Category: विशेष खबर

  • लाड़ली बहना के दम पर चुनाव का खेल बदलने के मूड में भाजपा ?

    लाड़ली बहना के दम पर चुनाव का खेल बदलने के मूड में भाजपा ?

     कांग्रेस रणनीति को लेकर असमंजस की स्थिति में

    भोपाल// प्रदेश में दोनों ही राजनैतिक दल पूरी तरह से चुनावी मोड में है। हर वर्ग के मतदाता को साधने और लुभाने के लिए जी जान से कोशिश शुरू हो गई है।  दोनों ही दलों की नजर प्रदेश की 2 करोड़ 60 लाख से ज्यादा महिला मतदाताओं पर है, यानी उनकी हर रणनीति का फोकस किसी भी तरह से इस आधी आबादी की वोट पाने पर है।

    लाड़ली बहना योजना साबित होगी गेम चेंजर?

    जहां तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है , वह  इसमें आगे नजर आ रही है। शिवराज सरकार ने हाल ही में महिलाओं के लिए लाड़ली बहना योजना शुरू की है, इसके तहत प्रत्येक पात्र महिला को हर महीने एक हजार रुपए दिए जाएंगे। बताया जा रहा है कि जून से  पात्र महिलाओं के खाते में पैसे आना शुरू हो जाएंगे। शिवराज सरकार की कोशिश है कि चुनाव से पहले तक महिलाओं के खाते में 6000 रुपए तक पहुंचा दे।

     महिलाओं के लिए अब तक की सबसे बड़ी बताई जा रही इस  योजना का भाजपा पूरी तरह से चुनावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के पूरे मूड में है, इसलिए इस योजना पर वह युद्ध गति से काम करने में जुटी है और भोपाल में के जंबूरी मैदान में बकायदा राज्य स्तरीय कार्यक्रम का योजना की शुरुआत की जानी है।  पार्टी इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक नया अध्याय के रूप में प्रचारित कर रही है। 

    भाजपा अपनी इस योजना को गेमचेंजर मान रही है। भाजपा के नेताओं को भरोसा है कि इसके दम पर वह एंटी इंकम्बेंसी  का मुकाबला कर लेंगे । कुछ राजनीतिक समीक्षक इसे भाजपा का मास्टर स्ट्रोक भी मान रहे हैं। 

     फिलहाल कांग्रेस के पास लाडली बहना योजना का की कोई काट नहीं है । यहां तक कि वह कर्ज में डूबी प्रदेश सरकार द्वारा इस तरह पैसे के बांटने का विरोध तक नहीं कर पा रही है।

     वहीं सरकार ने नई शराब नीति के तहत प्रदेश के सभी शराब आहातों को बंद करने का निर्णय लिया है। भाजपा का मानना है कि इससे भी  महिलाओं का वोट बैंक पक्का होगा, क्योंकि महिलाएं ही आहातों से ज्यादा परेशान थी, इससे उन्हें राहत मिलेगी। वह इस बात का अधिक से अधिक प्रचार कर फायदा उठाना चाहती है।

    भाजपा महिला प्रत्याशियों की संख्या भी बढ़ा कर भी महिला मतदाताओं को लुभाना चाहती है

    कांग्रेस रणनीति को लेकर असमंजस की स्थिति में

     ऐसा नहीं कि कांग्रेस महिला मतदाताओं की ताकत को कम आंक रही है, उसे भाजपा की महिलाओं को लेकर किए जा रहे लुभावने कामों की चिंता है पर फिलहाल उसे इसके मुकाबले की कारगर रणनीति नहीं सूझ रही है । 

    कांग्रेस महिलाओं के लिए अलग से घोषणा पत्र लाने का ऐलान कर चुकी है यानी पार्टी चुनाव में दो घोषणापत्र पेश करेगी एक सभी के लिए होगा दूसरा वचन पत्र महिलाओं के लिए। महिलाओं के वचन पत्र में महिलाओं से जुड़ी योजनाएं व वादे होंगे। इसके अलावा कांग्रेस 8 से 10 विधानसभा क्षेत्रों के बीच एक महिला प्रत्याशियों को उतारने की रणनीति बना रही है ।

    कांग्रेस सूत्रों के अनुसार पार्टी उन महिलाओं को टिकट वितरण में प्राथमिकता देने पर विचार कर रही है, जो सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं, लेकिन नेताओं की पत्नियों या बहू बेटियों को टिकट नहीं दिया जाएगा।

     पार्टी महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाने के लिए नगरी निकाय और पंचायत चुनाव में विजयी महिलाओं को भी परख रही है। सर्वे में ऐसी महिलाओं महिला प्रतिनिधियों के बारे में राय जुटाई जा रही है कि यदि उन्हें टिकट दिया जाए तो वह कितनी टक्कर दे सकती हैं ।

    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान प्रियंका गांधी ने “लड़की हूं ,लड़ सकती हूं” का नारा देकर कई महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था। कांग्रेस प्रदेश में कुछ ऐसी ही रणनीति अपना सकती है।

    कांग्रेस प्रदेश में महिलाओं की स्थिति औरमहिलाओं को लेकर बढ़ते अपराध को भी मुद्दा बनाकर आंदोलन करने की तैयारी कर रही है।

    चुनाव तक पन्द्रह सौ करोड़ का खर्च ?

    राज्य सरकार ने चुनावी वर्ष में महिला मतदाताओं को साधने के लिए खजाने का दरवाजा खोल दिया है . यदि कम से कम पच्चीस लाख भ्मों को इस योजना के दायरे में शामिल किया गया तो हर महीने खजाने पर 250 करोड़ रूपये का भर आएगा .यानि चुनाव तक सरकार छह माह तक भी एकेक हजार रूपये बहनों को देती है तो बहनों को छह हजार रूपये मिलेंगें वहीं छह माह में बहनों के खातों में कुल पन्द्रह सौ करोड़ रूपये जायेंगें ,इस तरह सरकार एक साल में इस योजना पर कम से कम तीन हजार करोड़ रूपये खर्च कर सकती है ,

  • बाघों पर संकट – देश में डेढ़ माह में 26 बाघों की मौत !

    बाघों पर संकट – देश में डेढ़ माह में 26 बाघों की मौत !

