Category: मध्य प्रदेश

  • क्यों खतरे में हैं भाजपा के सत्तर विधायको की टिकट ?

    क्यों खतरे में हैं भाजपा के सत्तर विधायको की टिकट ?

    भोपाल//  मध्यप्रदेश में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा संगठन तक जो जमीनी फीडबैक आ रहा है वो परेशान करने वाला है। राज्य के कई दिग्गज नेताओं के लिए यह फीडबैक अच्छा नहीं है। यही कारण है कि तमाम दावेदारों की नींद उड़ी हुई है।

    खबर है कि इस बार भाजपा तीन  ने तीन सर्वे कराए हैं ।पार्टी के सूत्रों के अनुसार एक फीडबैक सर्वे राज्य स्तर पर हो हुआ है जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी की एक एजेंसी से  कराया गया है। दूसरा सर्वे केंद्रीय नेतृत्व कराया है। एक गुजराती कंपनी को यह जिम्मा सौंपा गया है। तीसरा फीडबैक सर्वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जमीनी स्तर पर सक्रिय स्वयंसेवकों के बीच कराया जा रहा है। इन सर्वे के फीडबैक से केन्द्रीय नेतृत्व को भी अवगत कराया है। बताया जाता है कि सर्वे ने भाजपा नेतृृत्व को चिंता में डाल दिया है।

    मीडिया रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए तो पांच महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्तर विधायकों के टिकट पर संकट के बादल छा गए हैं। पार्टी द्वारा कराए गए सर्वे में इन विधायकों का परफार्मेन्स ठीक नहीं आया है। इनमें से कई अपने क्षेत्र में बेहद निष्क्रिय पाए गए हैं। समय रहते विधायकों की छवि में सुधार न हुआ तो इनके टिकट काटे जा सकते हैं। इसके अलावा ख़बर यह भी है कि आधा दर्जन से अधिक विधायकों के टिकट सत्तर की उम्र पार होने के कारण बदले जाएंगे।

     मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  विधायकों के साथ वन टू वन में उन्हें यह सर्वे रिर्पोट दिखा भी चुके हैं और रिपोर्ट के आधार पर सामने आई कमियों को दूर करने का आग्रह इस चेतावनी के साथ कर चुके हैं कि वक्त है, संभल जाओं वर्ना फिर संभलने का मौका नहीं मिलेगा। संगठन सूत्रों की माने तो करीब तीन दर्जन विधायक ऐसे हैं जो क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय नहीं हैं। इन सालों में इनकी छवि भी पहले जैसी नहीं रही है। बताया जाता है कि सर्वे के दौरान कुछ विधायकों के बारे में जिले के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ही खुलकर विपरीत टिप्पणियां की हैं । इनमें उप चुनाव जीत कर आए ज्योतिरादित्य सिंधिया  के समर्थक मंत्री और विधायक भी शामिल हैं।

    सत्तर पार पर संकट की चर्चा ?

    भाजपा में इस समय करीब तीन दर्जन से अधिक ऐसे विधायक हैं जो तीन और चार बार से लगातार विधायक हैं। इसके अलावा पांच या उससे अधिक बार के विधायकों की संख्या भी एक दर्जन के करीब है। सूत्रों की माने तो ऐसे विधायक जो चार बार से विधायक हैं और उनकी उम्र सत्तर को पार कर रही है, उनके टिकट कट सकते हैं। संगठन इस बारे में नीति तैयार कर रहा है। इसके अलावा कुछ विधायकों के टिकट काट कर उनके परिजन को चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। गौरतलब है कि भाजपा के अभी 126 विधायक हैं। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 148 सामान्य हैं, इसके अलावा 47 अनुसूचित जनजाति और 35 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। सूत्रों की माने तो प्रदेश कार्यसमिति के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल, प्रदेश संगठन प्रभारी मुरलीधर राव, प्रदेश अध्यक्ष वी डी शर्मा, संगठन महामंत्री हितानंद के बीच लंबी मंत्रणा हुई है। इसमें प्रदेश के हर जिले का दौरा कर चुके अजय जामवाल ने भी सीएम को विधायकों को लेकर मिले फीडबैक की जानकारी दी गई, उन्होंने फीडबैक से केन्द्रीय नेतृत्व को भी अवगत कराया है।

    पिछली बार कुछ यूं हुआ था

    भाजपा ने 2018 के विधानसभा चुनावों में पांच मंत्रियों समेत 54 विधायकों के टिकट काटे थे। पिछली बार हुए सर्वे में भी पार्टी के सत्तर विधायकों का प्रर्दशन अच्छा नही माना गया  था। जिन पांच मंत्रियों के टिकट काटे गए थे उनमें कुसुम मेहदेले, डाक्टर गौरीशंकर शेजवार, माया सिंह, सूर्यप्रकाश मीणा और हर्ष सिंह शामिल थे। इनमें शेजवार और हर्ष सिंह के स्थान पर उनके पुत्रों को टिकट दिया गया था।

  • दिग्विजय की सक्रियता से भयभीत है भाजपा ?

