Category: विशेष खबर

  • ऐसे पढ़ेगा भारत तो कैसे बढ़ेगा भारत ?

    सरकारी दावों के बीच स्कूली शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर सामने आई

     प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट में खुलासा – प्राथमिक में 6.18 करोड़ बच्चों का नामांकन, सीनियर सेकेंडरी तक पहुंचते-पहुंचते संख्या घटकर 1.64 करोड़ रह जाती है रह जाती है

    नई दिल्ली।

    सरकारी दावों के बीच स्कूली शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। संसद की प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्कूल में प्राथमिक स्तर पर दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 27 ही सीनियर सेकेंडरी (12वीं) तक पहुंच पाते हैं। 73% बच्चे 12वीं से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।

    समिति ने चेतावनी दी है कि अगर बच्चों को स्कूल में रोके रखने की चुनौती का समाधान नहीं किया गया तो सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ आंकड़ों तक सीमित रह जाएगा।

    आंकड़ों में गिरावट – कहां कितने बच्चे?

    रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार –

    स्तरनामांकित बच्चे (करोड़ में)स्कूलों की संख्या (लाख में)
    प्राथमिक6.189.11
    उच्च प्राथमिक4.084.12
    माध्यमिक2.361.61
    उच्च माध्यमिक1.640.90

    प्राथमिक के मुकाबले सीनियर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या सिर्फ 10% है। 2014-15 से 2024-25 के बीच स्कूलों की कुल संख्या 15.17 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई, जबकि शिक्षकों की संख्या 85.62 लाख से बढ़कर 1.01 करोड़ हो गई। इसके बावजूद माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 11.5% बनी हुई है।

    बच्चे स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं? रिपोर्ट में 4 बड़े कारण

    1. कमजोर बुनियादी नींव: प्राथमिक स्तर पर पढ़ने-लिखने और गणित की बुनियादी क्षमता कमजोर।
    2. स्कूलों की दूरी: गांव-देहात में सीनियर सेकेंडरी स्कूल दूर होने से बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
    3. आर्थिक-सामाजिक दबाव: गरीब परिवार के लड़कों पर मजदूरी का दबाव, लड़कियों के लिए सुरक्षा और दूरी बड़ी बाधा।
    4. शिक्षक प्रशिक्षण में गिरावट: 2022 में 53 लाख से अधिक शिक्षकों ने ऑनलाइन प्रशिक्षण लिया था, 2025 में यह घटकर मात्र 1.63 लाख रह गया।

    समिति की 3 बड़ी सिफारिशें

    1. ‘निपुण भारत’ योजना कड़ाई से लागू हो: ताकि शुरुआती कक्षाओं में ही बच्चों की बुनियादी समझ मजबूत हो।
    2. मजबूत स्टूडेंट ट्रैकिंग सिस्टम: हर बच्चे की उपस्थिति और प्रगति की रियल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग हो।
    3. शिक्षक प्रशिक्षण का सालाना लक्ष्य: ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रशिक्षण को निरंतर जारी रखा जाए।

  • कांग्रेस की जिला कार्यकारणी के लिए अभी करना होगा इंतजार….?

    कांग्रेस की जिला कार्यकारणी के लिए अभी करना होगा इंतजार….?

    भोपाल// वैसे तो जोर शोर से शुरू हुए कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान के तहत 15फरवरी तक प्रदेश भर में जिला कार्यकारणी घोषित हो जानी थीं , नेताओं और कार्यकर्ताओं को इसका बेसब्री से इंतजार भी था, अब यह इंतजार थोड़ा लंबा हो गया है, वैसे एक पखवाड़े पहले करीब 4 जिला कांग्रेस कमेटियां घोषित भी कर दी गईं थीं, पर अब अखिल भारतीय कांग्रेस ने इस पर रोक लगा दी है कहा जा रहा है कि अब नए सिरे से जिला कार्यकारणी गठित की जाएंगी, और यह सब फरवरी माह के अंत तक होने की संभावना है।

    15 दिन पहले छिंदवाड़ा, मऊगंज, सागर शहर और फिर झाबुआ जिला कांग्रेस की कार्यकारिणी घोषित की गई थी। अखिल भारतीय कांग्रेस ने जिला कार्यकारिणी के लिए 31 से लेकर 51 की संख्या निर्धारित की है लेकिन इन जिलों में संख्या अधिक हो गई। छिंदवाड़ा की कार्यकारिणी 250, सागर की 141 और मऊगंज में 59 की बनी।  इस कारण अब प्रदेश कांग्रेस ने चारों जिला कार्यकारिणी पर रोक लगाते हुए नई कार्यकारिणी के लिए नाम मांग लिए हैं। इनकी घोषणा हुई थी तब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की इसको लेकर दिशा-निर्देश नहीं थे, लेकिन जंबो कार्यकारिणी को लेकर सवाल हमेशा उठते थे। इस बीच कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सभी राज्यों को परिपत्र भेजकर कहा कि जिला कार्यकारिणी 31 से लेकर 51 की होगी।  यह फैसला अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के निर्देश के बाद लिया गया है। अब नई गाइडलाइन के अनुसार दोबारा कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा।

    कितनी बड़ी होगी कार्यकारणी

    अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की ओर से प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) और जिला अध्यक्षों को भेजे गए पत्र में जिला कार्यकारिणी का नया स्वरूप तय किया गया है. निर्देश के अनुसार, बड़े जिलों में अधिकतम 51 और छोटे जिलों में 31 सदस्य ही कार्यकारिणी में शामिल किए जा सकेंगे. इससे अधिक सदस्यों को शामिल करने की अनुमति नहीं होगी. इसी मानक के आधार पर अब सभी जिलों में पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है. दरअसल, जिला अध्यक्षों ने करीब तीन महीने की मशक्कत के बाद कार्यकारिणी की सूची तैयार कर पीसीसी को भेजी थी.

