Category: विशेष खबर

  • दुनिया में “दोस्ती में मंदी” की चर्चा – कौन चिंतित है इस मंदी से ?

    दुनिया में “दोस्ती में मंदी” की चर्चा – कौन चिंतित है इस मंदी से ?

    अभी तक आपने आर्थिक मंदी के बारे में सुना होगा , लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में दोस्ती की मंदी की बातें की जा रहीं हैं. इस को लेकर फोर्ब्स के अरबपतियों की लिस्ट में जगह बनाने वाले जीरोधा के को-फाउंडर निखिल कामथ का एक ट्वीट इन दिनों काफी चर्चा में है जिसमें उन्होंने दुनिया में फ्रेंडशिप रिसेशन यानी दोस्ती की मंदी को लेकर चिंता जताई है।  इस अरबपति एन्त्ररोप्रन्युँर ने लोगों से दोस्ती की अहमियत को याद दिलाई है । 

    उन्होंने दोस्ती से जुड़ा एक दिलचस्प रिसर्च भी अपने टि्वटर अकाउंट से शेयर किया है। इस रिसर्च को अमेरिकन पर्सपेक्टिव के रिचर्ड रिब्स ने तैयार किया है. इस रिसर्च सर्वे में कहा गया है कि पूरी दुनिया इस समय फ्रेंडशिप रिसेप्शन या ने दोस्तों की कमी की समस्या से जूझ रही है  । जिसके चलते लोगों के पास करीबी दोस्तों की संख्या कम हो गई है।  निखिल कामथ ने कहा है कि यह एक बड़ा संकट है क्योंकि अकेलापन 1 दिन में 15 सिगरेट पीने के बराबर है।

     जोधा के कोफाउंडर ने  रिसर्च की मुख्य बातें शेयर करते हुए कहा कि दोस्ती जीवन को बदलने वाला रिश्ता  होता है । दार्शनिक तौर पर  एक समुदाय का होना खुशहाली का सबसे बड़ा संकेत माना जाता है। मेरे जीवन में 5 भाई हैं जिनके लिए मैं सब कुछ कर लूंगा ,मैं इसे लेकर गंभीर हूं। 

     निखिल कामथ ने मानवीय संबंधों और उसके महत्व पर भी शेयर किया है इसमें इस बात पर प्रकाश डाला है कि दोस्ती लोगों के जीवन के लिए काफी अहम है रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय बच्चों पर मां बाप का  अधिक फोकस, लगातार शहर बदलने ,ऑफिस पर अधिक फोकस वॉल कर चलो ब्रेकअप के चलते पूरे समूह के साथ अलग होने की समस्याओं के चलते आजकल लोगों के दोस्त कम हो रहे हैं।

    ग्रीक दार्शनिक अरस्तु ने कहा था  मनुष्य सामजिक प्राणी है और दोस्ती सबसे आदर्श रिश्ता. सामाजिकता दोस्ती का महत्वपूर्ण आधार है मनुष्य के कल्याण के लिए मित्रता महत्वपूर्ण होती है । हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में कई कारणों और दबावों ने दोस्ती के बनाने ओए उसे बनाये रखने में मुश्किल होती जा रही है । दोस्ती के महत्व को पहचानते हुए, ज़ेरोधा के सह-संस्थापक निखिल कामथ ने पिछले दिनों लेखक रिचर्ड रीव्स के इस विषय पर एक दिलचस्प दर्शन को साझा किया।

    अमेरिकन पर्सपेक्टिव द्वारा 2021 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया “दोस्ती की मंदी” देख रही है क्योंकि ऐसे लोगों में वृद्धि हुई है जिनके करीबी दोस्तों की कमी है। और यह भविष्य में एक गंभीर संकट बन सकता है क्योंकि अकेलापन एक दिन में 15 सिगरेट पीने के बराबर है।

    दोस्ती में मंदी के कारण

    अमेरिकन पर्सपेक्टिव सर्वे ने चार ऐसे कारणों की ओर इशारा किया जो “मित्रता में गिरावट” का कारण बन रही  हैं – भौगोलिक गतिशीलता (geographic mobility), बच्चे के पालन-पोषण पर माता-पिता का बढ़ता ध्यान(increased parental focus on child rearing )कार्य-केंद्रित संस्कृति (work centric culture ) और रिश्तों का टूटना ( breakdown of relationship ) दोस्ती और दोस्तों समूहों के में कमी ला रहा है.

    अवसरों और नौकरी के संपर्कों की कमी, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव, और उदासी और अकेलेपन की भावनाओं को कम दोस्त होने के कुछ नकारात्मक पहलू के रूप में जाना जाता है ।

    सर्वेक्षण में बताया गया है कि 15% पुरुषों ने एक करीबी दोस्त की कमी को स्वीकार है । जबकि 1990 के दशक में केवल 3% पुरुष ही इसी तरह भावना का अनुभव करते थे .इसके अलावा, कोविड महामारी के दौरान आधी से अधिक महिलाओं का अपने दोस्तों से संपर्क टूट गया ।

    ‘दोस्ती में मंदी’ पर चेतावनी देते हुए, सर्वेक्षण में कहा गया है कि यदि प्रवृत्ति जारी रहती है तो व्यक्ति अधिक अकेला और खराब दृष्टिकोण (atomized indivisual and a dystopian outlook) वाला हो सकता है। हमारे जीवन में मित्रों की संख्या कम होने से “दुख और अस्वस्थता” भी बढ़ेगी ।

    दोस्ती को हमेशा के लिए कैसे बनाए रखें?

    लेखक रीव्स ने अकेलेपन और दोस्ती की मंदी को दूर करने के लिए तीन उपाय साझा किए हैं।

    -“दोस्ती को बनाये रखने के लिए सक्रियता से काम करने के महत्व को पहचानें।

    -मित्रता के लिए हमेशा प्रयास की आवश्यकता होती है, लेकिन पुरस्कार इसके लायक होते हैं।

    -दोस्त और दोस्ती के प्रति सवेदनशील  रहें और एक दोस्त की जरूरत के लिए खुले और तैयार  रहें। और इस बात को स्वीकार करने में संकोच करना छोड़ दें कि जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं दोस्ती की आपकी इच्छा और जरूरत बढती जाती है .