    दिग्विजय की सक्रियता से भयभीत है भाजपा ?

    भोपाल // वैसे तो प्रदेश में नबंबर  में होने वाले विधान सभा चुनाव में भाजपा के लिए हिंदुत्व मुख्य मुद्दा है, पर वह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल की कमियों को जनता के बीच उजागर करने की भी तैयारी कर रही है और उसे 2003 के दिग्विजय शासन बनाम शिवराज शासन के रूप में पेश करना चाहती है। चुनाव की तैयारी में सब कुछ झोंक देने को आतुर भाजपा ने पिछले दिनों प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में यह लिया गया है । यह निर्णय भाजपा खेमे की घबराहट को दर्शाता है।

    प्रदेश में पिछले 20 साल से भाजपा सत्ता में( इस बार के 18 महीने छोड़ कर) है तो ऐसे में अपनी सरकार की उपलब्धियों पर स्वतंत्र रूप से वोट ना मांग कर शिवराज सरकार की तुलना दिग्विजय सिंह सरकार की कोशिश को क्या कहा जाए?

    राजधानी की राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि अभी तक कमलनाथ के 18 महीने के कार्यकाल को कटघरे में खड़ा कर रही भाजपा का चुनाव के 6 महीने पहले पूर्व मुख्मंयत्री के दो दशक पुराने कार्यकाल को निशाना बनाने का फैसला यूं हीं नहीं है। राजनीतिक पंडितों और भाजपा सूत्रों के आधार पर कहा जा सकता है कि जिस तरह की खबरें आ रही हैं , कि एंटी इंकम्बेंसी के चलते प्रदेश में कांग्रेस सरकार बना सकती है। भाजपा फिलहाल इसकी कोई मजबूत काट नहीं ढूंढ पाई है, और वह अपनी जीत के लिए दिग्विजय सिंह को कारगर मान रही है।

    वैसे तो दिग्विजय सिंह हमेशा से ही भाजपा के निशाने पर रहते आए हैं, क्योंकि आमतौर पर उनकी तल्ख टिप्पणियां भाजपा और आरएसएस को नाराज करती रही हैं। भाजपा उन्हें मि. बंटाधार के रूप में प्रचारित करती रही है। उनके बयान भाजपा को कई बार धार्मिक ध्रुवीकरण करने में मदद कर चुके हैं, जिसका भाजपा चुनाव में फायदा भी उठा कर चुकी है । जानकारों का यह भी कहना है कि दिग्विजय सिंह के पूरे प्रदेश में समर्थक हैं , उनका विरोध करने पर पूरे प्रदेश से प्रतिक्रिया होती है ,जिससे स्थानीय स्तर पर भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं।  इस तरह से वे राष्ट्रीय स्तर के नेता का विरोध करने का मौका पाए जाते हैं। इसलिए दिग्विजय का विरोध भाजपा को ज्यादा फायदेमंद लगता है।

    दिग्विजय की सक्रियता से चिंता ?

    इसके अलावा इस बार कांग्रेस आलाकमान लगातार हार रही लगभग 70 सीटों पर फोकस कर रही है और उसमें से लगभग सभी सीटों पर दावेदारी मजबूत करने की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह को दी गई है। दिग्विजय सिंह पूरी सक्रियता के साथ लगातार इन क्षेत्रों में जाकर कार्यकर्ताओं, नेताओं से बात कर जमीनी हकीकत को जान परख रहे  हैं । उनकी इस कोशिश से कार्यकर्ताओं में उत्साह है और अनेक स्थानों पर जहां पार्टी मृत अवस्था में थी वहां भी कुछ सुगबुगाहट नजर आने लगी है। दिग्विजय सिंह के विरोधी भी उनकी नेतृत्व और संगठन क्षमता एहतराम करते रहे हैं। प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को दिग्विजय की सक्रियता ने चिंतित और भयभीत कर दिया है और उन्हें लगता है कि कहीं दिग्विजय की मेहनत भाजपा के सपनों को ध्वस्त न कर दे।  इसीलिए चुनाव में उनका फोकस कमलनाथ से हटकर दिग्विजय पर हो गया है।

    भाजपा की यह कोशिश दिग्विजय के राजनीतिक कौशल को एक तरह से स्वीकार करती लगती है।

  • नर्मदापुरम में भाजपा से आने वाले किसी नेता को टिकट नहीं देगी कांग्रेस-दिग्विजय

    नर्मदापुरम में भाजपा से आने वाले किसी नेता को टिकट नहीं देगी कांग्रेस-दिग्विजय

    दिग्विजय सिंह ने किया दावा-कांग्रेस प्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी

    इटारसी// कांग्रेस नर्मदापुरम (होंशगाबाद)क्षेत्र में भाजपा से आने वाले किसी व्यक्ति को टिकट नहीं देगी। टिकट कांग्रेस के व्यक्ति को ही मिलेगा। पिछली बार सरताज सिंह की टिकट को छोड़ दें ,तो हमेशा कांग्रेस के व्यक्ति को ही टिकट मिला है। यह बात पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने गुरुवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए कही।

     दिग्विजय सिंह यहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं और मंडल सेक्टर अध्यक्षों की बैठक में भाग लेने पहुंचे थे । इटारसी की एक्सप्रेसइलेवन में आयोजित इस बैठक के पूर्व श्री सिंह ने पत्रकार वार्ता को संबोधित किया।

     यह पूछे जाने पर कि क्षेत्र में चर्चा है कि भाजपा का कोई नेता कांग्रेस में शामिल होने वाला है और उसे टिकट दिया जा सकता है? दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस बात में कोई दम नहीं है। उन्होंने कांग्रेस की टिकट प्रक्रिया तो बताते हुए कहा कि जिला एवं प्रदेश कांग्रेस कमेटी नाम प्रस्तावित करेगी ,एआईसीसी की स्क्रीनिंग कमेटी और सेंट्रल स्क्रीनिंग कमेटी नाम तय करेगी। यह पूछे जाने पर भी यह पूछे जाने पर कि क्या पार्टी किसी नए चेहरे को मैदान में उतार सकती है? तो दिग्विजय ने कहा कि यह पार्टी तय करेगी चेहरा नया हो या पुराना इतना जरूर है कि इस बार चुनाव हम मिलकर लड़ेंगे और गुटबाजी समाप्त होगी।

    दिग्विजय सिंह ने किया दावा-

    कांग्रेस प्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी

    पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने दावा किया है कि इस बार कांग्रेस मध्यप्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी,  कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव लड़ेगी। हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि प्रदेश की जनता शिवराज सिंह सरकार से नाराज है भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है पूरे प्रदेश को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाया जा रहा है जिसमें शिवराज और कांग्रेस से गए महाराज हिस्सेदार हैं। हर काम में हिस्सेदारी मांगी जा रही है।

  • लगातार हार रही सीटों पर कांग्रेस तीन महीने पहले ही तय कर सकती है उम्मदीवारों के नाम !

    लगातार हार रही सीटों पर कांग्रेस तीन महीने पहले ही तय कर सकती है उम्मदीवारों के नाम !

    भोपाल// साल के अंत में होने वाले चुनाव में कांग्रेस लगातार हार रही सीटों पर फोकस कर रही है अब कांग्रेसमें इस तरह की सीटों पर पहले से उम्मीदवार घोषित करने की समय सीमा तय कर दिया बताया जाता है कि पार्टी लगातर हार रही या कम अंतर से हारी सीटों पर 3 महीने पहले ही उम्मीदवारों के नाम घोषित कर सकती है।

     इसकी वजह यह बताई जा रही है कि इससे उम्मीदवारों को जमीनी स्तर पर काम करने और प्रचार-प्रसार का भरपूर समय मिलेगा। साथ ही पार्टी को यह भी लग रहा है कि इस बार टिकट न मिलने पर कुछ नेता बगावत कर सकते हैं, उन्हें बैठाने, दावेदारी वापस लेने व मनाने के लिए भी पार्टी को वक्त मिलेगा।

    कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ पहले ही सर्वे रिपोर्ट के आधार पर टिकट देने की बात करते रहे हैं। बताया जाता है कि दो सर्वे कराए भी जा चुके हैं और कमलनाथ और दिग्विजय सिंह लगातार विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं और हारी हुई सीटों की जमीनी हकीकत जानने और कार्यकर्ताओं का फीडबैक लेने में लगे हुए हैं।वही आईसीसी द्वारा नियुक्त ऑब्जर्वर भी रिपोर्ट के आधार पर सभी पहलुओं को देखकर पार्टी टिकट का निर्णय करेगी।

    आधार पर तैयार होगी ऑब्जर्वर की रिपोर्ट

    बताया जा रहा है कि पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ के द्वारा दो सर्वे कराए गए हैं। यह सर्वे रिपोर्ट ऑब्जर्वर को सौंप दी गई है। ऑब्जर्वर ऐसे 70 विधानसभा क्षेत्रों की मैदानी स्थिति को देखेंगे । साथ ही सर्वे में जिनके नाम आए हैं उनकी स्थिति जमीनी तौर पर कैसी है? जीत सकते हैं कि नहीं ? जिनके नाम आए हैं उनसे भी चर्चा की जाएगी । इसके अलावा पार्टी के कार्यकर्ता वरिष्ठ नेता और मतदाताओं का रुझान भी लिया जाएगा। ऑब्जर्वर एक विधानसभा में 1 दिन बिताएंगे।

  • दिग्विजय सिंह का दौरा बदलेगा तस्वीर ?