    पीसीसी स्तर पर परीक्षण के बाद चार जिलों की कार्यकारिणी घोषित भी कर दी गई थी, जबकि शेष जिलों की घोषणा 15 फरवरी तक करने की तैयारी थी. इसी बीच केंद्रीय नेतृत्व का नया फरमान आ गया, जिससे पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ेगी या पड़ रही

    अध्यक्षों के सामने नई चुनौती.?

    नई मानक लागू होने के बाद जिला अध्यक्षों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पहले से घोषित या प्रस्तावित नामों में कटौती की है. जिन नेताओं के नाम कार्यकारिणी से हटाए जाएंगे, उनकी नाराजगी स्वाभाविक मानी जा रही है. वहीं, पीसीसी को भी सभी जिलों की संशोधित सूचियों का दोबारा परीक्षण करना होगा, जिसके बाद ही अंतिम घोषणा संभव होगी.

    कमलनाथ के जिले में बनी जंबो कार्यकारिणी

    प्रदेश संगठन महामंत्री डॉ. संजय कामले ने पुष्टि करते हुए कहा कि सभी जिलों की कार्यकारिणी नए सिरे से बनाई जाएगी. प्रयास है कि फरवरी माह के भीतर सभी जिलों की कार्यकारिणी घोषित कर दी जाए. वहीं छिंदवाड़ा जिले की कार्यकारिणी सबसे बड़ी थी, जिसमें कुल 261 सदस्य शामिल थे. इसमें 73 महामंत्री, 68 सचिव, 62 आमंत्रित सदस्य और अन्य पदाधिकारी थे. सूत्रों के अनुसार, इसी तरह की भारी-भरकम कार्यकारिणियों को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने आकार सीमित करने का निर्णय लिया है, ताकि संगठन अधिक चुस्त-दुरुस्त और सक्रिय बने तथा पदाधिकारियों की जवाबदेही तय हो सके.

    अब पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि संगठन में संतुलन और अनुशासन बनाए रखने के लिए तय मानकों के अनुसार ही नई कार्यकारिणी गठित की जाएगी। 

  • कितनी बार दिल पर दस्तक देता है शिद्दत भरा प्यार..?

    कितनी बार दिल पर दस्तक देता है शिद्दत भरा प्यार..?

    नई दिल्ली// बशीर बद्र की ग़ज़ल की पक्तियां हैं कि

    प्यार की नई दस्तक दिल पे फिर सुनाई दी,

    चाँद सी कोई सूरत ख़्वाब में दिखाई दी।

    किस ने मेरी पलकों पे तितलियों के पर रक्खे

    आज अपनी आहट भी देर तक सुनाई दी।

    जिंदगी  में सभी ने कभी न कभी एक ऐसे पलों  को महसूस जरूर किया होता है जिसमें किसी को देखकर या मिलकर पेट में तितलियां उड़ने का सा अहसास होता है, जिसे प्यार का नाम दिया जाता है। इस  अहसास या अनुभव को लेकर फिल्म गीत  और साहित्य  भरा पड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा जीवन में कितनी बार होता है?

    जिंदगी में दो बार प्यार होता है” यह एक आम धारणा है, जो अक्सर दो अलग-अलग तरह के प्यार को दर्शाती है: पहला प्यार जो आकर्षण, जुनून या वासना पर आधारित होता है, और दूसरा सच्चा प्यार जो समझ, सम्मान और गहरे जुड़ाव से आता है, जो पहले अनुभव से सीखकर आता है और अधिक परिपक्व होता है; कई लोगों के लिए, पहला प्यार मोहभंग के बाद दूसरा सच्चा प्यार मिलने का अवसर देता है, जिससे वे जीवन में अलग-अलग रिश्तों से सीखते और बढ़ते हैं। 

    पहला प्यार

    यह अक्सर शुरुआती आकर्षण, सुंदरता, या किसी व्यक्ति के गुणों से होता है, जैसा कि किसी तुर्की कहावत में बताया गया है।यह बहुत तीव्र और जुनूनी हो सकता है, जिसमें व्यक्ति दूसरे को अपनी पूरी दुनिया मान लेता है। 

    दूसरा प्यार इसे ट्रु लव भी कहते हैं

    यह अक्सर पहले प्यार के अनुभवों से सीखकर आता है, जहाँ व्यक्ति समझता है कि सच्चा प्यार सिर्फ दिखावे या आकर्षण से नहीं, बल्कि आपसी समझ और समर्थन से बनता है। यह पहले प्यार की तरह ही गहरा हो सकता है, लेकिन यह अधिक परिपक्व और टिकाऊ होता है क्योंकि इसमें अपेक्षाएँ कम और स्वीकृति अधिक होती है। 

    क्यों होता है दूसरा प्यार?

    अनुभव से सीखना: पहला रिश्ता टूटने के बाद व्यक्ति यह सीखता है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं, जिससे वह दूसरे रिश्ते में बेहतर चुनाव कर पाता है।

    परिपक्वता: समय के साथ, लोग भावनात्मक रूप से परिपक्व होते हैं और प्यार को एक अलग नज़र से देखते हैं, जहाँ वे साथी की कमियों को स्वीकार करते हैं और रिश्ते को बेहतर बनाते हैं।

    अलग-अलग रूप: प्यार के कई रूप होते हैं, जैसे माँ-पिता से प्यार, दोस्तों से प्यार, और जीवनसाथी से प्यार; ये सभी अलग-अलग स्तरों पर होते हैं, और हर अनुभव अपने आप में अनूठा होता है। 

    संक्षेप में, “दो बार प्यार” का मतलब अक्सर यह है कि जीवन में आप अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों से अलग-अलग तरह का प्यार अनुभव करते हैं, और दूसरा प्यार अक्सर पहले से मिली सीख का परिणाम होता है, जो गहरा और सच्चा हो सकता है।

    क्या कहता है नया अध्ययन?

