Blog

  • किताबों से  ज्ञान ही नहीं उम्र भी बढ़ती  है ?

    किताबों से ज्ञान ही नहीं उम्र भी बढ़ती है ?

    आपने किताबें पढ़ने की आदत  के कई फायदों के बारे में सुना होगा जैसे किताबें  पढ़ने से एकाग्रता आती है ,ज्ञान बढ़ता है, शब्दावली बढती है, किताबो का अध्ययन आपके व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव लाता  है ,आप  भावनात्मक रूप से मजबूत होते हैं, बुद्धिमत्ता में सुधार होता है, तनाव कम होता है, इसके अलावा यह समय बिताने का एक रोचक सस्ता तरीका है, पर हाल में हुए शोध बताते थीं कि किताब पढने की आदत आपकी उम्र को भी बढ़ा सकती है ,

    हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि हर हफ्ते 3.5 घंटे से ज्यादा किताबें पढ़ने से आपकी उम्र दो साल तक बढ़ सकती है। येल यूनिवर्सिटी  द्वारा किया यह अध्ययन सोशल साइंस एंड मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित हुआ है , इस अध्ययन का जिक्र डॉ माइकल मोस्ले ने हाल में में प्राकशित आसान जीवन जीने की कला पर आधारित पुस्तक में भी किया है.

    येल यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं ने पाया कि पुस्तक पाठक गैर-पाठकों की तुलना में लगभग दो साल अधिक जीवित रहे।

    2004 में शुरू हुए ‘ए चैप्टर ए डे: एसोसिएशन ऑफ बुक रीडिंग विद लॉन्गविटी’ शीर्षक वाले अध्ययन में 3,635 अमेरिकियों (50 और उससे अधिक उम्र के उम्र, लिंग, नस्ल, शिक्षा, धन, वैवाहिक स्थिति और अवसाद के लिए समायोजन करते हुए) की पढ़ने की आदतों को देखा गया। प्रतिभागियों को तीन समूहों में विभाजित किया गया था: वे जो सप्ताह में 3.5 घंटे या उससे अधिक पढ़ते हैं, वे जो सप्ताह में 3.5 घंटे तक पढ़ते हैं, और फिर वे जो बिल्कुल नहीं पढ़ते हैं।

    अध्ययन  की अवधि के दौरान, 33% गैर-पाठकों की मृत्यु हुई, जबकि 27% पुस्तक पाठकों की मृत्यु हुई, जो हर सप्ताह 3.5 घंटे से अधिक समय तक पढ़ते हैं यानि  गैर-पुस्तक पाठकों की तुलना में पुस्तक पाठकों के मरने की संभावना 20% कम थी। कुल मिलाकर, शोधकर्ताओं ने गणना की कि पुस्तक पढ़ना 23 महीने के अतिरिक्त जीवित रहने से जुड़ा था।

    शोधकर्ताओं ने यह भी पाया  कि समाचार पत्र या पत्रिका के लेख पढ़ने से किताब के समान प्रभाव नहीं पड़ता .

    शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग किताबें पढ़ते हैं, उनमें मजबूत बौद्धिक और तार्किक  क्षमताएं दिखाई देती हैं, जैसे कि याद करना और पीछे की ओर गिनना-कौशल, जो पढ़ने के साथ संयुक्त रूप से लंबे समय तक जीने के साथ सकारात्मक संबंध दिखाते हैं। अध्ययन का नेतृत्व करने वाली मास्टर की छात्रा अवनि बविशी का मानना ​​है कि पाठक का कथा और कथा के पात्रों के लिए आवश्यक गहन जुड़ाव हो जाता है,  कथा और गैर-कथा दोनों पुस्तकों की लंबाई  ही  जो संज्ञानात्मक कौशल को बढ़ाती है और इसलिए जीवन का विस्तार करती है।

    वैसे अध्ययन कर्ताओं का मानना यह है कि यह अध्ययन केवल पुस्तक के पढने और उम्र में सहसंबंध दिखाता है, कार्य-कारण की व्याख्या नहीं करता । इसके अलावा, यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं है कि युवा आबादी में समान सहसंबंध साबित होंगे या नहीं , हालांकि बाविशी का मानना ​​​​है कि इसकी संभावना है।