    नई दिल्ली// देश में 1 जनवरी से 11 फरवरी के बीच कुल 26 बाघों की मौत हुई है जो पिछले 3 वर्षों में साल की शुरुआत में बाघों की मौत का सबसे बड़ा आंकड़ा है। सबसे अधिक 9 मौतें मध्य प्रदेश में हुई । इसके बाद महाराष्ट्र में सात राजस्थान में तीन कर्नाटक में दो उत्तराखंड में दो आसाम बिहार और केरल में एक -एक बाघ की मौत हुई है।
    कारणों की तलाश
    फिलहाल सरकार की बाघ संरक्षण से जुड़ी योजनाएं इन मौतों के कारणों की तलाश कर रही है।आम तौर पर कोई अन्य कारण सिद्ध नहीं होने पर हर बाघ की मौत को अवैध शिकार माना जाता है।
    राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पास बाघों की मौत के कारणों के आंकड़े सिर्फ 2020 तक के ही उपलब्ध हैं जो  बताते हैं कि 2020 में अवैध शिकार के कारण कम मौतें हुईं हैं। 2020 में अवैध शिकार के कारण सिर्फ सात बाघों की मौत हुई , जो 2018 की तुलना में काफी कम थे । 2018  में 34 बाघों की मौत हुई थी।।
    पिछले साल इसी अवधि के दौरान 18 मौतें हुई थी और 2021 में 21 मौतें हुई थी। वही पूरे देश में  2020 से अब तक 380 बाघों की मौत हो चुकी है। सबसे अधिक बाघों की मौत 2021 में दर्ज की गई जब 127 बाघों की मौत हुई थी।
    मध्य प्रदेश में ज्यादा मौतें?
    मध्य प्रदेश में 2012 से 2022 के बीच लगभग 270 बाघों की मौत दर्ज की गई है यह आंकड़ा देश में सर्वाधिक है। इसके बाद महाराष्ट्र ( 184 मौत ) और कर्नाटक (150 मौत) का स्थान है।
    दुनिया के बाघों की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी भारत में

    फिलहाल दुनियाभर में साढ़े चार हजार बाघ हैं जिनमें से 2,967 भारत में बताए जाते हैं. प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ  द इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आई यू सी एन) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में बाघों की संख्या 3200 हो गई थी और 2022 में इनकी संख्या 4500 है.
    भारत दुनिया का सबसे अधिक बाघ की आबादी वाला देश है, जहां पूरी दुनिया के 70 फीसदी से ज्यादा बाघ पाए जाते हैं। 2010 में बाघों की संख्या  1,706थी जो  2018 तक बढ़कर 2, 967 पहुंच गई । यह एक उल्लेखनीय वृद्धि मानी जाती है। सरकार ने 2022के आंकड़े जारी नहीं किए हैं, लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि देश में बाघों की आबादी 3000के आंकड़े को पार कर लेगी। भारत में बाघों सबसे ज्यादा मध्य भारत, पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट में पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में दो हजार से ज्यादा बाघ रहते हैं।
    संरक्षण बजट में की गई है कमी
    1973 में बाघों को विलुप्त होने से बचाने और उनके प्राकृतिक आवासों में एक व्यवहार्य आबादी सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की थी ।हाल के वर्षों में इस कार्यक्रम पर होने वाले खर्च में कमी आई है, क्योंकि बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है , 2018-19 में जहां बाघों के संरक्षण पर 323. 44 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे वहीं चालू वित्त वर्ष में केंद्र द्वारा परियोजना पर मात्र 128 करोड खर्च करने का अनुमान है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा“धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं”

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा“धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं”

    नई दिल्ली // “धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं है।” ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस केएम जोसेफ ने की है । दरअसल, उनके नेतृत्व वाली बेंच एक व्यक्ति द्वारा यूपी पुलिस की निष्क्रियता के खिलाफ दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में शिकायत की गई थी कि वह जुलाई 2021 में नोएडा में हेट क्राइम का शिकार हुआ था। इस मामले में यूपी पुलिस ने घटना के डेढ़ साल बाद ही प्राथमिकी दर्ज की, वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई की तारीख पर केस डायरी पेश करने को कहा। पीठ ने यूपी पुलिस की ‘ढिलाई’ पर ‘दुख’ जताया।

    हेट स्पीच के दुष्परिणामों की ओर इशारा करते हुए जस्टिस जोसेफ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, “जब आप एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहां आप हेट स्पीच को बढ़ावा देते हैं, इसे प्रोत्साहित करते हैं, इसे रोकते नहीं हैं, तो यह बहुत गंभीर बात हो जाती है। इसे अपने जीवन से जड़ से खत्म करना होगा। इसमें कोई जगह नहीं है। अगर यह हेट क्राइम है तो हमें इसका सामने से सामना करना होगा और तेजी से कार्रवाई करनी होगी। हम इसमें लीपापोती नहीं कर सकते। हर राज्य अधिकारी की कार्रवाई कानून के प्रति सम्मान बढ़ाती है।“  जस्टिस जोसेफ ने यह भी कहा, “जब आप कानून के शासन को प्रभावित करते हैं, तो इसका प्रभाव समाज, इसकी राजनीति और सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रुपये में उतार-चढ़ाव का एक कारण, आर्थिक सिद्धांत में, वे इसे कानून और व्यवस्था कहते हैं। कानून और व्यवस्था का मुद्रा पर प्रभाव पड़ता है। हमें इसे रोकना होगा।” राजस्थान की एक हालिया घटना का जिक्र करते हुए जस्टिस जोसेफ ने कहा, “हाल ही में राजस्थान में एक गूंगे आदमी को पीटा गया और फिर पता चला कि वह हिंदू है।” जस्टिस जोसेफ ने चिंताजनक रूप से कहा, “आप इसे अनदेखा नहीं कर सकते हैं। आम आदमी पर इसका असर पड़ता है। हम उनकी सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकते। अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक, कुछ अधिकार ऐसे होते हैं जो मनुष्य में निहित होते हैं। आप एक परिवार में पैदा हुए हैं और उसी में पले-बढ़े हैं। लेकिन हम एक राष्ट्र के रूप में खड़े हैं। आपको इसे गंभीरता से लेना होगा।“ राज्य को सलाह देते हुए जस्टिस जोसेफ ने आगे टिप्पणी की, “समाधान तभी पाया जा सकता है जब आप समस्या को पहचानते हैं। पहला कदम समस्या को पहचानना और स्वीकार करना है। अगर कोई समस्या है तो कानून समाधान प्रदान करता है।” जस्टिस जोसेफ ने कहा, “घृणास्पद भाषण के बारे में आम सहमति बढ़ रही है। अगर कोई व्यक्ति आता है और कहता है कि मैंने टोपी पहनी है, मैं मुस्लिम हूं, मुझ पर आरोप लगाया गया है और दाढ़ी खींची गई है, इस तरह से व्यवहार किया गया है और फिर भी कोई शिकायत दर्ज नहीं की जाती है .. तो यह एक समस्या।” कई बार जस्टिस केएम जोसेफ हेट स्पीच को लेकर चिंता व्यक्त कर चुके हैं।


    दो साल पहले मुस्लिम होने की वजह से व्यक्ति की पिटाई की गई
    साल 2021 में 62 साल के व्यक्ति ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि 4 जुलाई को वह नोएडा के सेक्टर 37 में अलीगढ़ जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था। जब उन्हें कुछ लोगों ने लिफ्ट देने की पेशकश की। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम होने पर टारगेट किया और गाली देते हुए मारपीट की। पीड़ित नोएडा के सेक्टर 37 में एक पुलिस चौकी गया। वहां कोई सीनियर पुलिस अफसर नहीं थे। केवल कांस्टेबल मौजूद थे। इसलिए कोई केस दर्ज नहीं किया गया।

  • पत्रकार फर्जी खबरों पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को अधिकार देने के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहे हैं?