    अमेरिका के इंडियाना यूनिवर्सिटी के किन्से इंस्टीट्यूट के एक नए अध्ययन ने इस पर से कुछ पर्दा उठाया है और नतीजा थोड़ा अलग है। इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने 18 से 99 वर्ष की आयु के 10,036 अविवाहितों से सीधा सवाल पूछा कि अपने जीवन में आप कितनी बार जुनूनी (पैशनेट) प्यार में पड़े हैं। अध्ययन के अनुसार औसत जवाब था कि सिर्फ दो बार (सटीक रूप से 2.05 बार) । नतीजों को विस्तार से देखें तो 14 फीसदी लोगों ने कहा कि वे कभी ऐसे जुनूनी प्यार में नहीं पड़े, 28 फीसदी ने कहा एक बार, 30 फीसदी ने दो बार, 17 फीसदी ने तीन बार, और 11 फीसदी ने चार या उससे अधिक बार। 58 फीसदी ने कहा एक या दो बार ही किया जुनूनी हद वाला प्यार . विषमलैंगिक, समलैंगिक, उभयलिंगी सभी में अंतर बहुत मामूली पाया गया।

    उम्र दराज लोगों जुनूनी प्यार का ज्यादा अनुभव

    मजे की बात है कि उम्रदराज लोगों ने युवाओं की तुलना में थोड़ा अधिक बार ऐसे प्यार का अनुभव बताया, यानी क्यूपिड कभी रिटायर नहीं होता। पुरुषों ने महिलाओं की तुलना में थोड़ा अधिक संख्या बताई, लेकिन यह अंतर भी बहुत छोटा था। जुनूनी प्यार किसी भेदभाव को नहीं मानता, यह एक तरह से सबको बराबरी पर ले आता है। थेरेपिस्ट्स के लिए भी यह डेटा अहम है, क्योंकि यह याद दिलाता है कि लगातार आतिशबाजी जैसा रोमांच महसूस करना सामान्य नहीं है। साथीभाव पर आधारित स्थिर और गहरा प्यार वही असली लंबी दौड़ का विजेता है। रिपोर्ट बताती है कि 60 फीसदी सिंगल खुद को बहुत रोमांटिक मानते हैं।

    निष्कर्ष:

    • यह स्टडी बताती है कि ‘सोलमेट’ (एक ही सच्चा प्यार) की धारणा के बजाय, शिद्दत वाला प्यार एक दुर्लभ लेकिन दोहराया जाने वाला अनुभव है.
    • यह प्यार हर किसी के लिए अलग-अलग रूप में आता है, और ज़्यादातर लोगों के लिए यह जीवन में कई बार हो सकता है, न कि सिर्फ एक बार. 

    लोग प्यार में पड़ने की बातें तो लगातार करते हैं, लेकिन यह पहला बड़ा अध्ययन है जिसने दिखाया है कि यह वास्तव में कितना दुर्लभ है। अधिकांश लोगों के लिए यह आतिशबाजी जैसा जुनून जीवन में गिनी-चुनी बार ही आता है फिर जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ लेती है।

    – डॉ अमांडा गेसलमैन

    अध्ययन की प्रमुख लेखिका और किंसे की वैज्ञानिक

  • सूबे में पंद्रह लाख कार्यकर्ता जुटा  पाएगी काँग्रेस ?

    सूबे में पंद्रह लाख कार्यकर्ता जुटा पाएगी काँग्रेस ?

    भोपाल // सूबे में कांग्रेस संगठन सृजन  अभियान के जरिए अपने  को मजबूत करने में जुटी हुई है। जिला और ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद अब अगले चरण में  पंचायत वार्ड और मोहल्ला समितियों पर  फोकस किया जा रहा है। यह दावा किया जा रहा इसके  माध्यम से  करीब पंद्रह लाख कार्यकर्ता तैयार करने का लक्ष्य है और 20फरवरी तक प्रदेश भर में यह इकाइयां गठित कर इनके प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू कर दिए जाएंगे ।
    इन समितियों को स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाएंगी।
    हर पंचायत समितियों में पच्चीस  सदस्य रहेंगे और इनका गठन प्रदेश कार्यकारणी की तर्ज पर होगा। जिसमें युवा कांग्रेस महिला कांग्रेस एनएसयूआई आदिवासी कांग्रेस के प्रतिनिधि रहेंगे । शहरी क्षेत्रों में वार्ड समिति बनेगी पर उसमें सदस्यों की संख्या वार्ड की जनसंख्या पर निर्भर करेगी। नगर निगम में एक वार्ड में अधिकतम सौ, और नगर पालिका की वार्ड समिति में ज्यादा से ज्यादा पचास सदस्य होंगे। वार्डों के भीतर मोहल्ला समिति बनेगी।
    इन सबका समितियों का काम पार्टी अभियानों को आम जन तक पहुंचना, और हर तरह के सोशल मीडिया के माध्यम से आम आदमी तक पहुंच बनाना होगा।
    पर जानकारों का कहना कि कांग्रेस को अपने इस दावे को पूरा करने में काफी मशक्कत करनी होगी क्योंकि कांग्रेस के  संगठन सृजन अभियान के तहत पूरे सूबे में लगभग 71 जिलाध्यक्षों की घोषणा की गई थी। लेकिन करीब 5 महीने बीत जाने के बाद भी जिलाध्यक्ष अकेले काम कर रहे हैं. जिला कार्यकारणी की घोषणा तक नहीं हो पाई है। यही स्थिति ब्लॉक कमेटियों को लेकर भी है, ऐसे में मंडल , पंचायत, वार्ड ,मोहल्ला समितियां बनाने का काम कैसे गति ले पाएगा

