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  • क्यों खतरे में हैं भाजपा के सत्तर विधायको की टिकट ?

    क्यों खतरे में हैं भाजपा के सत्तर विधायको की टिकट ?

    भोपाल//  मध्यप्रदेश में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा संगठन तक जो जमीनी फीडबैक आ रहा है वो परेशान करने वाला है। राज्य के कई दिग्गज नेताओं के लिए यह फीडबैक अच्छा नहीं है। यही कारण है कि तमाम दावेदारों की नींद उड़ी हुई है।

    खबर है कि इस बार भाजपा तीन  ने तीन सर्वे कराए हैं ।पार्टी के सूत्रों के अनुसार एक फीडबैक सर्वे राज्य स्तर पर हो हुआ है जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी की एक एजेंसी से  कराया गया है। दूसरा सर्वे केंद्रीय नेतृत्व कराया है। एक गुजराती कंपनी को यह जिम्मा सौंपा गया है। तीसरा फीडबैक सर्वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जमीनी स्तर पर सक्रिय स्वयंसेवकों के बीच कराया जा रहा है। इन सर्वे के फीडबैक से केन्द्रीय नेतृत्व को भी अवगत कराया है। बताया जाता है कि सर्वे ने भाजपा नेतृृत्व को चिंता में डाल दिया है।

    मीडिया रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए तो पांच महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्तर विधायकों के टिकट पर संकट के बादल छा गए हैं। पार्टी द्वारा कराए गए सर्वे में इन विधायकों का परफार्मेन्स ठीक नहीं आया है। इनमें से कई अपने क्षेत्र में बेहद निष्क्रिय पाए गए हैं। समय रहते विधायकों की छवि में सुधार न हुआ तो इनके टिकट काटे जा सकते हैं। इसके अलावा ख़बर यह भी है कि आधा दर्जन से अधिक विधायकों के टिकट सत्तर की उम्र पार होने के कारण बदले जाएंगे।

     मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  विधायकों के साथ वन टू वन में उन्हें यह सर्वे रिर्पोट दिखा भी चुके हैं और रिपोर्ट के आधार पर सामने आई कमियों को दूर करने का आग्रह इस चेतावनी के साथ कर चुके हैं कि वक्त है, संभल जाओं वर्ना फिर संभलने का मौका नहीं मिलेगा। संगठन सूत्रों की माने तो करीब तीन दर्जन विधायक ऐसे हैं जो क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय नहीं हैं। इन सालों में इनकी छवि भी पहले जैसी नहीं रही है। बताया जाता है कि सर्वे के दौरान कुछ विधायकों के बारे में जिले के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ही खुलकर विपरीत टिप्पणियां की हैं । इनमें उप चुनाव जीत कर आए ज्योतिरादित्य सिंधिया  के समर्थक मंत्री और विधायक भी शामिल हैं।

    सत्तर पार पर संकट की चर्चा ?

    भाजपा में इस समय करीब तीन दर्जन से अधिक ऐसे विधायक हैं जो तीन और चार बार से लगातार विधायक हैं। इसके अलावा पांच या उससे अधिक बार के विधायकों की संख्या भी एक दर्जन के करीब है। सूत्रों की माने तो ऐसे विधायक जो चार बार से विधायक हैं और उनकी उम्र सत्तर को पार कर रही है, उनके टिकट कट सकते हैं। संगठन इस बारे में नीति तैयार कर रहा है। इसके अलावा कुछ विधायकों के टिकट काट कर उनके परिजन को चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। गौरतलब है कि भाजपा के अभी 126 विधायक हैं। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 148 सामान्य हैं, इसके अलावा 47 अनुसूचित जनजाति और 35 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। सूत्रों की माने तो प्रदेश कार्यसमिति के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल, प्रदेश संगठन प्रभारी मुरलीधर राव, प्रदेश अध्यक्ष वी डी शर्मा, संगठन महामंत्री हितानंद के बीच लंबी मंत्रणा हुई है। इसमें प्रदेश के हर जिले का दौरा कर चुके अजय जामवाल ने भी सीएम को विधायकों को लेकर मिले फीडबैक की जानकारी दी गई, उन्होंने फीडबैक से केन्द्रीय नेतृत्व को भी अवगत कराया है।

    पिछली बार कुछ यूं हुआ था

    भाजपा ने 2018 के विधानसभा चुनावों में पांच मंत्रियों समेत 54 विधायकों के टिकट काटे थे। पिछली बार हुए सर्वे में भी पार्टी के सत्तर विधायकों का प्रर्दशन अच्छा नही माना गया  था। जिन पांच मंत्रियों के टिकट काटे गए थे उनमें कुसुम मेहदेले, डाक्टर गौरीशंकर शेजवार, माया सिंह, सूर्यप्रकाश मीणा और हर्ष सिंह शामिल थे। इनमें शेजवार और हर्ष सिंह के स्थान पर उनके पुत्रों को टिकट दिया गया था।

  • दिग्विजय की सक्रियता से भयभीत है भाजपा ?

    दिग्विजय की सक्रियता से भयभीत है भाजपा ?

