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  • कितनी बार दिल पर दस्तक देता है शिद्दत भरा प्यार..?

    कितनी बार दिल पर दस्तक देता है शिद्दत भरा प्यार..?

    नई दिल्ली// बशीर बद्र की ग़ज़ल की पक्तियां हैं कि

    प्यार की नई दस्तक दिल पे फिर सुनाई दी,

    चाँद सी कोई सूरत ख़्वाब में दिखाई दी।

    किस ने मेरी पलकों पे तितलियों के पर रक्खे

    आज अपनी आहट भी देर तक सुनाई दी।

    जिंदगी  में सभी ने कभी न कभी एक ऐसे पलों  को महसूस जरूर किया होता है जिसमें किसी को देखकर या मिलकर पेट में तितलियां उड़ने का सा अहसास होता है, जिसे प्यार का नाम दिया जाता है। इस  अहसास या अनुभव को लेकर फिल्म गीत  और साहित्य  भरा पड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा जीवन में कितनी बार होता है?

    जिंदगी में दो बार प्यार होता है” यह एक आम धारणा है, जो अक्सर दो अलग-अलग तरह के प्यार को दर्शाती है: पहला प्यार जो आकर्षण, जुनून या वासना पर आधारित होता है, और दूसरा सच्चा प्यार जो समझ, सम्मान और गहरे जुड़ाव से आता है, जो पहले अनुभव से सीखकर आता है और अधिक परिपक्व होता है; कई लोगों के लिए, पहला प्यार मोहभंग के बाद दूसरा सच्चा प्यार मिलने का अवसर देता है, जिससे वे जीवन में अलग-अलग रिश्तों से सीखते और बढ़ते हैं। 

    पहला प्यार

    यह अक्सर शुरुआती आकर्षण, सुंदरता, या किसी व्यक्ति के गुणों से होता है, जैसा कि किसी तुर्की कहावत में बताया गया है।यह बहुत तीव्र और जुनूनी हो सकता है, जिसमें व्यक्ति दूसरे को अपनी पूरी दुनिया मान लेता है। 

    दूसरा प्यार इसे ट्रु लव भी कहते हैं

    यह अक्सर पहले प्यार के अनुभवों से सीखकर आता है, जहाँ व्यक्ति समझता है कि सच्चा प्यार सिर्फ दिखावे या आकर्षण से नहीं, बल्कि आपसी समझ और समर्थन से बनता है। यह पहले प्यार की तरह ही गहरा हो सकता है, लेकिन यह अधिक परिपक्व और टिकाऊ होता है क्योंकि इसमें अपेक्षाएँ कम और स्वीकृति अधिक होती है। 

    क्यों होता है दूसरा प्यार?

    अनुभव से सीखना: पहला रिश्ता टूटने के बाद व्यक्ति यह सीखता है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं, जिससे वह दूसरे रिश्ते में बेहतर चुनाव कर पाता है।

    परिपक्वता: समय के साथ, लोग भावनात्मक रूप से परिपक्व होते हैं और प्यार को एक अलग नज़र से देखते हैं, जहाँ वे साथी की कमियों को स्वीकार करते हैं और रिश्ते को बेहतर बनाते हैं।

    अलग-अलग रूप: प्यार के कई रूप होते हैं, जैसे माँ-पिता से प्यार, दोस्तों से प्यार, और जीवनसाथी से प्यार; ये सभी अलग-अलग स्तरों पर होते हैं, और हर अनुभव अपने आप में अनूठा होता है। 

    संक्षेप में, “दो बार प्यार” का मतलब अक्सर यह है कि जीवन में आप अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों से अलग-अलग तरह का प्यार अनुभव करते हैं, और दूसरा प्यार अक्सर पहले से मिली सीख का परिणाम होता है, जो गहरा और सच्चा हो सकता है।

    क्या कहता है नया अध्ययन?

    अमेरिका के इंडियाना यूनिवर्सिटी के किन्से इंस्टीट्यूट के एक नए अध्ययन ने इस पर से कुछ पर्दा उठाया है और नतीजा थोड़ा अलग है। इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने 18 से 99 वर्ष की आयु के 10,036 अविवाहितों से सीधा सवाल पूछा कि अपने जीवन में आप कितनी बार जुनूनी (पैशनेट) प्यार में पड़े हैं। अध्ययन के अनुसार औसत जवाब था कि सिर्फ दो बार (सटीक रूप से 2.05 बार) । नतीजों को विस्तार से देखें तो 14 फीसदी लोगों ने कहा कि वे कभी ऐसे जुनूनी प्यार में नहीं पड़े, 28 फीसदी ने कहा एक बार, 30 फीसदी ने दो बार, 17 फीसदी ने तीन बार, और 11 फीसदी ने चार या उससे अधिक बार। 58 फीसदी ने कहा एक या दो बार ही किया जुनूनी हद वाला प्यार . विषमलैंगिक, समलैंगिक, उभयलिंगी सभी में अंतर बहुत मामूली पाया गया।

    उम्र दराज लोगों जुनूनी प्यार का ज्यादा अनुभव

    मजे की बात है कि उम्रदराज लोगों ने युवाओं की तुलना में थोड़ा अधिक बार ऐसे प्यार का अनुभव बताया, यानी क्यूपिड कभी रिटायर नहीं होता। पुरुषों ने महिलाओं की तुलना में थोड़ा अधिक संख्या बताई, लेकिन यह अंतर भी बहुत छोटा था। जुनूनी प्यार किसी भेदभाव को नहीं मानता, यह एक तरह से सबको बराबरी पर ले आता है। थेरेपिस्ट्स के लिए भी यह डेटा अहम है, क्योंकि यह याद दिलाता है कि लगातार आतिशबाजी जैसा रोमांच महसूस करना सामान्य नहीं है। साथीभाव पर आधारित स्थिर और गहरा प्यार वही असली लंबी दौड़ का विजेता है। रिपोर्ट बताती है कि 60 फीसदी सिंगल खुद को बहुत रोमांटिक मानते हैं।

    निष्कर्ष:

    • यह स्टडी बताती है कि ‘सोलमेट’ (एक ही सच्चा प्यार) की धारणा के बजाय, शिद्दत वाला प्यार एक दुर्लभ लेकिन दोहराया जाने वाला अनुभव है.
    • यह प्यार हर किसी के लिए अलग-अलग रूप में आता है, और ज़्यादातर लोगों के लिए यह जीवन में कई बार हो सकता है, न कि सिर्फ एक बार. 

    लोग प्यार में पड़ने की बातें तो लगातार करते हैं, लेकिन यह पहला बड़ा अध्ययन है जिसने दिखाया है कि यह वास्तव में कितना दुर्लभ है। अधिकांश लोगों के लिए यह आतिशबाजी जैसा जुनून जीवन में गिनी-चुनी बार ही आता है फिर जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ लेती है।

    – डॉ अमांडा गेसलमैन

    अध्ययन की प्रमुख लेखिका और किंसे की वैज्ञानिक

  • सूबे में पंद्रह लाख कार्यकर्ता जुटा  पाएगी काँग्रेस ?

