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  • ऐसे पढ़ेगा भारत तो कैसे बढ़ेगा भारत ?

    सरकारी दावों के बीच स्कूली शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर सामने आई

     प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट में खुलासा – प्राथमिक में 6.18 करोड़ बच्चों का नामांकन, सीनियर सेकेंडरी तक पहुंचते-पहुंचते संख्या घटकर 1.64 करोड़ रह जाती है रह जाती है

    नई दिल्ली।

    सरकारी दावों के बीच स्कूली शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। संसद की प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्कूल में प्राथमिक स्तर पर दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 27 ही सीनियर सेकेंडरी (12वीं) तक पहुंच पाते हैं। 73% बच्चे 12वीं से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।

    समिति ने चेतावनी दी है कि अगर बच्चों को स्कूल में रोके रखने की चुनौती का समाधान नहीं किया गया तो सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ आंकड़ों तक सीमित रह जाएगा।

    आंकड़ों में गिरावट – कहां कितने बच्चे?

    रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार –

    स्तरनामांकित बच्चे (करोड़ में)स्कूलों की संख्या (लाख में)
    प्राथमिक6.189.11
    उच्च प्राथमिक4.084.12
    माध्यमिक2.361.61
    उच्च माध्यमिक1.640.90

    प्राथमिक के मुकाबले सीनियर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या सिर्फ 10% है। 2014-15 से 2024-25 के बीच स्कूलों की कुल संख्या 15.17 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई, जबकि शिक्षकों की संख्या 85.62 लाख से बढ़कर 1.01 करोड़ हो गई। इसके बावजूद माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 11.5% बनी हुई है।

    बच्चे स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं? रिपोर्ट में 4 बड़े कारण

    1. कमजोर बुनियादी नींव: प्राथमिक स्तर पर पढ़ने-लिखने और गणित की बुनियादी क्षमता कमजोर।
    2. स्कूलों की दूरी: गांव-देहात में सीनियर सेकेंडरी स्कूल दूर होने से बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
    3. आर्थिक-सामाजिक दबाव: गरीब परिवार के लड़कों पर मजदूरी का दबाव, लड़कियों के लिए सुरक्षा और दूरी बड़ी बाधा।
    4. शिक्षक प्रशिक्षण में गिरावट: 2022 में 53 लाख से अधिक शिक्षकों ने ऑनलाइन प्रशिक्षण लिया था, 2025 में यह घटकर मात्र 1.63 लाख रह गया।

    समिति की 3 बड़ी सिफारिशें

    1. ‘निपुण भारत’ योजना कड़ाई से लागू हो: ताकि शुरुआती कक्षाओं में ही बच्चों की बुनियादी समझ मजबूत हो।
    2. मजबूत स्टूडेंट ट्रैकिंग सिस्टम: हर बच्चे की उपस्थिति और प्रगति की रियल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग हो।
    3. शिक्षक प्रशिक्षण का सालाना लक्ष्य: ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रशिक्षण को निरंतर जारी रखा जाए।

  • मध्य प्रदेश कांग्रेस में जल्द होगा बड़ा संगठनात्मक बदलाव,  नई टीम में दिखेंगे नए चेहरे


    भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए संगठन में बड़ा बदलाव करने जा रही है। प्रदेश कांग्रेस की मौजूदा कार्यकारिणी जल्द भंग कर नई टीम गठित की जाएगी। अगले दो से तीन माह में नई कार्यकारिणी का गठन पूरा होने की संभावना है।
    वर्तमान कार्यकारिणी में करीब 253 पदाधिकारी हैं। नई व्यवस्था में इनकी संख्या घटाकर लगभग 125 करने की तैयारी है। विधायकों के साथ जिला अध्यक्ष और प्रदेश पदाधिकारी की दोहरी जिम्मेदारी रखने वालों को भी प्रदेश संगठन के दायित्व से मुक्त किया जा सकता है।


    युवा चेहरे और अनुभवी नेताओं का संतुलन


    नई टीम में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन के साथ ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देने की रणनीति है, जो चुनाव लड़ने के बजाय संगठन को मजबूत करने और चुनाव लड़ाने की भूमिका निभाएं। युवा चेहरों के साथ अनुभवी नेताओं को भी जगह दी जाएगी।
    प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा है कि नई टीम सभी से विचार-विमर्श के बाद बनाई जाएगी और पार्टी का मुख्य लक्ष्य मिशन-2028 रहेगा।


    253 से घटकर 125 पदाधिकारी


    पटवारी की मौजूदा टीम में संतुलन बनाने के प्रयासों के चलते पदाधिकारियों की संख्या बढ़कर 253 तक पहुंच गई थी। पार्टी का मानना है कि बड़ी कार्यकारिणी के बावजूद अपेक्षित संगठनात्मक सक्रियता नहीं दिखी। इसी कारण अब कार्यकारिणी को छोटा और अधिक सक्रिय बनाने पर जोर है।


    युवाओं पर भी कांग्रेस का फोकस


    कांग्रेस ने युवाओं को जोड़ने के लिए युवा संवाद, आंदोलन और प्रदेशस्तरीय युवा सम्मेलन की योजना बनाई है। इसके बाद जिलों में भी युवा संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पार्टी सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को प्रदेशस्तरीय युवा सम्मेलन में बुलाने की तैयारी कर रही है। छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को 2028 के चुनाव की रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाएगा।

    वरिष्ठ कांग्रेस नेता मानक अग्रवाल को मिली बड़ी जिम्मेदारी..!

    काँग्रेस ने अपनी रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है । शनिवार को इसका आगाज करते हुए
    प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कांग्रेस के वरिष्ठ और कद्दावर नेता मानक अग्रवाल को कांग्रेस के पूर्व विधायकों के बीच समन्वय बनाने के लिए समन्वयक बनाया है। श्री अग्रवाल पीसीसी में बैठकर पूर्व विधायकों के और पीसीसी के बीच तालमेल का कार्य करेंगे।
    श्री अग्रवाल को इस जिम्मेदारी मिलने से कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान को गति मिलेगी!