    भोपाल // वैसे तो प्रदेश में नबंबर  में होने वाले विधान सभा चुनाव में भाजपा के लिए हिंदुत्व मुख्य मुद्दा है, पर वह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल की कमियों को जनता के बीच उजागर करने की भी तैयारी कर रही है और उसे 2003 के दिग्विजय शासन बनाम शिवराज शासन के रूप में पेश करना चाहती है। चुनाव की तैयारी में सब कुछ झोंक देने को आतुर भाजपा ने पिछले दिनों प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में यह लिया गया है । यह निर्णय भाजपा खेमे की घबराहट को दर्शाता है।

    प्रदेश में पिछले 20 साल से भाजपा सत्ता में( इस बार के 18 महीने छोड़ कर) है तो ऐसे में अपनी सरकार की उपलब्धियों पर स्वतंत्र रूप से वोट ना मांग कर शिवराज सरकार की तुलना दिग्विजय सिंह सरकार की कोशिश को क्या कहा जाए?

    राजधानी की राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि अभी तक कमलनाथ के 18 महीने के कार्यकाल को कटघरे में खड़ा कर रही भाजपा का चुनाव के 6 महीने पहले पूर्व मुख्मंयत्री के दो दशक पुराने कार्यकाल को निशाना बनाने का फैसला यूं हीं नहीं है। राजनीतिक पंडितों और भाजपा सूत्रों के आधार पर कहा जा सकता है कि जिस तरह की खबरें आ रही हैं , कि एंटी इंकम्बेंसी के चलते प्रदेश में कांग्रेस सरकार बना सकती है। भाजपा फिलहाल इसकी कोई मजबूत काट नहीं ढूंढ पाई है, और वह अपनी जीत के लिए दिग्विजय सिंह को कारगर मान रही है।

    वैसे तो दिग्विजय सिंह हमेशा से ही भाजपा के निशाने पर रहते आए हैं, क्योंकि आमतौर पर उनकी तल्ख टिप्पणियां भाजपा और आरएसएस को नाराज करती रही हैं। भाजपा उन्हें मि. बंटाधार के रूप में प्रचारित करती रही है। उनके बयान भाजपा को कई बार धार्मिक ध्रुवीकरण करने में मदद कर चुके हैं, जिसका भाजपा चुनाव में फायदा भी उठा कर चुकी है । जानकारों का यह भी कहना है कि दिग्विजय सिंह के पूरे प्रदेश में समर्थक हैं , उनका विरोध करने पर पूरे प्रदेश से प्रतिक्रिया होती है ,जिससे स्थानीय स्तर पर भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं।  इस तरह से वे राष्ट्रीय स्तर के नेता का विरोध करने का मौका पाए जाते हैं। इसलिए दिग्विजय का विरोध भाजपा को ज्यादा फायदेमंद लगता है।

    दिग्विजय की सक्रियता से चिंता ?

    इसके अलावा इस बार कांग्रेस आलाकमान लगातार हार रही लगभग 70 सीटों पर फोकस कर रही है और उसमें से लगभग सभी सीटों पर दावेदारी मजबूत करने की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह को दी गई है। दिग्विजय सिंह पूरी सक्रियता के साथ लगातार इन क्षेत्रों में जाकर कार्यकर्ताओं, नेताओं से बात कर जमीनी हकीकत को जान परख रहे  हैं । उनकी इस कोशिश से कार्यकर्ताओं में उत्साह है और अनेक स्थानों पर जहां पार्टी मृत अवस्था में थी वहां भी कुछ सुगबुगाहट नजर आने लगी है। दिग्विजय सिंह के विरोधी भी उनकी नेतृत्व और संगठन क्षमता एहतराम करते रहे हैं। प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को दिग्विजय की सक्रियता ने चिंतित और भयभीत कर दिया है और उन्हें लगता है कि कहीं दिग्विजय की मेहनत भाजपा के सपनों को ध्वस्त न कर दे।  इसीलिए चुनाव में उनका फोकस कमलनाथ से हटकर दिग्विजय पर हो गया है।

    भाजपा की यह कोशिश दिग्विजय के राजनीतिक कौशल को एक तरह से स्वीकार करती लगती है।

  • व्यापारी क्यों चाहते हैं कि आप अरहर की दाल छोड़ दें और दूसरी दालें खाएं ?

    व्यापारी क्यों चाहते हैं कि आप अरहर की दाल छोड़ दें और दूसरी दालें खाएं ?

    नई दिल्ली// व्यापारी चाहते हैं कि बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए आप अरहर की जगह मसूर, मूंग, चना और पीली मटर जैसी अन्य दालों का इस्तेमाल करें। अरहर व्यापारियों ने सरकार से मांग की है कि उपभोक्ताओं को तुवर दाल के अलावा चना मसूर मूंग और पीली मटर जैसी अन्य डालें खाने के बारे में शिक्षित करने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान शुरू किया जाए। व्यापारियों का मानना है कि उपभोक्ता वरीयता में बदलाव को प्रभावित करके अरहर की मांग को कम करना आवश्यक है क्योंकि मांग को पूरा करने के लिए देश में तुअर का पर्याप्त उत्पादन नहीं हो रहा है। जबकि अन्य दालें सस्ती दरों पर काफी मात्रा में उपलब्ध हैं। 
    सरकारी आंकड़ों के अनुसार तूुअर की खुदरा कीमतें, जिसे अरहर दाल भी कहा जाता है, 27 फीसदी बढ़ी हैं और पिछले छह महीनों में 10 फीसदी बढ़ी हैं। दिल्ली में मौजूदा कीमत 132 रुपये किलो है जबकि औसत कीमत 119 रुपये किलो है। दिल्ली में खुदरा अरहर दाल की कीमतों में पिछले पांच वर्षों में 60% के करीब वृद्धि हुई है। उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं रहा है और सबसे अधिक बिकने वाली दाल का थोक मूल्य लगभग 60% बढ़ गया है।
    एक सरकारी अनुमान के अनुसार, भारत का 2022-23 अरहर का उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में 14% कम होना चाहिए। उद्योग को उम्मीद है कि गिरावट 20% से अधिक होगी।उत्पादन में कमी का कारण बेमौसम बारिश है।