    सूबे में पंद्रह लाख कार्यकर्ता जुटा पाएगी काँग्रेस ?

    भोपाल // सूबे में कांग्रेस संगठन सृजन  अभियान के जरिए अपने  को मजबूत करने में जुटी हुई है। जिला और ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद अब अगले चरण में  पंचायत वार्ड और मोहल्ला समितियों पर  फोकस किया जा रहा है। यह दावा किया जा रहा इसके  माध्यम से  करीब पंद्रह लाख कार्यकर्ता तैयार करने का लक्ष्य है और 20फरवरी तक प्रदेश भर में यह इकाइयां गठित कर इनके प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू कर दिए जाएंगे ।
    इन समितियों को स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाएंगी।
    हर पंचायत समितियों में पच्चीस  सदस्य रहेंगे और इनका गठन प्रदेश कार्यकारणी की तर्ज पर होगा। जिसमें युवा कांग्रेस महिला कांग्रेस एनएसयूआई आदिवासी कांग्रेस के प्रतिनिधि रहेंगे । शहरी क्षेत्रों में वार्ड समिति बनेगी पर उसमें सदस्यों की संख्या वार्ड की जनसंख्या पर निर्भर करेगी। नगर निगम में एक वार्ड में अधिकतम सौ, और नगर पालिका की वार्ड समिति में ज्यादा से ज्यादा पचास सदस्य होंगे। वार्डों के भीतर मोहल्ला समिति बनेगी।
    इन सबका समितियों का काम पार्टी अभियानों को आम जन तक पहुंचना, और हर तरह के सोशल मीडिया के माध्यम से आम आदमी तक पहुंच बनाना होगा।
    पर जानकारों का कहना कि कांग्रेस को अपने इस दावे को पूरा करने में काफी मशक्कत करनी होगी क्योंकि कांग्रेस के  संगठन सृजन अभियान के तहत पूरे सूबे में लगभग 71 जिलाध्यक्षों की घोषणा की गई थी। लेकिन करीब 5 महीने बीत जाने के बाद भी जिलाध्यक्ष अकेले काम कर रहे हैं. जिला कार्यकारणी की घोषणा तक नहीं हो पाई है। यही स्थिति ब्लॉक कमेटियों को लेकर भी है, ऐसे में मंडल , पंचायत, वार्ड ,मोहल्ला समितियां बनाने का काम कैसे गति ले पाएगा

    संगठन की स्थिति को लेकर संतुष्ट नहीं है आलाकमान
    पिछले हफ्ते दिल्ली में कांग्रेस  के प्रदेश संगठन को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल  गांधी मौजूद थे. कहा जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान प्रदेश कांग्रेस संगठन और उसको स्थिति को लेकर संतुष्ट नही है।
    प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी माना है कि कांग्रेस  का संगठन प्रदेश में अभी पूरी तरह से मजबूत नहीं है।  सूत्रों की माने तो काँग्रेस आलाकमान बहुत से जिलाध्यक्षों के काम काज से खुश नहीं है. उन्हें अपनी परफारमेंस सुधारने की चेतावनी मिल सकती है, फिलहाल तो प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी से जिलाध्यक्षों  के साथ व्यक्तिगत रूप से बैठकर सक्रियता और संगठन को मजबूत करने को कहा गया है। यदि फिर भी सुधार नहीं होता है तो विकल्पों को देखा जाएगा।
    खबर  है कि संगठन के महासचिव केसी वेनुगोपाल ने   प्रदेश संगठन को अल्टीमेटम दे दिया है कि 15 दिवस के भीतर जिला समितियां और  30दिन के भीतर ब्लाक समितियों की  घोषणा  की जाए ।

    देर कर रहा है प्रदेश संगठन
    वैसे बहुत से जिलाध्यक्षों ने समितियां बना कर प्रदेश संगठन को सौंप दी हैं, घोषणा में देरी प्रदेश स्तर से हो रही है। कहा जा रहा है कि प्रदेश संगठन को प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी से हरि झंडी नहीं मिली है। अब महासचिव केसी बेलुगोपाल ने 30 दिन में ब्लॉक समितियों और 60 दिन में मोहल्ला स्तर की समितियों का  गठन  करने को कहा है। समितियों में एससी, एसटी, ओबीसी ,अल्पसंख्यक का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करने को कहा है।
    पहली बार है कि कांग्रेस  में  जमीनी स्तर तक संगठन की गतिविधियों की केंद्र स्तर से निगरानी हो रही है । जिलाध्यक्षों के कामों की मासिक समीक्षा की जा रही है।
    संगठन सृजन अभियान की अवधारणा राहुल गांधी की है इसलिए इस पर ज्यादा फोकस है।

  • गेंहू की फसल पर “मामा” का प्रकोप “.

    गेंहू की फसल पर “मामा” का प्रकोप “.

    नर्मदापुरम//
    कभी पंजाब हरियाणा में गेंहू की फसल के लिए समस्या बनी खरपतवार जिसे वहां ‘ गेहूं  का मामा ‘ कहा जाता है, अब मध्य प्रदेश में भी अपने पैर पसार चुका है और उसमें तेजी आ रही है…. आई सी ए आर की रिपोर्ट के मुताबिक नर्मदापुरम , नरसिंहपुर,बैतूल, विदिशा, सीहोर, कटनी, जबलपुर  सहित कई जिलों में इसके प्रकोप  को देखा जा रहा है ।   नर्मदापुरम में इस खरपतवार को गुल्ली-डंडा कहा जाता है…. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय  पर इसको नियंत्रित नहीं किया जाए तो यह फसल  को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
    इसे पहचाना मुश्किल होता है
    फैलारिस माइनर वैज्ञानिक नाम वाली यह खरपतवार गेहूं जैसी दिखती है, इसलिए इसे पहचाना मुश्किल होता है और गेंहू के पौधों के पोषक तत्वों  और पानी को चुराकर जड़ों को  खोखला कर गेहू की वृद्धि को पर असर डालती है. दाने में भराव कम हो जाता है।
    विशेषज्ञों के अनुसार समय पर नियंत्रण नहीं होने पर यह खरपतवार गेहूं के उत्पादन में 30- 35फीसदी तक असर डाल सकता है।
    शुरुआती अवस्था में यह बिल्कुल गेहूं की तरह दिखता है, इसमें गेहूं जैसी बाली भी निकलती है, लेकिन बालियों में कांटे नहीं होते और कॉलर वाला हिस्सा हल्के गुलाबी रंग का होता है।
    जानकार किसानों का कहना है कि यह खरपतवार उस जमीन पर ज्यादा मात्रा में होती है जहां जल भराव होता है, या जमीन नमी पकड़ कर चलती है। नमी वाले खेतों में इसका प्रकोप ज्यादा होता है, वैसे क्षेत्र में इसका प्रकोप लगातार बढ़ रहा है।

