेज होने के कारण किसी का बीच में रुकना मुश्किल है । चुने हुए रास्ते को बंद करने के लिए इस चरण में अकल्पनीय लगता है जब कोई संभावनाओं से भरा होता है तो उसे इस स्तर पर चुने हुए रास्ते को बंद करने की बात अकल्पनीय लगती है.

    उम्र के साथ, हम बहुत सी आदतें विकसित करते हैं और स्वाद प्राप्त करते हैं।  जीवन उनके कारण गम्भीर जटिलताओं से भर जाता है जिनसे किसी को निपटना होता है। किसी की इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता और अक्सर इच्छा शक्ति कम पड़ जाती है। हम स्वाभाविक रूप से शुरू करते हैं और ट्रैक खो देते हैं क्योंकि काम बोझ बन जाता है, इसलिए उबाऊ हो जाता है। आदतों को पोषण और समर्पण की आवश्यकता होती है।

    रास्ता कहाँ है?

    काइज़न एक अद्वितीय जापानी दर्शन है। जापानी में इसका शाब्दिक अर्थ “निरंतर सुधार” है। “काई” का अर्थ परिवर्तन है, और “ज़ेन” का अनुवाद ज्ञान है। यह उन बदलावों की बात करता है जो प्रवाह में नहीं होते हैं लेकिन परिपक्व अनुभव का प्रतिबिम्ब दिखाते हैं।.  जापान में, इस दर्शन को पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लागू किया गया था। जब कंपनियों को नष्ट कर दिया गया था औरउनके पुनर्जनन की प्रक्रिया को तेज करने के लिए इसे लागू किया गया था। इसे उत्पादन या सहायक प्रक्रियाओं , व्यवसाय, प्रबंधन, व्यक्तिगत लक्ष्यों को प्राप्त करने में लागू किया गया, जिसमे पहली बार में बहुत अधिक लग सकता था.

    जापानी दार्शनिक मसाकी इमाई द्वारा 1986 में लिखी अपनी पुस्तक में इस विचार को विस्तृतरूप में प्रस्तुत किया  इसके बाद “कैज़ेन” की अवधारणा दुनिया भर में फैल गई । उन्होंने समझाया कि इस तरह के दर्शन का अर्थ है – जीवन और उसके सभी क्षेत्रों का पुन: उन्मुखीकरण (reorientation).

    .“एक मिनट का सिद्धांत” क्या है?

    आपके लक्ष्य का मार्ग अब एक मिनट लंबा है ! यह एक प्रबंधन तकनीक है जो निश्चित रूप से सुधार के संकेत बताती है । इस तकनीक का सार यह है कि एक व्यक्ति को एक निश्चित कार्य को एक मिनट के लिए (में)  निपटाना होता है, लेकिन यह हर दिन और एक ही समय पर होना चाहिए। छोटी अवधि से भ्रमित न हों; यह आलस्य को दूर रखने के लिए है। अगर आप किसी काम को करने के लिए आधा घंटा रखने की कोशिश करेंगे तो आप ढेर सारे बहाने बना लेंगे और काम अधूरा रह जाएगा।

    आप एक मिनट के मूल्य पर सवाल उठा सकते हैं। ठीक है, आप एक मिनिट में एक पृष्ठ पढ़ सकते हैं, एक विदेशी भाषा में बोल सकते हैं, व्यायाम कर सकते हैं और अपने उच्चारण में भी सुधार कर सकते हैं! निरंतरता कुंजी है। ऐसा नियमित रूप से करने से आपको खुशी और आत्म-संतुष्टि मिलेगी, इस प्रकार नई उपलब्धियों के लिए प्रेरणा मिलेगी। अगर आप संयोग से चूक गए हैं, तो इसे सोने से पहले या नाश्ते से पहले जरुर करें।

    लंबे समय तक नई चीजें करने की कोशिश करने से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है, इसलिए एक मिनट एक आसान काम लगता है। यदि आप आलस्य पर काबू पाने के बारे में संतुष्ट महसूस करते हैं तो समय बर्बाद करने का अपराध बोध दूर हो जाएगा। बिना किसी झंझट के समय को धीरे-धीरे पांच मिनट से एक घंटे तक बढ़ाएं।

    निरंतर सुधार के लिए एक पैटर्न की आवश्यकता होती है।

    ये कदम आपको काइज़ेन में महारत हासिल करने में मदद करेंगे

    1. मानकीकरण: Standardize:

    एक विशिष्ट और संगठित काम या गतिविधि के लिए एक स्टेंडर्ड प्रक्रिया अपनाया जाना बहुत महत्वपूर्ण और जरुरी है.