    निखिल कामथ ने ट्विटर पर रीव्स के द फ्रेंडशिप मंदी दर्शन को साझा किया और लिखा, “मेरे जीवन में 5 भाई हैं, मैं जीवन बदलने के लिए सब कुछ करूंगा, गंभीरता से”।

    कितने दोस्त आदर्श होते हैं?

    लेखक रीव्स ने उल्लेख किया है कि पूरे इतिहास में, लगभग 12-15 मित्रों के एक जनजातीय आकार( tribal size) को उचित माना गया है। हालाँकि, लगभग 3-4 करीबी दोस्त होना अक्सर “अर्थपूर्ण सम्बन्ध ” के लिए आदर्श होता है।

    निखिल कामथ के टिविट्स का हिंदी रूपांतर –

    जितना अधिक #दर्शन आप पढ़ते हैं (स्थिर नहीं), एक समुदाय का होना #खुशी का सबसे बड़ा अग्रदूत लगता है (जितना क्षणभंगुर हो सकता है)।

    मेरे जीवन में मेरे 5 भाई हैं जिनके लिए मैं सब कुछ करूंगा, यह जीवन बदलने वाला है, गंभीरता से ♥️ pic.twitter.com/jMxVDKs031

    – निखिल कामथ (@nikhilkamathcio) 26 मई, 2023

  • बदल रही हैं पक्षियों की फूड हेबिट्स ?

    बदल रही हैं पक्षियों की फूड हेबिट्स ?

    लंदन// इंसानों के खाने से पक्षियों की भी खाने की आदतें बदल रही है, दरअसल परिंदे भी इंसानों को खाते हुए देखकर आकर्षित होते हैं और उस तरह की चीजें खाने लगते हैं जिन्हें वे इंसानों को खाते देखते हैं। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ सक्सेस में हुए एक शोध के मुताबिक पक्षी इंसानों को खाते हुए बहुत बारीकी से देखते हैं। जिस चीज में इंसान कुछ खाते हैं पक्षी उस बर्तन या रैपर से भी आकर्षित होते हैं।

    वैज्ञानिकों ने ब्राइटन बीच पर सीगल पक्षी के साथ यह प्रयोग किया। इसमें वैज्ञानिकों ने स्नेक्स के जिस पैकेट से कुछ खाया और पक्षियों ने कुछ दूरी से उन्हें खाते हुए देखा, उसकी तरफ आकर्षित हुए । ऐसे ही जब इनके समूह में किसी खाने के पैकेट को रखा गया तो 5 में से सिर्फ एक चिड़िया उस तक पहुंची लेकिन जब वैज्ञानिकों को उन्होंने उस पैकेट से खाते हुए देखा तो आधी चिड़िया करीब 48 फीसदी उस पैकेट से खाने के लिए पहुंच गई और बाद में भी उस तरह के पैकेट किया खाने से आकर्षित हुई।

     यूनिवर्सिटी ऑफ सक्सेस के जैव वैज्ञानिक फ्रेजिस्का  फीस्ट कहती हैं – परिंदे इंसानों के व्यवहार का अवलोकन बहुत ध्यान से करते हैं और उसे अपनाने लगते हैं । यही वजह है कि चिड़ियों का भी शहरीकरण हो रहा है।

  • क्या है “सेंगोल” जिसे नए संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर नेहरु की तरह थामेंगे मोदी !

    क्या है “सेंगोल” जिसे नए संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर नेहरु की तरह थामेंगे मोदी !

    नई दिल्ली// रविवार को नए संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिल पुजारियों से एक सुनहरा राजदंड यानी सैंगोल प्राप्त करेंगे ।इसकी मीडिया में खासी चर्चा है।

    सैंगोल हस्तान्तारण एक ऐतिहासिक परंपरा है इस तरह का समारोह चोल साम्राज्य के दौरान होता था जो एक राज्य से दूसरे राज्य को सत्ता हस्तांतरण को दर्शाता है

    15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को नेहरू ने स्वीकार किया था सेंगोल

    आज से 75 साल पहले इसी तरह के समारोह में 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को अपने ऐतिहासिक भाषण से कुछ घंटे पहले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सैंगोल स्वीकार किया था जो अंग्रेजों से भारतीयों को सत्ता हस्तांतरित स्थानांतरण का प्रतीक था। आज़ाद भारत के प्रथम वायसराय श्री राजा राजगोपालाचारी ने नेहरू को वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन से सत्ता हस्तांतरण को दर्शाने के लिए चोल साम्राज्य की परंपरा के तहत सैंगोल को शामिल करने का सुझाव दिया था और नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद और अन्य लोगों की उपस्थिति में सैंगोल स्वीकार किया था। इस घटना को टाइम मैगजीन सहित कई समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया था लेकिन बाद में इसे भुला दिया गया यह सैंगोल प्रयागराज के इलाहाबाद संग्रहालय में पिछले 7 दशक से रखा हुआ है।अब सेंगोल को  न्याय पूर्ण शासन के प्रतीक के तौर पर सदन के अध्यक्ष के आसन के समीप स्थापित किया जाएगा।

    क्या और कैसा हैं सेंगोल?

     सेंगोल संस्कृत शब्द “संकु” से लिया गया माना जाता है, जिसका अर्थ है “शंख”. शंख हिंदू धर्म में एक पवित्र वस्तु थी, और इसे अक्सर संप्रभुता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. राजदंड भारतीय सम्राट की शक्ति और अधिकार का प्रतीक था. यह सोने या चांदी से बना था, और इसे अक्सर कीमती पत्थरों से सजाया जाता था. सेंगोल राजदंड औपचारिक अवसरों पर सम्राट द्वारा ले जाया जाता था, और इसका उपयोग उनके अधिकार को दर्शाने के लिए किया जाता था. सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक भी माना जाता है. संसद भवन में जिस सेंगोल की स्थापना होगी उसके शीर्ष पर नंदी विराजमान हैं.  