    कांग्रेस का लक्ष्य: 

    नई संगठनात्मक टीम के जरिए अगले दो वर्षों में बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना और 2028 विधानसभा चुनाव की मजबूत तैयारी करना है।

  • कांग्रेस अब सड़क पर उतरेगी, संभागवार आंदोलन से सरकार को घेरेगी; चुनाव के लिए अलग टीम बनाने की तैयारी

    भोपाल। संगठन सृजन अभियान पूरा करने के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस अब सीधे मैदान में उतरने की तैयारी में है। पार्टी संभागवार आंदोलन के जरिए सरकार को घेरने के साथ ही चुनावी मशीनरी को बूथ तक मजबूत करेगी। मंगलवार को भोपाल में होने वाली राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक में आंदोलन के मुद्दों से लेकर चुनाव प्रबंधन की नई रणनीति पर मुहर लग सकती है।

    खास बात यह है कि कांग्रेस इस बार आंदोलन को सिर्फ विरोध-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखना चाहती। वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतारकर कार्यकर्ताओं में एकजुटता का संदेश देने और संगठन को चुनावी मोड में लाने की तैयारी है।

    कांग्रेस की रणनीति में क्या बदलेगा?

    1. आंदोलन अब संभाग के हिसाब से होंगे
      भोपाल में बैठकर प्रदेशव्यापी आंदोलन करने के बजाय स्थानीय मुद्दों के आधार पर संभागवार अभियान चलाने की तैयारी है। इससे स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका बढ़ेगी।
    2. आंदोलन में बड़े चेहरे भी उतरेंगे
      पार्टी की कोशिश होगी कि वरिष्ठ नेता खुद आंदोलन में मौजूद रहें। मकसद साफ है—कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना कि नेतृत्व सिर्फ निर्देश नहीं देगा, बल्कि सड़क पर भी साथ खड़ा दिखाई देगा।
    3. चुनाव प्रबंधन के लिए अलग टीम
      जीतू पटवारी की रणनीति में चुनाव प्रबंधन को संगठन के सामान्य काम से अलग रखने पर जोर है। संभागवार टीम स्थानीय समीकरण देखेगी और बूथ तक चुनावी प्लान लागू कराएगी।
    4. संगठन का चार महीने में नया सेटअप
      भंग किए गए विभागों और प्रकोष्ठों का प्रदेश से लेकर मैदानी स्तर तक पुनर्गठन होगा। इसके लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाया जाएगा।
    5. दतिया के नतीजे से निकलेगा सबक
      बैठक में दतिया उपचुनाव की बूथवार रिपोर्ट पर भी चर्चा होगी। जिन नेताओं को दो से 30 बूथ तक के क्लस्टर की जिम्मेदारी दी गई थी, उनसे जमीनी रिपोर्ट ली जाएगी।

    दतिया के बाद अब अगली परीक्षा संगठन की

    कांग्रेस के लिए दतिया उपचुनाव सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि संगठन की जमीनी सक्रियता को परखने का मौका भी रहा। इसलिए पार्टी बूथवार रिपोर्ट के जरिए यह देखना चाहती है कि कौन-से क्षेत्र में संगठन ने बेहतर काम किया और कहां कमजोरी रह गई।

    इसी रिपोर्ट के आधार पर आगामी चुनावों के लिए संभाग से बूथ तक जिम्मेदारी तय करने की कवायद आगे बढ़ेगी। पार्टी की कोशिश है कि चुनाव आने का इंतजार करने के बजाय संगठन को अभी से सक्रिय कर दिया जाए।

    इंदौर में पटवारी के मुद्दे पर शक्ति प्रदर्शन की तैयारी

    कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को घेरने के लिए पुलिस-प्रशासन के इस्तेमाल और उनके स्वजन को निशाना बनाए जाने के आरोपों को भी पार्टी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाएगी। इसके विरोध में इंदौर में बड़ा प्रदर्शन प्रस्तावित है।

    इसके जरिए कांग्रेस दो संदेश देना चाहती है—पहला, सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर और दूसरा, पटवारी के पीछे पूरी पार्टी खड़ी है।

    बैठक में कौन-कौन रहेगा मौजूद?

    प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, विवेक तन्खा, अशोक सिंह, अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया, अजय सिंह, मीनाक्षी नटराजन और कमलेश्वर पटेल सहित वरिष्ठ नेता शामिल होंगे।

    पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ व्यक्तिगत कारणों से बैठक में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने इसकी सूचना पार्टी को दे दी है। उनके पुत्र और पूर्व सांसद नकुल नाथ बैठक में मौजूद रहेंगे।

    अंदर की बात : आंदोलन के बहाने संगठन की परीक्षा

    कांग्रेस के लिए संभागवार आंदोलन सिर्फ सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की कवायद नहीं है। इसके जरिए पार्टी यह भी परखना चाहती है कि कौन-सा नेता कितने कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतार सकता है और कौन-सा संगठन जमीन पर कितना सक्रिय है।

    यही वजह है कि आंदोलन की जिम्मेदारी, बूथवार रिपोर्ट और वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी—तीनों को एक ही रणनीति से जोड़ा जा रहा है। आने वाले चुनावों से पहले कांग्रेस के लिए यह अपने संगठन की ताकत और नेताओं की सक्रियता नापने का भी मौका होगा।

    5 पॉइंट में कांग्रेस का पूरा प्लान

    • संभागवार आंदोलन — स्थानीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी।
    • बड़े नेताओं की एंट्री — वरिष्ठ नेताओं को आंदोलनों में उतारा जाएगा।
    • अलग चुनाव टीम — चुनाव प्रबंधन को अलग सिस्टम से चलाने की तैयारी।
    • बूथ पर फोकस — दतिया की रिपोर्ट के आधार पर बूथ स्तर की कमजोरियां चिन्हित होंगी।
    • चार महीने में संगठन — विभागों और प्रकोष्ठों का नए सिरे से गठन होगा।