    . 2. मूल्यांकन . Measure:

    की जाने वाली गतिविधि का मूल्यांकन करें कि क्या यह मात्रात्मक डेटा( quantifiable data) का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है, जैसे किसी कार्य को पूरा करने में लगने वाला औसत समय या इसी तरह की अन्य बाते ।

    3. तुलना करें: Compare

    अपनी आवश्यकता के विरुद्ध मापन एक तुलना है जो जीवन के सभी क्षेत्रों में लाभदायक सिद्ध होती है। यह देखा जाना जरूरी है कि क्या यह काम समय लेने वाला है ? क्या आप अपने लक्ष्य के करीब हैं? क्या आपको दूसरा तरीका आजमाना चाहिए?

    4. नया करें: Innovate:

    नए तरीकों की खोज अंतहीन होती है और परिणाम हर बार बेहतर होते हैं। अपने लक्ष्य के लिए स्मार्ट और नये तरीकों को खोजें .( Innovate नवप्रवर्तन)  ठीक गूगल  कर्मचारियों की तरह जो अपना 20% समय नए तरीकों की खोज में लगाते हैं।

    5. दोहराएँ: . Repeat:

    पहले कदम पर वापस जाएं और फिर से शुरू करें।

    काइज़न काम पर स्वामित्व और अधिकार बढ़ाता है। जुनून को मरने नहीं देना बहुत बड़ा काम है।

    हालाँकि, यह प्रेरणा और ऊर्जा के उचित उपयोग का स्रोत है। किसी भी प्रकार की बर्बादी, चाहे वह ऊर्जा हो, समय हो या प्रयास, काइज़न के माध्यम से दूर किया जाता है। एक व्यक्ति स्वचालित रूप से अधिक प्रेरित और केंद्रित हो जाता है। तो फिर इसे अपनाओ और अजमाओ और अपना जीवन बदलो!

  • दस दलित लोगों की हत्या के मामले में 42 साल बाद आया फैसला,एक मात्र जीवित आरोपी 90 साल के बुजुर्ग को उम्रकैद की सजा !

    दस दलित लोगों की हत्या के मामले में 42 साल बाद आया फैसला,एक मात्र जीवित आरोपी 90 साल के बुजुर्ग को उम्रकैद की सजा !

    लखनऊ // 1981 में उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद थाना क्षेत्र में हुए दलित समुदाय के 10 लोगों के  हत्याकांड में 42 साल बाद फिरोजाबाद की जिला अदालत ने पिछले हफ्ते फैसला दिया है । अदालत ने दस आरोपियों में से 90 साल के एक मात्र जीवित आरोपी को आजीवन कारवास (उम्र कैद ) की सजा सुनाई है ,आरोपी पर 55हजार का जुर्माना भी किया है जिसे नहीं चुकाने पर 13 महीने और जेल में बिताने होंगें .

    सजा पाने वाले बुजुर्ग का नाम गंगादयाल है। उम्रकैद की सजा पाए बुजुर्ग की हालत ऐसी है कि वो खुद अपने पैरों में खड़ा नहीं हो सकता। उसे चलने के लिये भी सहारा चाहिए। सजा सुनाए जाने के बाद पुलिस वाले उसे पकड़ कर अदालत से बाहर ले गये.  बुजुर्ग को 90 साल की उम्र में मिली उम्रकैद का ये मामला अब सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है।

    क्या था मामला ?

    मीडिया खबरों के अनुसार मामला 1981 का है उत्तर प्रदेश के  फिरोजाबाद के मक्खनपुर इलाके  के साधुपुर गाँव में दलित ग्रामीणों ने एक राशन दूकान के मालिक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी ,इस बात से नाराज दुकानदार ने अपने साथियों के साथ मिलकर अपने घर में खाना बना रहे इन लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी जिसमे दस लोगों की मौत हो गई थी कुछ घायल हुए थे जिसमे महिलाएं भी थी, इस मामले में दस लोगों को दोषी माना गया था.इस मुकदमे की सुनावी के दौरान 9 आरोपियों की मौत हो गई ,90 साल का गंगादयाल एक मात्र जीवित आरोपी है .

