Category: विशेष खबर

  • जिला स्तर पर वचन पत्र तैयार करेगी कांग्रेस

    जिला स्तर पर वचन पत्र तैयार करेगी कांग्रेस

    भोपाल// प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने कहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रदेश के साथ ही जिला स्तर पर भी वचन पत्र जारी करेगी। इसके लिए हर जिले की समस्याओं का अध्ययन करने उसका समाधान सुलझाने के निर्देश दिए हैं ताकि जिले के लोगों की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए वजन पत्र तैयार किया जा सके। वचन पत्र में समाज के सभी वर्गों विशेषकर पिछड़े,आदिवासी  महिला और युवाओं को लुभाने वाले वादे और कार्यक्रमों पर विशेष जोर देने की बात की है।

    जिला शहर कांग्रेस कमेटियों के अध्यक्षों ,जिला प्रभारी सह प्रभारियों की बैठक को संबोधित करते हुए पिछ्ले दिनों कमलनाथ ने कहा है कि हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता बूथ प्रबंधन की होगी। बूथ प्रबंधन मजबूत होगा तो हम मजबूत होंगे। मंडलम सेक्टर पर मजबूती ही कांग्रेस को मजबूती प्रदान करेगी। उन्होंने सभी पदाधिकारियों से कहा कि आप सभी की जिम्मेदारी है कि जिला स्तर पर संगठन को मजबूती प्रदान करें। जिलों सामंजस बनाकर जिला अध्यक्ष जिला प्रभारियों सह प्रभारी साथ मिलकर काम करें प्रकोष्ठ दो और मोर्चा संगठनों को साथ लेकर चलें जिले में अधिक से अधिक बैठ के करें। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कहा कि भाजपा चुनाव में धांधली करने के सभी षड्यंत्र करेगी उस पर पैनी निगाह रखनी होगी।

  • कमलनाथ सरकार के दौर में सूबे में भी तैयार हुआ था ‘राइट टू हेल्थ बिल’,आज स्वास्थ्य विभाग में खा रहा है धूल ?

    कमलनाथ सरकार के दौर में सूबे में भी तैयार हुआ था ‘राइट टू हेल्थ बिल’,आज स्वास्थ्य विभाग में खा रहा है धूल ?

    भोपाल // अभी हाल ही में राजस्थान सरकार ने स्वास्थ्य का अधिकार (राइट टू हेल्थ) बिल विधानसभा में पारित किया है, जिसका वहां विरोध हो रहा है। इसी तर्ज पर 2019 में मध्य प्रदेश की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने भी राइट टू हेल्थ बिल को लेकर तैयारी की थी ।इसके लिए बाकायदा हेल्थ कांक्लेव आयोजित कर देश के तमाम विशेषज्ञों से चर्चा कर एक मसौदा तैयार किया था । अब यह मसौदा स्वास्थ्य विभाग में धूल खा रहा है यदि उस समय यह बिल पास हो जाता तो मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य होता जो अपनी जनता को स्वास्थ्य का अधिकार प्रदान करता जिसका प्रदेश की साढ़े साथ करोड़ जनता को फायदा पहुंचता।

    आयुष्मान योजना से लिंक किया गया था

     जानकारी के अनुसार 2019 में जो राइट टू हेल्थ बिल तैयार किया गया था, उसे केंद्र की आयुष्मान भारत निरामय योजना से लिंक किया गया था, इसके तहत आम लोगों को पांच लाख रूपए तक फ्री इलाज की सुविधा केंद्र देता है, वह तो रहती ही, इसके आगे इलाज में होने वाले खर्च को राज्य शासन वहन करती । इतना ही नहीं प्रदेश के बाहर भी इलाज कराया जा सकता था।

     निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक लगाने की थी कोशिश

     मध्यप्रदेश के इस राइट टू हेल्थ बिल में जो सबसे खास बात थी वह यह कि इमरजेंसी इलाज के दौरान यदि कोई मरीज निजी अस्पताल पहुंच जाता है तो अस्पताल उससे बिना पैसे की मांग किए इलाज शुरू करना था,अभी तक ऐसा नहीं होता है। इसलिए कई मामलों में मरीज की जान तक चली जाती है। वहीं दूसरी ओर निजी अस्पतालों में हर बीमारी के इलाज का खर्च भी फिक्स किया गया था ।

    97 बीमारियों को किया गया था कवर

     2019 में तैयार किया गया राइट टू  हेल्थ बिल में 97 बीमारियों के इलाज की गारंटी सरकार दे रही थी । उस समय के प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रहे तुलसी सिलावट ने बताया था कि 97 प्रकार की बीमारियों में मुख्य रूप से कैंसर, हार्ट डिसीज, ब्रेन ट्यूमर और पैरालिसिस भी शामिल थे

    संसाधन पर था जोर

     हेल्थ बिल को सफल बनाने के लिए पूरी योजना तैयार की गई थी। उसमें सबसे ज्यादा जोर हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने पर दिया गया था। इसमें जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज से जोड़ने के साथ ही बड़े बड़े जिलों में कुछ नए अस्पताल खोलने की योजना थी। वही दस हजार सब हेल्थ सेंटर खोलकर उसमें सबसे बड़े स्तर तक चिकित्सकों की भर्ती करने की योजना थी।

     डॉक्टर्स की जिम्मेदारी होती तय

    राइट टू हेल्थ बिल को तैयार करने में वरिष्ठ विशेषज्ञों ने अपनी सलाह दी थी।  सलाह का एक बिंदु यह भी था कि सरकारी से लेकर निजी अस्पताल तक के चिकित्सक की जिम्मेदारी तय की जाए, एक तरफ जहां सरकारी अस्पताल में डाक्टर नदारद रहते हैं वहीं दूसरी और निजी अस्पताल में डॉक्टर से पैसे की लूट में लगे रहते हैं । इस राइट टू हेल्थ बिल  में चिकित्सकों की जिम्मेदारी तय की गई थी।