    भारतीय दलहन और अनाज संघ (आईपीजीए) ने अरहर के विकल्प के रूप में मसूर, मूंग, चना और पीली मटर जैसी दालों की खपत को बढ़ावा देने के लिए खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के साथ एक संयुक्त अभियान का प्रस्ताव दिया है।
    एगमार्कनेट के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र के लातूर थोक बाजार में असंसाधित अरहर की औसत कीमत एक साल पहले इसी तारीख को 60 रुपये किलो से बढ़कर बुधवार को 90 रुपये किलो हो गई, जो 50% अधिक है। जनवरी में नई फसल की कटाई शुरू होने के बाद से पिछले चार महीनों में कीमतों में 24% की वृद्धि हुई है।
    “भारत के तुअर उत्पादन में भारी गिरावट आई है, जबकि तूर की मांग बरकरार है। केंद्र सरकार के साथ हमारी हालिया बैठक में, हमने अधिकारियों को सूचित किया है कि आईपीजीए अन्य दालों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए सरकार के साथ एक अभियान चलाने के लिए तैयार है। आईपीजीए के अध्यक्ष बिमल कोठारी ने कहा, जिसमें अरहर के बराबर या बेहतर प्रोटीन सामग्री है।
    घरेलू मांग और आपूर्ति में अंतर को पूरा करना आयात के माध्यम से भी संभव नहीं होगा। भारत के बाहर, तुअर केवल म्यांमार और कुछ देशों में उपलब्ध है। पूर्वी अफ्रीका में, जो उन्हें केवल भारतीय बाजार के लिए उगाते हैं।
    कोठारी ने कहा, “मौजूदा मांग को पूरा करने के लिए अरहर की आपूर्ति का प्रबंध करना संभव नहीं है। म्यांमार में सिर्फ एक लाख टन अरहर बचा है, जबकि पूर्वी अफ्रीका से हमें तुअर की खेप सितंबर में ही मिल सकती है।” .
    उन्होंने कहा कि लोग मसूर, चना, पीली मटर और मूंग जैसी दालों का विकल्प चुन सकते हैं, जो कम दरों पर भी उपलब्ध हैं।
    2010 में, नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (नेफेड) ने आयातित पीली मटर को मुख्य दाल के रूप में बढ़ावा देने के लिए एक अभियान चलाया था, जब स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली लगभग सभी दालों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई थी। उस समय तक बेसन बनाने के लिए चने में मिलाने के लिए पीली मटर आयात की जाती थी।
    आईपीजीए ने यह भी सुझाव दिया है कि केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी कल्याणकारी योजनाओं के तहत आपूर्ति के लिए खुले बाजार से तूर खरीदना बंद कर देना चाहिए। कोठारी ने कहा, “दालें, जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और सस्ती हैं, का उपयोग सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में किया जाना चाहिए।”
    अफ्रीकी अरहर
    व्यापारियों के अनुसार, अफ्रीका में तुअर की कीमतें, भारत को जिंसों की एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता, आगे के व्यापार में 25% अधिक खुली हैं। मयूर ग्लोबल कॉरपोरेशन के वाइस प्रेसिडेंट (सेल्स) हर्षा राय ने कहा, “अफ्रीकी तुअर के लिए वायदा कारोबार पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 25% अधिक है।”
    अफ्रीकी फसल, जो भारत के लिए उगाई जाती है और जुलाई/अगस्त में काटी जाती है, अगस्त से नवंबर तक त्योहारी सीजन के दौरान तुअर दाल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि देश तुअर की कमी का सामना कर रहा है। राय ने कहा, ‘हालांकि, भारतीय बाजारों में अरहर की कीमतों में पिछले सप्ताह तेजी आने के कारण अफ्रीकी अरहर के वायदा अनुबंधों ने विराम ले लिया है। आयातक कटाई की अवधि तक इंतजार करना पसंद कर सकते हैं, क्योंकि आवक का दबाव कीमतों में नरमी ला सकता है।

    भारत सरकार पहले ही म्यांमार में व्यापारियों को अरहर और उड़द की जमाखोरी के प्रति आगाह कर चुकी है। इसने चेतावनी दी कि अगर म्यांमार में व्यापारियों ने दालों की जमाखोरी की तो वह सरकार से सरकार खरीद का सहारा ले सकती है।

    ( इकोनॉमिक टाइम्स के आधार पर)

  • अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सच साबित हुआ दिल्‍ली के सीएम का डर !

    अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सच साबित हुआ दिल्‍ली के सीएम का डर !

    केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार फिर उपराज्यपाल को सौंप दिए

    नई दिल्ली// देश की राजधानी में अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल का डर सच साबित हुआ है।दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को अधिकारियों के तबादले का अधिकार मिले अभी आठ दिन ही हुए थे कि केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये यह अधिकार फिर उपराज्यपाल को सौंप दिए। दिल्‍ली के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लाई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इसे लाया गया है। केजरीवाल का दावा है कि इसके जरिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की साजिश की गई है। शीर्ष अदालत ने ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला दिया था। अध्‍यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण के गठन की बात कही गई है। अध्‍यादेश कहता है क‍ि ट्रांसफर-पोस्टिंग और विजिलेंस का काम राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण (NCCSA) देखेगा।
    मुख्यमंत्री प्राधिकरण के पदेन अध्यक्ष होंगे, जबकि दिल्ली के प्रधान गृह सचिव पदेन सदस्य-सचिव होंगे।
    यही प्राधिकरण सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर तबादले की सिफारिश करेगा, पर आखिरी फैसला दिल्ली के उपराज्यपाल का होगा। मुख्यमंत्री तबादले का फैसला अकेले नहीं कर सकेंगे।दानिक्स कैडर के समूह-ए अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए भी यही प्राधिकरण अधिकृत होगा। केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये 11 मई के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें तबादले-नियुक्ति का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया था। बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा था, उपराज्यपाल राज्य कैबिनेट के फैसले को मानने के लिए बाध्य हैं। वे कैबिनेट के फैसले में बदलाव नहीं कर सकते। इस फैसले के बाद केंद्र सरकार ने अब अध्यादेश जारी कर उपराज्यपाल को पहले की तरह फिर से असीमित शक्तियां दे दीं। 
    यह दिया तर्क
    केंद्र सरकार ने अध्यादेश में इस फैसले की वजह बताई है…इसमें कहा गया है कि दिल्ली की स्थिति बेहद खास है। यहां कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थान और प्राधिकारी जैसे राष्ट्रपति, संसद, सुप्रीम कोर्ट मौजूद हैं। विदेशी राजनयिकों का आगमन होता रहता है। इसलिए यहां प्रशासन में उच्च गुणवत्ता का होना राष्ट्रीय हित में है।

    अध्यादेश को लेकर केजरीवाल ने पहले ही जताया था अंदेशा
    केंद्र द्वारा लाए गए अध्यादेश को लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शाम को पहले ही अंदेशा जताया था। उन्होंने ट्वीट कर लिखा था, एलजी साहिब सुप्रीम कोर्ट के आदेश क्यों नहीं मान रहे? दो दिन से सर्विसेज़ सेक्रेटरी की फाइल साइन क्यों नहीं की? कहा जा रहा है कि केंद्र अगले हफ्ते आर्डिनेंस लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने वाली है? क्या केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने की साजिश कर रही है? क्या एलजी साहिब आर्डिनेंस का इंतजार कर रहे हैं, इसलिए फाइल साइन नहीं कर रहे?

    अध्यादेश पर लेनी होगी संसद की मंजूरी
    केंद्र सरकार को संसद के मानसून सत्र में इस अध्यादेश पर लोकसभा व राज्यसभा की मंजूरी लेनी होगी। राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं है। वहां विपक्षी पार्टियां इसे लेकर एकजुट हो सकती हैं।

    अध्यादेश से संघवाद को नुकसान : सिंघवी 
    सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली सरकार के वकील रहे अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्वीट कर इस अध्यादेश को बेहद खराब तरीके से बनाया गया करार दिया। उन्होंने लिखा, अध्यादेश जिस व्यक्ति ने तैयार किया है उसने बेहद आसानी से कानून की अवहेलना की है। सिविल सेवा पर दिल्ली सरकार को अधिकार संविधान पीठ ने दिया था जिसे अध्यादेश के जरिये पलट दिया गया। संघवाद संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है जिसे नुकसान पहुंचाया गया है। चुनी हुई सरकार के प्रति अधिकारियों की जवाबदेही को सिर के बल पलट दिया गया। अरविंद केजरीवाल ने सिंघवी के इस ट्वीट को रीट्वीट किया है।
     सौरभ भारद्वाज का केंद्र पर हमला
    दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि केंद्र यह अध्यादेश हार से बौखलाकर लेकर आई है। केंद्र ने संविधान से छल किया है। 

    ‘दिल्ली देश की राजधानी है, पूरे भारत का इस पर अधिकार’
    दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष वीरेन्द्र सचदेवा ने कहा है कि दिल्ली देश की राजधानी है, पूरे भारत का इस पर अधिकार है और गत काफी समय से दिल्ली की प्रशासकीय गरिमा को स्थानिय अरविंद केजरीवाल सरकार ने ठेस पहुंचाई है। दिल्ली में विश्व के हर देश के राजदूत रहते हैं और यहां जो कुछ प्रशासकीय अनहोनी होती है उससे विश्व भर में भी भारत की गरिमा खराब होती है।केंद्र सरकार जो अध्यादेश लाई है भारतीय जनता पार्टी उसका स्वागत करती है। 

    आतिशी ने बताया सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना

    केंद्र सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है वह सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ की साफ अवमानना है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि चुनी हुई सरकार के पास निर्णय लेने की ताकत होनी चाहिए। यही लोकतंत्र है, यही लोकतंत्र का सम्मान है। लेकिन आज सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है वो हार के डर से, केजरीवाल सरकार को पावर देने के डर से लेकर आई है। केंद्र सरकार केजरीवाल से डरी हुई है और यह अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना है। 

  • अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सच साबित हुआ दिल्‍ली के सीएम का डर !

    अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सच साबित हुआ दिल्‍ली के सीएम का डर !

    केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार फिर उपराज्यपाल को सौंप दिए

    नई दिल्ली// देश की राजधानी में अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल का डर सच साबित हुआ है।दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को अधिकारियों के तबादले का अधिकार मिले अभी आठ दिन ही हुए थे कि केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये यह अधिकार फिर उपराज्यपाल को सौंप दिए। दिल्‍ली के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लाई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इसे लाया गया है। केजरीवाल का दावा है कि इसके जरिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की साजिश की गई है। शीर्ष अदालत ने ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला दिया था। अध्‍यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण के गठन की बात कही गई है। अध्‍यादेश कहता है क‍ि ट्रांसफर-पोस्टिंग और विजिलेंस का काम राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण (NCCSA) देखेगा।
    मुख्यमंत्री प्राधिकरण के पदेन अध्यक्ष होंगे, जबकि दिल्ली के प्रधान गृह सचिव पदेन सदस्य-सचिव होंगे।
    यही प्राधिकरण सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर तबादले की सिफारिश करेगा, पर आखिरी फैसला दिल्ली के उपराज्यपाल का होगा। मुख्यमंत्री तबादले का फैसला अकेले नहीं कर सकेंगे।दानिक्स कैडर के समूह-ए अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए भी यही प्राधिकरण अधिकृत होगा। केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये 11 मई के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें तबादले-नियुक्ति का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया था। बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा था, उपराज्यपाल राज्य कैबिनेट के फैसले को मानने के लिए बाध्य हैं। वे कैबिनेट के फैसले में बदलाव नहीं कर सकते। इस फैसले के बाद केंद्र सरकार ने अब अध्यादेश जारी कर उपराज्यपाल को पहले की तरह फिर से असीमित शक्तियां दे दीं। 
    यह दिया तर्क
    केंद्र सरकार ने अध्यादेश में इस फैसले की वजह बताई है…इसमें कहा गया है कि दिल्ली की स्थिति बेहद खास है। यहां कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थान और प्राधिकारी जैसे राष्ट्रपति, संसद, सुप्रीम कोर्ट मौजूद हैं। विदेशी राजनयिकों का आगमन होता रहता है। इसलिए यहां प्रशासन में उच्च गुणवत्ता का होना राष्ट्रीय हित में है।

    अध्यादेश को लेकर केजरीवाल ने पहले ही जताया था अंदेशा
    केंद्र द्वारा लाए गए अध्यादेश को लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शाम को पहले ही अंदेशा जताया था। उन्होंने ट्वीट कर लिखा था, एलजी साहिब सुप्रीम कोर्ट के आदेश क्यों नहीं मान रहे? दो दिन से सर्विसेज़ सेक्रेटरी की फाइल साइन क्यों नहीं की? कहा जा रहा है कि केंद्र अगले हफ्ते आर्डिनेंस लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने वाली है? क्या केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने की साजिश कर रही है? क्या एलजी साहिब आर्डिनेंस का इंतजार कर रहे हैं, इसलिए फाइल साइन नहीं कर रहे?

    अध्यादेश पर लेनी होगी संसद की मंजूरी
    केंद्र सरकार को संसद के मानसून सत्र में इस अध्यादेश पर लोकसभा व राज्यसभा की मंजूरी लेनी होगी। राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं है। वहां विपक्षी पार्टियां इसे लेकर एकजुट हो सकती हैं।

    अध्यादेश से संघवाद को नुकसान : सिंघवी 
    सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली सरकार के वकील रहे अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्वीट कर इस अध्यादेश को बेहद खराब तरीके से बनाया गया करार दिया। उन्होंने लिखा, अध्यादेश जिस व्यक्ति ने तैयार किया है उसने बेहद आसानी से कानून की अवहेलना की है। सिविल सेवा पर दिल्ली सरकार को अधिकार संविधान पीठ ने दिया था जिसे अध्यादेश के जरिये पलट दिया गया। संघवाद संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है जिसे नुकसान पहुंचाया गया है। चुनी हुई सरकार के प्रति अधिकारियों की जवाबदेही को सिर के बल पलट दिया गया। अरविंद केजरीवाल ने सिंघवी के इस ट्वीट को रीट्वीट किया है।
     सौरभ भारद्वाज का केंद्र पर हमला
    दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि केंद्र यह अध्यादेश हार से बौखलाकर लेकर आई है। केंद्र ने संविधान से छल किया है। 

    ‘दिल्ली देश की राजधानी है, पूरे भारत का इस पर अधिकार’
    दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष वीरेन्द्र सचदेवा ने कहा है कि दिल्ली देश की राजधानी है, पूरे भारत का इस पर अधिकार है और गत काफी समय से दिल्ली की प्रशासकीय गरिमा को स्थानिय अरविंद केजरीवाल सरकार ने ठेस पहुंचाई है। दिल्ली में विश्व के हर देश के राजदूत रहते हैं और यहां जो कुछ प्रशासकीय अनहोनी होती है उससे विश्व भर में भी भारत की गरिमा खराब होती है।केंद्र सरकार जो अध्यादेश लाई है भारतीय जनता पार्टी उसका स्वागत करती है। 

    आतिशी ने बताया सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना

    केंद्र सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है वह सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ की साफ अवमानना है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि चुनी हुई सरकार के पास निर्णय लेने की ताकत होनी चाहिए। यही लोकतंत्र है, यही लोकतंत्र का सम्मान है। लेकिन आज सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है वो हार के डर से, केजरीवाल सरकार को पावर देने के डर से लेकर आई है। केंद्र सरकार केजरीवाल से डरी हुई है और यह अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना है। 

  • भारत में धनी कहलाने के लिए कितने रूपये चाहिए ?

    भारत में धनी कहलाने के लिए कितने रूपये चाहिए ?