    आज तक के मुताबिक इस मामले को लेकर उस वक्त राजनीतिक गलियारों में खूब बवाल मचा था , देश भर में इस कांड की काफी चर्चा हुई थी ,तत्कालीन प्रधानमंत्री इण्डिया गाँधी भी सधुपुर पहुंची थीं ,अटल बिहारी वाजपेयी ने मक्खनपुर से साधुपुर तक मार्च किया था .

    न्याय प्रणाली पर सवाल ?

    भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली अपनी सुस्ती के लिए जानी जाती है और यह कोई अकेली घटना नहीं है , बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी तक भारतीय अदालतों में लगभग 50 मिलियन मामले लंबित थे, ।

    पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की कमी, पुरानी प्रक्रियाओं और गवाहों के परीक्षण में  लगने वाले समय को न्याय में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।

     डेली ब्रीफ के अनुसार न्याय में देरी से पीड़ित परिवारों को काफी परेशानी हुई है, पीड़ित परिवार के लोग मानते हैं कि अदालत का फैसला उनके लिए कोई अर्थ रखने के लिए बहुत देर से आया है।

    हमले में बची प्रेमवती ने अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया जानने आए पत्रकारों से कहा कि भगवान ही जाने क्या यह न्याय है।’ वहीं हमले में परिवार के एक सदस्य को खोने वाले ग्रामीण महाराज सिंह ने कहा कि “हम सराहना करते हैं कि आखिरकार हमें न्याय मिला है, लेकिन यह सही समय पर नहीं आया। अगर हमें समय पर न्याय मिला होता तो हमें और खुशी होती।

    वकील अक्षत वाजपेयी कहते हैं यह वास्तव में ‘जस्टिस इज डिले ,जस्टिस इज डीनाय’ का मामला है  लोग दो-तीन साल की देरी की तो मान  सकते हैं, लेकिन 40 साल ?  बाजपेयी कहते हैं कि यह भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलता है कि पीड़ित और उनके परिवारों को 42 साल तक पीड़ा में रहना पड़ा।

  • कांग्रेस से नाता तोड़ सकते हैं सचिन पायलट ? 11 जून को कर सकते हैं नई पार्टी का ऐलान

    नई दिल्ली // राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में की उठापटक थमने का नाम नहीं ले रही है ,अब कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा  है कि राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट  ने कांग्रेस छोड़ने का मन बना लिया है, वे 11 जून को राजस्थान के दौसा में अपने पिता की पुण्यतिथि पर एक बड़ी घोषणा कर सकते हैं,

    यह भी कहा जा रहा है कि एक सप्ताह पहले कांग्रेस नेतृत्व द्वारा उनकी राजस्थान इकाई में मुख्यमत्री गेहलोत और सचिन पायलट के बीच लागू किया गया समझौता अब टूटता हुआ दिखाई दे रहा है . वीक की रिपोर्ट के मुताबिक़ पूर्व उपमुख्यमंत्री  सचिन पायलट 11 जून को नई पार्टी की घोषणा कर सकते हैं .

    पायलट  राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ लंबे समय से सत्ता संघर्ष में लगे हुए हैं, 2020 में, पायलट ने गहलोत के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया, जिसके बाद उन्हें पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया था, उसके बाद से कांग्रेस पार्टी की राजस्थान इकाई एक नाजुक से समझोते पर टिकी हुई है,पर  पिछले कुछ महीनों में एक बार फिर तनाव बढ़ता दिखाई दिया है जब  पायलट ने 11 अप्रैल को एक दिन का उपवास किया और 11 मई से पांच दिवसीय पदयात्रा की थी  .

    अब एक बार खबरें है कि कि पायलट से 11 जून को अपने पिता, राजेश पायलट की पुण्य  तिथि पर अपनी नई पार्टी के गठन की घोषणा करने की उम्मीद है, जिसका नाम संभवतः ‘प्रगतिशील कांग्रेस’  हो सकता है ।

    डेक्कन हेराल्ड की खबर के  अनुसार प्रशांत किशोर की राजनीतिक परामर्श फर्म, आईपीएसी , कथित तौर पर नई पार्टी के गठन के लिए जमीनी कार्य में पायलट की सहायता कर रही है।

    राजस्थान में पायलट के हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरपीएल) और आप के साथ तीसरे मोर्चे में शामिल होने की भी अटकलें हैं।

    यदि यह खबरें सच है तो यह इस बात  कि और इशारा है कि गहलोत और पायलट के बीच समझौता कराने के कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के प्रयास असफल रहे हैं।

    पायलट के कदम के राजनीतिक मायने ?