  • चुनावों की तैयारी – कांग्रेस किसान ,महिला और कर्मचारी पर कर रही है फोकस

    चुनावों की तैयारी – कांग्रेस किसान ,महिला और कर्मचारी पर कर रही है फोकस

    भोपाल // प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर लगभग 6 महीने का वक्त बचा है दोनों ही प्रमुख दल पूरी ताकत से तैयारियों में जुटे हुए हैं। राजनीतिक हालातों के चलते मुक़ाबला कांटे का माना जा रहा है  । दोनो ही हर तरह और तबके  के मतदाता को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं । जहां भाजपा द्वारा लाडली बहना योजना और प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि और प्रदेश सरकार की ओर से दी जाने वाले चार हजार रूपए को मास्टर स्ट्रोक बताया जा रहा है , वहीं कांग्रेस अपनी पूरी रणनीति महिला ,किसान और कर्मचारियों पर फोकस कर रही है । यह तीनों तबके मिलाकर लगभग 50% से अधिक मतदाता है। 

    लाड़ली बहना की काट में 15सौ रूपये और पांच सौ में गैस सिलेंडर

    कांग्रेस  भाजपा सरकार  की लाड़ली बहना योजना की काट में एक हजार की जगह 15 सौ रुपए देने की बात कर रही है साथ ही रसोई गैस का सिलेंडर ₹500 में देने की भी घोषणा की है । लाड़ली बहना योजना के तहत महिलाओ के खाते में एक हजार रुपया हजार जून माह तक आने की संभावना है फिलहाल तो महिलाएं इस योजना के लिए आवेदन करने में आ रही दिक्कतों से परेशान नजर आ रहीं हैं। प्रदेश में लगभग 2 करोड़ 60 लाख मतदाता है महिलाएं हैं। पूरी खींचतान इन्हीं के लिए है।

    फिर से कर्ज माफी का वादा

    जहां तक किसानों का सवाल है भा जा पा को अपनी सम्मान निधि और प्रदेश सरकार द्वारा दिए जा रहे पैसे पर भरोसा है। भाजपा आरोप लगाती रही है कि पंद्रह महीने की कांग्रेश सरकार ने किसानों की कर्ज माफी का वादा तोड़ा है। अब वह किसानों का ऋण माफ किए जाने का दावा करते हुए किसानों को राहत की बात कर किसानों को लुभा रही है । वहीं कांग्रेस इसे झूट बताते हुए फिर से कर्ज माफी का वादा कर रही है। हाल ही में हुई बारिश और ओलावृष्टि से प्रभावित किसानों के लिए उसने तत्परता से सर्वे का काम शुरू करवा दिया है। 

    पुरानी पेंशन की मांगसे परेशान भाजपा

    कर्मचारी वर्ग की सबसे बड़ी मांग पुरानी पेंशन की बहाली जरूर भाजपा के लिए सिरदर्द है। कर्मचारी इसको लेकर लामबंद हो रहे है और आंदोलन की चेतावनी भी दे चुके है। कांग्रेस ने इस मुद्दे को लपक लिया है और वह इसे भुनाने के मूड में है। जहां भाजपा के पास कर्मचारियों के लिए कोई योजना नहीं है वही कांग्रेसमें कर्मचारियों को पुरानी पेंशन और नियमितीकरण का वादा कर एक बड़ा दांव चला है।

    सस्ती बिजली की बात

    इसके अलावा सस्ती बिजली एक बड़ा मुद्दा है है 15 महीने की अपनी सरकार के दौरान कमल कमलनाथ ने सस्ती बिजली की एक ऐसी योजना शुरू की थी जिसे आज भी गरीब एवं मध्यम वर्ग बड़ी राहत के रूप में याद करते हैं उस दौरान ₹100 में 100 यूनिट बिजली से मध्यमवर्ग को बड़ी राहत मिली थी कांग्रेश इसे फिर से भुनाने की कोशिश में है बताया जाता है कि कांग्रे सब 100 यूनिट का दायरा बढ़ाकर इसे 200 यूनिट तक ले जा सकती है।

  • 8 साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे राहुल ?

    8 साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे राहुल ?

    नई दिल्ली// ‘मोदी उपनाम’ को लेकर की गई टिप्पणी से जुड़े अपराध मानहानि मामले में ऊपरी अदालत द्वारा कांग्रेसी नेता राहुल गांधी की दोष सिद्धि पर रोक न लगाए जाने की सूरत में वे 8 वर्षों के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाएंगे।

     निर्वाचन आयोग के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी एवं चुनावी कानून के विशेषज्ञ ने शुक्रवार को यह बात कही . पूर्व अधिकारी ने जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 का हवाला देते हुए कहा कि राहुल की अयोग्यता 8 साल के लिए होगी इसमें 2 साल के कारावास की अवधि और रिहाई के बाद कानून में निर्धारित 6 साल की अयोग्यता अवधि शामिल है दरअसल जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 के तहत 2 साल या उससे ज्यादा की सजा पाने वाला व्यक्ति दोष सिध्दि की तिथि से अयोग्य हो जाता है और सजा पूरी होने के 6 साल बाद तकअयोग्य रहता है.

  • क्या 2013 के अध्यादेश को जिसे राहुल गांधी ने फाड़ दिया जो उन्हें अयोग्यता से बचा सकता था?

    क्या 2013 के अध्यादेश को जिसे राहुल गांधी ने फाड़ दिया जो उन्हें अयोग्यता से बचा सकता था?