    इसके नियंत्रण के लिए रासायनिक दवाएं (जैसे फिनोक्सीडॉन ,क्लोडिनाफॉप, मेट्रिब्यूज़िन) और फसल चक्र अपनाना ज़रूरी है। 

    इसे ‘मामा’ और  गुल्ली डंडा क्यों कहते हैं ?
    इस खरपतवार के नामों की कहानी भी दिलचस्प है। इस खरपतवार को  बहरूपिया कहा जा सकता है बिल्कुल गेहूं जैसी दिखने वाली यह खरपतवार गेहूं की फसल में छिप जाता है  जिससे किसान इसे पहचान नहीं पाते और अंत में यह फसल को नुकसान पहुँचाता है, ग्रामीण  अंचलों में मामा और भांजे का जो रिश्ता होता है, वह बहुत ही अटूट और  दोस्ताना सा होता । खरपतवार और गेहूं में काफी समानता होती है।ठीक वैसे ही जैसे मामा कभी-कभी अपने भांजों और बच्चों को शरारत से परेशान करते हैं यह गेहूं की फसल को परेशान करती है।इसीलिए इसे गेहूं का मामा बुलाने लगे हैं.और यह नाम प्रचलन में भी आ गया है.
    कुछ जगह पर इसे गुल्ली डंडा भी बोला जाता है. इसकी वजह ये है, इसकी जो बनावट होती है,  इसका तना सीधा, पतला और सख्त होता है. दिखने में बिल्कुल डंडे की तरह होता है, तो वहीं इसका ऊपर का जो हिस्सा है, जो बीच का गुच्छा बनता है, वो छोटा और बेलनाकार होता है, जो कि बिल्कुल गुल्ली की तरह दिखता है. इसीलिए इसे गुल्ली डंडा के नाम से भी ग्रामीण क्षेत्रों में जानते हैं. वैसे इसे भंडूसी, कनकी, कैनरी ग्रास भी बोला जाता है।
    कहां से आई यह खरपतवार !
    इस खरपतवार का ओरिजन उत्तरी अफ्रीका यूरोप के देशों में माना जाता है। जानकारों के अनुसार हरित क्रांति के पहले देश में अनाज की कमी थी, उस समय अमेरिका मेक्सिको से हमारे यहां अनाज आयात किया गया था, तब यह गेहूं के साथ आ चुका था।

  • इस राज्य में लोग मेगा स्टायलिश अंत्येष्टि पर लाखों रूपये खर्च करने को तैयार ?

    इस राज्य में लोग मेगा स्टायलिश अंत्येष्टि पर लाखों रूपये खर्च करने को तैयार ?

    तिरुवनंतपुरम// अभी तक आपने शादी और अन्य समारोहों को भव्य और महंगा होने की बाते सुनी होगीं पर अब लोग अंत्येष्टि को भी भव्य बनाने के लिए खासी रकम खर्च करने को तैयार हैं .

    हिन्दू में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार इन दिनो केरल में अंतिम संस्कार का बाजार फल-फूल रहा है और लोग मेगा स्टाइलिश अंत्येष्टि पर लाखों रुपये तक खर्च करने को तैयार हैं। बढ़ते प्रवासी भारतीयों , विशेषकर ईसाई समुदाय के कारण, केरल में  अत्येष्टि का कार्यक्रम “लार्जर दें लाइफ”  बनाता जा रहा है

    कोरोना महामारी के बाद अंतिम संस्कार सेवाओं में विशेषज्ञता रखने  वाली कई इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां सामने आई हैं . महामारी से पहले केवल कुछ ही कंपनियां थीं जो ये सेवाएं प्रदान करती थीं,पर कोविड के चरम पर कुछ इवेंट मैनेजमेंट फर्मों ने अपने कारोबार को इसके लिए खोल दिया, क्योंकि  विवाह सहित सभी सार्वजनिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

    आम तौर पर ये कंपनियां अंतिम संस्कार की सेवाओं के लिए 50,000 से 10 लाख रुपये के बीच शुल्क लेती हैं, पर अतिरिक्त मांग लागत को बढ़ा देता है । उदाहरण के लिए, एक ताबूत ₹4,500 में उपलब्ध है, लेकिन लकड़ी और अन्य सामान के आधार पर ₹ 1 लाख में भी उपलब्ध है।

    इरिंजलाकुडा की कायरोस फ्यूनरल सर्विस, जिसे गूगल  पर पांच सितारा रेटिंग प्राप्त है, के पास ग्लास पैनल और साटन पर्दे वाले एम्बुलेंस और कस्टम-निर्मित शव वाहन का एक बड़ा बेड़ा है।

    रिपोर्ट के अनुसार एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं में शव की ड्रेसिंग, लाइव अंतिम संस्कार बैंड, कार्यक्रम की लाइव-स्ट्रीमिंग, ताबूत और कब्र को सजाना और वह सब कुछ शामिल है जो एक परिवार मांग सकता है। मृतक का मेकअप ‘पैकेज’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस तरह की सेवा दे रही कम्पनी कोकोनाडु इवेंट मैनेजमेंट, तिरुवल्ला की संजय जॉर्ज मैथ्यू कहते हैं, “विदेशी रिश्तेदार और मृतक के करीबी लोग शव को अधिक जीवंत रूप में देखना चाहते हैं।” लिपस्टिक और आईशैडो के साथ-साथ फाउंडेशन भी लगाया जाता है। अधिकांश हल्के टच-अप के लिए कहते हैं, लेकिन कई लोग भारी मेकअप के लिए कहते हैं, यह देखते हुए कि यह आखिरी बार होगा जब किसी व्यक्ति को देखा जाएगा।  इसके अलावा अंतिम संस्कार सेवाओं के लिए आम अनुरोध में अक्सर मृतक को ब्लेज़र, सूट या जैकेट जैसी औपचारिक पोशाक पहनाना शामिल होता है, हालांकि कुछ विचित्र  अनुरोध भी होते हैं, जैसे कि मृतक को रे-बैन धूप का चश्मा पहनना।

    ताबूत को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, जरूरत पड़ने पर और मेहमानों को  सुरक्षा प्रदान की जाती है देखभाल के लिए कर्मचारी तैनात किए जाते हैं। चर्च या श्मशान तक जुलूस और उसके बाद दावत की जिम्मेदारी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की होती है।

    त्रिशूर के निवासी पॉल जिफ़ी, जिन्होंने हाल ही में एक अंतिम संस्कार सेवा कंपनी का उपयोग किया है को लगता है कि इस तरह की सर्विस और सहायता व्यावहारिक है.उनका मानना है कि

    एकल या छोटे परिवार या शहर से बाहर से आए परिवार दुखी होते हैं और इस तरह के कई काम अक्सर उनको भारी पड़ सकते हैं । मिस्टर जिफ़ी को लगता है कि मृतक का हल्का मेकअप इसे  गरिमापूर्ण बनाता है, क्योंकि शव को सार्वजनिक श्रद्धांजलि के लिए रखा जाता  है। कंपनी परिवार के सदस्यों से इनपुट लेकर लेती है यह सेवा का एक महत्वपूर्ण पहलू है.