    पायलट का ऐसा कोई कदम राज्य में कांग्रेस पार्टी की स्थिति को कमजोर कर सकता है, खासकर अगर अन्य कांग्रेस विधायक भी उनका अनुसरण करने का निर्णय ले लेते हैं। यह राजस्थान में आगामी चुनाव से पहले पार्टी के जन आधार को विभाजित कर देगा । इसके अलावा, यह गुलाम नवी आज़ाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कपिल सिब्बल और अन्य सहित कांग्रेस नेताओं के छोड़ने की प्रवृत्ति को मजबूत करेगा।  लेकिन इंडिया टुडे के अनुसार पॉयलट के पार्टी छोड़ने की संभावना तब नहीं है, जब तक कि गहलोत के साथ बातचीत के दौरान किए गए वादों से इसका नेतृत्व पीछे नहीं हटता।

  • केरल हाईकोर्ट ने कहा- नग्नता और अश्लीलता हमेशा एक नहीं होती..!

    केरल हाईकोर्ट ने कहा- नग्नता और अश्लीलता हमेशा एक नहीं होती..!

    कोर्ट ने अर्धनग्न शरीर पर बच्चों से पेंटिंग करवाने वाली महिला को किया बरी

    कोच्चि // केरल हाईकोर्ट ने पास्को कानून से जुड़े एक मामले में महिला अधिकार कार्यकर्ता को बरी कर दिया! 33 वर्षीय रेहाना फातिमा नाम की इस महिला अधिकार एक्टिविस्ट के विरुद्ध बच्चों का यौन शोषण से संरक्षण (पॉक्सो ) कानून किशोर न्यायालय और सूचना एवं प्रौद्योगिकी कानून के तहत मुकदमा चल रहा था।

    क्या है पूरा मामला?

     कुछ महीनों पहले रेहाना फातिमा का एक वीडियो सामने आया था जिसमें वे अपने नाबालिग बच्चों के सामने अर्धनग्न (सेमी न्यूड) खड़ी थी और उन्होंने उन्हें अपने शरीर पर पेंटिंग की अनुमति दी थी।  इसका वीडियो वायरल होने के बाद उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था । रेहाना आरोपों का सामना कर रही थी । निचली अदालत ने फातिमा को दोष मुक्त करने वाली याचिका को खारिज कर दिया था । फातिमा ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी । 

    उच्च न्यायालय में फातिमा ने कहा था कि “बॉडी पेंटिंग” समाज के उस दृष्टिकोण के खिलाफ एक राजनीतिक बयान के रूप में थी, जिनमें सभी मानते हैं कि महिलाओं के शरीर का नग्न उपरी हिस्सा किसी भी रूप में यौन संतुष्टि या यौन क्रियाओं से जुड़ा है, जबकि पुरुषों के शरीर के निर्वस्त्र ऊपरी हिस्से को इस रूप में नहीं देखा जाता ।

    उच्च न्यायालय ने क्या कहा ?

    केरल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति कौसर एदाप्पागथ  ने फातिमा को आरोप मुक्त करते हुए कहा कि -आधी आबादी को अपने शरीर पर स्वायत्तता का अधिकार नहीं मिलता, अपने शरीर व जीवन के संबंध में फैसले लेने के कारण उन्हें परेशानी व दंड का सामना करना पड़ता है और अलग-थलग कर दिया जाता है।

     जस्टिस कौसर एदाप्पागथ ने कहा कि महिला कार्यकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप के आधार पर किसी के लिए यह तय करना संभव नहीं है कि बच्चों का किसी भी रूप से यौन संतुष्टि के लिए उपयोग हुआ है। उन्होंने बस अपने शरीर को कैनवास के रूप में अपने बच्चों को इस्तेमाल करने दिया था।  अदालत ने कहा कि अपने शरीर के बारे में फैसले लेने का अधिकार महिलाओं की समानता और निजता के मौलिक अधिकार के मूल में  है।

    उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसी” निर्दोष कलात्मक” अभिव्यक्ति को किसी भी रूप में यौन क्रिया से जोड़ना क्रूर है।  अभियोजन पक्ष ने अपनी दलील में इसे अश्लील और असभ्य बताया था । इस दलील को नकारते हुए अदालत ने कहा कि नग्नता और अश्लीलता हमेशा पर्यायवाची नहीं होते।  नग्नता को अनिवार्य रूप से अश्लील , असभ्य या अनैतिक करार देना गलत है। अदालत ने कहा कि एक समय में केरल की निचली जाति की महिलाओं ने अपने स्तन ढकने के अधिकार की लड़ाई लड़ी थी। देश के विभिन्न प्राचीन और सार्वजनिक स्थानों पर तमाम देवी-देवताओं और प्रतिमाएं और कलाकृतियां हैं जो अर्धनग्न अवस्था में है उन्हें पवित्र माना जाता है । अदालत ने कहा कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो महिलाओं की नग्नता को कलंक मानते हैं और उसे सिर्फ यौन तुष्टी से जोड़कर भर देखते हैं । फातिमा द्वारा जारी वीडियो का मकसद समाज में मौजूद इस दौरे में मापदंड का पर्दाफाश करना था। न्यायालय ने कहा कि नग्नता को सेक्स के साथ जोड़ना नहीं जोड़ना चाहिए।

    (नवभारत टाइम्स और एजेंसी खबरों के आधार पर )

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत के लिए कुंडली मिलाने का दिया आदेश, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत के लिए कुंडली मिलाने का दिया आदेश, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

    नईदिल्ली // हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा ही अनोखा और विचित्र सा फैसला दिया जिसमें रेप केस के आरोपी को जमानत देने के मामले में कोर्ट ने लखनऊ विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग को आदेश दिया था कि 3 सप्ताह में पीड़ित युवती की कुंडली की जांच कर यह बताएं कि युवती मांगलिक है या नहीं। यह रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी जाए।

     क्या है मामला ?

    इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने के आरोप में जेल में है। आरोपी शिक्षक ने अपनी जमानत के लिए हाईकोर्ट में अर्जी लगाई थी । सुनवाई के दौरान आरोपी ने अपने वकील के माध्यम से दलील दी थी कि पीड़िता मांगलिक है, इसलिए उससे शादी नहीं कर सकता। आरोपी की इस दलील को सुनने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस बृजराज सिंह ने लखनऊ विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग को रेप पीड़िता की कुंडली जांच करने का आदेश दिए। आदेश में कहा गया था कि याचिकाकर्ता का दावा है कि लड़की मांगलिक है लिहाजा उसकी शादी गैर मांगलिक आदमी के साथ नहीं हो सकती । ऐसे में यह जानने के लिए क्या वाकई लड़की मांगलिक है या नहीं? दोनों पक्ष लखनऊ विश्वविद्यालय ज्योतिष विभाग अध्यक्ष के सामने अपनी कुंडली पेश करें । हाईकोर्ट ने ज्योतिष विभाग के अध्यक्ष को कुंडलियों का मिलान और अध्ययन कर 3 हफ्ते में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए।

    इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला चर्चा में आ गया मीडिया में इसे प्रमुखता से छापा गया। मीडिया रिपोर्ट्स को देखकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर शनिवार को इसकी सुनवाई की और हाईकोर्ट के इस आदेश पर रोक लगा दी।

    शीर्ष न्यायालय ने लिया स्वत संज्ञान

    शनिवार को छुट्टी होने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय की विशेष खंडपीठ ने मामले का संज्ञान लिया । न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की पीठ ने सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर आश्चर्य व्यक्त किया।  पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश पीठ की विषय वस्तु है हम योग्यता( मेरिट) पर कुछ नहीं कहते। हम 23 मई के आदेश पर रोक लगाते हैं । शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि इस मामले में अगली तारीख में उच्च न्यायालय द्वारा गुण दोष के आधार पर फैसला लिया जाए।

    शीर्ष न्यायालय के समक्ष बहस के दौरान सॉलीसीटर जनरल ने कहा कि हाई कोर्ट का निर्देश परेशान करने वाला है और इस पर रोक लगाई जानी चाहिए। श्री मेहता का कहना था कि ज्योतिष एक विज्ञान है लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या अदालत का आदेश इसमें शामिल हो सकता है। शीर्ष अदालत का कहना है कि हमें समय समझ में नहीं आता कि यह ज्योतिष रिपोर्ट क्यों मांगी गई?  शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि आदेश पक्षकारों की सहमति से पारित किया गया था।