  • विदेश जाने की चाह, लेकिन लौटने का इरादा भी… 10 में 8 भारतीय छात्र बोले- पढ़ाई के बाद लौटेंगे वतन

    ऑक्सफोर्ड सर्वे में बदली सोच की तस्वीर: अब विदेश की डिग्री को ‘बसने’ नहीं, ग्लोबल एक्सपीरियंस हासिल करने का रास्ता मान रहे युवा; 49% ने कहा- विदेश जाने का फैसला हमारा अपना

    विदेश मे पढ़ाई के लिए भारतीय छात्रों का रुझान बढ़ रहा है ,लेकिन अब बड़ी संख्या मे छात्र पढ़ाई के बाद भारत लौटकर करियर बनाने की योजना बना रहे है

    नई दिल्ली। विदेश जाना है… लेकिन हमेशा के लिए नहीं! भारतीय युवाओं की विदेश पढ़ाई को लेकर सोच में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के स्टूडेंट ग्लोबल मोबिलिटी इंडेक्स सर्वे में शामिल 81% भारतीय छात्रों ने कहा कि वे विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटना चाहते हैं। यानी करीब 10 में से 8 छात्र विदेशी डिग्री के बाद अपना भविष्य भारत में देख रहे हैं।

    कभी विदेश में पढ़ाई को बेहतर नौकरी और वहीं बसने की पहली सीढ़ी माना जाता था। अब युवा विदेश को शिक्षा, अनुभव, एक्सपोजर और ग्लोबल नेटवर्किंग का ठिकाना मान रहे हैं। पढ़ाई पूरी होगी, अनुभव मिलेगा और फिर उसी अनुभव के साथ भारत लौटकर करियर बनाने की तैयारी है।

    सबसे बड़ा बदलाव: अब पैरेंट्स नहीं, बच्चे तय कर रहे विदेश जाना

    सर्वे में विदेश जाने के फैसले को लेकर भी बड़ा बदलाव सामने आया है। 2025-26 में 49% छात्रों ने कहा कि विदेश जाकर पढ़ाई करने का फैसला उनका अपना था।

    दो साल पहले यह आंकड़ा सिर्फ 29% था। यानी युवाओं में अपने करियर को लेकर निर्णय लेने की स्वतंत्रता तेजी से बढ़ी है।

    विदेश जाने का फैसला खुद लेने वाले छात्र

    2023-24 : 29%

    2024-25 : 34%

    2025-26 : 49%

    यानी 2 साल में फैसला खुद लेने वालों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत अंक बढ़ी।

    10 में 9 के परिवार में पहली बार कोई विदेश पढ़ने जाएगा

    विदेश शिक्षा अब केवल उन परिवारों तक सीमित नहीं है, जहां पहले से कोई विदेश में पढ़ चुका है। सर्वे में करीब 10 में 9 छात्र अपने परिवार में पहली बार विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले होंगे।

    यानी पहली पीढ़ी के विद्यार्थी अब ग्लोबल एजुकेशन की दौड़ में तेजी से शामिल हो रहे हैं। इनके लिए सबसे बड़ा सहारा बना है—इंटरनेट।

    गूगल बना विदेशी यूनिवर्सिटी खोजने का नया ठिकाना

    विदेशी संस्थान चुनने के लिए छात्र एजेंटों से ज्यादा खुद ऑनलाइन रिसर्च कर रहे हैं।

    39% छात्रों को अपनी पसंद का संस्थान गूगल सर्च के जरिए मिला, जबकि 35% ने एजुकेशन एजेंट्स से जानकारी ली।

    भरोसे की बात आई तो भी गूगल सबसे आगे रहा।

    गूगल : 56%

    कॉलेज इवेंट्स : 20%

    इंस्टाग्राम : 9%

    एआई टूल्स : 6%

    यूट्यूब : 5%

    यानी विदेश जाने से पहले अब युवा किसी एजेंट के ऑफिस में बैठकर सिर्फ ब्रोशर नहीं पलट रहे। मोबाइल खोल रहे हैं, गूगल पर सर्च कर रहे हैं, सोशल मीडिया देख रहे हैं और एआई से सवाल पूछ रहे हैं।

    बिजनेस-मैनेजमेंट सबसे पसंदीदा

    विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की पढ़ाई की पसंद भी दिलचस्प है।

    सबसे पसंदीदा क्षेत्र

    बिजनेस-मैनेजमेंट : 75%

    पोस्टग्रेजुएशन : 70%

    हेल्थ और मेडिसिन : 8%

    साइंस : 2%

    इंजीनियरिंग : 1%

    विदेश की डिग्री, भारत में वापसी… आखिर क्यों?

    सर्वे के आंकड़े एक नई कहानी कहते हैं। भारतीय छात्र ग्लोबल एक्सपोजर चाहते हैं, लेकिन अपनी जड़ें छोड़ना जरूरी नहीं समझते।

    विदेश में पढ़ाई अब कई युवाओं के लिए ‘फाइनल डेस्टिनेशन’ से ज्यादा ‘करियर एक्सपीरियंस’ बनती जा रही है।

    यानी सोच कुछ ऐसी है—

    “डिग्री वहां से… अनुभव वहां का… लेकिन करियर अपने देश में।”

    डेटा में छिपी बड़ी तस्वीर

    81% — पढ़ाई के बाद भारत लौटना चाहते हैं49% — विदेश जाने का फैसला खुद लिया10 में करीब 9 — परिवार में पहली बार विदेश पढ़ने जाएंगे56% — जानकारी के लिए गूगल पर सबसे ज्यादा भरोसा75% — बिजनेस-मैनेजमेंट की ओर झुकाव

    बदल रहा है ‘विदेश जाने’ का मतलब

    विदेश जाने की इच्छा कम नहीं हुई है। बल्कि भारतीय युवाओं में ग्लोबल एजुकेशन का आकर्षण बना हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब विदेश जाना ‘वहीं बस जाने’ का पर्याय नहीं रह गया।