    दिग्विजय सिंह का दौरा बदलेगा तस्वीर ?

    इटारसी / नर्मदापुरम//आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस खासी सक्रिय है। इस बार वह लगातार उन सीटों पर फोकस कर रही है जिन पर कांग्रेस पिछले चार-पांच चुनाव से हार झेलती आ रही है। वरिष्ठ नेताओं के दौरे इस तरह के क्षेत्र में लगातार जारी हैं। कहा जा रहा है कि इसी तारतम्य में पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य सभा सदस्य दिग्विजय सिंह गुरुवार को नर्मदा पुरम और इटारसी आ रहे हैं, वे कार्यकर्ताओं से चर्चा करेंगे और पार्टी की स्थिति को समझने और जानने का प्रयास करेंगे।

     जहां तक नर्मदापुरम( होशंगाबाद) जिले का सवाल है यहां संगठन कमजोर नहीं बल्कि ध्वस्त है और इसके लिए भोपाल मैं बैठकर जिले को अपनी जागीर मानने वाले नेता जिम्मेदार हैं । पिछले कई दशकों से उन्हीं नेताओं की पसंद के लोगों को यहां उम्मीदवार बनाया जाता रहा और यह बात खुलकर कही जाती रही है कि इन नेताओं का भाजपा के सबसे रसूखदार परिवार से गहन संबंध होने के कारण यहां कांग्रेस उनके सामने कोई मजबूत प्रत्याशी देने से बचती रही है। 

     बात कड़वी है पर सच है 

    यह बात इस क्षेत्र के राजनीतिक गलियारों में ही नहीं आम लोगों में भी खुलकर कही जाती है कि भाजपा के बगीचे से ही  कांग्रेस की टिकट तय होती है। इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना है, क्योंकि जो फार्मूला बताया जा रहा है जिसमें उम्मीदवार के चयन में स्थानीय संगठन और प्रभावशाली नेता की महत्वपूर्ण भूमिका होगी तो ऐसे में कोई बदलाव होगा ऐसा नहीं लगता। क्योंकि हाल ही में स्थानीय संगठनों में जो लोग पदाधिकारी बनाए गए हैं वह पार्टी के बजाय उन्हीं नेताओं की पसंद और निष्ठा वाले हैं। इसीलिए मंडलम की ओर से वही नाम जाएंगे जिन्हें यह नेता चाहेंगे।

    राष्ट्रवादियों की रहती है बल्ले-बल्ले

    पिछले कई बार से कांग्रेसी इलाके में चुनाव हार रही है इसके लिए कांग्रेसियों की भूमिका ही महत्वपूर्ण होती है। भीतरघात( यहां तक कि पैसे लेकर रातों-रात निष्ठा बदलने के किस्से चुनाव के बाद तक चर्चाओं में रहते हैं पिछले चुनाव में लिफाफे की चर्चा तो आज तक याद की जाती है) एक स्थायी रोग है, पर चुनाव के बाद भी इस तरह के तत्वों पर कभी कोई एक्शन पार्टी की ओर से कभी नहीं लिया गया, उल्टे उन्हें किसी ना किसी तरह से पुरस्कृत किया गया ,

     हाल ही के नपा चुनाव में कांग्रेस के भोपाल में बैठे वरिष्ठ नेताओं की जो भूमिका रही, माना जा रहा है कि उसके कारण इटारसी नगर पालिका पर कांग्रेस काबिज होते होते रह गई।  इन नेताओं ने जिन अपने चहेतों को पार्षद के टिकट दिलवाए उनमें से कुछ तो जीते ही नहीं जो जीते तो  उन्होंने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ खुलकर मतदान किया था और उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं इटारसी के एक मैदान का नाम सावरकर के नाम पर रखे जाने के मामले में भी पार्टी की लाइन से हटकर भाजपा का समर्थन करने वाले आज भी कांग्रेस के नेता बने हुए हैं और तो और भाजपा उन्हें राष्ट्रवादी बता रही है।

    अब  सवाल यह है कि दिग्विजय सिंह जी जब स्थानीय नेताओ और कार्यकर्त्ताओं से  से चर्चा करेंगें तो यह बातें उनके सामने आ सकेंगी ? और ऐसा होगा तभी दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं का दौरा और मेहनत इस तस्वीर को बदल सकेगा ।… और तस्वीर बदलेगी तभी कांग्रेस यहां जीत सकेगी।

  • सूबे के मंत्रियों को उनके ही क्षेत्रों में घेरेगी कांग्रेस !