    नई दिल्ली//दस साल पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, गांधी ने अपनी ही सरकार द्वारा पारित अध्यादेश की एक प्रति फाड़ दी थी, जो उन्हें उनकी वर्तमान परेशानी से बचा लेती।

    कांग्रेस  नेता और वायनाड सांसद (सांसद) राहुल गांधी को गुरुवार को आपराधिक मानहानि के अपराध के लिए गुजरात मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद लोकसभा से अयोग्य घोषित कर दिया गया है।

    गांधी के लिए अब एकमात्र विकल्प उच्च न्यायालय से मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश पर रोक लगाना है।

    दिलचस्प बात यह है कि दस साल पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, गांधी ने अपनी ही सरकार द्वारा पारित अध्यादेश की एक प्रति फाड़ दी थी, जो उन्हें उनकी वर्तमान दुर्दशा से बचा लेती।

    2013 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4) को रद्द करने के बाद अध्यादेश पारित किया गया था, जो मौजूदा सांसदों और विधायकों को अयोग्यता से सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत प्रदान करता है, अगर उन्हें कुछ अपराधों के लिए दोषी ठहराया जाता है।

    3 महीने की अवधि के लिए प्रदान किया गया प्रावधान जिसके भीतर सजायाफ्ता मौजूदा सांसद/विधायक को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है। इसके अलावा, यदि मौजूदा सांसद/विधायक को सजा की तारीख से इन तीन महीनों के भीतर अपील या पुनरीक्षण दायर करना होता है, तो उसे तब तक अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि अपील या पुनरीक्षण का निपटारा नहीं हो जाता।

    सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस बनाम भारत संघ के अपने प्रसिद्ध फैसले में इस प्रावधान को रद्द कर दिया था।

    यूपीए सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से जनप्रतिनिधित्व (दूसरा संशोधन और मान्यकरण) विधेयक, 2013 द्वारा फैसले को रद्द करने का प्रयास किया था।

    अध्यादेश कैबिनेट द्वारा पारित किया गया था और राष्ट्रपति को उनकी सहमति के लिए भेजा गया था जब गांधी ने एक संवाददाता सम्मेलन में अध्यादेश को “पूरी तरह से बकवास” के रूप में खारिज कर दिया था।

    अंततः इसे वापस ले लिया गया।

  • लोगों को बेवजह हिरासतों में भेजने वाले  मजिस्ट्रेटों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

    लोगों को बेवजह हिरासतों में भेजने वाले मजिस्ट्रेटों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

    सुप्रीम कोर्ट निचली अदालतों से बेवजह की हिरासत में भेजे जाने के मामलों पर सख्त है। अदालत ने कहा है कि ऐसे मजिस्ट्रेट को ट्रेनिंग की जरूरत है और उन्हें न्यायिक अकादमियों में भेजना चाहिए।
    नई दिल्ली // सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो न्यायिक दंडाधिकारी या न्यायिक मजिस्ट्रेट बेवजह लोगों को हिरासत में भेजते हैं, उन्हें कौशल बढ़ाने के लिए न्यायिक अकादमियों में भेजना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस्ट संजय किशन कौल, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने यह व्यवस्था दी है। अदालत ने कहा है कि ऐसे मैजिस्ट्रेट से न्यायिक कार्य वापस ले लिया जाना चाहिए और ट्रेनिंग के लिए न्यायिक अकादमियों में भेजा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने खासकर उत्तर प्रदेश में इस तरह के मामलों का मुद्दा भी उठाया है।

    बेवजह की हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
    सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा है कि एक तो ऐसे लोगों को हिरासत में भेजा जा रहा है, जिसकी आवश्यकता नहीं है और फिर आगे की मुकदवेबाजी का अवसर पैदा कर दिया जाता है। अदालत ने कहा है कि यह ऐसी बात है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और हमारा मानना है कि यह हाई कोर्ट की ड्यूटी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनकी निगरानी में निचली अदालतें इस देश के कानून का पालन करें।
    ऐसे मजिस्ट्रेट का कौशल अपग्रेड होना जरूरी
    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस्ट संजय किशन कौल, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने कहा है कि ‘अगर कुछ मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसे आदेश पारित किए जाते हैं तो यह जरूरी पड़ने पर न्यायिक कार्य वापस भी लिया जा सकता है और ऐसे मजिस्ट्रेट को न्यायिक अकादमियों में भेजना चाहिए ताकि वे वहां पर कुछ समय के लिए अपने कौशल को अपग्रेड करें।’
    इलाहाबाद हाई कोर्ट को जानकारी दी जाएगी
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे आदेश सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश राज्य में पास किए गए हैं और कहा है कि इसके बारे में इलाहाबाद हाई कोर्ट के कार्यकारी चीफ जस्टिस को जानकारी दी जाए। कोर्ट ने कहा है कि ‘ऐसे आदेश बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश से होते हैं और हमें जानकारी दी जाती है कि खासकर हाथरस, गाजियाबाद और लखनऊ की अदालतों से पारित आदेश इस कानून की अनदेखी करते नजर आते हैं।’ बेंच ने कहा कि ‘हम इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकील को बुलाते हैं, ताकि माननीय ऐक्टिंग चीफ जस्टिस को जानकारी दी जा सके, जिससे वह आवश्यक निर्दश जारी कर सकें, जिससे ऐसी घटनाएं न हों…….’

    किस मामले से जुड़ा है मुद्दा
    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियां सतेंदर कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो और अन्य के मामले में सुनवाई के दौरान की है। अदालत इसी मामले में जुलाई 2022 के अपने फैसले की तामील से संबंधित मामले की सुनवाई पर यह बातें कही हैं। अदालत ने अन्य बातों के अलावा गिरफ्तारी और ट्रायल के दौरान सीआरपीसी के प्रावाधनों को लागू करने पर जोर दिया था। अदालत ने उस फैसले में यह भी कहा था कि अदालतें जमानत याचिकाओं पर दो हफ्ते के भीतर फैसला करें, सिर्फ उन मामलों को छोड़कर जिसमें कानून के अलग प्रावधान हैं।

    अगली सुनवाई के लिए भी निर्देश
    अदालत ने फैसला दिया था कि सीआरपीसी की धारा 41 और 41ए की पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए और इसमें कमी रहने पर आरोपी को जमानत लेने का अधिकार होगा। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने यह भी निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई पर अनुपालन रिपोर्ट नहीं दाखिल करने के लिए दिल्ली, तेलंगाना, मेघालय और उत्तराखंड हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार उपस्थित रहें।

  • नास्तिक भगत सिंह के सियासी भगत ?