    भविष्य के अध्ययनों के बारे में यह विशेष रूप से देखने में मददगार होगा कि लोग किस प्रकार की किताबें पढ़ रहे हैं, और प्रिंट, ईबुक और ऑडियोबुक पर अधिक बारीकी से देखने के लिए यह पता लगाने की जरूरत है  कि उनके दीर्घायु के साथ अलग-अलग संबंध हैं या नहीं।

     पढने से आधुनिक जीवन का तनाव दूर होता है

    अध्ययनों से पता चलता है कि पढने से आधुनिक जीवन के दबाव पर तनाव से बचने में मदद मिलती है , दरअसल पढने के दौरान शब्दों और कहानियों पर  हमारा ध्यान बंट जाता है और हमारा तनाव कम होने लगता है इससे याददाश्त भी बेहतर होती है और अवसाद से बचने में भी मदद मिलती है , 

    सही तरीके से कैसे पढ़ें ?

    पढ़ना एक कला हैं , आम तौर पर सभी पढ़ते हैं पर क्या हम अपने पढ़े हुए शब्दों या बातों को आत्मसात कर पाते हैं ? आइये जाने बंगाल के प्रसिद्ध क्रन्तिकारी ,योगी और दार्शनिक महर्षि अरविन्द पुस्तक पढने पर क्या कहते हैं 1 ऐसा लगता है कि अधिकतर लोग जितना पढ़ते हैं उतना आत्मसात नहीं करते ,या  जितना आत्मसात कर सकते हैं उससे ज्यादा पढ़ा जाते हैं .

    2 वे बहुत साड़ी कहानियाँ ,उपन्यास ,और नाटक तेजी से पढ़ डालते हैं ,लेकिन पदबंधों ,मुहावरों ,व्याकरण की सूक्ष्मताओं की समझ नहीं बना पाते ,यही कारण है कि जब वे बोलते है तो बुनियासी गलतियाँ कर बैठते हैं .

    3 मैं सोचता हूँ कि हमे हर अच्छी किताब को तीनचार बार पढना चाहिए ,ताकि उसकी अन्तर्वस्तु को भली प्रकार से समझ सकें और उसे ग्रहण कर सकें .

    4 शायद सभी व्यक्ति हर किताब को तीन चार बार नहीं पढ़ सकें ,क्योंकि सभी किसी स्कालर की तरह नहीं हो सकते हैं ,फिर भी कुछ किताबें ऐसी हैं जिन्हें बार बार पढ़कर ही समझा जा सकता है . 5 मैं अपनी बताऊं कि मैंने संस्कृत कैसे सीखी ? मैंने महाभारत के नल दमयंती प्रसंग को बार-बार और भुत ध्यान से पढ़ते हुए उसे पूरी तरह से आत्मसात कर लिया था ,उसके बिना यह सम्भव नहीं था .                                                                                                                                                                                                                                                                                    ,                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 

  • दक्षिण भारतीय फिल्मों में दिखने वाली भव्य हवेलियाँ कहाँ हैं ?

    दक्षिण भारतीय फिल्मों में दिखने वाली भव्य हवेलियाँ कहाँ हैं ?

    इन दिनों टीवी पर बॉलीवुड के बजाय दक्षिण भारत की फिल्मों की भरमार है, इन फिल्मों में खूबसूरत हवेलियां और कलात्मक और परंपरागत गांव दिखाए जाते हैं ,आप जानते हैं यह हवेलियां कहां स्थित है ? और यह गांव कौन से हैं ? आइए आपको बताते हैं इसके बारे में-

     जी हां ! यह हैं चेट्टियारों की हवेलियां । चेट्टियार दक्षिण भारत या कहें तमिलनाडु की व्यापारिक जाति है । यह मदुरै के करैकुड़ी के आसपास लगभग 72 गांव में बसे हुए हैं । इलाका चेट्टीनाड कहलाता है और यहां रहने वाले चेट्टियार।

    कौन है चेट्टियार?