    पत्रकार फर्जी खबरों पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को अधिकार देने के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहे हैं?

    सरकार की अधिकृत सूचना इकाई पीआईबी को सोशल मीडिया मंचों पर फ़र्ज़ी ख़बरों की निगरानी का अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव पर विभिन्न मीडिया संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. इससे पहले एडिटर्स गिल्ड ने कहा था कि फ़र्ज़ी ख़बरों का निर्धारण सिर्फ़ सरकार के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है, इसका नतीजा प्रेस को सेंसर करने के रूप में निकलेगा.

    नई दिल्ली//  संपादकों की शीर्ष संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर उनसे आईटी नियमों में संशोधन को ‘हटाने’ का आग्रह किया है, जो सरकार की मीडिया शाखा ‘पत्र सूचना कार्यालय’ (पीआईबी) की फैक्ट चेकिंग इकाई द्वारा ‘फर्जी’ के रूप में पहचाने गए समाचार या सूचना को हटाने का निर्देश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को देता है. वैष्णव को भेजे गए एक पत्र में गिल्ड ने मंत्रालय से डिजिटल मीडिया के लिए नियामक ढांचे पर प्रेस निकायों, मीडिया संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ परामर्श शुरू करने के लिए कहा, ताकि प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर न किया जा सके.

    समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, गिल्ड ने कहा कि वह प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) को व्यापक अधिकार देने वाले प्रस्तावित संशोधन से ‘बेहद चिंतित’ है.

    पत्र में कहा गया है, ‘यह नई प्रक्रिया मूल रूप से स्वतंत्र प्रेस को दबाने का काम करती है और पीआईबी या तथ्य जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी अन्य एजेंसी को व्यापक अधिकार देगी, ताकि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को ऐसी किसी भी सामग्री को हटाने के लिए मजबूर किया जा सके, जिससे सरकार को परेशानी हो सकती है.’ इस प्रस्तावित संशोधन से इस एजेंसी को व्यापक नियामक शक्तियां देने की मांग की गई है, जो स्पष्ट रूप से अवैध और असंवैधानिक है.’ गिल्ड ने नोट किया कि पीआईबी की भूमिका सरकार के मामलों पर समाचार संगठनों को सूचना प्रसारित करने तक सीमित है .

    गिल्ड ने दोहराया कि प्रक्रियाओं की परवाह किए बिना संशोधन अपने आप में एक अवैध कदम था, क्योंकि पीआईबी के पास किसी भी क्षमता में प्रेस का नियामक होने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है.

    इससे पहले बीते 18 जनवरी को भी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक बयान में इस प्रस्ताव पर गहरी चिंता जताते हुए ने कहा था कि फर्जी खबरों का निर्धारण सिर्फ सरकार के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है, क्योंकि इसका नतीजा प्रेस को सेंसर करने के रूप में निकलेगा.

    दरअसल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बीते 17 जनवरी को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (आईटी नियम) के मसौदे में संशोधन जारी किया, जिसे पहले सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया था.

    इसमें सोशल मीडिया पर गलत, फर्जी या भ्रामक सामग्री की पहचान का जिम्मा पीआईबी या किसी अन्य सरकारी एजेंसी को देने का जिक्र है. इसे ऑनलाइन मीडिया के एक हिस्से ने सरकारी नियंत्रण की कोशिश बताया है.

    इसमें कहा गया है कि पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की फैक्ट-चेकिंग इकाई द्वारा ‘फर्जी (फेक)’ मानी गई किसी भी खबर को सोशल मीडिया मंचों समेत सभी मंचों से हटाना पड़ेगा.

    ऐसी सामग्री जिसे ‘फैक्ट-चेकिंग के लिए सरकार द्वारा अधिकृत किसी अन्य एजेंसी’ या ‘केंद्र के किसी भी कार्य के संबंध में’ भ्रामक के रूप में चिह्नित किया गया है, उसे ऑनलाइन मंचों (Intermediaries) पर अनुमति नहीं दी जाएगी.

    नए संशोधन प्रस्ताव को लेकर विभिन्न मीडिया संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अलावा प्रेस एसोसिएशन, डिजिपब फाउंडेशन ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन जैसे मीडिया संगठनों ने भी सरकार से संशोधन को वापस लेने की मांग की है.

    इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन ने ‘फर्जी समाचार’ पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को सशक्त बनाने के कदम का विरोध किया और सभी पार्टियों के सांसदों से हस्तक्षेप की मांग की है .  सांसदों को लिखे एक खुले पत्र में, IJU ने सांसदों से “संविधान में निहित सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार” की रक्षा के प्रयासों के लिए अपनी आवाज़ देने की अपील की है। पत्रकारों के निकाय ने ऑनलाइन सामग्री के नियमन के लिए भारतीय प्रेस परिषद की तर्ज पर एक स्वतंत्र निकाय के गठन की भी मांग की है।

    इस बीच इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) ने सरकार से अनुरोध किया कि आईटी नियमों में उस मसौदा संशोधन को वापस लिया जाए, जिसके तहत सोशल मीडिया मंचों के लिए पीआईबी की फैक्ट चैकिंग इकाई द्वारा फर्जी घोषित खबर या सूचना को हटाना जरूरी होगा.संगठन  ने कहा, ‘अपने स्वयं के मामले में न्यायाधीश बनने के लिए कानून बनाकर, सरकार नियमों के एक सेट में प्रस्तावित संशोधन के माध्यम से, जो अन्यथा भी चिंता का कारण बनता है, प्रभावी रूप से आलोचना और यहां तक ​​कि निष्पक्ष टिप्पणी को दबाने के लिए कदम उठा रही है.’

    आईएनएस के अलावा न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (एनबीडीए) ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों के संशोधनों के मसौदे को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि  बिना किसी नियंत्रण और संतुलन के सरकार को इस तरह की शक्तियां प्रदान करने से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गला घोंट दिया जाएगा और मीडिया पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.

    एनबीडीए ने कहा कि समाचार मीडिया को विनियमित करने के लिए पर्याप्त कानून, विनियम और वैधानिक निकाय हैं तथा इस तरह के संशोधन से सरकार द्वारा अत्यधिक विनियमन होगा जो न तो वांछनीय और न ही स्वीकार्य है. एनबीडीए ने कहा, ‘संविधान में इस तरह की सेंसरशिप की परिकल्पना नहीं की गई है.’