    नास्तिक भगत सिंह के सियासी भगत ?

    बलिदान दिवस 23 मार्च पर विशेष

    23 मार्च भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत का दिवस है । इनमें भगत सिंह को एक क्रांतिकारी नायक के तौर पर सबसे ज्यादा याद किया जाता है। पिछले कुछ सालों से भगत सिंह को याद करने में एक तरह की राजनीति देखी जा रही है। भगत सिंह को अपना बताने की होड़ सी मच गई है । भगत सिंह के सियासी दावेदार या “भगतों” का उनके विचारों से कोई लेना देना नहीं है, वे उनके विचारों पर कोई बात नहीं करते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग उन्हें आज अपना हीरो बता रहे हैं इतिहास इस बात का गवाह है कि व्यवहारिक और राजनीतिक तौर पर उनके विचारों सपनों के हत्यारे रहे हैं।

     सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली में बम फेंकने के बाद जब भगत सिंह गिरफ्तार हुए थे तो रिपोर्ट में उन्हें समाजवादी क्रांतिकारी कहा गया था पर वामपंथी उस वक्त उन्हें अपना बताने से बचते रहे ,क्योंकि वह उनकी पार्टी के सदस्य नहीं थे। आज वे भी उनको अपना बताते हैं। वामपंथियों पर आरोप रहा है कि 1942 में उन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था, अब शायद उन्हें लगा कि भगत सिंह का इस्तेमाल करके अपने को राष्ट्रवादी साबित कर सकते हैं ।

    जहां तक संघ परिवार का संबंध है उनकी भी आजादी के आंदोलन में भूमिका सदैव ही विवादों में रही है। समाजवाद से वैचारिक नफरत करने वाले दक्षिणपंथी आज भगत सिंह और उनके साथियों को ‘भारत माता की जय’ बोल कर फांसी के फंदे पर झूल जाने वाले राष्ट्रवादी देशभक्त के रूप में याद और महिमामंडित करना चाहता है, जबकि वास्तविकता यह है कि मुकदमे के दौरान अदालत में ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद”इंकलाब जिंदाबाद’ ‘ सर्वहारा जिंदाबाद ‘ के नारे गूंजते थे ।फांसी के दौरान भी यही नारे उन्होंने लगाए थे। 

    यहां तक की तस्वीर में भी उनकी छवि बदलने की कोशिश की गई है ।भगत सिंह की ज्यादातर तस्वीरें फेल्ट वाली हैं पर अब उन्हें पगड़ी पहना दी जाती है गले में एक रंग विशेष का गमछा डाल दिया जाता है । वैसे संघ परिवार अपनी सियासत के चलते  गांधी, अंबेडकर, सरदार पटेल  तक पर अपना दावा पेश करता रहा है वैसे ही भगत सिंह और उनके क्रांतिकारियों पर भी अपना दावा पेश कर उनकी बलिदानी और बहादुर छवि को भुनाने की कोशिश करते नजर आता है। युवाओं को बहादुरी के चलते भगत सिंह ज्यादा लुभाते हैं, इस तरह एक बहादुर नायक को वह अपने से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

    इस सियासी छीना झपटी में भगत सिंह और उनके साथियों का दर्शन और वैचारिक पहलू भुला दिया गया है। सवाल यह है कि आज यदि भगत सिंह होते तो मौजूदा राजनीति और परिस्थितियों पर उनका रूप क्या होता? 

    वे मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थे। वे धर्मनिरपेक्ष क्रांतिकारी थे। सांप्रदायिकता को वे उपनिवेशवाद के समान खतरनाक मानते थे। शोषण विहीन समानता आधारित समाज के स्वप्न दृष्टा थे।

    वैचारिक रूप से भगत सिंह और उनके साथियों ने क्रांति को व्यापक ढंग से परिभाषित किया । उनकी क्रांति का अर्थ महज हिंसा या लड़ाकूपन नहीं था । उनका लक्ष्य साम्राज्यवाद की जड़ें उखाड़ कर राष्ट्रीय मुक्ति था । वे ऐसे समाज की स्थापना के पक्षधर थे ,जहां व्यक्ति का व्यक्ति के द्वारा शोषण ना हो।

     असेंबली बम कांड में भगत सिंह ने अदालत में कहा था क्रांति के लिए रक्तरंजित संघर्ष जरूरी नहीं है, व्यक्तिगत बैर की इसमें कोई जगह नहीं है। यह बम या पिस्तौल की उपासना नहीं है। क्रांति से हमारा तात्पर्य है कि अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था समाप्त होनी चाहिए।भगत सिंह ने जेल से युवकों से अपील की थी कि वे क्रांतिकारी आतंकवाद का रास्ता छोड़ दें .

    इस सवाल पर कि फिर क्यों भगत सिंह और उनके साथी व्यक्तिगत उग्रवादी कार्रवाइयां करते थे? इसका ज़बाब  इतिहासकार बिपन चंद्र ने कुछ इस तरह से दिया है कि भगत सिंह और उनके साथी अपने वैचारिक लक्ष्य को कुछ सालो में ही हासिल करना चाहते थे, उन्हे लगता था कि उनकी धीमी बौद्धिक और राजनीतिक गतिविधियां तो कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों जैसी ही हैं। वे कांग्रेस की तुलना में अपने को ज्यादा तेज करना चाहते थे इसके लिए उनके पास विकल्प क्या था? उन्हें लगता था कि बलिदान देकर ही युवकों को आंदोलित किया जा सकता है। उनका मानना था कि कुछ चमत्कारिक एवं बहादुरी की कार्यवाइयां उनके प्रचार तथा अदालतों में अपने बयानों के माध्यम से राजनीतिक विचारधारा और कार्यक्रमों के प्रचार से ही जन क्रांतिकारी दल के लिए कैडर तैयार किए जा सकेंगे।