    (हिन्दू में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर )(फोटो हिन्दू से साभार )

  • गौ शालाओं में बनेंगी गायों की समाधी, गायों के शवों के सम्मानजनक तरीके से निष्पादन की योजना 

    गौ शालाओं में बनेंगी गायों की समाधी, गायों के शवों के सम्मानजनक तरीके से निष्पादन की योजना 

     भोपाल//  गायों की मौत को लेकर किरकिरी झेलने वाली मध्य प्रदेश सरकार ने अब गायों के शवों को खुले में छोड़ने के बजाय सम्मानजनक तरीके से निष्पादन की योजना बनाई है । सरकार ने ऐलान किया है कि अब मृत गोवंश पशुओं को गौशाला में समाधि दी जाएगी । 

     शिवराज सरकार दवारा इसके लिए मनरेगा से गो समाधिया बनवाई जाएंगी। 

     इसमें 6 फीट लंबा 4 फीट चौड़ा और इतने ही ऊंचाई का गड्ढा खोदकर समाधि दी जाएगी। सबसे पहले गड्ढे के तल में ताजे गोवर की आधी फिट की तह बिछाई जाएगी इसमें 20 किलो नमक और इतना ही चुना डाला जाएगा। जिससे 6 माह बाद शव खाद बन जाएगा।

    जिसके बाद वो खाद सरकार किसानों के साथ-साथ अन्य लोगों को देगी। यह फैसला सरकार ने लिया है, गौ संवर्धन बोर्ड इस स्कीम का क्रियान्वयन कराएगा।

     पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने इस संबंध में सभी जिला कलेक्टरों और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं ।

    पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि गौशालाओं में 1 वर्ष में 15% पशुओं की मौत होती है प्रदेश में 1772 गौशालाओं में 2, लाख 87हजार गोवंशीय पशु हैं ।इस अनुमान से हर वर्ष लगभग 43हजार, 50 पशुओं की मौत होती है। अभी तक शव खुले में फेंक दिया जाता था। जिससे गंदगी होती थी ।कई बार विवाद की स्थिति भी बनती है। गौशालाओं के आसपास वर्षों तक कंकाल पड़ा रहता है। गोवंशीय पशुओं के शव का सम्मानजनक तरीके से निष्पादन के लिए उन्हें समाधि दी जाएगी।

     दिल्ली ने दिखाई राह

     दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए लंपी स्कीन डिसीज से पीड़ित पशुओं का निष्पादन व्यवस्थित तरीके से करने के लिए दिल्ली सरकार को निर्देशित किया था । साथ ही कहा था कि समाधि की प्रक्रिया जन भावनाओं के अनुरूप होनी चाहिए।

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    पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने मनरेगा के अंतर्गत गो समाधि बनाने के लिए सभी जिलों को निर्देशित किया है जिसमें गोवंश पशुओं के समूह को व्यवस्थित तरीके से निष्पादित किया जा सके

     गुलशन बामरा प्रमुख सचिव पशुपालन

  • कौन फाइनल करेगा कांग्रेस के टिकट ? दिग्विजय सिंह ने किया बड़ा खुलासा !

    कौन फाइनल करेगा कांग्रेस के टिकट ? दिग्विजय सिंह ने किया बड़ा खुलासा !

    भोपाल// मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने तैयारियां तेज कर दी हैं। वहीं टिकटों को लेकर दावेदारों में घमासान मचा हुआ है इस बीच टिकट को लेकर फार्मूले पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्य मंत्री  दिग्विजय सिंह ने भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में साफ किया कि इस बार कमलनाथ ही सर्वे-सर्वा हैं। उन्हीं के सर्वे के आधार पर उम्मीदवार फाइनल किया जाएगा। इस दिग्विजय ने कार्यकर्ताओं से अपील करते हुए कहा-  आपस में लड़ाई नहीं करें!

    मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जल्द ही उम्मीदवारों की घोषणा कर सकती है। कांग्रेस उम्मीदवारों के चयन के लिए अलग-अलग सर्वे कर रही है। कांग्रेस के सीनियर नेता और एमपी के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने बड़ा खुलासा किया है। भोपाल में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस बार के विधानसभा चुनाव के लिए नेता आपस में लड़ें नहीं। उन्होंने कहा कि उम्मीदवार वही फाइनल होगा जिसे कमलनाथ फाइनल करेंगे। दिग्विजय सिंह ने कहा कि विधानसभा चुनाव के लिए कमलनाथ ही सर्वेसर्वा हैं। उन्होंने कहा कि इस बार बीजेपी सरकार को हराना है।
    दिग्विजय सिंह ने कार्य कर्ताओं और नेताओं से कहा कि समझ जाओ भैया,  लड़ो मत। उन्होंने कहा कि टिकट के कई दावेदार मुझसे मिले। उम्मीदवार इतने खड़े हो गए हैं कि मुसीबत हो रही है किस-किस को समझाएं किसको ना समझाएं हमने तो कह दिया है कि हमारे कमलनाथ जी सर्वे सर्वा हैं उनका जो सर्वे है सब पत्थर की लकीर है उनके हिसाब से टिकट मिलेगा किसी और के पास जाने की जरूरत नहीं है।क्योंकि फाइनल टिकट कमलनाथ के सर्वे के आधार पर ही मिलेगा।टिकट हमारे बस का काम नहीं है सर्वे से ही काम होगा। इसीलिए एकजुट हो जाओ लड़ो मत, डरो मत और भाजपा की सरकार मिटाओ । यही आप से मेरी प्रार्थना है ..!

