Category: कानून

  • दस दलित लोगों की हत्या के मामले में 42 साल बाद आया फैसला,एक मात्र जीवित आरोपी 90 साल के बुजुर्ग को उम्रकैद की सजा !

    दस दलित लोगों की हत्या के मामले में 42 साल बाद आया फैसला,एक मात्र जीवित आरोपी 90 साल के बुजुर्ग को उम्रकैद की सजा !

    लखनऊ // 1981 में उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद थाना क्षेत्र में हुए दलित समुदाय के 10 लोगों के  हत्याकांड में 42 साल बाद फिरोजाबाद की जिला अदालत ने पिछले हफ्ते फैसला दिया है । अदालत ने दस आरोपियों में से 90 साल के एक मात्र जीवित आरोपी को आजीवन कारवास (उम्र कैद ) की सजा सुनाई है ,आरोपी पर 55हजार का जुर्माना भी किया है जिसे नहीं चुकाने पर 13 महीने और जेल में बिताने होंगें .

    सजा पाने वाले बुजुर्ग का नाम गंगादयाल है। उम्रकैद की सजा पाए बुजुर्ग की हालत ऐसी है कि वो खुद अपने पैरों में खड़ा नहीं हो सकता। उसे चलने के लिये भी सहारा चाहिए। सजा सुनाए जाने के बाद पुलिस वाले उसे पकड़ कर अदालत से बाहर ले गये.  बुजुर्ग को 90 साल की उम्र में मिली उम्रकैद का ये मामला अब सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है।

    क्या था मामला ?

    मीडिया खबरों के अनुसार मामला 1981 का है उत्तर प्रदेश के  फिरोजाबाद के मक्खनपुर इलाके  के साधुपुर गाँव में दलित ग्रामीणों ने एक राशन दूकान के मालिक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी ,इस बात से नाराज दुकानदार ने अपने साथियों के साथ मिलकर अपने घर में खाना बना रहे इन लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी जिसमे दस लोगों की मौत हो गई थी कुछ घायल हुए थे जिसमे महिलाएं भी थी, इस मामले में दस लोगों को दोषी माना गया था.इस मुकदमे की सुनावी के दौरान 9 आरोपियों की मौत हो गई ,90 साल का गंगादयाल एक मात्र जीवित आरोपी है .

    आज तक के मुताबिक इस मामले को लेकर उस वक्त राजनीतिक गलियारों में खूब बवाल मचा था , देश भर में इस कांड की काफी चर्चा हुई थी ,तत्कालीन प्रधानमंत्री इण्डिया गाँधी भी सधुपुर पहुंची थीं ,अटल बिहारी वाजपेयी ने मक्खनपुर से साधुपुर तक मार्च किया था .

    न्याय प्रणाली पर सवाल ?

    भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली अपनी सुस्ती के लिए जानी जाती है और यह कोई अकेली घटना नहीं है , बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी तक भारतीय अदालतों में लगभग 50 मिलियन मामले लंबित थे, ।

    पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की कमी, पुरानी प्रक्रियाओं और गवाहों के परीक्षण में  लगने वाले समय को न्याय में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।

     डेली ब्रीफ के अनुसार न्याय में देरी से पीड़ित परिवारों को काफी परेशानी हुई है, पीड़ित परिवार के लोग मानते हैं कि अदालत का फैसला उनके लिए कोई अर्थ रखने के लिए बहुत देर से आया है।

    हमले में बची प्रेमवती ने अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया जानने आए पत्रकारों से कहा कि भगवान ही जाने क्या यह न्याय है।’ वहीं हमले में परिवार के एक सदस्य को खोने वाले ग्रामीण महाराज सिंह ने कहा कि “हम सराहना करते हैं कि आखिरकार हमें न्याय मिला है, लेकिन यह सही समय पर नहीं आया। अगर हमें समय पर न्याय मिला होता तो हमें और खुशी होती।

    वकील अक्षत वाजपेयी कहते हैं यह वास्तव में ‘जस्टिस इज डिले ,जस्टिस इज डीनाय’ का मामला है  लोग दो-तीन साल की देरी की तो मान  सकते हैं, लेकिन 40 साल ?  बाजपेयी कहते हैं कि यह भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलता है कि पीड़ित और उनके परिवारों को 42 साल तक पीड़ा में रहना पड़ा।

  • केरल हाईकोर्ट ने कहा- नग्नता और अश्लीलता हमेशा एक नहीं होती..!