    हवेलियों पर बात करने से पहले हम चेट्टियारो के इतिहास पर नजर डालते हैं। चेट्टियार चेट्टिनाड इलाके में रहने वाली  व्यावसायिक जाति है । यह सदियों पहले नमक का कारोबार करते थे, फिर जवाहरात का कारोबार करने लगे। 19वीं सदी तक यह इलाके में बड़े साहूकार बन गए। पैसा उधार देने और ब्याज लेने  लगे। 1826 में जब अंग्रेजों ने म्यांमार (वर्मा ) पर कब्जा किया तो चेट्टियार वहां गए और साहूकारी करने लगे, इससे दक्षिण पूर्व एशिया में बसने वाले चेट्टियार  मालामाल हो गए, एक समय ऐसा आया कि इन देशों के स्थानीय लोग इनसे असुरक्षा महसूस करने लगे ।

    इन चेट्टियारों ने  विदेशों में कमाई अपनी पूंजी का बड़ा हिस्सा तमिलनाडु के अपने क्षेत्र में भव्य हवेलिया बनाने में खर्च किया।

    चेट्टियारों की हवेलियाँ

     चेट्टियारों की हवेलियां का स्थापत्य अपनी भव्यता , मन मोह लेने वाले रंगों और स्थानीय और विदेशी वास्तुशिल्प के मिश्रण या तालमेल की खूबसूरत मिसाल है। चटख रंगों का इस्तेमाल इन्हें और भी आकर्षक बना देता है। चेट्टियारों ने हवेलियों के निमार्ण में स्थानीय हस्तकला को बहुत अहमियत दी । विशेष तौर पर रंग-बिरंगे अंथगुड़ी टाइल्स और प्लास्टर और लकड़ी की स्थानीय नक्काशी को खूब बढ़ावा दिया।इसके साथ ही जापानी टेल्स और इटेलियन मार्वल का भी प्रयोग है .

    कन्नाडुकाथन में स्थित राजा मुथैया की हवेली चेट्टियारों की हवेलियों की सुंदरता को समझने या परखने का आदर्श नमूना है । ऊंची दीवारें लंबे-लंबे बरामदे और बड़े-बड़े हाल चारों तरफ आता और झुकी हुई इलाहाबादी टाइल्स के अंदाज में बनी छत इन मकानों की खासियत है. अंदर बाहर दोनों तरफ बरामदे (कुछ-कुछ उत्तर भारत के पारंपरिक मकानों की तरह जैसे आंगन में लगी परछी  हुआ करती थी और जिन में बैठी महिलाएं सब्जी भाजी काटने छापने को लेकर बड़ी पापड़ अचार बनाने जैसे दिन भर सारे काम बातचीत करते हुए निपटा लिया करती थी।) इस तरह इस हवेली में भी दोनों तरफ  दुमंजले बरामदे हैं, बरामदे में सुंदर और गजब की फिनिशिग और चिकने खंबे। खम्बों पर ऊपर नीचे गजब की नक्काशी। घर के अंदर इस बरामदे से होकर ही जाया जा सकता है पहला हाल कुछ निजी किस्म का तो है, पर यहां परिवार के अलावा  कुछ खास लोगों को भी आने की इजाजत होती थी। इन हवेलियों के हाल का निमार्ण यूरोपीय शैली और सजावट वाला होता  हैं । अंग्रेजों के बंगलों के समान बड़ी बड़ी खिड़कियां।

    इन भव्य हवेलियों  को स्थानीय भाषा में “पेरिया वीडू” यानी बड़ा मकान कहलाते हैं।

    चेट्टियार जहांअपनी हवेलियों के  बाहरी बरामदों और हॉल की भव्य सजावट करते हैं , वहीं भीतरी हिस्सों में सादगी नजर आती है। घर की महिलाओं की सुविधा और निजता का ज्यादा ख्याल रखा जाता था क्योंकि घर के मर्द अक्सर विदेश में रहते थे, घर पूरी तरह से महिलाओं के हवाले हुआ करते थे।

    अंथगुड़ी टाइल्स ?

    चेट्टिनाड के मकानों के रंग-बिरंगे बेल बूते  वाले फर्श खास किस्म के टाइल्स से बनते हैं  । यह टाइल्स स्थानीय स्तर आथनगुड़ी गांव तैयार किए जाते हैं । इसलिए इसे अथंगुड़ी टाइल कहा जाता है

     यह टाइल्स  सस्ते मिलते हैं और डिजाइन के हिसाब से इनकी कीमत बढ़ती जाती है। इनकी खासियत है इनकी अलग किस्म की चमक होती है पर इनमें भड़कीला पन नहीं होता।  यह टाइल्स किसी मशीन से नहीं बनते बल्कि इन्हें हाथ से तैयार किया जाता है। इसके लिए इलाके की साधारण मिट्टी इस्तेमाल होती है मिट्टी से बने यह टाइल्स एक कांच के तले वाले खास कांचे में रखकर धूप में सुखाया जाते हैं इन खातों में पहले से रंग भरे रहते हैं सूखने पर मिट्टी के स्टाइल पर कांच की सतह वाली डिजाइन बन जाती है।