    पूर्व मुख्यमंत्री ने स भोपाल में महाकाल लोक में भ्रष्ट्राचार ,सतपुड़ा भवन में आग ,महगाई ,बेरोजगारी सहित सरकार की जन विरोधी नीतियों के विरोध में आयोजित धरना प्रदर्शन को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है .
    विधानसभा चुनाव के लिए कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। दिग्विजय सिंह के पास 66 विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी है जहां बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है। दिग्विजय सिंह इन 66 विधानसभा सीटों का दौरा कर चुके हैं।

    दिग्विजय सिंह ने इन 66 विधानसभा सीटों की सर्वे रिपोर्ट पार्टी हाई कमान को सौंप दी थी। इसके बाद से ही अटकलें लगाई जा रही हैं थी कि इसके सर्वे के आधार पर टिकट मिलेगा। कमलनाथ राज्य की 230 विधानसभा सीटों के लिए अलग से सर्वे करवा रहे हैं। माना जा रहा है कि इसी सर्वे रिपोर्ट के आधार पर उम्मीदवारों का टिकट फाइनल होगा।
    राज्य में इसी साल होंगे चुनाव
    मध्यप्रदेश में इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम पहले से घोषित करने की योजना बना रही है जिससे उम्मीदवार को जनसंपर्क करने के लिए अधिक से अधिक समय मिले।

  • कितने अमेरिकी मोदी को पहचानते हैं ? क्या कहता हैं प्यू रिसर्च का सर्वे ?

    कितने अमेरिकी मोदी को पहचानते हैं ? क्या कहता हैं प्यू रिसर्च का सर्वे ?

    नई दिल्ली //  भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे के बीच प्यू रिसर्च का एक रोचक लेकिन विरोधाभासी सर्वे सामने आया है , जिसके मुताबिक अधिकांश अमेरिकियों ने मोदी के बारे में सुना ही नहीं है और जो अमेरिकी मोदी को जानते हैं उनमे से ज्यादातर की उनके प्रति भावनाए नकारात्मक हैं .हालांकि अधिकतर अमेरिकी भारत को अनुकूल मानते हैं पर उसके नेतृत्व पर भरोसा नहीं है . प्यू ने यह सर्वे 20 से 26 मार्च के बीच किया था . इस सर्वे को सुब्रमण्यम स्वामी में भी अपने ट्विटर हेंडल पर शेयर किया है .

    एबीपी लाइव की खबर बताती है कि प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के अनुसार, है. अमेरिकी नागरिकों (40%) का एक बड़ा हिस्सा कहता है कि उन्होंने भारतीय नेता  मोदी के बारे में कभी नहीं सुना है, जो कि 30 (59%) से कम उम्र के अधिकांश अमेरिकियों में भी परिलक्षित होता है – जब कई अन्य विश्व नेताओं की तुलना की जाती है, तो उनके बारे में सबसे कम सुना जाता है।, अमेरिका के 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 28% वयस्क भी ऐसा ही कहते हैं. कम शिक्षा वाले वयस्कों की भी उच्च स्तर की शिक्षा वाले लोगों की तुलना में मोदी के बारे में कभी न सुनने की बात की है . जिन लोगों ने इस भारतीय नेता के बारे में सुना है, वे मानते हैं कि उनमें आत्मविश्वास की कमी है जिन लोगों ने पीएम मोदी के बारे में सुना है, उनके अंदर मोदी को लेकर भावना नकारात्मक है. जैसे- वहां 37% लोगों को वैश्विक मामलों के संबंध में पीएम मोदी की क्षमता पर बहुत कम या बिल्‍कुल भरोसा नहीं है, जबकि 21% को उन पर भरोसा है.

    लगभग आधे अमेरिकी वयस्कों (51%) का भारत के प्रति दृष्टिकोण अनुकूल है, जबकि थोड़े से अन्य (44%) का दृष्टिकोण प्रतिकूल है। डेमोक्रेट और डेमोक्रेटिक-झुकाव वाले स्वतंत्र लोग भारत को अनुकूल रूप से देखने के लिए अपने रिपब्लिकन और रिपब्लिकन-झुकाव वाले समकक्षों की तुलना में कुछ हद तक अधिक हैं (56% बनाम 48%), जैसे स्नातक की डिग्री वाले लोगों की तुलना में जिनके पास स्नातक की डिग्री नहीं है (55% बनाम 50%).

    विश्व स्तर पर भारत की स्थिति को देखते हुए, अधिकांश अमेरिकी वयस्कों (64%) का मानना है कि हाल के वर्षों में इस देश का प्रभाव दुनिया में वैसा ही बना हुआ है. वहीं, अन्य 23% का कहना है कि भारत का प्रभाव बढ़ा है, जबकि 11% का कहना है कि उसका प्रभाव कम हो गया है.

    ज्‍यादातर अमेरिकियों को नहीं पता भारत का ध्‍वज कैसा है!
    प्‍यू रिसर्च सेंटर की 2022 की एक रिपोर्ट में तो ये भी कहा गया कि अमेरिका के लोग भारतीय ध्वज से भी काफी हद तक अपरिचित हैं, यानी उन्‍हें नहीं पता होता कि भारत का राष्‍ट्रीय झंडा कैसा है. अमेरिकियों के अंतरराष्ट्रीय मामलों के ज्ञान का आकलन करने के लिए जब उनके सामने भारत के तिरंगा झंडे की तस्वीर प्रस्तुत की गई, तो केवल 41% अमेरिकी ही उसे पहचान पाए कि ये झंडा भारत का है.

    क्या है प्यू रिसर्च सेंटर ?

    प्यू रिसर्च सेंटर वाशिंगटन, डी.सी. में स्थित एक गैर-पक्षपाती अमेरिकी थिंक टैंक (खुद को “तथ्य टैंक” के रूप में संदर्भित करता है) है। इसकी उत्पत्ति 1990 में टाइम्स मिरर सेंटर फॉर द पीपल एंड द प्रेस नामक एक में हुई थी। 2004 में, प्यू चैरिटेबल ट्रस्ट्स ने अपनी सूचना पहलों को रखने के लिए एक सहायक के रूप में प्यू रिसर्च सेंटर की स्थापना की|

  • क्या सचमुच होती थीं विषकन्याएं ?

    क्या सचमुच होती थीं विषकन्याएं ?

    वैदिक साहित्य, लोक कथाओं और इतिहास में हमेशा से ही विषकन्याओं का जिक्र मिलता है. कहा जाता है कि विषकन्या का प्रयोग राजा अपने शत्रु का छलपूर्वक अन्त करने के लिए किया करते थे। इसकी प्रक्रिया में किसी सुन्दर बालिका को बचपन से ही विष की अल्प मात्रा देकर पाला जाता था और विषैले वृक्ष तथा विषैले प्राणियों के सम्पर्क से उसको अभ्यस्त किया जाता था। इसके अतिरिक्त उसको संगीत और नृत्य की भी शिक्षा दी जाती थी, एवं सब प्रकार की छल विधियाँ सिखाई जाती थीं। अवसर आने पर इस विषकन्या को युक्ति और छल के साथ शत्रु के पास भेज दिया जाता था। इसका श्वास तो विषमय होता ही था, परन्तु यह मुख में भी विष रखती थी, जिससे संसर्ग करनेवाला पुरुष रोगी होकर मर जाता था। चाणक्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र (ग्रन्थ) में तथा कल्कि पुराण में विषकन्याओं की चर्चा है।