    संगठन की स्थिति को लेकर संतुष्ट नहीं है आलाकमान
    पिछले हफ्ते दिल्ली में कांग्रेस  के प्रदेश संगठन को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल  गांधी मौजूद थे. कहा जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान प्रदेश कांग्रेस संगठन और उसको स्थिति को लेकर संतुष्ट नही है।
    प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी माना है कि कांग्रेस  का संगठन प्रदेश में अभी पूरी तरह से मजबूत नहीं है।  सूत्रों की माने तो काँग्रेस आलाकमान बहुत से जिलाध्यक्षों के काम काज से खुश नहीं है. उन्हें अपनी परफारमेंस सुधारने की चेतावनी मिल सकती है, फिलहाल तो प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी से जिलाध्यक्षों  के साथ व्यक्तिगत रूप से बैठकर सक्रियता और संगठन को मजबूत करने को कहा गया है। यदि फिर भी सुधार नहीं होता है तो विकल्पों को देखा जाएगा।
    खबर  है कि संगठन के महासचिव केसी वेनुगोपाल ने   प्रदेश संगठन को अल्टीमेटम दे दिया है कि 15 दिवस के भीतर जिला समितियां और  30दिन के भीतर ब्लाक समितियों की  घोषणा  की जाए ।

    देर कर रहा है प्रदेश संगठन
    वैसे बहुत से जिलाध्यक्षों ने समितियां बना कर प्रदेश संगठन को सौंप दी हैं, घोषणा में देरी प्रदेश स्तर से हो रही है। कहा जा रहा है कि प्रदेश संगठन को प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी से हरि झंडी नहीं मिली है। अब महासचिव केसी बेलुगोपाल ने 30 दिन में ब्लॉक समितियों और 60 दिन में मोहल्ला स्तर की समितियों का  गठन  करने को कहा है। समितियों में एससी, एसटी, ओबीसी ,अल्पसंख्यक का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करने को कहा है।
    पहली बार है कि कांग्रेस  में  जमीनी स्तर तक संगठन की गतिविधियों की केंद्र स्तर से निगरानी हो रही है । जिलाध्यक्षों के कामों की मासिक समीक्षा की जा रही है।
    संगठन सृजन अभियान की अवधारणा राहुल गांधी की है इसलिए इस पर ज्यादा फोकस है।

  • कितने अमेरिकी मोदी को पहचानते हैं ? क्या कहता हैं प्यू रिसर्च का सर्वे ?

    कितने अमेरिकी मोदी को पहचानते हैं ? क्या कहता हैं प्यू रिसर्च का सर्वे ?

    नई दिल्ली //  भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे के बीच प्यू रिसर्च का एक रोचक लेकिन विरोधाभासी सर्वे सामने आया है , जिसके मुताबिक अधिकांश अमेरिकियों ने मोदी के बारे में सुना ही नहीं है और जो अमेरिकी मोदी को जानते हैं उनमे से ज्यादातर की उनके प्रति भावनाए नकारात्मक हैं .हालांकि अधिकतर अमेरिकी भारत को अनुकूल मानते हैं पर उसके नेतृत्व पर भरोसा नहीं है . प्यू ने यह सर्वे 20 से 26 मार्च के बीच किया था . इस सर्वे को सुब्रमण्यम स्वामी में भी अपने ट्विटर हेंडल पर शेयर किया है .

    एबीपी लाइव की खबर बताती है कि प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के अनुसार, है. अमेरिकी नागरिकों (40%) का एक बड़ा हिस्सा कहता है कि उन्होंने भारतीय नेता  मोदी के बारे में कभी नहीं सुना है, जो कि 30 (59%) से कम उम्र के अधिकांश अमेरिकियों में भी परिलक्षित होता है – जब कई अन्य विश्व नेताओं की तुलना की जाती है, तो उनके बारे में सबसे कम सुना जाता है।, अमेरिका के 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 28% वयस्क भी ऐसा ही कहते हैं. कम शिक्षा वाले वयस्कों की भी उच्च स्तर की शिक्षा वाले लोगों की तुलना में मोदी के बारे में कभी न सुनने की बात की है . जिन लोगों ने इस भारतीय नेता के बारे में सुना है, वे मानते हैं कि उनमें आत्मविश्वास की कमी है जिन लोगों ने पीएम मोदी के बारे में सुना है, उनके अंदर मोदी को लेकर भावना नकारात्मक है. जैसे- वहां 37% लोगों को वैश्विक मामलों के संबंध में पीएम मोदी की क्षमता पर बहुत कम या बिल्‍कुल भरोसा नहीं है, जबकि 21% को उन पर भरोसा है.

    लगभग आधे अमेरिकी वयस्कों (51%) का भारत के प्रति दृष्टिकोण अनुकूल है, जबकि थोड़े से अन्य (44%) का दृष्टिकोण प्रतिकूल है। डेमोक्रेट और डेमोक्रेटिक-झुकाव वाले स्वतंत्र लोग भारत को अनुकूल रूप से देखने के लिए अपने रिपब्लिकन और रिपब्लिकन-झुकाव वाले समकक्षों की तुलना में कुछ हद तक अधिक हैं (56% बनाम 48%), जैसे स्नातक की डिग्री वाले लोगों की तुलना में जिनके पास स्नातक की डिग्री नहीं है (55% बनाम 50%).