  • प्रकृति के उपहारों से खाली होती जा रही दुनिया 

    प्रकृति के उपहारों से खाली होती जा रही दुनिया 

    सुधांशु मिश्र

    प्रकृति खतरे में है,डायनासोर युग का अंत होने के बाद प्रकृति को अब तक के सबसे बड़े स्तर पर क्षति पहुंच रही है। दक्षिण आस्ट्रेलिया की फ्लैंडर्स यूनिवर्सिटी और यूरोपीय आयोग की टीम ने हाल ही में किए शोध ने बताया कि दुनिया में जलवायु और जमीन के उपयोग में तेजी से हो रहे बदलाव के चलते 2100 तक दुनिया की की एक चौथाई से अधिक जैव विविधता का सफाया हो जाएगा । विडंबना यह है कि आपस में जुड़ी प्रजातियों के इस नुकसान को टाला नहीं जा सकता ।
    शोध के मुताबिक 2050 तक धरती 6 से 10% तक  जानवर और वनस्पतियों को खो देगी सदी के अंत की आंकड़ा 27% तक पहुंच जाएगा। विश्लेषण यह भी बताता है कि अब तक पृथ्वी जैव विविधता पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करके आंका गया है और यदि सुधार नहीं किए तो हम धरती पर जीवन को बचाए रखने वाली महत्वपूर्ण चीजों को खो देंगे ।

    शोध में सुपर कंप्यूटर का इस्तेमाल
    एक दूसरे से आपस में जुड़ी प्रजातियों का भविष्य जानने के लिए अध्ययन में सबसे शक्तिशाली सुपर कंप्यूटर का इस्तेमाल किया गया। सुपर कंप्यूटर की मदद से वैज्ञानिकों ने आभासी प्रजातियों और 15000 से ज्यादा खाद्य जालों के साथ नकली धरती का निर्माण किया इस धरती पर जलवायु और भूमि उपयोग में बदलाव किए गए कंप्यूटर मॉडलिंग में पाया गया कि जैसे ही जलवायु परिवर्तन हुआ आभासी प्रजातियों ने अपने स्थान बदल दिए कुछ नए परिवर्तनों को स्वीकार किया तो कुछ विलुप्त हो गई।

    दुनिया भर में जैवविविधता पर तेज होता खतरा
    द इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडाइवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज- आईपीबीईएस का अनुमान है कि दुनिया भर में कम से कम 80 लाख प्रजातियां मौजूद हैं. लेकिन उसने आगाह किया है कि 2030 तक करीब 10 लाख प्रजातियां गायब हो सकती हैं. जैवविविधता क्षरण की दर खतरे के निशान पर पहुंच चुकी है- हर 10 मिनट में औसतन एक प्रजाति खत्म हो रही है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, हम लोग दुनिया की छठी सामूहिक विलुप्ति के बीचोबीच पहुंच गए हैं.

    मनुष्य ने धरती और इसके प्राकृतिक संसाधनों पर अपना एकाधिकार मान लिया है जिसके चलते प्राकृतिक संसाधनों का बेहताशा दोहन ,श्रीकरं ,जंगलों की अंधाधुंध कटाई, औद्योगिकरन,और शिकार से जैव विविधता के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है . मनुष्य के अतिरिक्त धरती पर मौजूद सभी जीवित इकाइयाँ प्रकृति को बहुत कम नुकसान पहुंचाती है.

    जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से बढ़ रही गर्मी ने जैव विविधता पर बहुत बुरा असर डाला है .अमेरिकी एजेंसी नासा ने अपने अध्यन में पाया है की मौसमी बदलाव की वजह से धरती के 65 फीसदी कीट अगली सदी तक विलुप्त हो जाएंगें. जलवायु परिवर्तन ने हमारे पारिस्थितिकी तंत (ईको सिस्टम) को गड़बड़ा दिया है,धीरे धीरे पेड़ पोधे पशु पक्षी गायब होते जा रहे हैं ,आज हमें आसपास गौरैया जैसी घरेलू चिड़िया नजर आना कम हो गयी हैं ,तितलियाँ,मधुमक्खियाँ ,सहित जाने पहचाने कीट पतंगें देखने को तरस गये हैं .  