    विषकन्या बनाने तथा उसके प्रयोग की विधि के संकेत रामायण काल तक नहीं मिलते ,महाभारत काल में इसका उल्लेख पाया जाता है परंतु इसका प्रचुर उल्लेख बौद्ध काल के बाद ही मिलता है। एक विचित्र बात यह है कि स्वर्ण रसायन तथा विषकन्या दोनों के प्रयोग लगभग एक साथ विकसित हुए हैं। रसायन के साथ इनका जुड़ा होना बौद्ध काल में रसायन का खूब विकास होना दोनों के निकट संबंध का द्योतक है। कहा जाता है कि नागार्जुन ने अंत में स्वर्ण रसायन का आविष्कार कर लिया था, जिसके द्वारा तांबे (अथवा किसी अन्य सस्ती धातु)  को रासायनिक प्रक्रिया से सोने में परिवर्तित किया जा सकता था । यह भी विश्वास किया जाता है कि यह प्रक्रिया नागार्जुन के साथ ही लुप्त हो गई और बाद में रसायन शास्त्री इसे निरंतर खोजते रहे ।

    बौद्ध मत के पतन का कारण था इसमें आज आने वाले कर्मकांड संबंधी तथा वैचारिक दोष। हीनयान तथा महायान में विभाजित होने पर बौद्ध मत ने ही आगे चलकर हठयोगियों, नाथपंथियों, वामाचारियों तथा ऐसे अन्य संप्रदायों को उत्पन्न किया। आरंभ में विषकन्या बनाने का काम यही लोग करते थे। कापालिक, तांत्रिक तथा अघोरियों का जिक्र इस संबंध में आता है।

    कुछ लोग बौद्ध मत को नकारात्मक मानते है, क्योंकि उसमें न केवल संसार में भोग विलास की अस्वीकृति है ,अपितु स्वयं संसार को ही दुखमय, क्षणिक एवं मिथ्या माना गया है।  कुछ कापालिकों, वामाचारियोंं और योगियों में एक परंपरा यह चल पड़ी थी कि उनके इंद्रिय निग्रह का प्रमाण यह माना जाएगा कि विषय वासना की प्रतीक नारी के साथ रहकर भी इन साधकों में उनके प्रति आसक्ति आकर्षण ना हो । ध्यान देने की बात यह है कि इन्हीं साधकों का एक वर्ग यौन आनंद को ब्रह्मानंद मानकर विशेष प्रकार की तांत्रिक प्रक्रियाओं का विकास कर रहा था ,फिर हुआ यह होगा कि नारी के आकर्षण से बचने के लिए उसे विष समान बताया गया और विशेष वर्ग के साधकों ने “विषकन्या” का आविष्कार किया।
    लोग आश्चर्य करते हैं कि आखिर विषकन्या है क्या? मान्यता यह थी कि यदि किसी कन्या को जन्म के तुरंत बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में इतना विष खिलाया जाए कि वह मरे नहीं, तो क्रमश: उसे उस मात्रा में विष को आत्मसात करने की आदत पड़ जाएगी, फिर धीरे-धीरे उसके भोजन में विष की मात्रा को क्रमश: बढ़ाया जाए, तो जब तक वह युवती होगी, तब तक उसके नित्य के भोजन में इतना विष सम्मिलित होगा कि जिसमें 50 से 100 व्यक्ति तक मर सकते हैं , परंतु उसके स्वास्थ्य पर उसका प्रभाव नहीं होगा । यही नहीं ,वह उस मात्रा के उत्तरोत्तर परिवर्तित होने वाले विष के बिना नहीं रह सकेगी।  बात वही है , जो आज ‘ड्रग एडिक्शन’ में होती है । इसके साथ साथ यह विश्वास चल पड़ा कि उस विषकन्या के शारीरिक संपर्क मात्र से व्यक्ति तुरंत मर सकता है। कुछ विषकन्या इतनी तीव्र प्रभावशाली मानी जाती थीं कि उनके स्पर्श -चुंबन मात्र से व्यक्ति की मृत्यु  हो जाती थी।
    ऐसी थी विष कन्या बनाने की विधि?
    कहते हैं कि विषकन्या बनाने में 15 से 20 वर्ष तक लगते थे।  विधि यह थी कि उस बालिका को आरंभ में संखिया ( कभी-कभी धतूरा भी ) दिया जाता था। एक चिकने पत्थर पर संखिया की ढेली से लकीरें खींची जाती और उसे उस कन्या को चटाया जाता था । लकीरों का आकार तथा उनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ाई जाती थी।  इस प्रकार उस कन्या के प्रतिदिन के भोजन में विशेषकर प्रातः के प्रथम कलेउ में विष की मात्रा बढ़ते बढ़ते आधी छटांक तक हो जाती थी । सर्वाधिक विषाक्त विषकन्या का स्पर्श मात्र घातक होता था।

    कहा जाता है कि कालांतर में राजनीति तथा कूटनीति में इनका प्रयोग होने लगा।  एक राजा दूसरे राजा को मारने के लिए सुंदरी विषकन्या का प्रयोग करता था। धोखे से विषकन्या पर आसक्त कराकर शत्रु को मारने का विधान शास्त्री दृष्टि से चाणक्य की कूटनीति में भी पाया जाता है। प्राचीन नाटकों में भी इसके उल्लेख मिलते हैं।
    वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो वह केवल कपोल कल्पना है।  इसका केवल इतना भाग सच है कि यदि आरंभ से विष या अन्य कोई वस्तु खिलाई जाए तो मानव शरीर उसका अभ्यस्त हो जाता है और फिर उसकी उत्तरोत्तर बढ़ती हुई मात्रा को भी सहन कर सकता है, जैसा कि अफीम, हीरोइन आदि नशीली वस्तुओं के साथ होता है।  यह एकदम गलत है कि विषकन्या से शारीरिक संसर्ग या स्पर्श होते ही कोई व्यक्ति मर सकता है ,वास्तव में होता यह था कि कुछ परम सुंदरियां स्त्रियों , नर्तकियों और वेश्याओं आदि को विष के प्रयोग की शिक्षा दी जाती थी और वह संबद्ध व्यक्ति को मुग्ध करके उसे खाने पीने के पदार्थों के साथ विष दे देती थीं। उसके बाद या तो वे भाग जाती थीं या पकड़े जाने पर मारी जाती थी।  इन्हीं विषकन्या देने वाली  स्त्रियों को विषकन्या कहा जाता था। यद्यपि यह सत्य की प्राचीन विश्वास के कारण अनेक योगियों -अघोरियों  ने कुछ कन्याओं को विष खिलाकर उन्हें विषकन्या बनाने का प्रयत्न किया है और इस सिलसिले में असंख्य सुंदर अबोध दुधनी दूधमुहीं कन्याएं मरी हैं।
    कर्नाटक में हेलेबिड के प्राचीन मंदिरों में सांपों के साथ विश्व कन्याओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हुई मिलती हैं। समझा जाता था कि कुछ विषकन्याएं सर्प विष खाकर उनकी उसकी मात्रा को क्रमश: बढ़ाते हुए पूर्ण विषकन्या की स्थिति को प्राप्त होती थी। सांपों को पकड़ना उनको पालना उनका विष निकालना तथा उनके साथ खेलना उनका स्वभाव हो जाता था।
    यदि विषकन्या की कल्पना में कुछ भी वास्तविकता है तो इससे भयानक मनोवैज्ञानिक अत्याचार और कोई नहीं है। निर्दोष अबोध कन्याओं के जीवन को नष्ट करने की यह विधि परम भयावह रही होगी । यह निश्चित हुआ करता था कि विषकन्या का अंत जवानी में ही हो जाता था क्योंकि उसका प्रयोग तभी तक हो सकता था जब तक उसका शरीर सुंदर तथा आकर्षक रहता था। पकड़े जाने पर तुरंत बध या अग्नि में जलाया जाना कि उसके भाग्य में होता था।
    (रविवार 1985 में प्रकाशित आर्केश परंतप के लेख पर आधारित)