    सेंगोल शब्द का तमिल में एक और अर्थ बताया जाता है जिसका अर्थ है नीति परायणता । इस चांदी से बनी सैंगोल पर सोने की परत चढ़ाई गई है और उसके शीर्ष पर न्याय के प्रतीक के तौर पर पवित्र नंदी विराजमान है सैंगोल उसी भावना का प्रतिनिधित्व करता है जिसका एहसास 14 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने किया था।  

    जब माउंटबेटन ने नेहरू से सप्ताह स्थानांतरण के प्रतीक समारोह के बारे में पूछा तो राजगोपालाचारी जी से चर्चा की गई, राजगोपालाचारी ने तमिलनाडु के चंद्रपुर जिले में शैव संप्रदाय के धार्मिक मठ तिरुवदुथुराई अधीनम से संपर्क किया था। अधीनम के प्रमुख में चेन्नई के जौहरी बुम्मिडी बंगारू चेट्टी को सेंगोल( 5 फुट लंबा) तैयार करने का जिम्मा सौंपा सा था।  नए संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर सैंगोल बनाने वाले 96 वर्षीय बुम्मिडी एथिराजुलू और 88 वर्षीय बुम्मिडी सुधाकर शिल्पकार को भी समारोह में शामिल होंगे।

  • दुनिया में सबसे दयनीय देशों की रैंकिंग में जिम्बाब्वे नम्बर एक पर, जानिए किस स्थान पर है भारत ?

    दुनिया में सबसे दयनीय देशों की रैंकिंग में जिम्बाब्वे नम्बर एक पर, जानिए किस स्थान पर है भारत ?

    नई दिल्ली // मशहूर अर्थशास्त्री स्टीव हैंक (Steve Hanke) हर साल एक  एनुअल मिजरी इंडेक्स (Hanke’s Annual Misery Index) जारी करते हैं . अर्थशास्त्री स्टीव हैंके की रिपोर्ट का आधार आर्थिक स्थितियों के मुताबिक तय होता है। इसे तैयार करते समय देशों की बेरोजगारी, महंगाई और बैंक कर्ज की दरों और ‘रियल GDP पर कैपिटा ग्रोथ’ को शामिल किया जाता है.

    स्टीव हैंके के वार्षिक दुख सूचकांक (HAMI) के मुताबिक जिम्बाब्वे दुनिया में सबसे दयनीय देशों की सूची में नंबर एक पर है। इस रैंकिंग के लिए 157 देशों का विश्लेषण किया गया था।  वर्ष 2023 के लिए पेश की गयी इस रिपोर्ट के मुताबिक अफ्रीकी देश जिम्बाब्वे ने बदतर हालात से जूझ रहे मुल्कों की इस लिस्ट में यूक्रेन, सीरिया और सूडान जैसे युद्धग्रस्त देशों को पीछे छोड़ दिया है। इस सूचकांक के मुताबिक स्विट्जरलैंड का स्कोर सबसे कम है , जिसका अर्थ है कि वहां के नागरिक सबसे खुश हैं।

    क्या कारण हैं?

    ”बढ़ती महंगाई,  बेरोजगारी,उधार की दरों में उछाल और और बदहाल अर्थव्यवस्था ने  जिम्बाब्वे के हालात खराब कर दिए हैं। हैंके की इस रिपोर्ट  ने देश की सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी ज़ानू-पीएफ और उसकी नीतियों को भी इन हालात के लिए जिम्मेदार बताया है।  वेनेज़ुएला, सीरिया, लेबनान, सूडान, अर्जेंटीना, यमन, यूक्रेन, क्यूबा, तुर्की, श्रीलंका, हैती, अंगोला, टोंगा और घाना सबसे दयनीय देशों की शीर्ष 15 सूची में अन्य देश हैं।

    सबसे खुश देश

    अर्थशास्त्री स्टीव हैंके की रिपोर्ट के मुताबिक स्विट्जरलैंड का स्कोर सबसे कम था, जिसका अर्थ है कि वहां के नागरिक सबसे खुश हैं। दूसरा सबसे खुशहाल मुल्क इस रिपोर्ट के मुताबिक कुवैत है उसके बाद आयरलैंड, जापान, मलेशिया, ताइवान, नाइजर, थाईलैंड, टोगो और माल्टा का नंबर है।

    भारत कौनसे नंबर पर है?

     भारत इस सूची में 103वें स्थान पर है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत बेरोजगारी से गुज़र रहा है । इस सूची में अमेरिका 134वें स्थान पर है। हैं। मुख्य तौर पर द एनुअल मिसरी इंडेक्स को जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय में एप्लाइड इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर स्टीव हैंके द्वारा संकलित किया गया है।

  • शहरों के स्कूलों में सालों  से जमे शिक्षकों को भेजा जाएगा गावों में,15 जून से होंगे शिक्षा विभाग में ट्रांसफर