    मालूम हो कि इससे पहले डिजिटल मीडिया संगठनों के एक संघ ‘डिजीपब’ ने बीते 19 जनवरी को कहा था कि आईटी नियमों में प्रस्तावित संशोधन संभावित रूप से प्रेस की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाने के लिए एक सुविधाजनक संस्थागत तंत्र बन सकता है.

    इसके अलावा, प्रेस एसोसिएशन ने एक बयान में कहा था, ‘प्रेस काउंसिल पहले से ही फर्जी समाचार की कई शिकायतों पर फैसला कर रही है. पीआईबी जैसी विशुद्ध रूप से सरकारी संस्था को फर्जी समाचार को निर्धारित करने और कार्रवाई करने की शक्ति मिलने से प्रेस काउंसिल का अधिकार, स्वतंत्रता कम हो जाएगी, जो 1966 से सुचारू रूप से काम कर रही है.’

    गौरतलब है कि 2019 में स्थापित पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई, जो सरकार और इसकी योजनाओं से संबंधित खबरों को सत्यापित करती है, पर वास्तविक तथ्यों पर ध्यान दिए बिना सरकारी मुखपत्र के रूप में कार्य करने का आरोप लगता रहा है.

    मई 2020 में  वेब साईट न्यूज़लॉन्ड्री ने ऐसे कई उदाहरण बताए थे, जहां पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई वास्तव में तथ्यों के पक्ष में नहीं थी, बल्कि सरकारी लाइन पर चल रही थी.

    फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के संस्थापक प्रतीक सिन्हा का भी कहना है कि समस्या यह भी है कि पीआईबी किन खबरों का फैक्ट-चेक करने का फैसला करता है और किनको नजरअंदाज करता है.

    उन्होंने वेब साईट न्यूजलॉन्ड्री से कहा था कि , ‘मुद्दा यह है कि पीआईबी फैक्ट चेक इकाई क्या सत्यापित करने का फैसला करती है. यदि आप पीआईबी द्वारा किए गए फैक्ट-चेक देखते हैं तो कुछ अपवादों को छोड़कर वे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचने से बचाने की कोशिश करते हैं. वे उन चुनिंदा खबरों का फैक्ट-चेक करते हैं, जो स्वभाव से राजनीतिक हैं और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए आलोचनात्मक हैं.’

    उन्होंने कहा था, ‘यह कहना कि केवल पीआईबी फैक्ट-चेकिंग इकाई ही यह तय करेगी कि क्या सच है और क्या झूठ है, बताता है कि केवल सरकार के खिलाफ गलत सूचना को हटाया जाएगा. अन्य सभी गलत सूचनाओं को ऑनलाइन बने रहने की अनुमति होगी.’

    पीआईबी को ऑनलाइन सामग्री की पड़ताल का अधिकार देने पर अगले महीने चर्चा: मंत्री

    इस बीच  इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री चंद्रशेखर मंगलवार को कहा कि सरकार की अधिकृत सूचना इकाई पीआईबी को सोशल मीडिया मंचों पर फर्जी खबरों की निगरानी का अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव पर अगले महीने सभी हितधारकों के साथ चर्चा की जाएगी. हम अगले महीने की शुरुआत में इस पर अलग से चर्चा करेंगे.’

  • रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    इटारसी। इटारसी से लगभग 7 किलोमीटर पर स्थित रैसलपुर ग्राम  के निवासी राजेन्द्र प्रसाद चौधरी के घर के पीछे बाड़े में पाई गई दुर्लभ बौद्ध प्रतिमा अब नर्मदापुरम जिला पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित की जा सकती है, पिछले दिनों  राज्य के  पुरातत्व विभाग के अधिकारी ने पहुंच कर मूर्ति का निरीक्षण किया उनके साथ दा बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक और सदस्य भी थे।

    पुरातत्व विभाग के सीनियर गाइड  हुकुमचंद मलिक ने बताया की यह  मूर्ति पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है  बुद्ध की मूर्ति का यहां मिलना बहुत  दुर्लभ है और पूरे नर्मदापुरम के लिए गौरव की बात है। 

    इस मूर्ति की यहां उपस्थिति की ओर सबसे पहले वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु मिश्र और ख़बर भारतवर्ष की टीम ध्यान आकर्षित करवाया था, इसके बाद द बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक प्रहलाद निकम ने पुरातत्व विभाग से संपर्क कर इस तरफ़ ध्यान आकर्षित किया, 

    क्या है बुद्ध प्रतिमा की विशेषता ?

    ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण एक बुद्ध प्रतिमा है जो  गाँव के ही एक कृषक के बाड़े में एक सीमेंट के छोटे से चबूतरे पर रखी हुई है । इस प्रतिमा का क्षेत्र में होना दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । बलुआ पत्थर से बनी करीब 4 फुट ऊंची और 3 फुट से ज्यादा चौड़ी यह प्रतिमा करीब डेढ़ फुट मोटे शिलाखंड पर उकेरी गई है । मूर्ति में भगवान बुद्ध ध्यानस्थ मुद्रा में है। चेहरा शांत और सौम्य है, केश विन्यास अद्वितीय है । बुद्ध के दोनों और चँवरधारी पुरुष है और सिर के दोनों और दो मालाधारी स्त्री प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से अंकित है । प्रतिमा के ऊपर त्रीछत्र बना हुआ है । प्रतिमा बीच में से टूटी हुई है जिसे जोड़ कर रखा गया है। 

    देवराज बाबा के नाम से होती थी पूजा

    कृषक श्यामसुंदर चौधरी बताते हैं कि उनके भाई राजेंद्र चौधरी के घर के पीछे यह मूर्ति वर्षों से बाड़े में गड़ी हुई थी । इस मूर्ति का ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता था । हमारे पूर्वज  देवराज बाबा के नाम से कई सदियों तक इसकी पूजा करते रहे पर करीब 20 साल पहले जब आसपास की मिट्टी का क्षरण हुआ  तो मूर्ति का सिर दिखाई दिया । जब खुदाई की तो बुद्ध की चार पांच फीट ऊंची प्रतिमा दो टुकड़े में निकली। जिसे हमने चबूतरा बनाकर स्थापित कर दिया है। 

    क्या कभी यहां भव्य मंदिर था ?

    पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र की ज्यादातर प्रतिमाएं 12 वीं शताब्दी की हैं । इस क्षेत्र में बुद्ध की प्रतिमा का मिलना बहुत ही दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । उनका अनुमान है कि इस स्थान पर कोई भव्य मंदिर रहा होगा जो किसी कारण से नष्ट हो गया या कर दिया गया हो और उसके अवशेष आज भी यहां बिखरे हैं। जिन्हे संरक्षण की जरूरत है।

    पुरातत्व सम्पदा से भरपूर है यह क्षेत्र

    इटारसी और उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्र पुरातत्वीय अवशेषों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। अंचल में प्राचीन प्रतिमाएं बहुतायत में फैली हुई है जो कलात्मक दृष्टि से बहुत ही प्राचीन और महत्वपूर्ण हैं। अनेक मूर्तियों को तो ग्रामीण सिंदूर आदि पोत कर देवी देवताओं की तरह पूज रहे हैं। ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, इसके अलावा गांव में अनेक स्थानों पर प्राचीन मूर्तियां सती शिलाएँ, स्थापत्य खंड, स्तंभ आदि बिखरे पड़े हुए हैं । जिसमें प्रमुख रुप से उमा महेश्वर की प्रतिमा का ऊपरी भाग है इस मूर्ति में पार्वती हाथों में दर्पण है। ऊपर अनेक देव प्रतिमाएं हैं। वक्त के कारण मूर्ति अस्पष्ट हो गई है। गांव के मंदिर प्रांगण में पेड़ के नीचे कई मूर्तियाँ रखी  है।शिव की एक अस्पष्ट और खंडित प्रतिमा है जिसमें वे सर्प पकड़े हुए हैं वही अंबिका की प्रतिमा है।  लगभग 17 वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा मंदिर परिसर में दीवार में जड़ी हुई है । सूंड दाहिनी ओर मुड़ी हुई है। गणेश के  सिर और कान शरीर की तुलना में काफी बड़े हैं। शैली के कारण यह प्रतिमा अन्य प्रतिमाओं से अलग है।  गांव में कई पत्थर के बने स्तंभ यहां-वहां बिखरे हुए हैं । उनमें कई बहुत अच्छी स्थिति में है, जिन पर सुंदर नक्काशी और प्रतिमाएं अंकित हैं । कई स्तंभ जमीन में धँसे हुए हैं और उनके बारे में गांव वालों की अपनी अपनी धारणाएं हैं। कुछ सती स्तंभ है जो बहुत अच्छी स्थिति में है। अन्य प्रतिमाएं भी हैं जिनका संरक्षण किया जाना जरूरी है.

  • लापता हैं देश भर के 50 पुरातात्विक महत्व के स्मारक !

    लापता हैं देश भर के 50 पुरातात्विक महत्व के स्मारक !

    केंद्र सरकार ने संसद में दी जानकारी

    नई दिल्ली // संस्कृति मंत्रालय ने कहा है कि राष्ट्रीय महत्व के कई स्मारक (Monuments) तेजी से शहरीकरण, जलाशयों और बांधों से जलमग्न होने के कारण पिछले कुछ सालों में लापता हो गए.

     देश में केंद्र सरकार की ओर से संरक्षित 50 स्मारक गायब हो गए हैं. केंद्र सरकार ने इस संबंध में संसद में जानकारी दी है. केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया है कि देश के 3,693 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों (Centrally Protected Monuments) में से 50 स्मारक लापता हैं. केंद्र सरकार ने कहा है कि स्मारकों का गायब होना गंभीर चिंता की बात है.

    लापता स्मारकों में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के 11 स्मारक शामिल हैं. इसके साथ ही दिल्ली और हरियाणा में दो-दो स्मारक गायब बताए गए हैं. . इसके अलावा सूची में असम, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड के स्मारक भी शामिल हैं

    विडम्बना यह है कि इस बात की जानकारी केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संसद में साल 2013, 2016, 2017, 2020 और 2022 में भी दो बार दी गई है। इसके बावजूद स्मारकों के गायब होने का सिलसिला जारी है।

    8 दिसंबर को संसद में जानकारी
    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से 8 दिसंबर को परिवहन, पर्यटन और संस्कृति पर संसदीय स्थायी समिति को एक रिपोर्ट के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने 18 मई 2022 को संस्कृति सचिव गोविंद मोहन, एएसआई महानिदेशक वी विद्यावती और कई वरिष्ठ अधिकारियों के विचार सुने थे.

    संसद में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) की ओर से कहा गया, ”यह गंभीर चिंता का विषय है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (संस्कृति मंत्रालय) के संरक्षण में राष्ट्रीय महत्व के कई स्मारक तेजी से शहरीकरण, जलाशयों और बांधों की वजह से जलमग्न होने के कारण पिछले कुछ सालों में लापता हो गए हैं. दूरस्थ स्थानों और घने जंगलों में पता लगाने में दिक्कतों की वजह से कुछ स्मारक गायब हुए हैं”

    क्यों और कहां से लापता हैं स्मारक?
    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के मुताबिक इन स्मारकों में से 14 तेजी से शहरीकरण के कारण खो गए हैं, जबकि 12 जलाशयों या बांधों से जलमग्न हैं. बाकी 24 स्मारकों के स्थान पता नहीं चल रहे(अनट्रेसेबल या जिसका अस्तित्व नहीं रहा) हैं।

    अधिकारियों ने बताया कि इनमें कई स्मारक शिलालेखों से जुड़े थे, जिनका कोई निश्चित स्थान पता नहीं है. इन्हें स्थानांतरित या क्षतिग्रस्त किया जा सकता है और उनका पता लगाना मुश्किल हो सकता है. अधिकारियों ने ये भी कहा कि 1930, 40 और 50 के दशक में केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों की एक बड़ी संख्या की पहचान की गई थी और आजादी के बाद के दशकों में उन्हें संरक्षित करने के बजाय नए स्मारकों की खोज पर ध्यान केंद्रित किया गया था. पहली बार जब स्मारकों का भौतिक सत्यापन किया जा रहा था तो 2013 में पता चला कि 92 स्मारक गायब हैं। इन 92 स्मारकों में से एएसआई 42 की पहचान करने में कामयाब रहा है ।

    रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारियों ने बताया कि आजादी के बाद की सरकारों की प्राथमिकताएं स्वास्थ्य और विकास रही, इसलिए विरासत को भी नजरअंदाज किया गया. अब भी कई बड़े और छोटे स्मारक (Monuments) देखभाल में कमी की वजह से विलुप्त होने के कागार पर हैं.

    (चित्र प्रतीकात्मक है )

  • ज़िले की सियासत: चुनावी साल में भाजपा में बढ़ी खेमेबाजी?  

    ज़िले की सियासत: चुनावी साल में भाजपा में बढ़ी खेमेबाजी?  

    इटारसी -नर्मदापुरम // पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से साफ जाहिर हो रहा है कि जो पार्टी” पार्टी विद डिफरेंस”होने का दावा करती थी, जिसे उसे अपने अनुशासित और संस्कारित पार्टी और कार्यकर्ताओं पर गर्व था ,वह पार्टी अब भीतर से दरकने लगी है। उसमें गुटबाजी और खेमेबाजी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी है। वैसे पार्टी के नेता इसे नहीं स्वीकार रहे हैं , घटनाओं को सामान्य मतभेद बताकर सवालों से कन्नी काट रहे हैं। पर घटनाएं असलियत बयां कर रही हैं।

     भाजपा जिलाध्यक्ष के विरोध में पदाधिकारियों का इस्तीफा ?