    विश्व स्तर पर भारत की स्थिति को देखते हुए, अधिकांश अमेरिकी वयस्कों (64%) का मानना है कि हाल के वर्षों में इस देश का प्रभाव दुनिया में वैसा ही बना हुआ है. वहीं, अन्य 23% का कहना है कि भारत का प्रभाव बढ़ा है, जबकि 11% का कहना है कि उसका प्रभाव कम हो गया है.

    ज्‍यादातर अमेरिकियों को नहीं पता भारत का ध्‍वज कैसा है!
    प्‍यू रिसर्च सेंटर की 2022 की एक रिपोर्ट में तो ये भी कहा गया कि अमेरिका के लोग भारतीय ध्वज से भी काफी हद तक अपरिचित हैं, यानी उन्‍हें नहीं पता होता कि भारत का राष्‍ट्रीय झंडा कैसा है. अमेरिकियों के अंतरराष्ट्रीय मामलों के ज्ञान का आकलन करने के लिए जब उनके सामने भारत के तिरंगा झंडे की तस्वीर प्रस्तुत की गई, तो केवल 41% अमेरिकी ही उसे पहचान पाए कि ये झंडा भारत का है.

    क्या है प्यू रिसर्च सेंटर ?

    प्यू रिसर्च सेंटर वाशिंगटन, डी.सी. में स्थित एक गैर-पक्षपाती अमेरिकी थिंक टैंक (खुद को “तथ्य टैंक” के रूप में संदर्भित करता है) है। इसकी उत्पत्ति 1990 में टाइम्स मिरर सेंटर फॉर द पीपल एंड द प्रेस नामक एक में हुई थी। 2004 में, प्यू चैरिटेबल ट्रस्ट्स ने अपनी सूचना पहलों को रखने के लिए एक सहायक के रूप में प्यू रिसर्च सेंटर की स्थापना की|

  • गीता प्रेस को गाँधी शांति पुरस्कार पर क्यों उठा विवाद ?

    गीता प्रेस को गाँधी शांति पुरस्कार पर क्यों उठा विवाद ?

    नई दिल्ली//साल 2021 का गांधी शांति पुरस्कार गीता प्रेस गोरखपुर को दिया जाएगा यह फैसला रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने सर्वसम्मति से किया है लेकिन इस फैसले पर सवाल और विवाद उठने लगे हैं. कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने गांधी शांति पुरस्कार के लिए गीता प्रेस के चयन को पुरस्कार का अपमान बताया है।
    इसको लेकर जयराम रमेश ने एक ट्वीट किया है। उन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर को पुरस्कार देने की तुलना गोडसे को सम्मानित करने से की है।  जयराम रमेश ने ट्ववीट में लिखा, “2021 के लिए गांधी शांति पुरस्कार गोरखपुर में गीता प्रेस को प्रदान किया गया है जो इस साल अपनी शताब्दी मना रहा है। अक्षय मुकुल द्वारा इस संगठन के बारे में 2015 की एक बहुत ही बेहतरीन जीवनी है जिसमें वह महात्मा के साथ इसके तूफानी संबंधों और उनके राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक एजेंडे पर उनके साथ चल रही लड़ाइयों का पता लगाता है। यह फैसला वास्तव में एक उपहास है और सावरकर और गोडसे को पुरस्कार देने जैसा है।”

    जयराम के ट्वीट से कांग्रेस भी नाराज

    सूत्रों का कहना है कि गीता प्रेस को लेकर जयराम रमेश के ट्वीट से कांग्रेस के कई नेता नाराज हैं। उन्होंने इस मामले में जयराम रमेश के बयान को गैर जरूरी बताया है।
    सियासी बयान बाजी शुरू
    गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार दिए जाने के एलान के बाद सियासी वार-पलटवार का दौर शुरू हो गया है. कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों पर मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने जवाब देते हुए कहा है कि कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति को देश जान चुका है. 
    सांसद भाजपा सांसद रवि किशन ने इसे कांग्रेस की बीमार मानसिकता बताते हुए कहा है कि यह कांग्रेस की सनातन धर्म के खिलाफ मनोवृत्ति का परिचायक है भाजपा प्रवक्ता से शहजाद पुनेवाला, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा और नेता रवि शंकर प्रसाद ने कांग्रेसको हिंदू विरोधी बताया है।
    पुरस्कार राशि नहीं लेगी गीता प्रेस
    गीता प्रेस की ओर से भी इस मामले पर बयान सामने आया है। उसकी ओर से कहा गया है कि वह केंद्र सरकार से इस पुरस्कार लेंगे लेकिन पुरस्कार के लिए मिलने वाली राशि नहीं लेंगे। बता दें कि इस पुरस्कार के साथ पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रुपये की राशि भी दी जाती है।
    100 पहले हुई थी स्थापना
    बता दें कि गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना 1923 में हुई थी। यह अब तक 14 भाषाओं में करीब 42 करोड़ किताबों का प्रकाशन किया है। गीता प्रेस की पहचान प्रमुख रूप से भगवत गीता के प्रकाशन को लेकर है। गीता प्रेस की ओर से अब तक जिन पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है उनमें 16 करोड़ से अधिक श्गीरी मद भगवत गीता हैं।
    गीता प्रेस के संस्थापकों और महात्मा गांधी के संबंध कैसे थे?
    नवभारत टाइम्स के अनुसार गीता प्रेस की स्थापना 1923 में की गई थी। इसके संस्थापक जयदयाल गोयनका और गीता प्रेस की पत्रिका कल्याण के संस्थापक संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार  के साथ महात्मा गांधी के करीबी संबंध थे। हालांकि छुआछूत और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों पर आगे चलकर महात्मा गांधी और गीता प्रेस के संस्थापकों के बीच मतभेद उभर आए। यह भी बताया जाता है कि 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद देशभर में जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उनमें पोद्दार और गोयनका भी शामिल थे। हालांकि 1992 में पी वी नरसिंह राव सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया था।