    भोपाल // सूबे में स्कूल शिक्षा विभाग की नई ट्रांसफर पॉलिसी के तहत ट्रांसफर का काम शुरू हो गया है इसकी महत्वपूर्ण बात यह बताई जा रही है कि शहरी स्कूलों में सालों से जमे शिक्षकों को अनिवार्य रूप से गांव में भेजा जा सकता है। स्कूली शिक्षा विभाग के तबादले की प्रक्रिया 15 मई तक पूरी होनी थी लेकिन वरिष्ठ पदों पर प्रभार देने की प्रक्रिया के चलते तबादले 15 जून के बाद ही हो सकेंगे। सरकार ने पिछले साल स्कूल शिक्षा विभाग की नई स्थानांतरण नीति को मंजूरी दी है यह व्यवस्था इस साल यानी 2023 24 से लागू होना है वैसे तो स्थानांतरण नीति के अंतर्गत शिक्षा विभाग में सभी संवर्ग ओं के लिए स्थानांतरण की प्रक्रिया 31 मार्च से 15 मई के बीच पूरी की जानी थी लेकिन वरिष्ठ पदों पर प्रभाव की प्रक्रिया में हुई देरी के चलते अब पूरी प्रक्रिया 15 जून के बाद शुरू होगी।
    ऑनलाइन होगी आवेदन की प्रक्रिया
    स्कूल शिक्षा विभाग के तबादलों के लिए आवेदन ऑनलाइन ही लिए जाएंगे उत्कृष्ट स्कूल मॉडल स्कूल और सीएम राइस स्कूलों में स्वैच्छिक स्थानांतरण नहीं होंगे साथ ही प्राचार्य सहायक संचालक गया उससे वरिष्ठ पदों के स्वैच्छिक स्थानांतरण आवेदन ऑनलाइन लिए जाएंगे लेकिन उनका निराकरण ऑफलाइन भी किया जा सकेगा रिलीविंग और जॉइनिंग की कार्यवाही ऑनलाइन होगी।
    इन्हें मिल सकती है छूट?
    ऐसी शिक्षक जिनकी सेवानिवृत्ति 3 वर्ष शेष है और गंभीर बीमारी या विकलांगता से पीड़ित है उन्हें इस प्रक्रिया से मुक्त रखा जाएगा स्थानांतरण प्रक्रिया में वरीयता क्रम निर्धारित किया गया है नई नीति के अनुसार शिक्षकों को निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की निजी पदस्थापना में पदस्थ नहीं किया जाएगा
    3 साल तक तबादला नहीं
    शिक्षा विभाग की नई स्थानांतरण नीति में एक बार स्वैच्छिक स्थानांतरण होने के बाद विशेष परिस्थितियों को छोड़कर 3 वर्ष तक स्थानांतरण नहीं किया जा सकेगा सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई शाला शिक्षक भी ना हो जाए प्रथम श्रेणी अधिकारियों के स्थानांतरण समन्वय मुख्यमंत्री के अनुमोदन से किए जाएंगे।
    नई शिक्षा नीति के अंतर्गत नए नियुक्त शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में कम से कम 3 वर्ष तक और अपने संपूर्ण सेवाकाल में कम से कम 10 साल तक कार्य करना होगा।  10 वर्ष या इससे अधिक अवधि तक एक ही संस्था विशेषकर शहरी क्षेत्रों में पदस्थ शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षक विहीन और शिक्षकों की कमी वाले विद्यालयों में पदस्थ किया जाएगा।
    प्रभारी मंत्रियों की भूमिका खत्म
    अभी तक शिक्षकों के तबादले में प्रभारी मंत्रियों की चलती थी, नई नीति के तहत प्रभारी मंत्रियों की इसमें कोई भूमिका नहीं रहेगी। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन ही होगी शिक्षकों की पोस्टिंग उपलब्ध सीटों के आधार पर होगी

  • क्यों खतरे में हैं भाजपा के सत्तर विधायको की टिकट ?

    क्यों खतरे में हैं भाजपा के सत्तर विधायको की टिकट ?

    भोपाल//  मध्यप्रदेश में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा संगठन तक जो जमीनी फीडबैक आ रहा है वो परेशान करने वाला है। राज्य के कई दिग्गज नेताओं के लिए यह फीडबैक अच्छा नहीं है। यही कारण है कि तमाम दावेदारों की नींद उड़ी हुई है।

    खबर है कि इस बार भाजपा तीन  ने तीन सर्वे कराए हैं ।पार्टी के सूत्रों के अनुसार एक फीडबैक सर्वे राज्य स्तर पर हो हुआ है जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी की एक एजेंसी से  कराया गया है। दूसरा सर्वे केंद्रीय नेतृत्व कराया है। एक गुजराती कंपनी को यह जिम्मा सौंपा गया है। तीसरा फीडबैक सर्वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जमीनी स्तर पर सक्रिय स्वयंसेवकों के बीच कराया जा रहा है। इन सर्वे के फीडबैक से केन्द्रीय नेतृत्व को भी अवगत कराया है। बताया जाता है कि सर्वे ने भाजपा नेतृृत्व को चिंता में डाल दिया है।

    मीडिया रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए तो पांच महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्तर विधायकों के टिकट पर संकट के बादल छा गए हैं। पार्टी द्वारा कराए गए सर्वे में इन विधायकों का परफार्मेन्स ठीक नहीं आया है। इनमें से कई अपने क्षेत्र में बेहद निष्क्रिय पाए गए हैं। समय रहते विधायकों की छवि में सुधार न हुआ तो इनके टिकट काटे जा सकते हैं। इसके अलावा ख़बर यह भी है कि आधा दर्जन से अधिक विधायकों के टिकट सत्तर की उम्र पार होने के कारण बदले जाएंगे।

     मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  विधायकों के साथ वन टू वन में उन्हें यह सर्वे रिर्पोट दिखा भी चुके हैं और रिपोर्ट के आधार पर सामने आई कमियों को दूर करने का आग्रह इस चेतावनी के साथ कर चुके हैं कि वक्त है, संभल जाओं वर्ना फिर संभलने का मौका नहीं मिलेगा। संगठन सूत्रों की माने तो करीब तीन दर्जन विधायक ऐसे हैं जो क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय नहीं हैं। इन सालों में इनकी छवि भी पहले जैसी नहीं रही है। बताया जाता है कि सर्वे के दौरान कुछ विधायकों के बारे में जिले के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ही खुलकर विपरीत टिप्पणियां की हैं । इनमें उप चुनाव जीत कर आए ज्योतिरादित्य सिंधिया  के समर्थक मंत्री और विधायक भी शामिल हैं।

    सत्तर पार पर संकट की चर्चा ?