    सूबे के मंत्रियों को उनके ही क्षेत्रों में घेरेगी कांग्रेस !

    भोपाल//नवंबर में होने वाले चुनाव के लिए कांग्रेस लगातार रणनीति बना रही है । नई रणनीति के तहत पार्टी की अब भाजपा सरकार के मंत्रियों को उनके निर्वाचन क्षेत्र में ही घेरने की योजना है और इस पूरी कवायद की कमान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के हाथ में होगी। इसमें वरिष्ठ नेता लगातार भाजपा के वरिष्ठ मंत्रियों के क्षेत्रों में जाएंगे और कार्यकर्ताओं से संवाद करेंगे । इसके साथ ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक भी इन क्षेत्रों में दौरा करेंगे मंत्रियों के क्षेत्र में एक एक जनसभा भी जल्द आयोजित की जाएगी।

    इस कार्ययोजना की शुरुआत 18 मई से हो सकती है जब कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव के विधानसभा क्षेत्र बदनावर पहुंचेंगे। वहीं दिग्विजय सिंह गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के क्षेत्र दतिया में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के लगातार प्रदेश में जो दौरे हो रहे हैं इन्हें गति दी जाएगी।

    इन पर होगी खास नजर

    प्रदेश कांग्रेस ने चुनाव अभियान कीइस घेराबंदी की अभी जो कार्ययोजना बनाई है उसमें जिन मंत्रियों की घेराबंदी को प्राथमिकता से राहत रखा गया है उसमें गोविंद सिंह राजपूत ,तुलसीराम सिलावट, प्रद्युम्न सिंह तोमर सहित वह मंत्री भी शामिल है जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए थे । इसके अलावा डॉ नरोत्तम मिश्रा, भूपेंद्र सिंह, कमल पटेल ,अरविंद भदौरिया, विश्वास सारंग के निर्वाचन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान रखा जाएगा।

    दतिया खुरई क्षेत्र में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाकर प्रताड़ित करने के सर्वाधिक मामले हैं। कमल पटेल और अरविंद भदौरिया किसान कर्ज माफी को लेकर कांग्रेस पर लगातार हमले करते रहे हैं। तो विश्वास सारंग पार्टी के नेताओं के निशाने पर हैं। पार्टी के सभी सहयोगी संगठनों से कहा गया है कि वह मंत्रियों के क्षेत्र में मतदान केंद्र स्तर पर मतदाताओं से संपर्क कर इस कार्यक्रम को गति दे। मतदाता सूची का सत्यापन कराएं ।

    प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष केके मिश्रा ने बताया कि प्रमाणित जानकारियों के साथ भ्रष्टाचार ,कुशासन और कुप्रबंधन को लेकर अपनी बात जनता के सामने रखेंगे मंत्रियों को लेकर उनके क्षेत्र में नाराजगी है हम इसके आधार पर उन्हें वही घेरेंगे .

  • कर्नाटक के समान कनुगोलू की टीम लगा पाएगी एमपी में भी कांग्रेस की नैया पार ?

    कर्नाटक के समान कनुगोलू की टीम लगा पाएगी एमपी में भी कांग्रेस की नैया पार ?

    कहा जा रहा है कि कर्नाटक में कांग्रेस को जीत दिलाने में आक्रामक चुनावी कैंपेन का बड़ा हाथ रहा है और जिस व्यक्ति और टीम ने यह कैंपेन संभाला था अब वही टीम मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस की नैया पार लगाने आ रही है?

    भोपाल//  कर्नाटक में कांग्रेस की प्रचंड जीत के कई कारणों में से एक कारण आक्रामक चुनाव कैंपेन की रणनीति और मेनिफेस्टो को माना जा रहा है और इस चुनावी कैंपेन की बागडोर थी सुनील कनूगोलू नाम के व्यक्ति के हाथों में । अब खबर है कि यही सुनील कनुगोलू अपनी टीम के साथ जल्द ही मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए काम शुरू करेंगें। 

    पार्टी सूत्रों के अनुसार सुनील तनु गोलू के नेतृत्व में 130 सदस्य टीम जल्द ही मध्यप्रदेश में डेरा डालेगी और चुनाव की व्यू रचना तैयार करेगी । प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व सीएम कमलनाथ की टीम से बातचीत हो चुकी है कमलनाथ ने टीम को मध्य प्रदेश के बारे में फीडबैक दे दिया है उसी के आधार पर यह टीम प्रदेश में अपना काम शुरू करेगी।