    नई पीढ़ी विदेश से सीखना चाहती है, दुनिया देखना चाहती है, अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करना चाहती है और फिर उस अनुभव को भारत में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है।

    यानी मंजिल विदेश नहीं… मंजिल बेहतर करियर है। और रास्ता चाहे जितना लंबा हो, लौटने का रास्ता भारत की ओर भी खुला है।

  • नागदेव ने रोका रास्ता… बोले- आस्था मन में रखिए……

    नागदेव ने रोका रास्ता… बोले- आस्था मन में रखिए……


    पचमढ़ी। दुर्गम पहाड़ी रास्ता… चारों तरफ घना जंगल… नागद्वारी गुफा और देवस्थल के दर्शन की आस में आगे बढ़ता श्रद्धालु। तभी रास्ते में सामने आता है एक विशाल नागदेव। श्रद्धालु ठिठक जाता है। नागदेव उससे सवाल करते हैं—“दर्शन करने आए हो, लेकिन क्या इस जंगल की जिम्मेदारी भी समझते हो?”
    यहीं से शुरू होती है सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की वह कहानी, जो इस बार नागद्वारी मेले में श्रद्धालुओं को आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश दे रही है।
    नागद्वारी मेला शुरू हो चुका है और 17 अगस्त, नाग पंचमी तक चलेगा। करीब 10 दिन चलने वाले इस मेले को प्रशासन ने इस बार ग्रीन और प्लास्टिक मुक्त मेला बनाने की थीम रखी है। इसी अभियान को प्रभावी बनाने के लिए सतपुड़ा टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने एक रचनात्मक एनिमेटेड वीडियो जारी किया है। इसमें नागदेव स्वयं श्रद्धालुओं को जंगल की अहमियत समझाते नजर आते हैं।


    “यह रास्ता सिर्फ आपका नहीं, वन्यजीवों का भी घर है”
    वीडियो में श्रद्धालु नागद्वारी की कठिन यात्रा पर निकलता है। रास्ते में उसकी मुलाकात नागदेव से होती है। बातचीत में नागदेव बताते हैं कि जिस जंगल से होकर श्रद्धालु गुजर रहे हैं, वह केवल तीर्थयात्रियों का रास्ता नहीं है। यह असंख्य जीव-जंतुओं और वन्यप्राणियों का घर भी है।
    श्रद्धालु जब आस्था के नाम पर जंगल में कपड़े, प्रसाद सामग्री या दूसरी चीजें छोड़ने की बात करता है, तो नागदेव उसे समझाते हैं—श्रद्धा मन में होती है, जंगल में कपड़े या प्लास्टिक छोड़ने में नहीं।
    संदेश साफ है—भगवान का आशीर्वाद लेने आए हैं तो उनके बनाए जंगल का सम्मान करना भी सीखिए।


    बोतल, रैपर और पुराने कपड़े बन रहे संकट
    मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से प्लास्टिक बोतलें, रैपर, पॉलीथिन, दोने-पत्तल और पुराने कपड़ों का कचरा जंगल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। यही वजह है कि प्रशासन प्रवेश मार्गों पर वाहनों की जांच और प्लास्टिक सामग्री पर नियंत्रण की तैयारी कर रहा है।
    एसटीआर का वीडियो श्रद्धालुओं को यह भी संदेश देता है कि जो सामान लेकर जंगल में आए हैं, उसे वापस भी साथ लेकर जाएं। कचरा रास्ते में छोड़ने के बजाय अपने बैग में रखें और बाहर निकलकर निर्धारित स्थान पर ही डालें।


    श्रद्धालु ने उठाया कचरा, नागदेव ने दिया आशीर्वाद
    कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा तब आता है जब श्रद्धालु नागदेव की बात समझता है। वह रास्ते में बिखरा प्लास्टिक और कचरा खुद उठाकर अपने बैग में भर लेता है और जंगल को साफ रखने का संकल्प लेता है।
    उसकी इस पहल से प्रसन्न होकर नागदेव पंचमुखी अवतार में उसे आशीर्वाद देते हैं।
    वीडियो का संदेश भी इसी दृश्य के साथ सामने आता है—प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति जिम्मेदारी निभाना ही सच्ची तीर्थयात्रा है।


    आस्था भी रहे, जंगल भी बचे
    नागद्वारी यात्रा सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सतपुड़ा के संवेदनशील जंगलों से होकर गुजरने वाली यात्रा भी है। इसलिए एसटीआर प्रबंधन श्रद्धालुओं से अपील कर रहा है कि वे प्लास्टिक बोतल, पॉलीथिन, रैपर, पुराने कपड़े और अन्य कचरा जंगल में न छोड़ें।
    प्रशासन की कोशिश है कि इस बार श्रद्धालु दर्शन की पुण्य स्मृति लेकर लौटें, लेकिन जंगल के हिस्से में अपना कचरा छोड़कर नहीं।
    नागदेव का संदेश सीधा है—भगवान को प्रसाद चढ़ाइए, जंगल को कचरा नहीं।

  • नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा का ‘पीढ़ी परिवर्तन’ प्लान,  युवा चेहरों पर दांव;  पुराने नेताओं की बढ़ सकती है मुश्किल


    मध्य प्रदेश में 2027 के निकाय चुनाव की तैयारियां तेज, पार्षद से लेकर महापौर तक नए चेहरों को मौका देने की रणनीति; गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों पर भी नजर