    अक्षय मुकुल ने गीता प्रेस और महात्मा गांधी के बारे में क्या लिखा है?
    अक्षय मुकुल ने ‘गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया  किताब लिखी है। मुकुल ने लिखा है, ‘पोद्दार 1926 में जमनलाल बजाज के साथ महात्मा गांधी के पास गए। वह कल्याण पत्रिका के लिए उनका आशीर्वाद लेना चाहते थे। गांधी ने उन्हें दो बातें कहीं। एक, विज्ञापन मत प्रकाशित करना। दूसरी, पुस्तक समीक्षा कभी मत छापना। पोद्दार ने ये सलाहें मान लीं। आज भी कल्याण और कल्याण कल्पतरु में न तो विज्ञापन छपता है और न ही पुस्तक समीक्षा छापी जाती है।’
    मुकुल ने लिखा है, ‘गीता प्रेस और महात्मा के रिश्तों में खटास तब आने लगी, जब जाति और सांप्रदायिकता के मुद्दों पर गहरे मतभेद उभरे। इनमें मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश का मामला भी था और पूना पैक्ट भी। गांधी ने छुआछूत पर पोद्दार का नजरिया बदलने की पूरी कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। गांधी के खिलाफ पोद्दार की तीखी बातें कल्याण पत्रिका में 1948 तक छापी जाती रहीं।’
    मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है कि 1948 में गोयनका और पोद्दार की गिरफ्तारी के बाद ‘उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला ने इन दोनों की सहायता करने से मना कर दिया। जब सर बद्रीदास गोयनका ने इन दोनों का केस अपने हाथ में लिया तो बिड़ला ने इसका भी विरोध किया। बिड़ला का कहना था कि ये दोनों लोग सनातन धर्म को नहीं, बल्कि शैतान धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं।’

    महात्मा गांधी की हत्या पर गीता प्रेस का क्या रुख था?
    1948 में हत्यारे नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को मार डाला। 30 जनवरी को हुई उस घटना से पूरा विश्व सिहर गया। दुनिया के तमाम नेताओं और संस्थाओं ने दुख जताया, लेकिन गीता प्रेस ने चुप्पी साध ली। अक्षय मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है, ‘महात्मा की हत्या पर गीता प्रेस ने सोची-समझी चुप्पी साध ली। जिस व्यक्ति के लेख और आशीर्वाद कभी कल्याण पत्रिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण हुआ करते थे, उनके बारे में अप्रैल 1948 तक इस पत्रिका ने एक शब्द भी नहीं लिखा। अप्रैल 1948 में पोद्दार ने गांधी के साथ अपनी विभिन्न मुलाकातों का जिक्र किया।’

    मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है, ‘हिंदू राष्ट्रवाद के दायरे में इसने हिंदुओं को संगठित करने, धार्मिक शुद्धता वाली पहचान बनाने और सांस्कृतिक मूल्यों का एक मानक बनाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह 1923 से ही हर महत्वपूर्ण मोड़ पर हिंदू महासभा, जनसंघ और बीजेपी के विचारों के साथ खड़ा रहा है। जब भी समाज में तीखे सांप्रदायिक मतभेद उभरे, कल्याण पत्रिका ने एक धार्मिक पत्रिका की संजीदा भूमिका छोड़कर नफरत और धार्मिक पहचान की भाषा अपना ली।’

    गीता प्रेस के बारे में पीएम नरेंद्र मोदी ने क्या कहा?
    गीता प्रेस विश्व के बड़े प्रकाशकों में शामिल है। 14 भाषाओं में इसने करीब 42 लाख पुस्तकें प्रकाशित की हैं। इनमें 16 करोड़ 21 लाख प्रतियां श्रीमद भागवत गीता की हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने ट्वीट किया, ‘गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार 2021 मिलने पर मैं बधाई देता हूं। आपने पिछले 100 वर्षों में लोगों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के लिए सराहनीय कार्य किया है।’ यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  ने भी गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी पीस प्राइज मिलने पर बधाई दी।

    गांधी शांति पुरस्कार में कितनी राशि दी जाती है?
    गांधी शांति पुरस्कार की शुरुआत 1995 में की गई थी। यह हर वर्ष दिया जाने वाला पुरस्कार है। इसे महात्मा गांधी के आदर्शों के लिए काम करने वाले लोगों या संस्थाओं को दिया जाता है। यह पुरस्कार किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति या संस्था को दिया जा सकता है। पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रुपये, एक प्रशस्ति पत्र, एक स्मारक पट्टिका और हैंडलूम या हैंडीक्राफ्ट का एक परंपरागत आइटम दिया जाता है। इससे पहले यह पुरस्कार पाने वालों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और रामकृष्ण मिशन जैसे संगठन शामिल हैं। 2022 के लिए गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा नहीं की गई है।
    (मीडिया की ख़बरों के आधार पर)

  • केदारनाथ मंदिर के अन्दर सोने की परत काम में चढ़ाने के काम 125 करोड़ के घोटाले का आरोप, प्रबंधन ने दिया जवाब

    केदारनाथ मंदिर के अन्दर सोने की परत काम में चढ़ाने के काम 125 करोड़ के घोटाले का आरोप, प्रबंधन ने दिया जवाब

    देहरादून // प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर के एक वरिष्ठ पुजारी ने मंदिर के अंदर सोने की परत चढ़ाने के काम में घोटाले का आरोप लगाकर विवाद खड़ा कर दिया है,  पर इस दावे का मंदिर समिति ने जोरदार खंडन किया है,

    मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक केदारनाथ मंदिर महापंचायत के एक वरिष्ठ पुजारी संतोष त्रिवेदी ने जो  चार धाम महापंचायत के उपाध्यक्ष भी हैं ने श्री बदरीधाम केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी)  पर मंदिर के गर्भगृह के अंदर सोने के काम में 125 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया है। त्रिवेदी का आरोप है कि गर्भगृह के अंदर जो सोने की प्लेटें लगाई गई हैं, वे असल में पीतल की बनी हैं.