    आंकड़े और तथ्य चिंतित करने और डराने वाले हैं.  वैज्ञानिकों का कहना है कि हर प्रजाति किसी न किसी रूप में एक दूसरे पर निर्भर है ।ग्लोबल वार्मिंग के कारण शिकारी प्रजाति शिकार हो रही है या नुकसान प्राथमिक विलुप्तीकरण है, शिकारी प्रजाति के लिए भोजन का संकट कराया तो एक समय बाद विलुप्त हो जाएगी।

    दुनिया भर में है चिंता ?

    7 दिसंबर से 19 दिसंबर 2022 तक जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र संघ का एक महत्वपूर्ण सम्मेलन कॉप 15 (cop15) कनाडा के मांट्रियल शहर में संपन्न हुआ। जहां 200 देशों के प्रतिनिधियों ने मानवीय गतिविधियों के कारण प्रकृति के चिंताजनक विनाश को रोकने के लिए लक्ष्य स्थापित करने पर चर्चा की । सम्मेलन में यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि प्रकृति के बिना हमारे पास कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जंगलों की कटाई मरुस्थलीकरण रसायन और कीटनाशकों के दुरुपयोग से हमारी धरती  क्षरण  की शिकार हुई है और बढ़ती विश्व आबादी के लिए भोजन जुटाना कठिन होता जा रहा है मानवता सामूहिक विनाश का हथियार बन गई है।
    इस सम्मेलन में नया वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क पारित किया गया और एक ऐतिहासिक समझौता हुआ,जिसमे 2030 तक जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली 30 फीसदी भूमि और जल का संरक्षण  किया जाएगा ,वर्तमान में 17 फीसदी भूमि व् 10 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र का संरक्षण किया गया है. समझौते में लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण ,जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और प्रदूषण की कम करने के प्रयासों को गति देने की बात कही गई है .मसौदे में 2030 तक जैव विवधता के लिए 200 अरब डॉलर जुटाने और सब्सिडी को चरण बद्ध तरीके से खत्म का कम किया जायेगा . समझौते के तहत गरीब देशों के लिए सालाना वित्तीय मदद को 2025 तक बढाकर 20 अरब डॉलर किया जाएगा,जो 2030 तक बढ़कर 30अरब डालर सालाना हो जाएगी . यह बात ध्यान देने की है कि सम्मेलन में भारत ने ही जैव विविधता संरक्षण के लिए नया और समर्पित कोष बनाए जाने की तत्काल जरूरत पर जोर दिया था ,भारत का कहना था कि जैव विविधता के संरक्षण के लक्ष्यों को लागू करने का बोझ ज्यादा विकासशील देशों पर पड़ता है .  

    जैवविविधता रक्षा के लिये तीन उपाय

    इस सम्मेलन में यूएन महासचिव ने प्रकृति की रक्षा सुनिश्चित करने के लिये तीन अहम उपायों पर बल दिया है.

    पहला, उन राष्ट्रीय योजनाओं लिये सब्सिडी और टैक्स में छूट को ख़त्म किया जाए, जिनमें प्रकृति को क्षति पहुँचाने वाली गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है . इसके बजाय, हरित समाधानों जैसे कि नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहन, प्लास्टिक के इस्तेमाल को घटाने, प्रकृति-अनुकूल खाद्य उत्पादन और संसाधनों के टिकाऊ दोहन की ओर बढ़ना होगा.इन योजनाओं में आदिवासी आबादी व स्थानीय समुदायों के अधिकारों को मान्यता दी जाएगी, जोकि प्रकृति के संरक्षक हैं.