    भोपाल। मध्य प्रदेश में वर्ष 2027 में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन भाजपा ने इसकी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। संगठन स्तर पर चल रहे पीढ़ी परिवर्तन के अभियान का असर अब नगरीय निकायों में भी दिखाई देने की तैयारी है। पार्टी इस बार बड़ी संख्या में नए और युवा चेहरों को मैदान में उतारने के साथ साफ छवि वाले गैर राजनीतिक लोगों को भी मौका देने की रणनीति पर काम कर रही है।
    प्रदेश के 413 नगरीय निकायों में होने वाले चुनाव में महापौर के साथ नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्ष के चुनाव भी प्रत्यक्ष प्रणाली से कराने की तैयारी है। यानी मतदाता सीधे अध्यक्ष और महापौर का चुनाव करेंगे। यही बदलाव भाजपा की रणनीति को महत्वपूर्ण बना रहा है, क्योंकि सीधे चुनाव में संगठन के बजाय उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, छवि और स्थानीय स्वीकार्यता भी निर्णायक होगी।


    30 से 50 साल के नेताओं पर फोकस


    भाजपा की रणनीति में उम्र भी महत्वपूर्ण फैक्टर बन सकती है। पार्टी स्तर पर यह विचार चल रहा है कि पार्षद पद पर 30 से 50 वर्ष की उम्र के नेताओं को अधिक अवसर दिया जाए। वहीं अध्यक्ष और महापौर पद के लिए अधिकतम उम्र करीब 60 वर्ष रखने की गाइडलाइन पर विचार है। हालांकि विशेष परिस्थितियों में अपवाद की संभावना भी रहेगी।
    इसका सीधा असर उन नेताओं पर पड़ सकता है, जो वर्षों से निकाय की राजनीति में सक्रिय हैं और लगातार टिकट की दावेदारी करते रहे हैं। पार्टी संगठन में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति को अब स्थानीय सरकार तक ले जाने की तैयारी कर रही है।


    गैर राजनीतिक चेहरों पर भी नजर


    भाजपा की रणनीति का दूसरा अहम हिस्सा गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति में अवसर देना है। सामाजिक कार्य, व्यापार, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय लेकिन साफ छवि रखने वाले लोगों को निकाय चुनाव में उतारने पर विचार हो सकता है।
    पार्टी का आकलन है कि ऐसे चेहरों से स्थानीय स्तर पर नई स्वीकार्यता बनाई जा सकती है। साथ ही लंबे समय से चले आ रहे गुटीय समीकरणों और आपसी खींचतान से भी संगठन को बाहर निकलने का मौका मिलेगा।


    पुराने अध्यक्षों की एंटी-इनकमबेंसी चुनौती


    2022 में हुए निकाय चुनाव के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय स्तर पर उभरा असंतोष रहा। उस चुनाव में महापौर को छोड़कर नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से हुए थे। पार्षदों द्वारा चुने गए कई अध्यक्षों के खिलाफ बाद में असंतोष और गुटबाजी सामने आई।
    2024-25 में शिवपुरी और देवरी समेत करीब 100 निकायों में अध्यक्षों के खिलाफ पार्षदों की नाराजगी खुलकर सामने आई थी। सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव की समय-सीमा को दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष किया। साथ ही अध्यक्ष को हटाने के लिए जरूरी पार्षदों के समर्थन की सीमा भी दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई कर दी गई।
    इस बदलाव से निकायों में चुनाव से पहले बड़े राजनीतिक टकराव की स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश हुई।


    1000 से ज्यादा एल्डरमैन से साधे असंतुष्ट


    सरकार द्वारा नगर निगमों और नगर पालिकाओं में 1,000 से अधिक एल्डरमैन की नियुक्ति को भी निकाय चुनाव की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इनके जरिए लंबे समय से उपेक्षित या असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साधने के साथ सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार भी किया जाएगा।


    वार्डों का पुनरीक्षण, मतदाता सूची भी तैयार


    निकाय चुनाव की प्रशासनिक तैयारियां भी आगे बढ़ चुकी हैं। नगरीय विकास विभाग वार्डों का पुनरीक्षण कर चुका है और राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता सूची का प्रकाशन कर चुका है। ऐसे में भाजपा संगठन अब संभावित उम्मीदवारों की सामाजिक और राजनीतिक पकड़ का आकलन करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
    हालांकि पार्टी के भीतर निकाय चुनाव को आगे बढ़ाने की संभावना पर भी चर्चा है। अंतिम कार्यक्रम और चुनाव की समय-सीमा पर तस्वीर बाद में साफ होगी।
    फिलहाल संकेत साफ हैं—भाजपा निकाय चुनाव को सिर्फ सत्ता की पुनरावृत्ति का चुनाव नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में नई पीढ़ी को स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रही है। अगर उम्र और नए चेहरे की रणनीति लागू हुई तो कई पुराने दावेदारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट बचाने की ही होगी।

  • दतिया जीत से कांग्रेस को मिला नया चुनावी मॉडल, 2028 के लिए बूथ स्तर तक जमावट

    सेक्टर फॉर्मूले से हर बूथ पर नजर; कमजोर प्रदर्शन वाले क्षेत्रों की होगी समीक्षा, कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण शुरू

    निशाना न्यूज


    भोपाल। दतिया उपचुनाव में मिली जीत ने मध्यप्रदेश कांग्रेस को सिर्फ राजनीतिक संजीवनी ही नहीं दी, बल्कि मिशन 2028 के लिए बूथ मैनेजमेंट का नया मॉडल भी दे दिया है। दतिया में अपनाए गए क्लस्टर-सेक्टर फॉर्मूले को अब पूरे प्रदेश में लागू करने की तैयारी है। इसके जरिए हर बूथ की नियमित मॉनीटरिंग, स्थानीय सामाजिक समीकरणों के हिसाब से जनसंपर्क और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय की जाएगी।कांग्रेस ने दतिया विधानसभा क्षेत्र को अलग-अलग क्लस्टर में बांटकर आसपास के 4-5 बूथों को एक सेक्टर में रखा था। प्रत्येक क्लस्टर की जिम्मेदारी वरिष्ठ और लोकप्रिय नेता को दी गई, जबकि सेक्टर स्तर पर दो-तीन नेताओं को मॉनीटरिंग की जिम्मेदारी मिली। बूथ कमेटियों के गठन के साथ नियमित रिपोर्टिंग की व्यवस्था भी की गई।क्लस्टर प्रभारी रोजाना सेक्टर प्रभारियों से बूथवार रिपोर्ट लेते थे। जहां पार्टी कमजोर दिखी, वहां तत्काल जमावट की जाती थी। विधायकों, पूर्व सांसद-विधायकों और वरिष्ठ नेताओं को क्षेत्रवार जनसंपर्क की जिम्मेदारी दी गई। जाति, समाज और वर्ग के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए घर-घर संपर्क के लिए अलग-अलग नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगाया गया।