    भाजपा में इस समय करीब तीन दर्जन से अधिक ऐसे विधायक हैं जो तीन और चार बार से लगातार विधायक हैं। इसके अलावा पांच या उससे अधिक बार के विधायकों की संख्या भी एक दर्जन के करीब है। सूत्रों की माने तो ऐसे विधायक जो चार बार से विधायक हैं और उनकी उम्र सत्तर को पार कर रही है, उनके टिकट कट सकते हैं। संगठन इस बारे में नीति तैयार कर रहा है। इसके अलावा कुछ विधायकों के टिकट काट कर उनके परिजन को चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। गौरतलब है कि भाजपा के अभी 126 विधायक हैं। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 148 सामान्य हैं, इसके अलावा 47 अनुसूचित जनजाति और 35 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। सूत्रों की माने तो प्रदेश कार्यसमिति के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल, प्रदेश संगठन प्रभारी मुरलीधर राव, प्रदेश अध्यक्ष वी डी शर्मा, संगठन महामंत्री हितानंद के बीच लंबी मंत्रणा हुई है। इसमें प्रदेश के हर जिले का दौरा कर चुके अजय जामवाल ने भी सीएम को विधायकों को लेकर मिले फीडबैक की जानकारी दी गई, उन्होंने फीडबैक से केन्द्रीय नेतृत्व को भी अवगत कराया है।

    पिछली बार कुछ यूं हुआ था

    भाजपा ने 2018 के विधानसभा चुनावों में पांच मंत्रियों समेत 54 विधायकों के टिकट काटे थे। पिछली बार हुए सर्वे में भी पार्टी के सत्तर विधायकों का प्रर्दशन अच्छा नही माना गया  था। जिन पांच मंत्रियों के टिकट काटे गए थे उनमें कुसुम मेहदेले, डाक्टर गौरीशंकर शेजवार, माया सिंह, सूर्यप्रकाश मीणा और हर्ष सिंह शामिल थे। इनमें शेजवार और हर्ष सिंह के स्थान पर उनके पुत्रों को टिकट दिया गया था।

  • दिग्विजय की सक्रियता से भयभीत है भाजपा ?

    दिग्विजय की सक्रियता से भयभीत है भाजपा ?

    भोपाल // वैसे तो प्रदेश में नबंबर  में होने वाले विधान सभा चुनाव में भाजपा के लिए हिंदुत्व मुख्य मुद्दा है, पर वह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल की कमियों को जनता के बीच उजागर करने की भी तैयारी कर रही है और उसे 2003 के दिग्विजय शासन बनाम शिवराज शासन के रूप में पेश करना चाहती है। चुनाव की तैयारी में सब कुछ झोंक देने को आतुर भाजपा ने पिछले दिनों प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में यह लिया गया है । यह निर्णय भाजपा खेमे की घबराहट को दर्शाता है।

    प्रदेश में पिछले 20 साल से भाजपा सत्ता में( इस बार के 18 महीने छोड़ कर) है तो ऐसे में अपनी सरकार की उपलब्धियों पर स्वतंत्र रूप से वोट ना मांग कर शिवराज सरकार की तुलना दिग्विजय सिंह सरकार की कोशिश को क्या कहा जाए?

    राजधानी की राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि अभी तक कमलनाथ के 18 महीने के कार्यकाल को कटघरे में खड़ा कर रही भाजपा का चुनाव के 6 महीने पहले पूर्व मुख्मंयत्री के दो दशक पुराने कार्यकाल को निशाना बनाने का फैसला यूं हीं नहीं है। राजनीतिक पंडितों और भाजपा सूत्रों के आधार पर कहा जा सकता है कि जिस तरह की खबरें आ रही हैं , कि एंटी इंकम्बेंसी के चलते प्रदेश में कांग्रेस सरकार बना सकती है। भाजपा फिलहाल इसकी कोई मजबूत काट नहीं ढूंढ पाई है, और वह अपनी जीत के लिए दिग्विजय सिंह को कारगर मान रही है।

    वैसे तो दिग्विजय सिंह हमेशा से ही भाजपा के निशाने पर रहते आए हैं, क्योंकि आमतौर पर उनकी तल्ख टिप्पणियां भाजपा और आरएसएस को नाराज करती रही हैं। भाजपा उन्हें मि. बंटाधार के रूप में प्रचारित करती रही है। उनके बयान भाजपा को कई बार धार्मिक ध्रुवीकरण करने में मदद कर चुके हैं, जिसका भाजपा चुनाव में फायदा भी उठा कर चुकी है । जानकारों का यह भी कहना है कि दिग्विजय सिंह के पूरे प्रदेश में समर्थक हैं , उनका विरोध करने पर पूरे प्रदेश से प्रतिक्रिया होती है ,जिससे स्थानीय स्तर पर भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं।  इस तरह से वे राष्ट्रीय स्तर के नेता का विरोध करने का मौका पाए जाते हैं। इसलिए दिग्विजय का विरोध भाजपा को ज्यादा फायदेमंद लगता है।

    दिग्विजय की सक्रियता से चिंता ?

    इसके अलावा इस बार कांग्रेस आलाकमान लगातार हार रही लगभग 70 सीटों पर फोकस कर रही है और उसमें से लगभग सभी सीटों पर दावेदारी मजबूत करने की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह को दी गई है। दिग्विजय सिंह पूरी सक्रियता के साथ लगातार इन क्षेत्रों में जाकर कार्यकर्ताओं, नेताओं से बात कर जमीनी हकीकत को जान परख रहे  हैं । उनकी इस कोशिश से कार्यकर्ताओं में उत्साह है और अनेक स्थानों पर जहां पार्टी मृत अवस्था में थी वहां भी कुछ सुगबुगाहट नजर आने लगी है। दिग्विजय सिंह के विरोधी भी उनकी नेतृत्व और संगठन क्षमता एहतराम करते रहे हैं। प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को दिग्विजय की सक्रियता ने चिंतित और भयभीत कर दिया है और उन्हें लगता है कि कहीं दिग्विजय की मेहनत भाजपा के सपनों को ध्वस्त न कर दे।  इसीलिए चुनाव में उनका फोकस कमलनाथ से हटकर दिग्विजय पर हो गया है।

    भाजपा की यह कोशिश दिग्विजय के राजनीतिक कौशल को एक तरह से स्वीकार करती लगती है।

  • व्यापारी क्यों चाहते हैं कि आप अरहर की दाल छोड़ दें और दूसरी दालें खाएं ?