    कभी प्रशांत किशोर के साथ मिलकर भाजपा के लिए चुनाव की योजना बनाने सुनील को कांग्रेस ने कर्नाटक में चुनावी कैंपेन का काम सौंपा था। सुनील कनुगोलू ने यहां 4 महीने से अधिक समय रहकर चुनावी कैंपेन की प्लानिंग की और उनकी प्लानिंग के हिसाब से ही वहां कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार को अंजाम दिया ।

    इस टीम ने नारों से लेकर वरिष्ठ नेताओं के भाषण भी तैयार किए थे, जिसमें भाजपा द्वारा कांग्रेस पर किए गए हमलों का जवाब भी होता था। कांग्रेस के बलिदानी इतिहास का इसी टीम ने पूरा खाका तैयार कर बताया था कि किस तरह गांधी परिवार ने देश के लिए कुर्बानी दी। सुनील कनुगोलू 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की टीम के सदस्य थे । जिन्होंने भा ज पा और मोदी की पूरी रणनीति तैयार की थी। जिससे पहली बार देश में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा की सरकार बनी थी। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार को इसी टीम ने संभाला था और वहां दूसरी बार भाजपा ने लगातार सरकार बनाई थी । 2022 में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के रणनीतिकार भी यही टीम थी और अब खबर है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद जल्दी यह टीम मध्यप्रदेश आ रही है।

    हर सीट पर होगा फोकस

    कांग्रेस सूत्रों की माने तो मध्यप्रदेश में आने से पहले यह टीम प्रदेश की एक-एक सीट की जानकारी जुटा चुकी है। हर सीट पर सामाजिक और राजनीतिक संतुलन के लिए अलग से रणनीति बनाई जा रही है। बताया जाता है कि 130 सदस्यों वाली सुनील की टीम हर विधानसभा क्षेत्र का दौरा कर सबसे पहले लोगों का मन जानेगी और क्षेत्रीय समस्याओं के बारे में जानकारी जुटाएगी उसके बाद प्रदेश के चुनावी कैंपेन के मुद्दे और नेताओं के भाषण के प्रमुख बिंदु तय किए जायेंगे। इसके अलावा जिलों की रणनीति अलग से तय की जाएगी।

  • भाजपा पहली बार जिलों में नियुक्त करेगी प्रवक्ता

    भाजपा पहली बार जिलों में नियुक्त करेगी प्रवक्ता

    भोपाल// भारतीय जनता पार्टी आगामी चुनाव को लेकर अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए अब प्रत्येक जिले में प्रवक्ता नियुक्त करेगी। यह पहली बार होगा अभी सभी जिलों में मीडिया प्रभारी और सह मीडिया प्रभारी है लेकिन जिला प्रवक्ता नहीं है। गुरुवार को प्रदेश कार्यालय में आयोजित मीडिया विभाग की प्रदेश स्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया है। बैठक को पार्टी के प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव प्रदेश । अध्यक्ष एवं सांसद विष्णु दत्त शर्मा एवं प्रदेश संगठन मंत्री हितानंद ने संबोधित किया।

     बैठक में जिला प्रवक्ता ना होने की बात कही गई जिसमें सभी ने एक सुर से कहा कि विधानसभा चुनाव नजदीक होने के नाते पार्टी को प्रत्येक जिले में प्रवक्ता नियुक्त करने चाहिए जिससे कि पार्टी और संगठन के कार्यों की जानकारी मीडिया तक पहुंचा जा सके । इसको लेकर वरिष्ठ नेताओं ने सहमति जताई और जल्दी ही इनकी नियुक्ति करने की बात कहते हुए इसकी जवाबदारी प्रदेश मीडिया विभाग को सौंपी गई है।

     मुरलीधर राव ने कहा कि पार्टी अब चुनाव मोड में आ गई है इन चुनाव के लिए पार्टी ने अपने लक्ष्य किए हैं इनमें से एक 200 से ज्यादा सीटें हासिल करना दूसरा 51% वोट शेयर हासिल करना है। यह मीडिया विभाग की जिम्मेदारी है कि वह अपने स्तर पर पार्टी को इन लक्ष्य तक पहुंचाने के काम में सहभागी बने।

     प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने कहा कि मीडिया विभाग की छवि उसके चेहरे को उभारता है।  जनता में पार्टी के प्रति धारणा बनाता है। उन्होंने कहा कि विरोधियों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ को बेनकाब करना उनके, दुष्प्रचार और हथकंडे को पहचानना तथा डर्टी पॉलिटिक्स को पूरी ताकत से जवाब देना भी मीडिया विभाग की जिम्मेदारी है।

     नवनियुक्त प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने नई जिम्मेदारी के लिए संगठन का धन्यवाद करते हुए कहा कि  नवाचार पार्टी मीडिया टीम की प्राथमिकता रहेगी।

  • खरीद कर पानी पीने को मजबूर हैं विस्थापित गावों के आदिवासी ! अधिकारियों , ठेकेदार की मिलीभगत से करोड़ों का गोलमाल ?