    156 बूथों पर कांग्रेस की जीत

    दतिया के 35 क्लस्टरों में कांग्रेस ने 156 बूथों पर जीत दर्ज की। कई बूथों पर पार्टी को एकतरफा बढ़त मिली। वहीं भाजपा सीमित सेक्टरों में ही कांग्रेस को चुनौती दे सकी। कांग्रेस अब दतिया के इस प्रयोग का विधानसभा स्तर पर अध्ययन कर कमजोर और मजबूत क्लस्टरों की पहचान कर रही है।

    इन क्लस्टरों का प्रदर्शन रहा कमजोर

    कुछ क्लस्टरों में कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। पूर्व मंत्री प्रभु सिंह ठाकुर के प्रभार वाले क्लस्टर नंबर-5 में 29 में से सिर्फ 2 बूथ कांग्रेस जीत सकी, जबकि 27 बूथ भाजपा के खाते में गए। विधायक दिनेश गुर्जर, पूर्व विधायक सत्यपाल नीटू सिकरवार और विधायक सचिन यादव के प्रभार वाले क्लस्टरों में भी कांग्रेस को आधे से अधिक बूथों पर हार का सामना करना पड़ा।

    ये तीन बने ‘सुपर कैंपेनर’

    कांग्रेस की आंतरिक समीक्षा में जयवर्धन सिंह, पंकज उपाध्याय और बैजनाथ कुशवाह के क्लस्टरों का प्रदर्शन सबसे बेहतर माना गया।जयवर्धन सिंह: 35 में से 30 बूथ कांग्रेस के पक्ष मेंपंकज उपाध्याय: 29 में से 24 बूथों पर कांग्रेस विजयीबैजनाथ कुशवाह: क्लस्टर में कांग्रेस को एकतरफा बढ़तइनके अलावा पूर्व मंत्री लाखन सिंह यादव के नेतृत्व वाले क्लस्टर का प्रदर्शन भी बेहतर रहा। यहां 34 में से 18 बूथ कांग्रेस के पक्ष में गए।

    अब पूरे प्रदेश में लागू होगा दतिया मॉडल

    प्रदेश कांग्रेस संगठन ने दतिया की रणनीति को ‘संगठन सृजन’ का हिस्सा माना है। संगठन महामंत्री संजय कामले के मुताबिक, विधानसभा प्रभारी, मंडलम, सेक्टर, वार्ड और ग्राम पंचायत समितियों में जिम्मेदारियां बांटी जा रही हैं। बूथ लेवल एजेंट (BLA) भी तय किए जा रहे हैं।इन सभी को दतिया मॉडल की तर्ज पर चुनाव से काफी पहले सक्रिय किया जाएगा। कार्यकर्ताओं का संभागवार प्रशिक्षण शुरू हो चुका है।कामले के मुताबिक, दतिया उपचुनाव में अपनाया गया मॉडल पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सफल रहा है। हालांकि 2028 के विधानसभा चुनाव में बड़े नेता खुद प्रत्याशी होंगे, इसलिए चुनाव लड़वाने वाली टीम की भूमिका अलग होगी। इसके लिए भी अलग स्तर पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।

    कांग्रेस की रणनीति के तीन फोकस

    1. हर बूथ की नियमित मॉनीटरिंग
    2. सामाजिक समीकरण के हिसाब से माइक्रो मैनेजमेंट
    3. चुनाव से पहले ही कार्यकर्ताओं और बूथ कमेटियों को सक्रिय करनाकांग्रेस की कोशिश अब दतिया के इस प्रयोग को प्रदेशभर में दोहराकर भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट का मुकाबला करने की है।

  • क्या जेन जी गढ़ रहे हैं नई भाषा..? जेन जी के स्लैंग शब्दों को समझने में नाकाम हुए दिग्गज?

    नई दिल्ली,// भाषा हमेशा बदलती रही है, यह  बदलाब अस्वाभाविक नहीं माना जाता है लेकिन इस डिजिटल दौर में यह बदलाव पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गया है। जेन जी (Generation Z – 1997 से 2012 के बीच जन्मे)  की नई शब्दावली जिसे आमतौर पर ‘स्लैंग’ कहा जाता है, अब सिर्फ मजाक या ट्रेंड नहीं रह गई, बल्कि एक तरह का ‘कोड’ बन चुकी है। ऐसा कोड, जो कुछ लोगों को जोड़ता है और बाकी को बाहर कर देता है।
    बूमर्स (1946-1964) और यहाँ तक कि मिलेनियल्स (1981-1996) के लिए उन्हें समझना मुश्किल हो रहा है।
    स्लैंग क्यों समझ नहीं आते?
    ये शब्द अक्सर संदर्भ (context) पर निर्भर होते हैं, और पुराना जनरेशन, जो औपचारिक भाषा का आदी है, इन्हें “आलसी” या “बेतुका” मान लेता है। 
    दिलचस्प बात यह है कि इस बदलती भाषा को समझने की कोशिश सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े सितारे और नेता भी कर रहे हैं लेकिन अक्सर नाकाम रहते हैं।
    ये शब्द अक्सर पारंपरिक अंग्रेजी अर्थों से बिल्कुल अलग होते हैं, जो बातचीत में भ्रम पैदा करते हैं। जेन ज़ी पीढ़ी की अपनी अलग भाषा है, जो वाक्यों में कम और स्लैंग में ज्यादा बातें करती है। ये जनरेशन टेक्नो-सेवी है और सोशल मीडिया में माहिर है।