    व्यापारी क्यों चाहते हैं कि आप अरहर की दाल छोड़ दें और दूसरी दालें खाएं ?

    नई दिल्ली// व्यापारी चाहते हैं कि बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए आप अरहर की जगह मसूर, मूंग, चना और पीली मटर जैसी अन्य दालों का इस्तेमाल करें। अरहर व्यापारियों ने सरकार से मांग की है कि उपभोक्ताओं को तुवर दाल के अलावा चना मसूर मूंग और पीली मटर जैसी अन्य डालें खाने के बारे में शिक्षित करने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान शुरू किया जाए। व्यापारियों का मानना है कि उपभोक्ता वरीयता में बदलाव को प्रभावित करके अरहर की मांग को कम करना आवश्यक है क्योंकि मांग को पूरा करने के लिए देश में तुअर का पर्याप्त उत्पादन नहीं हो रहा है। जबकि अन्य दालें सस्ती दरों पर काफी मात्रा में उपलब्ध हैं। 
    सरकारी आंकड़ों के अनुसार तूुअर की खुदरा कीमतें, जिसे अरहर दाल भी कहा जाता है, 27 फीसदी बढ़ी हैं और पिछले छह महीनों में 10 फीसदी बढ़ी हैं। दिल्ली में मौजूदा कीमत 132 रुपये किलो है जबकि औसत कीमत 119 रुपये किलो है। दिल्ली में खुदरा अरहर दाल की कीमतों में पिछले पांच वर्षों में 60% के करीब वृद्धि हुई है। उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं रहा है और सबसे अधिक बिकने वाली दाल का थोक मूल्य लगभग 60% बढ़ गया है।
    एक सरकारी अनुमान के अनुसार, भारत का 2022-23 अरहर का उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में 14% कम होना चाहिए। उद्योग को उम्मीद है कि गिरावट 20% से अधिक होगी।उत्पादन में कमी का कारण बेमौसम बारिश है।

    भारतीय दलहन और अनाज संघ (आईपीजीए) ने अरहर के विकल्प के रूप में मसूर, मूंग, चना और पीली मटर जैसी दालों की खपत को बढ़ावा देने के लिए खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के साथ एक संयुक्त अभियान का प्रस्ताव दिया है।
    एगमार्कनेट के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र के लातूर थोक बाजार में असंसाधित अरहर की औसत कीमत एक साल पहले इसी तारीख को 60 रुपये किलो से बढ़कर बुधवार को 90 रुपये किलो हो गई, जो 50% अधिक है। जनवरी में नई फसल की कटाई शुरू होने के बाद से पिछले चार महीनों में कीमतों में 24% की वृद्धि हुई है।
    “भारत के तुअर उत्पादन में भारी गिरावट आई है, जबकि तूर की मांग बरकरार है। केंद्र सरकार के साथ हमारी हालिया बैठक में, हमने अधिकारियों को सूचित किया है कि आईपीजीए अन्य दालों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए सरकार के साथ एक अभियान चलाने के लिए तैयार है। आईपीजीए के अध्यक्ष बिमल कोठारी ने कहा, जिसमें अरहर के बराबर या बेहतर प्रोटीन सामग्री है।
    घरेलू मांग और आपूर्ति में अंतर को पूरा करना आयात के माध्यम से भी संभव नहीं होगा। भारत के बाहर, तुअर केवल म्यांमार और कुछ देशों में उपलब्ध है। पूर्वी अफ्रीका में, जो उन्हें केवल भारतीय बाजार के लिए उगाते हैं।
    कोठारी ने कहा, “मौजूदा मांग को पूरा करने के लिए अरहर की आपूर्ति का प्रबंध करना संभव नहीं है। म्यांमार में सिर्फ एक लाख टन अरहर बचा है, जबकि पूर्वी अफ्रीका से हमें तुअर की खेप सितंबर में ही मिल सकती है।” .
    उन्होंने कहा कि लोग मसूर, चना, पीली मटर और मूंग जैसी दालों का विकल्प चुन सकते हैं, जो कम दरों पर भी उपलब्ध हैं।
    2010 में, नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (नेफेड) ने आयातित पीली मटर को मुख्य दाल के रूप में बढ़ावा देने के लिए एक अभियान चलाया था, जब स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली लगभग सभी दालों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई थी। उस समय तक बेसन बनाने के लिए चने में मिलाने के लिए पीली मटर आयात की जाती थी।
    आईपीजीए ने यह भी सुझाव दिया है कि केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी कल्याणकारी योजनाओं के तहत आपूर्ति के लिए खुले बाजार से तूर खरीदना बंद कर देना चाहिए। कोठारी ने कहा, “दालें, जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और सस्ती हैं, का उपयोग सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में किया जाना चाहिए।”
    अफ्रीकी अरहर
    व्यापारियों के अनुसार, अफ्रीका में तुअर की कीमतें, भारत को जिंसों की एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता, आगे के व्यापार में 25% अधिक खुली हैं। मयूर ग्लोबल कॉरपोरेशन के वाइस प्रेसिडेंट (सेल्स) हर्षा राय ने कहा, “अफ्रीकी तुअर के लिए वायदा कारोबार पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 25% अधिक है।”
    अफ्रीकी फसल, जो भारत के लिए उगाई जाती है और जुलाई/अगस्त में काटी जाती है, अगस्त से नवंबर तक त्योहारी सीजन के दौरान तुअर दाल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि देश तुअर की कमी का सामना कर रहा है। राय ने कहा, ‘हालांकि, भारतीय बाजारों में अरहर की कीमतों में पिछले सप्ताह तेजी आने के कारण अफ्रीकी अरहर के वायदा अनुबंधों ने विराम ले लिया है। आयातक कटाई की अवधि तक इंतजार करना पसंद कर सकते हैं, क्योंकि आवक का दबाव कीमतों में नरमी ला सकता है।

    भारत सरकार पहले ही म्यांमार में व्यापारियों को अरहर और उड़द की जमाखोरी के प्रति आगाह कर चुकी है। इसने चेतावनी दी कि अगर म्यांमार में व्यापारियों ने दालों की जमाखोरी की तो वह सरकार से सरकार खरीद का सहारा ले सकती है।

    ( इकोनॉमिक टाइम्स के आधार पर)

  • अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सच साबित हुआ दिल्‍ली के सीएम का डर !

    अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सच साबित हुआ दिल्‍ली के सीएम का डर !

    केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार फिर उपराज्यपाल को सौंप दिए

    नई दिल्ली// देश की राजधानी में अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल का डर सच साबित हुआ है।दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को अधिकारियों के तबादले का अधिकार मिले अभी आठ दिन ही हुए थे कि केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये यह अधिकार फिर उपराज्यपाल को सौंप दिए। दिल्‍ली के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लाई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इसे लाया गया है। केजरीवाल का दावा है कि इसके जरिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की साजिश की गई है। शीर्ष अदालत ने ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला दिया था। अध्‍यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण के गठन की बात कही गई है। अध्‍यादेश कहता है क‍ि ट्रांसफर-पोस्टिंग और विजिलेंस का काम राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण (NCCSA) देखेगा।
    मुख्यमंत्री प्राधिकरण के पदेन अध्यक्ष होंगे, जबकि दिल्ली के प्रधान गृह सचिव पदेन सदस्य-सचिव होंगे।
    यही प्राधिकरण सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर तबादले की सिफारिश करेगा, पर आखिरी फैसला दिल्ली के उपराज्यपाल का होगा। मुख्यमंत्री तबादले का फैसला अकेले नहीं कर सकेंगे।दानिक्स कैडर के समूह-ए अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए भी यही प्राधिकरण अधिकृत होगा। केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये 11 मई के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें तबादले-नियुक्ति का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया था। बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा था, उपराज्यपाल राज्य कैबिनेट के फैसले को मानने के लिए बाध्य हैं। वे कैबिनेट के फैसले में बदलाव नहीं कर सकते। इस फैसले के बाद केंद्र सरकार ने अब अध्यादेश जारी कर उपराज्यपाल को पहले की तरह फिर से असीमित शक्तियां दे दीं। 
    यह दिया तर्क
    केंद्र सरकार ने अध्यादेश में इस फैसले की वजह बताई है…इसमें कहा गया है कि दिल्ली की स्थिति बेहद खास है। यहां कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थान और प्राधिकारी जैसे राष्ट्रपति, संसद, सुप्रीम कोर्ट मौजूद हैं। विदेशी राजनयिकों का आगमन होता रहता है। इसलिए यहां प्रशासन में उच्च गुणवत्ता का होना राष्ट्रीय हित में है।

    अध्यादेश को लेकर केजरीवाल ने पहले ही जताया था अंदेशा
    केंद्र द्वारा लाए गए अध्यादेश को लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शाम को पहले ही अंदेशा जताया था। उन्होंने ट्वीट कर लिखा था, एलजी साहिब सुप्रीम कोर्ट के आदेश क्यों नहीं मान रहे? दो दिन से सर्विसेज़ सेक्रेटरी की फाइल साइन क्यों नहीं की? कहा जा रहा है कि केंद्र अगले हफ्ते आर्डिनेंस लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने वाली है? क्या केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने की साजिश कर रही है? क्या एलजी साहिब आर्डिनेंस का इंतजार कर रहे हैं, इसलिए फाइल साइन नहीं कर रहे?

    अध्यादेश पर लेनी होगी संसद की मंजूरी
    केंद्र सरकार को संसद के मानसून सत्र में इस अध्यादेश पर लोकसभा व राज्यसभा की मंजूरी लेनी होगी। राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं है। वहां विपक्षी पार्टियां इसे लेकर एकजुट हो सकती हैं।

    अध्यादेश से संघवाद को नुकसान : सिंघवी 
    सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली सरकार के वकील रहे अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्वीट कर इस अध्यादेश को बेहद खराब तरीके से बनाया गया करार दिया। उन्होंने लिखा, अध्यादेश जिस व्यक्ति ने तैयार किया है उसने बेहद आसानी से कानून की अवहेलना की है। सिविल सेवा पर दिल्ली सरकार को अधिकार संविधान पीठ ने दिया था जिसे अध्यादेश के जरिये पलट दिया गया। संघवाद संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है जिसे नुकसान पहुंचाया गया है। चुनी हुई सरकार के प्रति अधिकारियों की जवाबदेही को सिर के बल पलट दिया गया। अरविंद केजरीवाल ने सिंघवी के इस ट्वीट को रीट्वीट किया है।
     सौरभ भारद्वाज का केंद्र पर हमला
    दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि केंद्र यह अध्यादेश हार से बौखलाकर लेकर आई है। केंद्र ने संविधान से छल किया है। 

    ‘दिल्ली देश की राजधानी है, पूरे भारत का इस पर अधिकार’
    दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष वीरेन्द्र सचदेवा ने कहा है कि दिल्ली देश की राजधानी है, पूरे भारत का इस पर अधिकार है और गत काफी समय से दिल्ली की प्रशासकीय गरिमा को स्थानिय अरविंद केजरीवाल सरकार ने ठेस पहुंचाई है। दिल्ली में विश्व के हर देश के राजदूत रहते हैं और यहां जो कुछ प्रशासकीय अनहोनी होती है उससे विश्व भर में भी भारत की गरिमा खराब होती है।केंद्र सरकार जो अध्यादेश लाई है भारतीय जनता पार्टी उसका स्वागत करती है। 

    आतिशी ने बताया सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना

    केंद्र सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है वह सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ की साफ अवमानना है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि चुनी हुई सरकार के पास निर्णय लेने की ताकत होनी चाहिए। यही लोकतंत्र है, यही लोकतंत्र का सम्मान है। लेकिन आज सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है वो हार के डर से, केजरीवाल सरकार को पावर देने के डर से लेकर आई है। केंद्र सरकार केजरीवाल से डरी हुई है और यह अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना है। 

  • अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सच साबित हुआ दिल्‍ली के सीएम का डर !

    अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सच साबित हुआ दिल्‍ली के सीएम का डर !

    केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार फिर उपराज्यपाल को सौंप दिए

    नई दिल्ली// देश की राजधानी में अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल का डर सच साबित हुआ है।दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को अधिकारियों के तबादले का अधिकार मिले अभी आठ दिन ही हुए थे कि केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये यह अधिकार फिर उपराज्यपाल को सौंप दिए। दिल्‍ली के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लाई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इसे लाया गया है। केजरीवाल का दावा है कि इसके जरिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की साजिश की गई है। शीर्ष अदालत ने ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला दिया था। अध्‍यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण के गठन की बात कही गई है। अध्‍यादेश कहता है क‍ि ट्रांसफर-पोस्टिंग और विजिलेंस का काम राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण (NCCSA) देखेगा।
    मुख्यमंत्री प्राधिकरण के पदेन अध्यक्ष होंगे, जबकि दिल्ली के प्रधान गृह सचिव पदेन सदस्य-सचिव होंगे।
    यही प्राधिकरण सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर तबादले की सिफारिश करेगा, पर आखिरी फैसला दिल्ली के उपराज्यपाल का होगा। मुख्यमंत्री तबादले का फैसला अकेले नहीं कर सकेंगे।दानिक्स कैडर के समूह-ए अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए भी यही प्राधिकरण अधिकृत होगा। केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये 11 मई के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें तबादले-नियुक्ति का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया था। बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा था, उपराज्यपाल राज्य कैबिनेट के फैसले को मानने के लिए बाध्य हैं। वे कैबिनेट के फैसले में बदलाव नहीं कर सकते। इस फैसले के बाद केंद्र सरकार ने अब अध्यादेश जारी कर उपराज्यपाल को पहले की तरह फिर से असीमित शक्तियां दे दीं। 
    यह दिया तर्क
    केंद्र सरकार ने अध्यादेश में इस फैसले की वजह बताई है…इसमें कहा गया है कि दिल्ली की स्थिति बेहद खास है। यहां कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थान और प्राधिकारी जैसे राष्ट्रपति, संसद, सुप्रीम कोर्ट मौजूद हैं। विदेशी राजनयिकों का आगमन होता रहता है। इसलिए यहां प्रशासन में उच्च गुणवत्ता का होना राष्ट्रीय हित में है।

    अध्यादेश को लेकर केजरीवाल ने पहले ही जताया था अंदेशा
    केंद्र द्वारा लाए गए अध्यादेश को लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शाम को पहले ही अंदेशा जताया था। उन्होंने ट्वीट कर लिखा था, एलजी साहिब सुप्रीम कोर्ट के आदेश क्यों नहीं मान रहे? दो दिन से सर्विसेज़ सेक्रेटरी की फाइल साइन क्यों नहीं की? कहा जा रहा है कि केंद्र अगले हफ्ते आर्डिनेंस लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने वाली है? क्या केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने की साजिश कर रही है? क्या एलजी साहिब आर्डिनेंस का इंतजार कर रहे हैं, इसलिए फाइल साइन नहीं कर रहे?

    अध्यादेश पर लेनी होगी संसद की मंजूरी
    केंद्र सरकार को संसद के मानसून सत्र में इस अध्यादेश पर लोकसभा व राज्यसभा की मंजूरी लेनी होगी। राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं है। वहां विपक्षी पार्टियां इसे लेकर एकजुट हो सकती हैं।

    अध्यादेश से संघवाद को नुकसान : सिंघवी 
    सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली सरकार के वकील रहे अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्वीट कर इस अध्यादेश को बेहद खराब तरीके से बनाया गया करार दिया। उन्होंने लिखा, अध्यादेश जिस व्यक्ति ने तैयार किया है उसने बेहद आसानी से कानून की अवहेलना की है। सिविल सेवा पर दिल्ली सरकार को अधिकार संविधान पीठ ने दिया था जिसे अध्यादेश के जरिये पलट दिया गया। संघवाद संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है जिसे नुकसान पहुंचाया गया है। चुनी हुई सरकार के प्रति अधिकारियों की जवाबदेही को सिर के बल पलट दिया गया। अरविंद केजरीवाल ने सिंघवी के इस ट्वीट को रीट्वीट किया है।
     सौरभ भारद्वाज का केंद्र पर हमला
    दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि केंद्र यह अध्यादेश हार से बौखलाकर लेकर आई है। केंद्र ने संविधान से छल किया है। 

    ‘दिल्ली देश की राजधानी है, पूरे भारत का इस पर अधिकार’
    दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष वीरेन्द्र सचदेवा ने कहा है कि दिल्ली देश की राजधानी है, पूरे भारत का इस पर अधिकार है और गत काफी समय से दिल्ली की प्रशासकीय गरिमा को स्थानिय अरविंद केजरीवाल सरकार ने ठेस पहुंचाई है। दिल्ली में विश्व के हर देश के राजदूत रहते हैं और यहां जो कुछ प्रशासकीय अनहोनी होती है उससे विश्व भर में भी भारत की गरिमा खराब होती है।केंद्र सरकार जो अध्यादेश लाई है भारतीय जनता पार्टी उसका स्वागत करती है। 

    आतिशी ने बताया सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना

    केंद्र सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है वह सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ की साफ अवमानना है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि चुनी हुई सरकार के पास निर्णय लेने की ताकत होनी चाहिए। यही लोकतंत्र है, यही लोकतंत्र का सम्मान है। लेकिन आज सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है वो हार के डर से, केजरीवाल सरकार को पावर देने के डर से लेकर आई है। केंद्र सरकार केजरीवाल से डरी हुई है और यह अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना है।