    देश सबसे अमीर 1% में शामिल होने के लिए शामिल होने का आंकड़ा बताती है वेल्थ रिपोर्ट -2023

    नई दिल्ली // हिंदी की प्रसिद्ध फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन का एक बड़ा ही मशहूर डायलाग  है ‘मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है।’  जो फिल्म के दृश्य में वे अपनी हैसियत या अपने को अमीर बताने के लिए बोलते हैं, लेकिन वह सिर्फ अमीर होना है । हर अमीर देश के रिची रिच क्लब (एक फीसदी अमीर लोग ) में शामिल नहीं है . देश के सबसे आमिर एक प्रतिशत लोगों में शामिल होने पर ही आप रिची रिच कहला सकेंगें  और उसका हिस्सा बनने के लिए आपके पास कितना पैसा होना चाहिए?   

    ग्लोबल रियल एस्टेट कंसल्टेंसी नाइट फ्रैंक की वेल्थ रिपोर्ट इसका जबाब देती है । फर्म ‘वेल्थ रिपोर्ट 2023’ सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया भर और भी कई देशों में किसी व्यक्ति को ‘रिची रिच’ क्लब का हिस्सा बनने के लिए कितनी रकम जरूरत है यह बताती है.

    बुधवार को जारी वेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 1% सबसे अमीर लोगों में शामिल होने के लिए सिर्फ 175,000 डॉलर (1.44 करोड़ रुपये) नेटवर्थ की जरूरत है। यह राशि अन्य देशों के 1% क्लब में प्रवेश बिंदु से बहुत कम है, भले ही भारत में अमीर लोगों की आबादी में तेजी से बढ़ रही है।

     मोनाको में,  एक ऐसा देश जो भारत के किसी महानगर के एक हिस्से से भी छोटा होगा और जहां दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों की आबादी सबसे अधिक है, 1% क्लब के प्रवेश में प्रवेश के लिए कम से कम 12.4 मिलियन डॉलर (102 करोड़) की सम्पत्ति  की जरूरत है. जो भारत के मुकाबले 160 गुना ज्यादा है . नाइट फ्रैंक की सूची में अगले दो देश स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया हैं। इन दो देशों के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों में शामिल  होने के लिए  स्विट्ज़रलैंड में 6.6 मिलियन डॉलर (54 करोड़ रुपये) की आवश्यकता होती है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में यह रकम 5.5 मिलियन डॉलर (45 करोड़ रुपये) है।

    एशिया महाद्वीप  की बात करें तो सिंगापुर में 3.5 मिलियन डॉलर  (28 करोड़ रु.) की आवश्यकता है। इसके बाद हांगकांग में 3.4 मिलियन डॉलर है। चीनी में, जिसकी जनसंख्या की तुलना भारत से की जा सकती है, 1% क्लब का आंकड़ा 960,000 डालर आंका गया है। लगभग 25 देशों की इस सूची में भारत का 22 वां स्थान है ,उसे दक्षिण अफ्रीका, फिलीपींस और केन्या से पहले रखा गया था।

    संयोग से, मोनाको में अमीर कहलाने का आंकड़ा (प्रवेश बिंदु) केन्या के 200 गुना से अधिक है – जो स्पष्ट रूप से देशों के बीच बढ़ती आय असमानता की खाई को उजागर करता है।

    लैटिन अमेरिका में, ब्राजील में 430,000 डॉलर (लगभग 3.5 करोड़ रुपये) की उच्चतम सीमा है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए सीमा 5.1 मिलियन डॉलर (लगभग 42 करोड़ रुपये) है । मध्य पूर्व में, सबसे अधिक 1.6 मिलियन डॉलर (13 करोड़ रुपये) की सीमा के साथ संयुक्त अरब अमीरात है । संयोग से, मोनाको में रिच क्लब का प्रवेश बिंदु केन्या के 200 गुना से अधिक है – जो स्पष्ट रूप से देशों के बीच बढ़ती आय असमानता की खाई को उजागर करता है। हाल के दिनों में कोविड महामारी के साथ-साथ वैश्विक मुद्रास्फीति में वृद्धि के कारण अमीर और गरीब देशों के बीच की खाई चौड़ी हो गई है। ।

    भारत में अरबपतियों की संख्या बढ़ी

    भारत के अमीर बढ़ रहे हैं . नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNI) की संख्या – जिनकी संपत्ति का मूल्य 1 मिलियन डॉलर या उससे अधिक है – अगले पांच वर्षों में 108 प्रतिशत की भारी वृद्धि के साथ 1.7 मिलियन डॉलर हो जाएगी। 2022 में देश में एचएनआई की संख्या 797,714 थी।

    रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया है कि भारत के अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल (UHNWIs) – जिनकी कुल संपत्ति 30 मिलियन डॉलर से अधिक है – 58.4 प्रतिशत की दर से बढ़ने वाली है । रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल की संख्या 2022 में 12,069 से बढ़कर 19,119 और 2027 तक होनी थी। भारत के अरबपतियों की संख्या भी मौजूदा 161 अरबपतियों से बढ़कर 195 होने की उम्मीद है। यह प्रवृत्ति दुनिया भर के परिदृश्य के ठीक विपरीत है। नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक यूएचएनआई आबादी में पिछले साल 3.8 फीसदी की गिरावट आई है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक स्तर पर अरबपतियों की संख्या भी 5 प्रतिशत घटकर 2,629 रह गई।

    दुनिया में अमीर गरीब की खाई बढती जा रही है ,श्रम ,बुद्धि या विवेक से ज्यादा नई व्यवस्था में पैसा काम पर लग रहा है .