  • गीता प्रेस को गाँधी शांति पुरस्कार पर क्यों उठा विवाद ?

    गीता प्रेस को गाँधी शांति पुरस्कार पर क्यों उठा विवाद ?

    नई दिल्ली//साल 2021 का गांधी शांति पुरस्कार गीता प्रेस गोरखपुर को दिया जाएगा यह फैसला रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने सर्वसम्मति से किया है लेकिन इस फैसले पर सवाल और विवाद उठने लगे हैं. कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने गांधी शांति पुरस्कार के लिए गीता प्रेस के चयन को पुरस्कार का अपमान बताया है।
    इसको लेकर जयराम रमेश ने एक ट्वीट किया है। उन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर को पुरस्कार देने की तुलना गोडसे को सम्मानित करने से की है।  जयराम रमेश ने ट्ववीट में लिखा, “2021 के लिए गांधी शांति पुरस्कार गोरखपुर में गीता प्रेस को प्रदान किया गया है जो इस साल अपनी शताब्दी मना रहा है। अक्षय मुकुल द्वारा इस संगठन के बारे में 2015 की एक बहुत ही बेहतरीन जीवनी है जिसमें वह महात्मा के साथ इसके तूफानी संबंधों और उनके राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक एजेंडे पर उनके साथ चल रही लड़ाइयों का पता लगाता है। यह फैसला वास्तव में एक उपहास है और सावरकर और गोडसे को पुरस्कार देने जैसा है।”

    जयराम के ट्वीट से कांग्रेस भी नाराज

    सूत्रों का कहना है कि गीता प्रेस को लेकर जयराम रमेश के ट्वीट से कांग्रेस के कई नेता नाराज हैं। उन्होंने इस मामले में जयराम रमेश के बयान को गैर जरूरी बताया है।
    सियासी बयान बाजी शुरू
    गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार दिए जाने के एलान के बाद सियासी वार-पलटवार का दौर शुरू हो गया है. कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों पर मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने जवाब देते हुए कहा है कि कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति को देश जान चुका है. 
    सांसद भाजपा सांसद रवि किशन ने इसे कांग्रेस की बीमार मानसिकता बताते हुए कहा है कि यह कांग्रेस की सनातन धर्म के खिलाफ मनोवृत्ति का परिचायक है भाजपा प्रवक्ता से शहजाद पुनेवाला, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा और नेता रवि शंकर प्रसाद ने कांग्रेसको हिंदू विरोधी बताया है।
    पुरस्कार राशि नहीं लेगी गीता प्रेस
    गीता प्रेस की ओर से भी इस मामले पर बयान सामने आया है। उसकी ओर से कहा गया है कि वह केंद्र सरकार से इस पुरस्कार लेंगे लेकिन पुरस्कार के लिए मिलने वाली राशि नहीं लेंगे। बता दें कि इस पुरस्कार के साथ पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रुपये की राशि भी दी जाती है।
    100 पहले हुई थी स्थापना
    बता दें कि गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना 1923 में हुई थी। यह अब तक 14 भाषाओं में करीब 42 करोड़ किताबों का प्रकाशन किया है। गीता प्रेस की पहचान प्रमुख रूप से भगवत गीता के प्रकाशन को लेकर है। गीता प्रेस की ओर से अब तक जिन पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है उनमें 16 करोड़ से अधिक श्गीरी मद भगवत गीता हैं।
    गीता प्रेस के संस्थापकों और महात्मा गांधी के संबंध कैसे थे?
    नवभारत टाइम्स के अनुसार गीता प्रेस की स्थापना 1923 में की गई थी। इसके संस्थापक जयदयाल गोयनका और गीता प्रेस की पत्रिका कल्याण के संस्थापक संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार  के साथ महात्मा गांधी के करीबी संबंध थे। हालांकि छुआछूत और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों पर आगे चलकर महात्मा गांधी और गीता प्रेस के संस्थापकों के बीच मतभेद उभर आए। यह भी बताया जाता है कि 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद देशभर में जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उनमें पोद्दार और गोयनका भी शामिल थे। हालांकि 1992 में पी वी नरसिंह राव सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया था।

    अक्षय मुकुल ने गीता प्रेस और महात्मा गांधी के बारे में क्या लिखा है?
    अक्षय मुकुल ने ‘गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया  किताब लिखी है। मुकुल ने लिखा है, ‘पोद्दार 1926 में जमनलाल बजाज के साथ महात्मा गांधी के पास गए। वह कल्याण पत्रिका के लिए उनका आशीर्वाद लेना चाहते थे। गांधी ने उन्हें दो बातें कहीं। एक, विज्ञापन मत प्रकाशित करना। दूसरी, पुस्तक समीक्षा कभी मत छापना। पोद्दार ने ये सलाहें मान लीं। आज भी कल्याण और कल्याण कल्पतरु में न तो विज्ञापन छपता है और न ही पुस्तक समीक्षा छापी जाती है।’
    मुकुल ने लिखा है, ‘गीता प्रेस और महात्मा के रिश्तों में खटास तब आने लगी, जब जाति और सांप्रदायिकता के मुद्दों पर गहरे मतभेद उभरे। इनमें मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश का मामला भी था और पूना पैक्ट भी। गांधी ने छुआछूत पर पोद्दार का नजरिया बदलने की पूरी कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। गांधी के खिलाफ पोद्दार की तीखी बातें कल्याण पत्रिका में 1948 तक छापी जाती रहीं।’
    मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है कि 1948 में गोयनका और पोद्दार की गिरफ्तारी के बाद ‘उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला ने इन दोनों की सहायता करने से मना कर दिया। जब सर बद्रीदास गोयनका ने इन दोनों का केस अपने हाथ में लिया तो बिड़ला ने इसका भी विरोध किया। बिड़ला का कहना था कि ये दोनों लोग सनातन धर्म को नहीं, बल्कि शैतान धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं।’