    बीकेटीसी ने आरोपों का खंडन किया है, समिति ने दावा किया कि घोटाले के आरोप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैलाई गई गलत सूचना का हिस्सा हैं।और इसे छोटे राजनीतिक तत्वों की साजिश का हिस्सा बताया है, जो यात्रा को प्रभावित करने और केदारनाथ धाम की छवि को खराब करने के लिए अफवाहें फैला रहे हैं,  समिति ने यह भी कहा है कि वह इसे बदनाम करने की कोशिश करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी।

    बीकेटीसी ने कहा है कि सोना चढ़ाने का काम भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण के विशेषज्ञों की देखरेख में किया गया है  गर्भगृह को स्वर्ण जड़ित करने का कार्य स्वयं दानदाता ने अपने स्तर से किया। दानदाता ने अपने स्तर से ज्वेलर्स से तांबे की प्लेटें तैयार करवाई व फिर उन पर सोने की परतें चढ़ाई और अपने ज्वेलर्स के माध्यम से ही इन प्लेटों को मंदिर में स्थापित कराया।

    बीकेटीसी ने स्पष्ट किया है कि बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अधिनियम 1939 में दिए गए प्रावधान और राज्य सरकार से अनुमति के अनुसार दान स्वीकार किया गया था। गर्भगृह में स्थापित सोने और तांबे की प्लेटों के बिल और वाउचर काम पूरा होने के बाद बीकेटीसी को दिए गए थे, और नियमानुसार मंदिर की स्टॉक बुक में दर्ज किए गए हैं। दानस्वरूप किए इस कार्य के लिए दानी व्यक्ति अथवा किसी फर्म की ओर से बीकेटीसी के समक्ष किसी प्रकार की शर्त नहीं रखी गई न ही दानदाता ने बीकेटीसी से आयकर अधिनियम की धारा- 80 जी का प्रमाण पत्र मांगा।

    इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सोने की प्लेटें मुंबई के व्यवसायी द्वारा दान की गई थीं, जो गुमनाम रहना चाहते थे, और राज्य सरकार ने मंदिर को 230 किलो सोना दान करने के उनके प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

  • एक साल के तीन मासूम बच्चे चुने गए जगन्नाथ मंदिर के सेवादार, आइए जाने क्या है यह परंपरा ?

    एक साल के तीन मासूम बच्चे चुने गए जगन्नाथ मंदिर के सेवादार, आइए जाने क्या है यह परंपरा ?

    भुवनेश्वर। एक साल के तीन बच्चों को प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी मंदिर  का सेवादार चुना गया है। ये जगन्नाथ मंदिर में पुरोहित सेवा प्रदान करेंगे। इसके लिए इन्हें बाकायदा सालाना एक से दो लाख रुपए सैलरी के रूप में दिए जाएंगे। इनमें से बालादेब दशमोहापात्र तो अभी 10 महीने का ही है, जबकि एकांशु दशमोहापात्रा और बलदेव उम्र का एक साल पूरा कर चुके हैं।
    तीनों बच्चों को जगन्नाथ मंदिर के सेवकों के रूप में शामिल किया गया। बच्चे दैतापति निजोग श्रेणी के सेवादार होंगे,। 

    क्या है परम्परा

    दैतापति निजोग श्रेणी के सेवादार रथयात्रा के दौरान प्रमुख अनुष्ठान करते हैं। परंपरा के मुताबिक रथयात्रा से 15 दिन पहले (अनासार अवधि) या इस अवधि के आसपास जब भी दैतापति सेवक के घर लड़के का जन्म होता है, उसे भगवान की सेवा में शामिल करने के लिए चुना जाता है। इसी परंपरा के तहत इन बच्चों को सेवादार चुना गया। की रथयात्रा के आसपास इन तीनों बच्चों का जन्म हुआ था।
    जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति के सदस्य दुर्गा दशमोपात्रा ने बताया कि बलदेव दशमोहापात्रा  और एकांशु फिलहाल रथयात्रा में सेवाएं देंगे । जब भी 18 साल के हो जाएंगे इन्हें मंदिर के अंदर सेवा की अनुमति मिल जाएगी। बच्चों को मंदिर के अनासार घर में समारोह के दौरान सेवा करने का मौका भी मिलेगा। अनासार घर  वहजगह होती है जहां भगवान जगन्नाथ, बलदेव और देवी सुभद्रा रहते हैं।
    इस बार 20 जून को निकलेगी रथ यात्रा
    इस बार भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा 20 जून को निकलेगी । रथ यात्रा के लिए हर साल नए रथ बनाए जाते हैं। अक्षय तृतीया पर तीनों रथों का निर्माण शुरू किया गया था। रथों को चमकीले रंगों में रंगा जाता है। भगवान जगन्नाथ के लिए लाल पीले, भगवान बलराम के लिए लाल हरे, जबकि सुभद्रा के लिए लाल काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है।

    (मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर )

  • रिलीज होते ही विवादों में घिरी आदिपुरुष, फिल्म के खिलाफ़ दाखिल की गई याचिका।

    नई दिल्ली// ओम राउत के डायरेक्शन में बनी ‘प्रभास और कृति सेनन स्टारर फिल्म ‘आदिपुरुष’ विवादों में घिर गई है। सोशल मिडिया पर तो इसके संवादों को लेकर तहलका मचा हुआ है, साधु संत नाराज हैं और इसे आस्था से खिलवाड़ बता रहे हैं ,वहीं हिंदू सेना ने ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर मांग की है कि फिल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणित नहीं किया जाए. हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने शुक्रवार को ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की. साथ ही आरोप लगाया है कि मूवी में भगवान का काफी मजाक उड़ाया गया है।

    एनडीटीवी के अनुसार फिल्म को भगवान हनुमान की भूमिका निभाने वाले अभिनेता द्वारा बोले गए ‘टपोरी’ शैली के संवादों के लिए भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. समीक्षकों ने फिल्म की गंभीरता से समीक्षा की और इसे पुरानी फिल्मों का मिला-जुला रूप बताया है. उधर, नेपाल के फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने ‘सीता को भारत की बेटी’ बताने संबंधी संवाद पर आपत्ति जताई है. दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका में, श्री गुप्ता ने कहा, “यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत जनहित याचिका के रूप में एक रिट याचिका है, जिसमें उत्तरदाताओं को निर्देश की प्रकृति में एक उपयुक्त रिट जारी करने की प्रार्थना की गई है. धार्मिक नेताओं/चरित्रों/आकृतियों को गलत तरीके से चित्रित करने वाले आपत्तिजनक दृश्यों को हटाना की मांग की गई है. साथ ही प्रतिवादियों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए फीचर फिल्म आदिपुरुष को प्रमाणित नहीं करने और इस तरह के अन्य या आगे के आदेश को पारित करने का निर्देश देने के लिए मांग की गई है.”याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि फिल्म ‘धार्मिक नेताओं/पात्रों/आंकड़ों को गलत और अनुचित तरीके से चित्रित करके हिंदू समुदाय की भावनाओं को आहत करती है.’ हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने याचिका में रामायण, भगवान राम और देश की संस्कृति का मजाक बनाने का आरोप लगाया है. इसके अलावा उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट से ‘आदिपुरुष’ में रावण, राम, सीता और हनुमान के कई अपमानजनक सीन्स भी हटाने के लिए आदेश देने की मांग की है. 

  • कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व का सच उजागर करेगी भाजपा ?

    भोपाल //पांच राज्यों में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों पर गारंटी कार्यक्रमों के साथ हिंदुत्व के मुद्दे को भी लेकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कभी इस तरह की छवि से दूर रहने वाली कांग्रेस अब एक नए अवतार में खुलकर मंचों से’ जय श्री राम, जय बजरंगबली’ जैसे नारे लगा रही है। पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने जबलपुर में  नर्मदा पूजन कर चुनाव अभियान की शुरुआत कर स्पष्ट इशारा कर दिया है कि कांग्रेस के चुनाव की रणनीति क्या होगी। पिछले 1 साल से ज्यादा समय से कमलनाथ प्रदेश में खुलकर सॉफ्ट हिंदुत्व को आगे बढ़ाते नजर आ रहे हैं।

    एंटी इनकंबेंसी और अन्य मामलों के कारण भाजपा के रणनीति कार चिंता में हैं, वहीं कांग्रेस का यह नया अवतार ने उनकी परेशानी को बढ़ा दिया है । अब भाजपा कांग्रेस के इस नए अवतार पर हमला करने की रणनीति बना रही है। 

    हाल ही में कर्नाटक में बनी कांग्रेसी सरकार के कुछ निर्णय ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला और उसे कथित रुप से हिंदू विरोधी साबित करने का के मुद्दे दे दिए हैं। बताया जा रहा है कि भाजपा ने इन फैसलों को आधार बनाकर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने की योजना और रणनीति बना  रही है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने धर्मांतरण विरोधी कानून की वापसी, पाठ्य पुस्तकों में से सावरकर और हेडगेवार सहित विवादित लेखकों के पाठ हटाने के फैसलों  के साथ कर्नाटक के पशु पालन मंत्री के गौ हत्या कानून को लेकर दिए बयान जैसे मामलों को मध्यप्रदेश में भाजपा राजनीति को गरमाने का प्रयास कर रही है।

    प्रदेश के गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा ने कहा है कि कर्नाटक सरकार के फैसले को देखते हुए प्रदेश की जनता को आने वाले समय में फैसला लेना चाहिए कि वह किसके साथ जाना चाहती है। कर्नाटक में धर्मांतरण विरोधी कानून वापस लेने का फैसला लव जिहाद को बढ़ावा देगा । गृहमंत्री का कहना है कि कांग्रेस के फैसले ने उसकी मानसिकता को स्पष्ट कर दिया है ।कांग्रेस   दिखावा करती है ,कहती कुछ है और करती कुछ और है। वही प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा ने कांग्रेस के खून में मुगलों के खून की मिलावट तक का दावा कर दिया है।

    भाजपा के नेताओं का मानना है कि कर्नाटक में कांग्रेस के फैसले यह साबित करते हैं की कांग्रेस हिंदुओं के साथ धोखा कर रही है। कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व एक दिखावा भर है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि भविष्य में पार्टी कांग्रेस के इस दोहरे चरित्र को उजागर करने के लिए पूरे जोर-शोर से काम करेगीऔर इस मुद्दे पर कांग्रेस को सवालों से घेरेगी।

    वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस भी  भाजपा की रणनीति का जवाब देने की तैयारी में जुट गई है।