  • नर्मदापुरम में भाजपा से आने वाले किसी नेता को टिकट नहीं देगी कांग्रेस-दिग्विजय

    नर्मदापुरम में भाजपा से आने वाले किसी नेता को टिकट नहीं देगी कांग्रेस-दिग्विजय

    दिग्विजय सिंह ने किया दावा-कांग्रेस प्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी

    इटारसी// कांग्रेस नर्मदापुरम (होंशगाबाद)क्षेत्र में भाजपा से आने वाले किसी व्यक्ति को टिकट नहीं देगी। टिकट कांग्रेस के व्यक्ति को ही मिलेगा। पिछली बार सरताज सिंह की टिकट को छोड़ दें ,तो हमेशा कांग्रेस के व्यक्ति को ही टिकट मिला है। यह बात पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने गुरुवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए कही।

     दिग्विजय सिंह यहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं और मंडल सेक्टर अध्यक्षों की बैठक में भाग लेने पहुंचे थे । इटारसी की एक्सप्रेसइलेवन में आयोजित इस बैठक के पूर्व श्री सिंह ने पत्रकार वार्ता को संबोधित किया।

     यह पूछे जाने पर कि क्षेत्र में चर्चा है कि भाजपा का कोई नेता कांग्रेस में शामिल होने वाला है और उसे टिकट दिया जा सकता है? दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस बात में कोई दम नहीं है। उन्होंने कांग्रेस की टिकट प्रक्रिया तो बताते हुए कहा कि जिला एवं प्रदेश कांग्रेस कमेटी नाम प्रस्तावित करेगी ,एआईसीसी की स्क्रीनिंग कमेटी और सेंट्रल स्क्रीनिंग कमेटी नाम तय करेगी। यह पूछे जाने पर भी यह पूछे जाने पर कि क्या पार्टी किसी नए चेहरे को मैदान में उतार सकती है? तो दिग्विजय ने कहा कि यह पार्टी तय करेगी चेहरा नया हो या पुराना इतना जरूर है कि इस बार चुनाव हम मिलकर लड़ेंगे और गुटबाजी समाप्त होगी।

    दिग्विजय सिंह ने किया दावा-

    कांग्रेस प्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी

    पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने दावा किया है कि इस बार कांग्रेस मध्यप्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी,  कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव लड़ेगी। हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि प्रदेश की जनता शिवराज सिंह सरकार से नाराज है भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है पूरे प्रदेश को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाया जा रहा है जिसमें शिवराज और कांग्रेस से गए महाराज हिस्सेदार हैं। हर काम में हिस्सेदारी मांगी जा रही है।

  • लगातार हार रही सीटों पर कांग्रेस तीन महीने पहले ही तय कर सकती है उम्मदीवारों के नाम !

    लगातार हार रही सीटों पर कांग्रेस तीन महीने पहले ही तय कर सकती है उम्मदीवारों के नाम !

    भोपाल// साल के अंत में होने वाले चुनाव में कांग्रेस लगातार हार रही सीटों पर फोकस कर रही है अब कांग्रेसमें इस तरह की सीटों पर पहले से उम्मीदवार घोषित करने की समय सीमा तय कर दिया बताया जाता है कि पार्टी लगातर हार रही या कम अंतर से हारी सीटों पर 3 महीने पहले ही उम्मीदवारों के नाम घोषित कर सकती है।

     इसकी वजह यह बताई जा रही है कि इससे उम्मीदवारों को जमीनी स्तर पर काम करने और प्रचार-प्रसार का भरपूर समय मिलेगा। साथ ही पार्टी को यह भी लग रहा है कि इस बार टिकट न मिलने पर कुछ नेता बगावत कर सकते हैं, उन्हें बैठाने, दावेदारी वापस लेने व मनाने के लिए भी पार्टी को वक्त मिलेगा।

    कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ पहले ही सर्वे रिपोर्ट के आधार पर टिकट देने की बात करते रहे हैं। बताया जाता है कि दो सर्वे कराए भी जा चुके हैं और कमलनाथ और दिग्विजय सिंह लगातार विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं और हारी हुई सीटों की जमीनी हकीकत जानने और कार्यकर्ताओं का फीडबैक लेने में लगे हुए हैं।वही आईसीसी द्वारा नियुक्त ऑब्जर्वर भी रिपोर्ट के आधार पर सभी पहलुओं को देखकर पार्टी टिकट का निर्णय करेगी।

    आधार पर तैयार होगी ऑब्जर्वर की रिपोर्ट

    बताया जा रहा है कि पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ के द्वारा दो सर्वे कराए गए हैं। यह सर्वे रिपोर्ट ऑब्जर्वर को सौंप दी गई है। ऑब्जर्वर ऐसे 70 विधानसभा क्षेत्रों की मैदानी स्थिति को देखेंगे । साथ ही सर्वे में जिनके नाम आए हैं उनकी स्थिति जमीनी तौर पर कैसी है? जीत सकते हैं कि नहीं ? जिनके नाम आए हैं उनसे भी चर्चा की जाएगी । इसके अलावा पार्टी के कार्यकर्ता वरिष्ठ नेता और मतदाताओं का रुझान भी लिया जाएगा। ऑब्जर्वर एक विधानसभा में 1 दिन बिताएंगे।

  • लव मैरिज से हो रहे हैं हैं सबसे ज्यादा तलाक, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कही ये बात ?

    लव मैरिज से हो रहे हैं हैं सबसे ज्यादा तलाक, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कही ये बात ?

     सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि ज्यादातर तलाक लव मैरिज से ही हो रहे हैं। जस्टिस बीआर गवई और संजय करोल की पीठ ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़ी ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई करते वक्त यह बात कही।
    नई दिल्ली// लव मैरिज (Love Marriage) से तलाक की नौबत आ रही है। यह हम नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा। दरअसल, कोर्ट की जस्टिस बीआर गवई और संजय करोल की पीठ वैवाहिक विवाद से जुडी ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामले के एक वकील ने कोर्ट को सूचित किया कि यह विवाह एक प्रेम विवाह था।
    न्यायमूर्ति गवई ने जवाब देते हुए कहा कि ज्यादातर तलाक लव मैरिज से ही हो रहे हैं। कोर्ट ने कपल को मेडिटेशन की सलाह दी थी, जिसका पति ने विरोध किया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि हाल के एक फैसले के मद्देनजर वह उसकी सहमति के बिना तलाक दे सकती है।
    तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    आपको बता दें कि 2 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिए फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत तुरंत तलाक देकर विवाह समाप्त कर सकती है। लेकिन, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसा तभी हो सकता है, जब विवाह को बचाने का और कोई तरीका न बचा हो।

  • दिग्विजय सिंह का दौरा बदलेगा तस्वीर ?

    दिग्विजय सिंह का दौरा बदलेगा तस्वीर ?

    इटारसी / नर्मदापुरम//आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस खासी सक्रिय है। इस बार वह लगातार उन सीटों पर फोकस कर रही है जिन पर कांग्रेस पिछले चार-पांच चुनाव से हार झेलती आ रही है। वरिष्ठ नेताओं के दौरे इस तरह के क्षेत्र में लगातार जारी हैं। कहा जा रहा है कि इसी तारतम्य में पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य सभा सदस्य दिग्विजय सिंह गुरुवार को नर्मदा पुरम और इटारसी आ रहे हैं, वे कार्यकर्ताओं से चर्चा करेंगे और पार्टी की स्थिति को समझने और जानने का प्रयास करेंगे।

     जहां तक नर्मदापुरम( होशंगाबाद) जिले का सवाल है यहां संगठन कमजोर नहीं बल्कि ध्वस्त है और इसके लिए भोपाल मैं बैठकर जिले को अपनी जागीर मानने वाले नेता जिम्मेदार हैं । पिछले कई दशकों से उन्हीं नेताओं की पसंद के लोगों को यहां उम्मीदवार बनाया जाता रहा और यह बात खुलकर कही जाती रही है कि इन नेताओं का भाजपा के सबसे रसूखदार परिवार से गहन संबंध होने के कारण यहां कांग्रेस उनके सामने कोई मजबूत प्रत्याशी देने से बचती रही है। 

     बात कड़वी है पर सच है 

    यह बात इस क्षेत्र के राजनीतिक गलियारों में ही नहीं आम लोगों में भी खुलकर कही जाती है कि भाजपा के बगीचे से ही  कांग्रेस की टिकट तय होती है। इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना है, क्योंकि जो फार्मूला बताया जा रहा है जिसमें उम्मीदवार के चयन में स्थानीय संगठन और प्रभावशाली नेता की महत्वपूर्ण भूमिका होगी तो ऐसे में कोई बदलाव होगा ऐसा नहीं लगता। क्योंकि हाल ही में स्थानीय संगठनों में जो लोग पदाधिकारी बनाए गए हैं वह पार्टी के बजाय उन्हीं नेताओं की पसंद और निष्ठा वाले हैं। इसीलिए मंडलम की ओर से वही नाम जाएंगे जिन्हें यह नेता चाहेंगे।

    राष्ट्रवादियों की रहती है बल्ले-बल्ले

    पिछले कई बार से कांग्रेसी इलाके में चुनाव हार रही है इसके लिए कांग्रेसियों की भूमिका ही महत्वपूर्ण होती है। भीतरघात( यहां तक कि पैसे लेकर रातों-रात निष्ठा बदलने के किस्से चुनाव के बाद तक चर्चाओं में रहते हैं पिछले चुनाव में लिफाफे की चर्चा तो आज तक याद की जाती है) एक स्थायी रोग है, पर चुनाव के बाद भी इस तरह के तत्वों पर कभी कोई एक्शन पार्टी की ओर से कभी नहीं लिया गया, उल्टे उन्हें किसी ना किसी तरह से पुरस्कृत किया गया ,

     हाल ही के नपा चुनाव में कांग्रेस के भोपाल में बैठे वरिष्ठ नेताओं की जो भूमिका रही, माना जा रहा है कि उसके कारण इटारसी नगर पालिका पर कांग्रेस काबिज होते होते रह गई।  इन नेताओं ने जिन अपने चहेतों को पार्षद के टिकट दिलवाए उनमें से कुछ तो जीते ही नहीं जो जीते तो  उन्होंने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ खुलकर मतदान किया था और उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं इटारसी के एक मैदान का नाम सावरकर के नाम पर रखे जाने के मामले में भी पार्टी की लाइन से हटकर भाजपा का समर्थन करने वाले आज भी कांग्रेस के नेता बने हुए हैं और तो और भाजपा उन्हें राष्ट्रवादी बता रही है।

    अब  सवाल यह है कि दिग्विजय सिंह जी जब स्थानीय नेताओ और कार्यकर्त्ताओं से  से चर्चा करेंगें तो यह बातें उनके सामने आ सकेंगी ? और ऐसा होगा तभी दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं का दौरा और मेहनत इस तस्वीर को बदल सकेगा ।… और तस्वीर बदलेगी तभी कांग्रेस यहां जीत सकेगी।