    महात्मा गांधी की हत्या पर गीता प्रेस का क्या रुख था?
    1948 में हत्यारे नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को मार डाला। 30 जनवरी को हुई उस घटना से पूरा विश्व सिहर गया। दुनिया के तमाम नेताओं और संस्थाओं ने दुख जताया, लेकिन गीता प्रेस ने चुप्पी साध ली। अक्षय मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है, ‘महात्मा की हत्या पर गीता प्रेस ने सोची-समझी चुप्पी साध ली। जिस व्यक्ति के लेख और आशीर्वाद कभी कल्याण पत्रिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण हुआ करते थे, उनके बारे में अप्रैल 1948 तक इस पत्रिका ने एक शब्द भी नहीं लिखा। अप्रैल 1948 में पोद्दार ने गांधी के साथ अपनी विभिन्न मुलाकातों का जिक्र किया।’

    मुकुल ने अपनी किताब में लिखा है, ‘हिंदू राष्ट्रवाद के दायरे में इसने हिंदुओं को संगठित करने, धार्मिक शुद्धता वाली पहचान बनाने और सांस्कृतिक मूल्यों का एक मानक बनाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह 1923 से ही हर महत्वपूर्ण मोड़ पर हिंदू महासभा, जनसंघ और बीजेपी के विचारों के साथ खड़ा रहा है। जब भी समाज में तीखे सांप्रदायिक मतभेद उभरे, कल्याण पत्रिका ने एक धार्मिक पत्रिका की संजीदा भूमिका छोड़कर नफरत और धार्मिक पहचान की भाषा अपना ली।’

    गीता प्रेस के बारे में पीएम नरेंद्र मोदी ने क्या कहा?
    गीता प्रेस विश्व के बड़े प्रकाशकों में शामिल है। 14 भाषाओं में इसने करीब 42 लाख पुस्तकें प्रकाशित की हैं। इनमें 16 करोड़ 21 लाख प्रतियां श्रीमद भागवत गीता की हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने ट्वीट किया, ‘गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार 2021 मिलने पर मैं बधाई देता हूं। आपने पिछले 100 वर्षों में लोगों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के लिए सराहनीय कार्य किया है।’ यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  ने भी गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी पीस प्राइज मिलने पर बधाई दी।

    गांधी शांति पुरस्कार में कितनी राशि दी जाती है?
    गांधी शांति पुरस्कार की शुरुआत 1995 में की गई थी। यह हर वर्ष दिया जाने वाला पुरस्कार है। इसे महात्मा गांधी के आदर्शों के लिए काम करने वाले लोगों या संस्थाओं को दिया जाता है। यह पुरस्कार किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति या संस्था को दिया जा सकता है। पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रुपये, एक प्रशस्ति पत्र, एक स्मारक पट्टिका और हैंडलूम या हैंडीक्राफ्ट का एक परंपरागत आइटम दिया जाता है। इससे पहले यह पुरस्कार पाने वालों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और रामकृष्ण मिशन जैसे संगठन शामिल हैं। 2022 के लिए गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा नहीं की गई है।
    (मीडिया की ख़बरों के आधार पर)

  • केदारनाथ मंदिर के अन्दर सोने की परत काम में चढ़ाने के काम 125 करोड़ के घोटाले का आरोप, प्रबंधन ने दिया जवाब

    केदारनाथ मंदिर के अन्दर सोने की परत काम में चढ़ाने के काम 125 करोड़ के घोटाले का आरोप, प्रबंधन ने दिया जवाब

    देहरादून // प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर के एक वरिष्ठ पुजारी ने मंदिर के अंदर सोने की परत चढ़ाने के काम में घोटाले का आरोप लगाकर विवाद खड़ा कर दिया है,  पर इस दावे का मंदिर समिति ने जोरदार खंडन किया है,

    मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक केदारनाथ मंदिर महापंचायत के एक वरिष्ठ पुजारी संतोष त्रिवेदी ने जो  चार धाम महापंचायत के उपाध्यक्ष भी हैं ने श्री बदरीधाम केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी)  पर मंदिर के गर्भगृह के अंदर सोने के काम में 125 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया है। त्रिवेदी का आरोप है कि गर्भगृह के अंदर जो सोने की प्लेटें लगाई गई हैं, वे असल में पीतल की बनी हैं.

    बीकेटीसी ने आरोपों का खंडन किया है, समिति ने दावा किया कि घोटाले के आरोप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैलाई गई गलत सूचना का हिस्सा हैं।और इसे छोटे राजनीतिक तत्वों की साजिश का हिस्सा बताया है, जो यात्रा को प्रभावित करने और केदारनाथ धाम की छवि को खराब करने के लिए अफवाहें फैला रहे हैं,  समिति ने यह भी कहा है कि वह इसे बदनाम करने की कोशिश करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी।

    बीकेटीसी ने कहा है कि सोना चढ़ाने का काम भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण के विशेषज्ञों की देखरेख में किया गया है  गर्भगृह को स्वर्ण जड़ित करने का कार्य स्वयं दानदाता ने अपने स्तर से किया। दानदाता ने अपने स्तर से ज्वेलर्स से तांबे की प्लेटें तैयार करवाई व फिर उन पर सोने की परतें चढ़ाई और अपने ज्वेलर्स के माध्यम से ही इन प्लेटों को मंदिर में स्थापित कराया।

    बीकेटीसी ने स्पष्ट किया है कि बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अधिनियम 1939 में दिए गए प्रावधान और राज्य सरकार से अनुमति के अनुसार दान स्वीकार किया गया था। गर्भगृह में स्थापित सोने और तांबे की प्लेटों के बिल और वाउचर काम पूरा होने के बाद बीकेटीसी को दिए गए थे, और नियमानुसार मंदिर की स्टॉक बुक में दर्ज किए गए हैं। दानस्वरूप किए इस कार्य के लिए दानी व्यक्ति अथवा किसी फर्म की ओर से बीकेटीसी के समक्ष किसी प्रकार की शर्त नहीं रखी गई न ही दानदाता ने बीकेटीसी से आयकर अधिनियम की धारा- 80 जी का प्रमाण पत्र मांगा।

    इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सोने की प्लेटें मुंबई के व्यवसायी द्वारा दान की गई थीं, जो गुमनाम रहना चाहते थे, और राज्य सरकार ने मंदिर को 230 किलो सोना दान करने के उनके प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।