    लगभग 10 दिन पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष माधव दास अग्रवाल के विरोध में उनके ही गृह क्षेत्र पिपरिया- खापाखेड़ा के पदाधिकारियों के इस्तीफे का एक वायरल पत्र चर्चा में रहा। यह कथित पत्र पिपरिया मंडल अध्यक्ष के लेटर पैड पर लिखा गया था। इस पत्र में करीब 25 पदाधिकारियों ने मय नाम हस्ताक्षर किए गए थे ।यह पत्र 18 दिसंबर 2022 का बताया गया। वायरल पत्र में यह आरोप लगाया गया था कि जिला अध्यक्ष की कार्यप्रणाली ठीक नहीं है, इसी वजह से नर्मदापुरम में कांग्रेस का जिला पंचायत अध्यक्ष बना था, जबकि जिला पंचायत में भाजपा के 12 सदस्य और कांग्रेस के मात्र 3 सदस्य ही थे ।इस मामले में प्रदेश संगठन ने जो जांच समिति बनाई थी उसमें भी जिलाध्यक्ष को जिम्मेदार माना गया था। बताया जा रहा है कि जिले के चारों विधायक व सांसद ने भी प्रदेश संगठन से जिलाध्यक्ष की शिकायत की थी, पर जब मामला चर्चा में आया तो पदाधिकारियों ने इस्तीफे से इंकार कर दिया संगठन के लोगों ने इस तरह के किसी भी पत्र के अस्तित्व से इंकार कर दिया। पार्टी की ओर से पत्र को फर्जी बताया है और सच्चाई का पता लगाने थाने में रिपोर्ट करने की बात की पर अभी तक क्या सच्चाई है? और यदि पत्र फर्जी है तो क्या खाने में इसकी शिकायत की गई है इसका पता नहीं चल सका है।

    किसान संघ और भाजपा नेता पीयूष शर्मा का विवाद ?

    कुछ दिन पूर्व भारतीय जनता पार्टी के किसान संगठन भारतीय किसान संघ और भाजपा नेता पीयूष शर्मा के बीच खटपट की खबरें मीडिया की सुर्खियों में रहीं। बताया जाता है कि पीयूष शर्मा ने माखन नगर के ताल केसरी में एक श्रद्धांजलि सभा के दौरान यह कहा था कि “आज किसानों की जो दुर्दशा है, खाद की किल्लत है, आदि के लिए भारतीय किसान संघ जिम्मेदार है” इस बयान से किसान संघ के पदाधिकारी नाराज हो गए .संघ के अध्यक्ष सर्वज्ञ दीवान ने यहां तक कह दिया कि भाजपा नेता ने पूरे किसान समाज का अपमान किया है और उन्होंने नर्मदा पुरम के साथ रास्ते पर भाजपा नेता पीयूष शर्मा के पुतला दहन की घोषणा कर दी।

     इस मामले में पीयूष शर्मा का कहना था कि बात अनौपचारिक थी मेरी बात का गलत मतलब निकाला गया, मेरी मंशा भारतीय किसान संघ भारतीय किसान संघ की भावनाओं को आहत करने की नहीं थी ,यह कहते हुए उन्होंने माफी मांग ली ।शर्मा के माफी मांगने पर किसान संघ ने भी अपना पुतला दहन का कार्यक्रम निरस्त कर दिया

     भाजपा नेताओं में हाथापाई ,पिस्टल तक निकलने की खबरें !!

    पिछले शुक्रवार को जब भाजपा के प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव सर्किट हाउस में कार्यकर्ताओं को चुनाव जीतने का गणित समझा रहे थे, उसी दौरान पार्टी के दो नेता आपस में भिड़ गए नौबत यहां तक आ गई कि एक पक्ष ने पिस्तौल तक निकाल ली। बताया जा रहा है कि भाजपा नेता रेवेंद्र चौहान सर्किट हाउस के एक कमरे में अपने कुछ साथियों के साथ खाना खा रहे थे, उसी दौरान भाजपा के नेता पीयूष शर्मा ने उनसे भोजन स्थल पर जाकर भोजन करने को कहा।इस बात को लेकर दोनों में विवाद हो गया और बात  गाली गलौज हाथापाई और पिस्टल निकलने तक पहुंच गई। दोनों के समर्थक सर्किट हाउस में जमा हो गए। विवाद बढ़ता देख कुछ वरिष्ठ नेताओं ने बीच-बचाव कर मामले को शांत कराया खबर यह भी है कि स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि दोनों गुटों के कार्यकर्ताओं को अलग-अलग वहां वाहनों से वहां से ले जाया गया ।घटना के वक्त प्रभारी मुरलीधर राव भी सर्किट हाउस में थे उन्हें भी घटना की जानकारी लगी । वैसे घटना को लेकर संगठन और नेताओं ने चुप्पी साध रखी है।

    प्रदेश प्रभारी के दौरे में शक्ति प्रर्दशन जैसा माहौल?

    भाजपा के प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव का दौरा भी यह संकेत दे गया कि भाजपा में खेमेबाजी और आपसी प्रतिद्वंद्विता चरम पर है। चुनाव से पहले जमीनी हकीकत का पता लगाने आए प्रदेश प्रभारी के सामने जिलेभर से आए विधायक की टिकट के दावेदारों ने अपनी दावेदारी कुछ-कुछ शक्ति प्रदर्शन जैसी ही की।  प्रदेश प्रभारी श्री राव के आने के पहले ही और आने के दिन अखबारों में एक  गुट विशेष द्वारा बड़े-बड़े स्वागत विज्ञापन प्रकाशित किए गए। उन विज्ञापनों में छपी फोटो की आकार प्रकार को देखकर भी गुटबाजी की चर्चा रही। भाजपा के नए नए नेता डा राजेश शर्मा जो कि नर्मदापुरम से टिकट के दावेदार माने जा रहे हैं ने एक समाचार पत्र में प्रभारी राव पर एक आलेख भी लिखा जिसकी खासी चर्चा रही।

     बताया जाता है कि प्रदेश प्रभारी को जिले में भारी गुटबाजी और खेमे बाजी का एहसास हो गया है, उन्होंने चर्चा के दौरान मिलजुल कर काम करने की सीख नेता और कार्यकर्ताओं को दी हैं, वहीं कई नेताओं ने व्यक्तिगत तौर पर प्रभारी को पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी की जानकारी भी दी।

    सब्ज़ी मंडी दुकानों की जांच और गुटबाजी !