    खरीद कर पानी पीने को मजबूर हैं विस्थापित गावों के आदिवासी ! अधिकारियों , ठेकेदार की मिलीभगत से करोड़ों का गोलमाल ?

    पुनीत दुबे

    इटारसी।  सतपुड़ा टाइगर रिर्जव क्षेत्र से विस्थापित  किए गए आदिवासी परिवार अपने आप को ठगा से महसूस कर रहे है, विस्थापित किए जाते वक्त इन आदिवासी परिवारों को जो लुभावने सपने दिखाए गए थे आज वे काफूर हो चुके हैं । हालत यह है कि विकास के नाम पर शासन से करोड़ों रूपए मिलने के बाद भी यहां रहने वाले लोगों को पीने के पानी तक की कीमत चुकानी पड़ रही है। ग्राम में पेयजल के लिए नलकूप खनन तो कराए गए लेकिन उनकी गुणवत्ता इतनी खराब थी की कुछ ही दिनों में नलकूपों ने दम तोड़ दिया। 

    अधिकारियों और ठेकेदार ने आदिवासियों से किया छलावा ?

    सतपुड़ा टाइगर रिर्जव क्षेत्र के विस्तारीकरण के तहत विभाग द्वारा रिजर्व क्षेत्र में बसे 4 ग्राम साकई, झालई, नया माना, खामदा को जमानी के पास तिलक सिंदूर मार्ग पर विस्थापित किया गया है । शासन की नीति के अनुसार विस्थापित किए गए ग्रामों में होने वाले सभी निर्माण और विकास कार्यो के साथ ही यहां रहने वाले परिवारों की सुविधाओं से जुड़े सभी कार्य विभाग को करवाना था।

    बताया जाता है कि गांव में रहने वाले लगभग 94 परिवारों की पेयजल व्यवस्था के लिए विभाग ने  सत्ताधारी दल से जुड़े एक प्रभावशाली व्यक्ति को नलकूप खनन का ठेका दिया था। लेकिन इस ठेकेदार दवारा अधिकारियों की मिली भगत के चलते नलकूप इतनी घटिया के खनन कराए गए कि उन्होने कुछ ही दिन में दम तोड़ दिया तथा कुछ नलकूप तो जमीन के अंदर ही समा गए। बताया जाता है कि गांव में लगभग 94 नलकूप का खनन किया गया था, जिसमें से लगभग डेढ़ दर्जन ही चल रहे है, शेष में कुछ बंद है और कुछ जमीन में समा गए।

     बताया जाता है कि नलकूप में घटिया स्तर की केसिंग डाली गई थी, जिसमें कारण अधिकांश नलकूप बंद हो गए। नलकूपो के बैठने के बाद यहां के लोग अब सिर्फ बरसाती फसल के भरोसे ही रह गए है। ग्रामीणों के अनुसार यदि नलकूप चलते तो वह और भी फसल का लाभ ले सकते थे। गांव के अमन, मुकेश, शिवन ने बताया कि इस समस्या को लेकर हमने अनेको बार शिकायत की है, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा।

    निजी नलकूप के भरोसे लोग

    गांव के इस  पेयजल संकट की स्थिति को देखते हुए कुछ लोगों ने  अपने निजी व्यय पर नलकूप का खनन कराया गया है, जिससे लोगों को पीने के लिए पानी उपलब्ध कराया जा रहा है, लेकिन इसके लिए ग्रामीणों को राशि का भुगतान करना पड रहा है। जिसमें हर घर से बिजली के बिल भुगतान के लिए यूनिट के हिसाब से राशि का विभाजन किया जाता है।

     कारगुजारी छिपाने में लगे हैं जिम्मेदार

    नया माना गांव के लोगों बताया  कि  गांव में व्याप्त इस समस्या को लेकर उन्होने अनेकों बार वन विभाग के अधिकारियों के सामने अपनी समस्या रखी, लेकिन अधिकारियों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। बताया जाता है कि नलकूप खनन के नाम पर हुई अनियमित्ता को छिपाने के लिए अब वन विभाग के अधिकारियों द्वारा ग्राम में नलजल योजना के तहत काम कराने पर विचार किया जा रहा है।

    रेंजर द्वारा नहीं ली गई सुध

    विस्थापित ग्रामों की देखरेख का जिम्मा वन परिक्षेत्र अधिकारी निशांत डोसी को सौंपा गया है। लेकिन अपने रूतबे के लिए मशहूर साहब यदाकदा ही विस्थापित ग्रामों का हाल जानने ग्रामों में जाते है, शेष समय तो साहब अपने भौंरा वाले घर पर ही आराम फरमाते रहते है। ग्रामीणों का कहना है कि रेंजर भी उनकी बातों को अनुसनुा कर देते है।

    क्या कह रहे हैं अधिकारी              

     बोर के अंदर कई  मोटर  फस गई है,   इस कारण उनके बोर बंद हो गए हैं प्रयास कर उन्हें ठीक  करवायेंगें. 