    भगत सिंह एक धर्मनिरपेक्ष क्रांतिकारी थे। वे राष्ट्र और राष्ट्रीय आंदोलन के सम्मुख मौजूद सांप्रदायिकता के खतरे को पहचानते थे। वे अपने साथियों से बराबर कहा करते थे कि सांप्रदायिकता उतनी ही खतरनाक है जितना उपनिवेशवाद। यहां तक कि इस मुद्दे पर उन्होंने लाला लाजपत राय के विरुद्ध राजनीतिक वैचारिक आंदोलन छेड़ दिया था। 1926 में बनाई गई संस्था ‘नौजवान भारत सभा’ जो क्रांतिकारियों का खुला संगठन था  के 6 नियम जिन्हें भगतसिंह  ने ही तैयार किया था , में  से 2 नियम यह थे कि ऐसी किसी संस्था संगठन या पार्टी से किसी भी तरह का संपर्क ना रखना जो सांप्रदायिकता का प्रचार करती हो और धर्म को व्यक्ति का निजी मामला मानते हुए जनता के बीच एक-दूसरे के प्रति सहनशीलता की भावना पैदा करना और इस पर दृढ़ता के काम करना ।

    भगत सिंह धर्म और अंधविश्वास की जकड़न से समाज को मुक्त करने पर जोर देते थे। अपनी मौत से कुछ पहले उन्होंने एक प्रसिद्ध और चर्चित लेख लिखा था “मैं नास्तिक क्यों हूं” उसमें उन्होंने धर्म और धर्म दर्शन की खूब आलोचना की थी। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे सिख धर्म में उनकी आस्था खत्म हो गई और अंत में भगवान के अस्तित्व में भी उनकी आस्था नहीं रही । उन्हीं के शब्दों में प्रगति के लिए संघर्ष ही किसी भी व्यक्ति को अंधविश्वास की आलोचना करनी ही होगी और पुरातन पंथी विचारों को चुनौती देनी ही होगी प्रचलित विश्वासों की हर एक कड़ी की प्रासंगिकता और सत्यता  को परखना ही होगा।

    बिपन चंद्र के मुताबिक राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष में भगत सिंह और उनके साथियों का योगदान अमूल्य है  उनका अनन्य राष्ट्र प्रेम, अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धताऔर गौरवमय बलिदान भारतीय जनता के ल प्रेरणा स्रोत बने। उन्होंने देश में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया उत्तर भारत में समाजवादी विचारधारा के प्रचार प्रसार में उनका योगदान अमूल्य और अतुलनीय है।

  • कर्ज उतारने बेची जा रही हैं सरकारी सम्पत्ति? दो साल में छह सौ करोड़  की संपत्ति बेची, करीब सवा अरब रुपए की  बेंची जाने की तैयारी ..!

    कर्ज उतारने बेची जा रही हैं सरकारी सम्पत्ति? दो साल में छह सौ करोड़  की संपत्ति बेची, करीब सवा अरब रुपए की बेंची जाने की तैयारी ..!