    इटारसी सब्जी मंडी की दुकानों के आवंटन में हुई गड़बड़ियों की फाइल एक बार फिर खुल गई है। कमिश्नर द्वारा जांच के बाद आवंटन रद्द करने और जिम्मेदारों पर कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश के बाद लंबे समय तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही फाइल के फिर से खुलने के पीछे लोग स्थानीय राजनीति और भाजपा की गुटबाजी देख रहे हैं ।  नगर पालिका चुनाव के दौरान की खींचतान अब रंग लाती दिख रही है । बताया जाता है कि इस आवंटन में भाजपा नेता के सबसे ज्यादा जिम्मेदार होने की बात की जा रही है वह भी विधानसभा की टिकट के दावेदार हैं, और वर्तमान के लोग इस तरह की कोई चुनौती नहीं चाहते ,जबकि उस नेता की सत्ता और संगठन में अच्छी पकड़ बताई जा रही है । उसे भाजपा के सांसद खेमे का भी समर्थन है। लोगों का कहना है कि दूकानों के निर्माण और आवंटन के समय से ही इसमें गड़बड़ी की चर्चा थी, तब जन प्रतिनिधियों ने जांच की मांग क्यों नहीं की?

    कुल मिलाकर भाजपा की अंदरूनी कलह और गुटबाजी  से प्रदेश आलाकमान वाकिफ और परेशान है, पर इसमें कमी आने की संभावना नजर नहीं आ रही है, जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे और टिकट के लिए दावेदारियां बढ़ेंगी । नए पुराने दावेदारों के बीच कड़वाहट बढ़ेगी। देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस समस्या से कैसे निपटती है और यह भाजपा के चुनाव कितना नुकसान पहुंचाती है?

  • क्यों  किया अमेरिका में स्कूलों ने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर केस?

    क्यों किया अमेरिका में स्कूलों ने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर केस?

    नई दिल्ली//अमेरिका के सिएटल शहर के पब्लिक स्कूलों ने टिक टॉक ,इंस्टाग्राम फेसबुक ,और स्नैपचैट और इसी जैसी कई सोशल मीडिया कंपनियों पर मुकदमा किया है ,स्कूलों का कहना है कि यह कंपनियां बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही हैं । स्कूल का आरोप है कि यह अपने फायदे के लिए बच्चों के कमजोर मस्तिष्क का शोषण कर रहे हैं जिससे स्कूल में मानसिक और मनोवैज्ञानिक परेशानियों से बच्चे पीड़ित हो रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अधिकतम नागरिक दंड (सिविल पेनल्टी) की मांग की है। इस जिले में लगभग 100 स्कूल हैं और उनमें 50,000 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं 

    अमेरिका के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में पेश अपने मुकदमे में स्कूल ने कहा है बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, खराब होते व्यवहार जैसे बेचैनी निराशा और खाने की आदतों के लिए सोशल मीडिया जिम्मेदार है। 

    लगभग 91पेज की शिकायत में कहा गया है कि यह कंपनियां युवाओं के लिए हानिकारक सामग्रियों का प्रसार और सिफारिश करती हैं। प्रबंधन का यह भी कहना है कि बच्चों को शिक्षित करना मुश्किल हो रहा है स्कूलों को बच्चों की मदद के लिए ज्यादा मानसिक चिकित्सकों की मदद लेनी पड़ रही है। मुकदमे में यह भी कहा गया है कि बच्चों की ऐसी भावनात्मक रिपोर्टों में लगभग लगभग 30% की वृद्धि हुई है जहां वे दो या दो से अधिक हफ्तों तक निराशा महसूस करते हैं और फिर सामान्य गतिविधियां बंद कर देते हैं।

    गूगल ने कहा हमने सुरक्षा के कई फीचर दिए हैं 

    इसके बाद कुछ सोशल मीडिया प्लेटफार्म अपने बचाव में सामने आये हैं . गूगल के प्रवक्ता जोस कास्टानेड़ा ने कहा कि हमने अपने प्लेटफार्म को बच्चों के लिए सुरक्षित अनुभव बनाने में बड़ा निवेश किया है। और बच्चों की भलाई को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर सुरक्षा और समर्पित फीचर पेश किए हैं उदाहरण के लिए फैमिली लिंक के माध्यम से हम माता-पिता को रिमाइंडर सेट करने , स्क्रीन समय सीमित करने और पर्यवेक्षक उपकरणों पर विशिष्ट प्रकार की सामग्री को ब्लॉक करने की क्षमता प्रदान करते हैं वहीं स्नेप चेट ने कहा है कि वह युवा लोगों की सुरक्षा के लिए कदम उठा रहा है ,वह मेंटल हेल्थ सपोर्ट के लिए फीचर शुरू कर रहा है ..

  • सूबे में एक पुलिस वाले के जिम्मे है 748 लोगों की सुरक्षा

    सूबे में एक पुलिस वाले के जिम्मे है 748 लोगों की सुरक्षा

    भोपाल// मध्य प्रदेश में जिस तरह से आबादी बढ़ी और अपराधों की संख्या बढ़ती जा रही है,पुलिस सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह खड़े हो रहे हैं . नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की वर्ष 2021 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में कुल चार लाख 75 हजार 918 प्रकरण दर्ज हुए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 42 हजार अधिक हैं। बच्चों नाबालिग से दुष्कर्म और अनुसूचित जनजाति वर्ग पर सर्वाधिक अत्याचार के मामलो में मध्य प्रदेश कई राज्यों से बहुत आगे है लेकिन पुलिस बल उस अनुपात में नहीं बढ़ाया गया। इस कारण प्रदेश में पुलिस बल की बहुत ज्यादा कमी हो गई है।
    प्रदेश पुलिस की डाटा रिपोर्ट में सामने आया है कि प्रदेश में 1956 में एक पुलिसकर्मी पर औसतन 520 लोगों की सुरक्षा का दायित्व था, जो 2022 में बढ़कर 748 हो गया है। मध्य प्रदेश पुलिस के विभिन्न विभागों में स्वीकृत पदों के सापेक्ष 25 से लेकर 40 प्रतिशत तक कम पुलिस बल है। पुलिसकर्मी कम होने के कारण अपराध बढ़ रहे हैं। साथ ही पुलिस बल पर कामकाज का बोझ ज्यादा होने की वजह से फरियादियों को न्याय मिलने में भी देरी होती है।
    रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में प्रति लाख आबादी पर 117 पुलिसकर्मी हैं, जबकि दिल्ली में 480, उत्तर प्रदेश में 123, पंजाब में 236, महाराष्ट्र में 165, हरियाणा में 209 हैं। हालांकि, बिहार और गुजरात से मध्य प्रदेश की स्थिति इस मामले में ठीक है। पूरे देश के औसत की बात करें तो यह आंकड़ा 124 है।
    प्रदेश में पुलिस बल की यह स्थिति तब है जब अनुसूचित जनजाति के लोगों पर देश में सबसे ज्यादा अपराध होने का कलंक प्रदेश के माथे पर लगा है। अनुसूचित जाति के लोगों पर अपराध के सर्वाधिक मामले में भी मध्य प्रदेश देश में तीसरे नंबर पर है। यह जानकारी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार है।

    इनका कहना है

    पुलिस की भर्ती लगातार चल रही है। अभी आरक्षक के छह हजार पदों को भरा गया है। इन्हें मुख्यमंत्री जल्द प्रमाण पत्र देने वाले हैं। सात हजार पदों पर और भर्ती की जाएगी। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहेगी।

    डा. नरोत्तम मिश्रा गृह मंत्री, मध्य प्रदेश

  • क्या भारत नशीली दवाओं और शराब के दुरूपयोग संकट के कगार पर है ?