    संदीप फेलोस ,प्रभारी अधिकारी  सतपुड़ा नेशनल पार्क पचमढ़ी

    ग्रामीणों की व्यथा

    सन दो हजार अट्ठारह से हम इस गांव में आए हैं तभी से मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रही जिसमें पीने के पानी की समस्या बड़ी कठिन है यह हमें खरीदना पड़ता है और दूसरे मोहल्ले से पीने का पानी लाना पड़ता है।                   

     चतुर सिंह, नया माना तिलक सिंदूर रोड जमानी

  • आदिवासी सीटों पर गैर राजनीतिक चेहरों की तलाश में है कांग्रेस ?

    आदिवासी सीटों पर गैर राजनीतिक चेहरों की तलाश में है कांग्रेस ?

    भोपाल// नए राजनीतिक समीकरणों और नगरीय निकायों के अनुभव को देखते हुए नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस आदिवासी क्षेत्रों में नए चेहरे की तलाश कर रही है। पार्टी ने वरिष्ठ नेताओं को आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में ऐसे नए चेहरों को खोजने को कहा है जो राजनीतिक पृष्ठभूमि से ना आते हो पर सामाजिक तौर पर सक्रिय हों । कांग्रेस पिछली बार की तरह इस बार भी आदिवासी वर्ग की ज्यादा से ज्यादा सीट जीतने पर फोकस कर रही है।

    2018 में जब डेढ़ दशक बाद कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी तो उसका एक बड़ा कारण आदिवासी वर्ग का कांग्रेस को समर्थन मिलना था। कांग्रेस ने 47 आदिवासी सीटों में से 30 पर जीत हासिल की थी। पार्टी इस प्रदर्शन को फिर दोहराना चाहती है । दरअसल नगरीय निकाय चुनाव में पार्टी ने महापौर पद के लिए कई नए चेहरों को आजमाया था और उसके परिणाम भी सुखद रहे थे । पहली बार था कि कांग्रेस के 5 महापौर चुने गए । इस बार कांग्रेस द्वारा चुनावों में  जीत सुनिश्चित करने के लिए हर संभावनाओं पर काम किया जा रहा है । यही कारण है कि कांग्रेस ने 50 फ़ीसदीसीटों पर  प्रत्याशी के रूप में युवा ,अनुसूचित जाति जनजाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं को मैदान में उतारने की योजना बनाई है। वरिष्ठ नेताओं के अलावा सभी सहयोगी संगठनों, हर क्षेत्र के विशेषज्ञ गणमान्य और प्रभावशाली लोगों से सुझाव लिए जा रहे हैं । इतना ही नहीं सेवानिवृत्त अधिकारियों और आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले एनजीओ की मदद से उन व्यक्तियों की जानकारी जुटाई जा रही है जो चाहे राजनीतिक पृष्ठभूमि से ना हो सामाजिक रूप से सक्रिय और प्रतिष्ठित हो । इसमें सेवानिवृत्त अधिकारी ही नहीं वर्तमान अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।

    विगत चुनाव में जय युवा आदिवासी शक्ति संगठन (जयस) के संरक्षक डॉ हीरालाल अलावा को चुनाव लड़या था वह जीते थे । कांग्रेस ने 114 सीटें जीती थी जिनमें से 49 विधायक आरक्षित सीटों पर जीते थे। इसके बाद निकाय चुनाव में छिंदवाड़ा से विक्रम अहाके को महापौर पद के लिए मैदान में  उतारा था वह भी जीते। इसी को  कांग्रेस फिर दोहराना चाहती है।

    जयस की गतिविधियों पर दोनों पार्टी की नजर

    इधर दोनों ही राजनीतिक दल जय युवा आदिवासी शक्ति संगठन (जयस ) की गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं । जयस ने 80 विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशी उतारने की घोषणा की है। जाहिर है कि आदिवासी वोटों के बंटवारे का नुकसान दोनों दलों को होगा, क्योंकि 47 में से 30 सीटें अभी कांग्रेस के पास हैं, कांग्रेस इसमें कमी आने नहीं देना चाहती है। वहीं भाजपा ने भी आदिवासी क्षेत्रों में अपनी गतिविधि बढ़ाई है । शिवराज सरकार ने पेसा कानून लागू करके यह संदेश देने का काम किया है कि वह आदिवासी वर्ग की सबसे बड़ी हितेषी है।