    भोपाल//  सरकार पर तीन हजार करोड रुपए से अधिक का कर्ज है और बताया जाता है कि इस कर्ज से उबरने के लिए सरकार सरकारी संपत्तियां बेच रही है. सरकारी संपत्तियों की बिक्री जमीन प्रबंधन के नाम पर की जा रही है।आरोप यह भी है कि सरकार ने माफियाओं को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार ने इसे नियमों का जामा पहना दिया है।
    पिछले 2 सालों में प्रदेश की 600 करोड़ रुपए की सरकारी संपत्ति बेंच दी है और आने वाले दिनों में 131 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति को बेचने की तैयारी की जा रही है, जिसमें नर्मदापुरम जिले की पिपरिया का वेयरहाउस( 2.14 करोड) और इटारसी की ट्रैक्टर स्कीम की जमीन (11.87 करोड) की संपत्ति शामिल है इसके अलावा कटनी का ब्लॉक तीन (8.19 करोड़) छतरपुर के नौगांव की (5.51 करोड़ )और धार का बस डिपो (25.58 करोड रुपए )की संपत्ति को नीलाम किया जाएगा।
    इसी तरह ग्वालियर की 47.92 करोड रुपए की कीमत की 3 संपत्तियां भी बेंची जाएंगी। उत्तर प्रदेश के झांसी में मध्य प्रदेश परिवहन विभाग का बस डिपो भी भेजने की तैयारी है हालांकि इसका मूल्य तय नहीं किया गया है इस साल 65 से अधिक संपत्ति या बैठे जाने के लिए चिन्हित की गई हैं। वैसे वैसे राजधानी भोपाल की प्राइम लोकेशन पर स्थित आरटीओ और मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम की संपत्ति भी इसी तरह बेच दिए जाने की तैयारी थी लेकिन बाद में आरटीओ कार्यालय भाजपा को किराए पर दिए जाने से फिलहाल इस संपत्ति की नीलामी प्रक्रिया को रोक दिया गया है।
    सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में वर्तमान सरकार ने सरकारी संपत्तियां बेचने की इस बड़ी योजना के तहत बस डिपो, रेस्ट हाउस, मकान, खाली भूखंड, कारखाने, ऑफिस, बिल्डिंग, रेशम केंद्र, सिल्क केंद्र आदि बेचे जा रहे हैं। इन संपत्तियों को लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग की वेबसाइट पर प्रदर्शित किया गया है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इनमें से कई संपत्तियों की बिक्री के लिए टेंडर जारी किए जा चुके हैं। कुछ संपत्तियों की बोली भी शुरू हो गई है।
    सरकारी जमीन को खुर्दबुर्द करने का खेल?
    लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग के पेम पोर्टल पर बाकायदा जमीनों की गाइडलाइन या कच्ची जमीन के आधार पर रिजर्व प्राइस पर बोली लगवा कर जमीन बेची जा रही है कहने को तीन गुना तक बोली आने पर जमीन बेची जा रही है लेकिन वास्तविकता में यह सरकार के लिए नुकसान का सौदा है क्योंकि इन जमीनों का वास्तविक मूल्य बाजार मूल्य से कई गुना ज्यादा है चौंकाने वाली बात यह है कि विभाग को सरकारी अनुपयोगी जमीन बेचना है पर देखने में यह आया है कि सरकार द्वारा ऐसी जमीनों को बेचा जा रहा है जिनका उपयोग भविष्य में नागरिक सुविधाओं को विकसित करने के लिए किया जा सकता है।
    इस पूरे मामले को इटारसी के रेस्ट हाउस  की जमीन को बेचें जाने के उदाहरण से समझा जा सकता है। सरकार की परिसंपत्ति विभाग द्वारा इस 16338 वर्ग मीटर भूमि का मूल्य 24 करोड़ रुपया का गया और इसे मात्र 31 करोड़ 60 लाख की बोली पर बेच दिया गया जबकि इटारसी में इस क्षेत्र में जमीन का बाजार मूल्य इस कीमत से बहुत ज्यादा है इटारसी में 10 * 10 फीट की दुकान की कीमत ₹1 करोड़ है। उसी तरह इंदौर के तलावली चांदा की जमीन को गाइडलाइन के आधार पर कीमत ₹250 वर्गफुट आंकी गई  बोली आई 12 सो रुपए, जबकि इस  क्षेत्र में जमीन का बाजार मूल्य ₹2000 से ज्यादा है। यही स्थिति परिसंपत्ति विभाग के पेम पोर्टल पर बिक्री के लिए डाली गई सभी जमीनों की है। हैरानी की बात यह है कि कैबिनेट ने फैसला होकर प्रशासन के पास रजिस्ट्री करवाने की जानकारी आती है सरकार का लोकसंपत्ति  प्रबंधन विभाग यह कार्य कर रहा है।
    सरकार करे विचार
    सरकार को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए और दूरगामी सोच के साथ देखना चाहिए कि जिन जमीनों को अनुपयोगी घोषित किया जा रहा है वह वास्तव में अनुपयोगी है भी या नहीं, क्योंकि उन्हें बेचने के बाद भविष्य में नागरिक सुविधाओं को विकसित करने के लिए उनके पास कोई जमीन उपलब्ध नहीं होगी इस दृष्टिकोण से पुख्ता होने के बाद ही उन्हें बेचा जाए जिसके लिए मौजूदा बाजार मूल्य के बराबर इनकी की माता की जाए ओने पौने दामों पर बेचकर भारी नुकसान ना उठाया जाए।

  • क्यों बिकती हैं भारत में सफेद कारें ज्यादा ?

    नई दिल्ली // क्या आप जानते हैं भारत में अमूमन लोग सफेद रंग की कार खरीदना पसंद करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल यानी 2022 में देश में बिकने वाली करीब 42.2 फ़ीसदी कारें सफेद रंग की थीं। सफेद रंग के बाद खरीदने वालों की पसंद सिल्वर फिर ग्रे है .

     आर्थिक अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड ने विगत दिनों वाहन सलाहकार कंपनी जाटो डायनामिक्स के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर एक खबर छपी है,  जिसके अनुसार पिछले साल देशभर में बिकने वाली 42.2 फ़ीसदी कारें सफेद थी, जबकि यह संख्या 2021 में थोड़ी अधिक 43.9 फ़ीसदी थी, हां, 2021 की तुलना में 2022 में दूसरे रंग जिनमें काली, सिलेटी, नीले, लाल,हरे और सुनहरे रंगों की  कारों की बिक्री में कुछ फ़ीसदी की वृद्धि हुई है ,

    सफेद कार ज्यादा बिकने के कई हैं कारण

     विशेषज्ञों के मुताबिक सफेद कारों के ज्यादा बिकने के कारणों की फेहरिस्त लंबी है ।सबसे अव्वल तो सफेद रंग की गाड़ियों का रखरखाव आसान होता है। यह रंग दूसरे रंगों की तरह जल्दी अपनी चमक नहीं खोता। यह रंग परिवार के सदस्यों की आम पसंद भी हो जाता है । इस रंग की गाड़ी की रीसेल वैल्यू ज्यादा होती है यानी दोबारा बिक्री करने पर ज्यादा पैसा मिलता है। इसके अलावा सुरक्षा के मामले में भी सफेद रंग के अलग फायदे हैं, यह रात को बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है ।गर्मी के मौसम में कम  गर्मी अवशोषित करता है और छोटी कारें भी सफेद रंग की वजह से बड़ी दिखती हैं। और वास्तु और ज्योतिष कारणों से इस रंग को शुभ नहीं माना जाता है ।

    आखिर कंपनियां क्यों बनाती हैं इतने रंगों की कारें?