    क्या भारत नशीली दवाओं और शराब के दुरूपयोग संकट के कगार पर है ?

    नई दिल्ली // एक ताजे सरकारी राष्ट्रीय सर्वेक्षण से यह खुलासा हुआ है है कि भारत के युवाओं की एक बड़ी संख्या शराब, भांग या ओपिओइड की लत से पीड़ित है और नशे के आदी चार में से तीन लोगों को इलाज नहीं मिल पाता है।

    देश में 15.8 मिलियन बच्चे जिनकी  उम्र 10 से 17 वर्ष की है मादक पदार्थों के आदी हैं, पिछले दिनों  भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह आंकड़े पेश किये हैं .

    यह सम्भवत:भारत में मादक द्रव्यों के सेवन की सीमा और पैटर्न पर पहले व्यापक सर्वेक्षण है जिसे , नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर ने किया है . सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, 10 चिकित्सा संस्थानों और 15 गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से देश के सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सर्वेक्षण किया गया था। डेटा संग्रह में 1,500 से अधिक कर्मचारी शामिल थे। यह सर्वे 2017 से 2018 के बीच किया गया था  2019 में जनता के लिए जारी किया गया और इसी महीने सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया.

    यह स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भारत में नशीली दवाओं के दुरुपयोग के आंकड़े वास्तव में बहुत अधिक हैं।

    अध्ययन में क्या पाया गया?

    सर्वेक्षण के अनुसार, शराब भारत में लोगों द्वारा सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला साइकोएक्टिव पदार्थ है, इसके बाद भांग और ओपिओइड का नंबर आता है। भांग के सर्वाधिक प्रचलन वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिक्किम और छत्तीसगढ़ शामिल हैं।

    रिपोर्ट में कहा गया है, “30 मिलियन से अधिक व्यक्ति कैनबिस उत्पादों का उपयोग करते हैं और लगभग 2.5 मिलियन कैनबिस निर्भरता से पीड़ित हैं, ” 22.6 मिलियन लोग ओपिओइड का उपयोग करते हैं और लगभग 7.7 मिलियन व्यक्तियों को ओपिओइड उपयोग की समस्याओं के लिए मदद की आवश्यकता होती है।

    इसमें यह भी पाया गया कि देश की आबादी में 2.06% ओपिओइड उपयोगकर्ता शामिल हैं, और 1.7% बच्चे और किशोर और 0.58% वयस्क इनहेलेंट के उपयोगकर्ता हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अवैध दवाओं पर निर्भरता से पीड़ित लोगों में से चार में से तीन को इलाज नहीं मिल पाता है।

    देश में 14.6 फीसदी (लगभग 160 मिलियन ) लोग शराब का सेवन करते हैं

    2017 के एक अध्ययन के मुताबिक देश में अवैध ड्रग्स के कारण हर साल बाईस हजार से ज्यादा लोगोंकी मौत हो जाती है .अवैध ड्रग्स लेने के आदी चार में से तीन को इलाज नहीं मिल पाटा है .  .

    दवाओं की अन्य श्रेणियां – अर्थात् कोकीन, एम्फ़ैटेमिन प्रकार के उत्तेजक और मतिभ्रम – का उपयोग देश की आबादी के एक छोटे से हिस्से द्वारा किया जाता है।

    जहाँ तक राज्यवार आंकड़ों का सवाल है उत्तर प्रदेश ,पंजाब सिक्किम और छत्तीसगढ़ केनाबिस के प्रयोग में सूची में सबसे ऊपर हैं . पंजाब मे पचहतर फ़ीसदी  से ज्यादा युवा ड्रग्स के दुरुपयोग् का  शिकार है .

    स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारियों का ऑफ़ थे रिकार्ड कहना है कि, “परिणाम यह भी संकेत देते हैं कि साइकोएक्टिव पदार्थों की मांग पारंपरिक, कम क्षमता वाले, पौधे-आधारित उत्पादों जैसे अफीम से अधिक शक्तिशाली और हेरोइन जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों की ओर बढ़ रही है।”

    क्यों बढ़ रहा है

    नशीली दवाओं के दुरुपयोग में वृद्धि के पीछे कमजोर नीतियों को दोषी माना जा रहा है ,

    निष्कर्ष बताते हैं कि सख्त दवा नियंत्रण कानूनों के अस्तित्व और पूरे भारत में दवा आपूर्ति नियंत्रण की दिशा में काम करने वाली एजेंसियों की एक बड़ी संख्या के बावजूद, नियंत्रित दवाओं की एक विस्तृत विविधता का अभी भी उपयोग किया जा रहा है।

    कई राज्यों में मादक द्रव्यों के सेवन को रोकने के लिए नीतियों का अभाव है। सरकार द्वारा संचालित स्कूल आमतौर पर नशीली दवाओं के दुरुपयोग के बारे में संवेदीकरण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित नहीं करते हैं।

    एच.एस. फूलका जो बचपन बचाओ आंदोलन के वकील हैं, जो भारत में बच्चों के अधिकारों के लिए एक आंदोलन है, जिसने बच्चों के बीच नशीली दवाओं के दुरुपयोग की चिंताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। उनका मानना है  कि यह मुद्दा राष्ट्रीय सर्वेक्षण के निष्कर्षों से कहीं अधिक गंभीर है। “बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं जो प्रभावित हैं और इस सर्वेक्षण में उनकी गिनती नहीं की गई है… वे नशे के आदी हैं। स्कूलों और इसके आसपास के इलाकों में ड्रग की उपलब्धता एक समस्या है और आखिरकार वे पेडलर बन जाते हैं।”

    ओपियोइड का दुरुपयोग प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गया है. राज्यों के पास इस पदार्थों के दुरूपयोग को रोकने कोई कारगर नीति नहीं है. सरकारों द्वारा चलाये जा रहे जागरूकता अभियान की पहुँच बहुत कम लोगों तक है ,  स्थिति का अंदाज इस बात से लग जाता है कि 57.4 लाख ड्रग की आदि महिलाओं के इलाज के लिए देश भर में मात्र 4 केंद्र  हैं .

    ओपियाड और कैनाबिस क्या हैं ?

    ओपियाड जिस अकसर नशीले पदार्थ के रूप में जाना जाता है ,यह दवाओं का एक वर्ग है जो दर्द से छुटकारा पाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है इसमें दर्द निवारक गुण होता है और आफीम के सत से बनता है , इसको लेने से अआनंद की अनुभूति होती है , ,वहीं कन्नाबिस श्रेणी में भांग ,गांजा और मेरिजुआना जैसे पदार्थ शामिल हैं