    दूसरा, निजी सैक्टर को मुनाफ़ा और संरक्षण को एक साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम करना होगा होगा, और खाद्य व कृषि उद्योग को सतत उत्पादन, कीटनाशक नियंत्रण,परागण के प्राकृतिक रास्तों पर ध्यान देना होगा.  
    यूएन के शीर्षतम अधिकारी ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा  कि वे अपने बैंक खाते भर रहे हैं जबकि दुनिया प्रकृति के उपहारों से खाली होती जा रही है .
    उन्होंने हरित लीपापोती की प्रवृत्ति की आलोचना की, जिसके ज़रिये कम्पनियाँ प्रकृति संरक्षण के लिये बड़े-बड़े दावे करती हैं, और कहा कि निजी सैक्टर की उसके क़दमों के लिये जवाबदेही तय की जानी होगी.
    तीसरा, विकसित देशों को वैश्विक दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित देशों को साहसिक वित्तीय पोषण प्रदान करना होगा, चूँकि उनके अनुसार, यह बोझ केवल विकासशील देशों के कन्धों पर नहीं छोड़ा जा सकता है.
    अमेरिका के कंजर्वेशन इंटरनेशनल में जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता वैज्ञानिक डेव होले का कहना है कि कुदरत हमें जो देती है उसी से  हमारा अस्तित्व है,  पर हम उसकी बिलकुल प्रवाह नही कर रहे हैं, वे कहते है कि सुबह सुबह जब प्लेट में अनाज से बना खाना हमारे सामने होता है तो हम यह नहीं सोचते कि प्रकृति ने इन फसलों को उगाने में कितनी है जिसकी बदौलत यह अन्न तैयार हुआ है ,रोजमर्रा के स्टार पर कुदरत जो हमारे लिए कर रही है  वह हमें दिखता ही नहीं .

    पर पर्यावरण की चिंता और उन पर काम करने वाले विशेषज्ञ और पर्यावरणविद इस तरह के अंतरराष्ट्रीय (कांफ्रेंस/सेमीनार) को बहुत अधिक सार्थक नहीं मानते ,उनका मानना है कि इस तरह के लक्ष्य कई बार निर्धारित हो चुके हैं पर कुछ सार्थक नहीं निकला ,उदाहरण के लिए 80 के दशक में यूनाइटेड नेशन में मेनएंड बायोस्फियर नाम की योजना चलाई थी ,जिसे वन्य जीवों और पेड़ पोधों को बचाने और संरक्षित रखने के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया गया था ,दुनिया भर में कई बायोस्फियर पार्क ,सेंचुरी और नेशनल पार्क इसके तहत बने ,पर अपेक्षित परिणाम नही आ सके .

    प्रकृति की बरबादी रोकने के लिए इस तरह के बड़े-बड़े समझोते या लक्ष्य उतने कारगर नहीं होंगें जितने की देशीय या स्थानीय स्तर के उपाय . सिर्फ आर्थिक मदद या बड़े प्रोजेक्ट से किसी देश की जैव विविधता को नहीं बचाया जा सकता . भारत के पर्यावरण को सुधारने  के लिए अमेरिका में बात नहीं की जा सकती . भारत को अपने उपाय खोजने होगें ,

    पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरण विद डॉ अनिल प्रकाश जोशी ने पिछले दिनों एक लेख में लिखा था कि “अगर कहीं कोई समाधान छुपा है तो वो अपने देश में बाकी बचे जंगलों ,तालाबों ,नदियों के संरक्षण से ही सम्भव है . यह भी जानना आवश्यक है कि जितना ज्यादा पानी होगा ,जितना ज्यादा वन होगें ,बेहतर मिट्टी होगी ,ये स्वयं भी जलवायु परिवर्तन में और तापक्रम स्थिर करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं .यह सवाल इसलिए बार-बार है की  हम इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों से क्या पा रहे हैं ? और पिछले लगातार दशकों से होने वाली गोष्ठियों किस बेहतर परिणाम की तरफ हमें ले जा चुकी हैं? क्योंकि प्रकृति और पारिस्थितिकी दुनिया भर अगर लगातार गिरती चली जा रही हो तो सवाल इस तरह के अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों के प्रति खड़ा होना ही चाहिए .प्रकृति को बचाना है तो अपनी प्रवृति को पहले सुधारना होगा .हमें अपनी आवश्यकताओं पर अंकुश लगाना चाहिए विलासिताओं को त्याग कर ही शायद हम प्रकृति संरक्ष्ण के बड़े वाहक बन सकते हैं .

    यदि हमें अपना अस्तित्व बचाना है तो हमें जैव विविधता को बनाये रखना होगा ,क्योंकि जैव विविधता के क्षरण का सीधा असर हमारे भोजन तंत्र पर पड़ेगा ,वह  तहस नहस हो सकता है.अब हमें इसका दोहन रोकना होगा और प्रभावी संरक्षण करना होगा . ,समय रहते मनुष्य ने प्रभावी कदम नहीं उठाये तो हमारे पास पछताने के सिवाय कुछ नहीं रहा जाएगा .