     भारत के लोग कई तरह की कारों का अनुभव लेने और प्रयोग करने में पीछे नहीं हैं। पिछले साल कुल यात्री वाहन की बिक्री में 1 फ़ीसदी से थोड़ा अधिक हिस्सेदारी सफेद के अलावा दूसरे रंग के वाहनों की हुई थी। कार बिक्री पर नजर रखने वालों का कहना है कि सफेद रंग के अलावा दूसरे रंग की कारों की बिक्री इसलिए बढ़ी है, क्योंकि उनके लिए कम इंतजार करना पड़ता है। इसके अलावा स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) सेग्मेंट के वाहनों की बिक्री में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिल रही है, क्योंकि इस तरह के वाहन लग्जरी सुविधाओं से लैस होने के साथ काफी मजबूत होते हैं इस सेगमेंट में लोग अधिकतर गहरे रंगों वाले मॉडल खरीदते हैं। मारुति सुजुकी इंडिया के वरिष्ठ  कार्याधिकारी ( विपणन और बिक्री) शशांक श्रीवास्तव के मुताबिक किसी भी बढ़ती अर्थव्यवस्था और परिपक्व  कार बाजार में सलेटी के अलावा दूसरे रंग की कारों को कम पसंद किया जाता है

    महिला खरीददारों के कारण चमकीले और गहरे और रंगों के वाहनों की मांग बढ़ी

    जानकारों के मुताबिक आजकल करों की खरीदी में 10 से 12 फीसदी की हिस्सेदारी महिलाओं की है जो ब्राईट रंग खरीदना पसंद करती हैं . अब भारत में रंगीन गाड़ियों को प्राथमिकता मिलना शुरू हो गई हैं, वैसे आंकड़े यह भी बताते हैं कि पिछले 3 दशकों तक भारत में सफेद, सिल्वर और सलेटी गाड़ियों की हिस्सेदारी 65 से 70 फ़ीसदी रही है । एक वक्त सिल्वर कार बहुत खरीदी जाती थी।

     पिछले साल यानी 2022 सबसे अधिक 38 लाख़ यात्री वाहन बिके जो 2018 के पिछले रिकॉर्ड से 4.38 लाख ज्यादा थे।

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  • जब जिले में चना 1रूपये  का साठ सेर और गेहूं 50 सेर मिलता था।

    जब जिले में चना 1रूपये का साठ सेर और गेहूं 50 सेर मिलता था।

    इटारसी // आज महंगाई के चर्चे चारों ओर हैं, आम आदमी महंगाई से परेशान हैं, अनाज के दाम आसमान पर हैं। पर क्या आप जानते हैं कि करीब दो सौ साल पहले 1826-30 के आसपास होशंगाबाद जिले (अब नर्मदा पुरम ) जिसमें नरसिंहपुर  से लेकर हरदा जिले तक का क्षेत्र शामिल था, में अनाज की  क्या कीमत थी?  उसकी आज कल्पना नहीं की जा सकती।
    आइए जानते हैं नर्मदापुरम जिले में दो शताब्दी में हुई अनाजों की कीमतों के उतार चढ़ाव की रोचक दास्तान…!