    इस तरह पहले भी हो चुके हैं बदलाव!
    असल में यह पहली बार नहीं है जब नई पीढ़ी ने अपनी अलग भाषा बनाई हो। 1970 के दशक में ‘ग्रोवी’ और ‘बमर’, 1980 में ‘रेडिकल’ और ‘डवीब’ और 1990 में ‘सप’ और ‘एज इफ’ जैसे शब्द आए। हर दौर में ऐसे शब्द रहे हैं, जो उस समय के युवाओं की पहचान बनते थे और बड़ों को ‘आउटसाइडर’ जैसा महसूस कराते थे। लेकिन जेन जी स्लैंग सिर्फ मजेदार या स्टाइलिश नहीं है। यह सामाजिक और राजनीतिक अनुभवों को भी व्यक्त करती है। उदाहरण के लिए मैन्सप्लैनिंग(जब पुरुष महिलाओं को जरूरत से ज्यादा समझाते हैं), गैसलाइटिंग (किसी को मानसिक रूप से भ्रमित करना), घोस्टिंग (अचानक संपर्क तोड़ देना) और कैंसल कल्बर (गलत व्यवहार पर सार्वजनिक बहिष्कार) जैसे शब्द सिर्फ ट्रेंड नहीं हैं, बल्कि समाज में मौजूद समस्याओं को नाम देते हैं और उन्हें सामने लाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार,
    जेन जी स्लैंग एक तरह की ‘माइक्रो-सोसाइटी’ बना रही है। जो लोग इन शब्दों को समझते हैं, वे एक समूह का हिस्सा बन जाते हैं। हालांकि पहले स्लैंग धीरे-धीरे फिल्मों, किताबों या पॉप कल्चर के जरिए फैलती थी। इंटरनेट ने अभी इसे वैश्विक बना दिया है।

    रेयान गोसलिंग भी अटके

    हॉलीवुड अभिनेता रेयान गोसलिंग ने अपनी फिल्म प्रोजेक्ट हैल मेरी के प्रमोशनल वीडियो में जेन जी स्लैंग इस्तेमाल करने की कोशिश की। उन्होंने ‘टी’ (गॉसिप), ‘स्ले’ (शानदार करना), ‘नो कैप’ (सच कहना) जैसे शब्द बोले। लेकिन यही वीडियो मजेदार इसलिए बन गया क्योंकि यह सब उनके मुंह से ‘नेचुरल’ नहीं लग रहा था। उनकी कोशिश में एक अजीब-सी असहजता दिखी और वही दर्शकों के लिए हंसी का कारण बन गई।


    भारत में भी यही हाल

    भारत में भी यही ट्रेंड देखने को मिल रहां है। युवा कलाकार जैसे अनन्या पांडे आसानी से ‘एनजीएल’ (नॉट गोना लाई) या ‘गिविंग’ जैसे शब्द समझा देती हैं, जबकि कई वरिष्ठ कलाकार इन शब्दों से अनजान नजर आते हैं। दूसरी ओर डलकोर सलमान जैसे कुछ अभिनेता इन शब्दों को समझते हैं और इसका श्रेय अपने जेन जी परिवार के सदस्यों को देते हैं। राजनीति भी इससे अछूती नहीं है। राहुल गांधी से जब छात्रों ने ‘पोकी’ (प्यार से बुलाने वाला शब्द) और ‘रिज्ज’ (आकर्षण/करिश्मा) का मतलब पूछा, तो उन्होंने मजाक में कहा- ‘अब मैं फंस गया हूं।’ इसी तरह शशि थरूर जैसे शब्दों के उस्ताद नेता भी ‘फिन्स्ट्रा’ (फेक इंस्टाग्राम) और ‘ओओटीडी’ (आउटफिट ऑफ द डे) जैसे शब्द नहीं पहचान पाए।
    अभी हाल ही में मनोज बाजपेयी से इंटरव्यू में पूछा गया कि ‘बेंचिंग’ किसे कहते हैं, तो उसपर उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि ‘’बेंचिंग तो उसे कहते हैं जो बैंच पर बैठते हैं’’ इसपर सभी हंसने लगे, लेकिन जवाब गलत था जिसके बाद उन्हें सही किया गया
    इसपर एंकर ने समझाया कि रिलेशनशिप में बैंचिंग का मतलब होता है किसी को उम्मीद में लगाए रखना। यानी सामने वाला आपमें दिलचस्पी दिखाता है, लेकिन असली रिश्ते में आने से बचता है। वो आपको एक तरह से “साइड ऑप्शन” की तरह रखता है। जब उसे अकेलापन महसूस हो या इमोशनल सपोर्ट चाहिए हो, तभी वो आपको याद करता है। बाकी समय वो आपको इग्नोर करता रहता है। ऐसे में इंसान को लगता है कि रिश्ता आगे बढ़ेगा, लेकिन असल में दूसरा सिर्फ अपनी सुविधा के लिए आपको पकड़े रखता है
    दिग्गजों को परेशान करने वाले प्रमुख जेन जी स्लैंग (Gen Z Slang Dictionary):