    उन दिनों के रिकॉर्ड से अनाज की कीमतों का रोचक विवरण सामने आता है ।  यह भी पता चलता है कि बाद में आकाल और अन्य स्थानीय कारणों से कैसे धीरे-धीरे कीमत बढ़ती गईं।
    जिले में 1830 तक गेहूं ₹ 1 का 50 सेर था (सेर यानी आज के 1 किलो ग्राम से कुछ ज्यादा)  तो चना ₹1 में 60 सेर से ज्यादा मिलता था। 1832 में इलाक़े की फसलों पर गेरुआ रोग का प्रकोप हो गया तो  कीमतों में एकदम तेजी आई और 1832 33 में गेहूं की कीमत  ₹1 में 17 सेर तक  पहुंच गई   1833 में चना  ₹1 का 18 सेर हो गया था। वैसे बाद के सालों में कीमतें कम हुई पर पहले की सबसे कम कीमतों पर नहीं पहुंच सकीं।
    1836-40 में गेहूं 1रुपए का 40 सेर था, चना 46 सेर । वहीं 1846 में यहीं आंकड़ा क्रमश: 31और 39 हो गया।1856-60में फिर कीमतें कम हुईं और गेहूं एक रुपए का साढ़े चवालीस किलो और चना 54किलो मिलने लगा ।
    पर  1861से 65के बीच  फिर तेजी से दाम बढ़े और गेहूं एक रुपए का साढ़े इक्कीस किलो और चना साढ़े चौबीस किलो मिलने लगा और इसका कारण था अमेरिका का युद्ध जिसके कारण कपास की मांग बढ़ गई थी, आसपास के क्षेत्रों के लोग अपनी जमीन पर गेहूं छोड़ कपास उगाने लगे थे, गेहूं का उत्पादन कम हो गया था।
    फिर 1968 में बुंदेलखंड में अकाल पड़ा दो आसपास के जिलों में अनाज का संकट पैदा हुआ तो कीमतें बढ़ी अकाल के दौरान और बाद में ज्वार पैदा की जाने लगी तो गेहूं और चने के दाम बढ़ गए। 1870 के आसपास इस क्षेत्र में रेल लाइन आ गई इससे निर्यात शुरू हो गया तो कीमतें बढ़ने लगी। 1878 में फिर अकाल पड़ गया तो अनाज महंगा हुआ । 1878 में गेहूं का भाव प्रति रुपए 12 सेर हो गया । अमेरिका युद्ध के समय से हुई सामान्य वृद्धि से 1871- 76 के बीच बंदोबस्त के समय लगाए अनुमान के अनुसार गेहूं 32 सेर से 16 सेर तथा चना 40 सेर से 20 सेर हो गया था। ज्वार की कीमत वैसे उस समय कम थी पर उसमें भी उतार-चढ़ाव देखे गए। 1861 से 1880  तक ज्वार की कीमत औसत रूप से एक रुपए में साढ़े बाइस सेर थी।
    19 वी सदी के अंतिम दशक में मौसम और मांग पूर्ति में बदलाव के कारण गेहूं और ज्वार की कीमतों में अनिश्चित रूप से उतार-चढ़ाव होते रहे। 1893 में गेहूं का सबसे कम दाम ₹1 में 16.4 सेर था और सबसे ज्यादा कीमत 1897 में 8.3 सेर प्रति रुपए थी, वहीं ज्वार का भाव 1874 में सबसे कम था यानी ₹1 का 22.8 सेर, पर 1897 में गेहूं का मुकाबला करते हुए ज्वार का भाव ₹1 का 10.8 सेर तक पहुंच गया, कहते हैं यह भाव अकाल के कारण पहुंचा था ।18 97 में गेहूं का एक रुपए में 8 सेर से कुछ ज्यादा मिलता था ।1898 में दाम कुछ कम हुए तो ₹1 में 11.2 सेर भी मिला हां ज्वार का भाव भी कम हुआ, वह एक रुपए में 20.9 सेर मिलने लगी। आगे अकाल पढ़ जाने के कारण 1900  में इन अनाजों की कीमतें बढ़ी।
    20 वीं सदी के प्रारंभ में
    बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में स्थिति सामान्य होने अच्छी फसल होने के कारण भाव में निरंतर गिरावट आती गई और अनाज के दाम 1903 में सबसे कम हो गए अर्थात ज्वार एक रुपए की 27.2 सेर तक पहुंच गई तथा 1904 में गेहूं ₹1 का 15.2 सेर हो गया था। बाद के वर्षों में फिर दामों में अनिश्चितता की स्थिति रही। 1908 में दामों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जब अनाज के दाम अपने शिखर पर पहुंच गए अर्थात गेहूं ₹1 का 8.06 सेर तथा ज्वार एक रुपए की 10.15 से तक बिकी। यह ठीक है की इन असामान्य भावों की तुलना आज के भावों से नहीं की जा सकती लेकिन वह हमें तुलना करने का एक दिलचस्प आधार जरूर प्रदान करते हैं।
    प्रथम विश्व युद्ध
    आगामी दशक के बाद के वर्षों में प्रथम विश्व युद्ध हुआ था, जिसका असर अनाज के दामों पर मौसम और स्थानीय कारणों से ज्यादा दिखा, ज्वार और चना भी गेहूं के लगभग बराबर हो गया था।
    1919 में गेंहू एक रूपए का 5.03 सेर, जुआर 6 सेर और चना 6.22 सेर तक बिका।
    तीसरे दशक में अनाज की कीमतों कम ज्यादा होती रही 1923 का साल सबसे सस्ता साल रहा इस साल गेहूं चना और ज्वार का भाव क्रमश: एक रुपए का 9.16 12.35 तथा 13.58 सेर रहा। अगले दशक में सभी भाव 1929 में आई भारी मंदी के कारण एक बार फिर कम हो गए । 1933 -34 तक भाव पहले विश्व युद्ध के स्तर तक आ गए थे  यानी गेहूं 1रूपए का 14.92, चना 16.91और ज्वार 19.62 सेर तक आ गई थी।
    द्वितीय विश्व युद्ध
    मंदी के भाव पूरे चौथे दशक में बने रहे, इस दशक में सबसे महंगा गेंहू 1937 में 1रूपए का 10.37सेर मिलता था। द्वितीय विश्व युद्ध की घोषणा के साथ ही मंदी खत्म हो गई। मूल्य नियंत्रण और मुद्रा स्फीति के कारण लगातर बढने वाले मूल्यों के युग का सूत्रपात हुआ। आगामी चार साल अनाज के दाम तेजी से बढ़े । जहां 1940-41में गेंहू का दाम 1रूपए का 9.91चने का 11.25 और ज्वार 6.07 था, वहीं 1944 में गेंहू 2.79 सेर और चना 4.35 सेर तक पहुंच गया।
    आजादी के बाद की कीमतें
    अनाज के दामों के बढने की शुरुआत आजादी के पहले से हो चुकी थी। 1947 मैं भी एक रुपए का चार सेर गेहूं मिलता था यह भाव जिले के थोक भाव का औसत था देश के विभाजन के कारण बढ़ी वित्तीय कठिनाई के कारण सामान के दाम बढ़ गए थे । प्रथम पंचवर्षीय योजना में अनाज के उत्पादन को बढ़ाने पर जोर दिया गया था दूसरी पंचवर्षीय योजना तक यानी साठ के दशक तक दामों में कोई ज्यादा वृद्धि नहीं हुई। गेहूं का भाव 1962- 63 में 35.8 ₹ प्रति क्विंटल था जो 1968 – 69 तक 80.67 रुपए प्रति क्विंटल हो गया यानी 1962- 63 में गेहूं ₹1 का 2.79 किलो मिलता था तो चना ₹1 का 2.93  किलो 1968- 69 में गेहूं एक रुपए का 1.23 किलो मिलता था और चना एक रूपए का 1.29 किलो तक पहुंच गया। इस दौर में सिर्फ अनाज ही नहीं सभी वस्तुओं के दाम बढ़ने लगे थे।
    1974 -75 तक गेहूं का मूल्य 162.84  रूपए प्रति क्विंटल था तो चना 168.18 रूपए और ज्वार 142.98 रूपए प्रति क्विंटल थी, यानी गेंहू की कीमत 1.62प्रति किलो तक पहुंच गई ।
    और आज की कीमत तो आप जानते ही हैं।
    गेहूं रही है जिले की पहचान
    गेहूं सदैव से ही जिले की एक प्रमुख फसल रही है। गेहूं पैदा करना होशंगाबाद जिले के किसानों की विशेषता रही है। काफी समय पहले 1864 में रैसलपुर ग्राम से जलालिया गेहूं का नमूना लिया गया जिसे लखनऊ की प्रदर्शनी में प्रतियोगिता की भारी संख्या के बीच प्रदर्शित किए गेहूं में सबसे बड़े तथा सबसे अच्छे गेहूं के रूप में पुरस्कार मिला था। सफेद पिसी का इंग्लैंड को भारी मात्रा में निर्यात किया जाता था जहां इसका उपयोग अच्छी अमेरिकन किस्में मिलाने के लिए किया जाता था। रैली ब्रदर्स का विचार था कि मध्य प्रांत में सिवनी मालवा की पिसी सबसे अच्छी किस्म की थी । पुराने गजेटियर के अनुसार उस समय पैदा की जाने वाली किसमें थी जलालिया, कठिया सफेद पिसी लाल पिसी, बंसी, बगासिया, मुंडी पिसी तथा लौजिया या सहारिया थीं।