    • Rizz (रिज़): ‘Charisma’ (आकर्षण) शब्द से बना है, जिसका अर्थ है किसी को आकर्षित करने या रिझाने की क्षमता।
    • Sus (सस): ‘Suspicious’ का संक्षिप्त रूप, जिसका अर्थ है संदेहास्पद या जिस पर भरोसा न किया जा सके।
    • Bet (बेट): किसी बात से सहमति जताना या ‘हाँ’ या ‘ठीक है’ के अर्थ में उपयोग होता है।
    • Slay (स्ले): बहुत अच्छा प्रदर्शन करने या अद्भुत दिखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
    • Gyatt (ग्याट): सोशल मीडिया पर अक्सर किसी व्यक्ति की तारीफ (क्यूट) के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द।
    • Pookie (पूंकी): किसी बेहद प्यारे या करीबी दोस्त के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला निकनेम।
    • No Cap (नो कैप): ‘कोई झूठ नहीं’ या ‘सच में’ (Honestly) के अर्थ में, जो बात की सच्चाई पर जोर देता है।
    • Delulu (डेलुलू): ‘Delusional’ का संक्षिप्त रूप, जो अव्यावहारिक मान्यताओं या कल्पनाओं को दर्शाता है।
    • Mid (मिड): औसत दर्जे का या कम गुणवत्ता (Mediocre) वाली चीज़ के लिए।
    • Yeet (यीत): किसी वस्तु को उत्साह या जोर से फेंकना।
    • Ick (इक्क): किसी व्यक्ति से अचानक घृणा या नापसंदगी महसूस होना।
    • Sigma (सिग्मा): सोशल मीडिया पर लोकप्रिय एक व्यक्तित्व प्रकार, जिसे अक्सर आत्मविश्वासी या सफल के रूप में देखा जाता है।

  • कांग्रेस की जिला कार्यकारणी के लिए अभी करना होगा इंतजार….?

    कांग्रेस की जिला कार्यकारणी के लिए अभी करना होगा इंतजार….?

    भोपाल// वैसे तो जोर शोर से शुरू हुए कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान के तहत 15फरवरी तक प्रदेश भर में जिला कार्यकारणी घोषित हो जानी थीं , नेताओं और कार्यकर्ताओं को इसका बेसब्री से इंतजार भी था, अब यह इंतजार थोड़ा लंबा हो गया है, वैसे एक पखवाड़े पहले करीब 4 जिला कांग्रेस कमेटियां घोषित भी कर दी गईं थीं, पर अब अखिल भारतीय कांग्रेस ने इस पर रोक लगा दी है कहा जा रहा है कि अब नए सिरे से जिला कार्यकारणी गठित की जाएंगी, और यह सब फरवरी माह के अंत तक होने की संभावना है।

    15 दिन पहले छिंदवाड़ा, मऊगंज, सागर शहर और फिर झाबुआ जिला कांग्रेस की कार्यकारिणी घोषित की गई थी। अखिल भारतीय कांग्रेस ने जिला कार्यकारिणी के लिए 31 से लेकर 51 की संख्या निर्धारित की है लेकिन इन जिलों में संख्या अधिक हो गई। छिंदवाड़ा की कार्यकारिणी 250, सागर की 141 और मऊगंज में 59 की बनी।  इस कारण अब प्रदेश कांग्रेस ने चारों जिला कार्यकारिणी पर रोक लगाते हुए नई कार्यकारिणी के लिए नाम मांग लिए हैं। इनकी घोषणा हुई थी तब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की इसको लेकर दिशा-निर्देश नहीं थे, लेकिन जंबो कार्यकारिणी को लेकर सवाल हमेशा उठते थे। इस बीच कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सभी राज्यों को परिपत्र भेजकर कहा कि जिला कार्यकारिणी 31 से लेकर 51 की होगी।  यह फैसला अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के निर्देश के बाद लिया गया है। अब नई गाइडलाइन के अनुसार दोबारा कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा।

    कितनी बड़ी होगी कार्यकारणी

    अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की ओर से प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) और जिला अध्यक्षों को भेजे गए पत्र में जिला कार्यकारिणी का नया स्वरूप तय किया गया है. निर्देश के अनुसार, बड़े जिलों में अधिकतम 51 और छोटे जिलों में 31 सदस्य ही कार्यकारिणी में शामिल किए जा सकेंगे. इससे अधिक सदस्यों को शामिल करने की अनुमति नहीं होगी. इसी मानक के आधार पर अब सभी जिलों में पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है. दरअसल, जिला अध्यक्षों ने करीब तीन महीने की मशक्कत के बाद कार्यकारिणी की सूची तैयार कर पीसीसी को भेजी थी.

    पीसीसी स्तर पर परीक्षण के बाद चार जिलों की कार्यकारिणी घोषित भी कर दी गई थी, जबकि शेष जिलों की घोषणा 15 फरवरी तक करने की तैयारी थी. इसी बीच केंद्रीय नेतृत्व का नया फरमान आ गया, जिससे पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ेगी या पड़ रही

    अध्यक्षों के सामने नई चुनौती.?

    नई मानक लागू होने के बाद जिला अध्यक्षों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पहले से घोषित या प्रस्तावित नामों में कटौती की है. जिन नेताओं के नाम कार्यकारिणी से हटाए जाएंगे, उनकी नाराजगी स्वाभाविक मानी जा रही है. वहीं, पीसीसी को भी सभी जिलों की संशोधित सूचियों का दोबारा परीक्षण करना होगा, जिसके बाद ही अंतिम घोषणा संभव होगी.

    कमलनाथ के जिले में बनी जंबो कार्यकारिणी

    प्रदेश संगठन महामंत्री डॉ. संजय कामले ने पुष्टि करते हुए कहा कि सभी जिलों की कार्यकारिणी नए सिरे से बनाई जाएगी. प्रयास है कि फरवरी माह के भीतर सभी जिलों की कार्यकारिणी घोषित कर दी जाए. वहीं छिंदवाड़ा जिले की कार्यकारिणी सबसे बड़ी थी, जिसमें कुल 261 सदस्य शामिल थे. इसमें 73 महामंत्री, 68 सचिव, 62 आमंत्रित सदस्य और अन्य पदाधिकारी थे. सूत्रों के अनुसार, इसी तरह की भारी-भरकम कार्यकारिणियों को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने आकार सीमित करने का निर्णय लिया है, ताकि संगठन अधिक चुस्त-दुरुस्त और सक्रिय बने तथा पदाधिकारियों की जवाबदेही तय हो सके.

    अब पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि संगठन में संतुलन और अनुशासन बनाए रखने के लिए तय मानकों के अनुसार ही नई कार्यकारिणी गठित की जाएगी।