    केरल हाईकोर्ट ने कहा- नग्नता और अश्लीलता हमेशा एक नहीं होती..!

    कोर्ट ने अर्धनग्न शरीर पर बच्चों से पेंटिंग करवाने वाली महिला को किया बरी

    कोच्चि // केरल हाईकोर्ट ने पास्को कानून से जुड़े एक मामले में महिला अधिकार कार्यकर्ता को बरी कर दिया! 33 वर्षीय रेहाना फातिमा नाम की इस महिला अधिकार एक्टिविस्ट के विरुद्ध बच्चों का यौन शोषण से संरक्षण (पॉक्सो ) कानून किशोर न्यायालय और सूचना एवं प्रौद्योगिकी कानून के तहत मुकदमा चल रहा था।

    क्या है पूरा मामला?

     कुछ महीनों पहले रेहाना फातिमा का एक वीडियो सामने आया था जिसमें वे अपने नाबालिग बच्चों के सामने अर्धनग्न (सेमी न्यूड) खड़ी थी और उन्होंने उन्हें अपने शरीर पर पेंटिंग की अनुमति दी थी।  इसका वीडियो वायरल होने के बाद उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था । रेहाना आरोपों का सामना कर रही थी । निचली अदालत ने फातिमा को दोष मुक्त करने वाली याचिका को खारिज कर दिया था । फातिमा ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी । 

    उच्च न्यायालय में फातिमा ने कहा था कि “बॉडी पेंटिंग” समाज के उस दृष्टिकोण के खिलाफ एक राजनीतिक बयान के रूप में थी, जिनमें सभी मानते हैं कि महिलाओं के शरीर का नग्न उपरी हिस्सा किसी भी रूप में यौन संतुष्टि या यौन क्रियाओं से जुड़ा है, जबकि पुरुषों के शरीर के निर्वस्त्र ऊपरी हिस्से को इस रूप में नहीं देखा जाता ।

    उच्च न्यायालय ने क्या कहा ?

    केरल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति कौसर एदाप्पागथ  ने फातिमा को आरोप मुक्त करते हुए कहा कि -आधी आबादी को अपने शरीर पर स्वायत्तता का अधिकार नहीं मिलता, अपने शरीर व जीवन के संबंध में फैसले लेने के कारण उन्हें परेशानी व दंड का सामना करना पड़ता है और अलग-थलग कर दिया जाता है।

     जस्टिस कौसर एदाप्पागथ ने कहा कि महिला कार्यकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप के आधार पर किसी के लिए यह तय करना संभव नहीं है कि बच्चों का किसी भी रूप से यौन संतुष्टि के लिए उपयोग हुआ है। उन्होंने बस अपने शरीर को कैनवास के रूप में अपने बच्चों को इस्तेमाल करने दिया था।  अदालत ने कहा कि अपने शरीर के बारे में फैसले लेने का अधिकार महिलाओं की समानता और निजता के मौलिक अधिकार के मूल में  है।

    उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसी” निर्दोष कलात्मक” अभिव्यक्ति को किसी भी रूप में यौन क्रिया से जोड़ना क्रूर है।  अभियोजन पक्ष ने अपनी दलील में इसे अश्लील और असभ्य बताया था । इस दलील को नकारते हुए अदालत ने कहा कि नग्नता और अश्लीलता हमेशा पर्यायवाची नहीं होते।  नग्नता को अनिवार्य रूप से अश्लील , असभ्य या अनैतिक करार देना गलत है। अदालत ने कहा कि एक समय में केरल की निचली जाति की महिलाओं ने अपने स्तन ढकने के अधिकार की लड़ाई लड़ी थी। देश के विभिन्न प्राचीन और सार्वजनिक स्थानों पर तमाम देवी-देवताओं और प्रतिमाएं और कलाकृतियां हैं जो अर्धनग्न अवस्था में है उन्हें पवित्र माना जाता है । अदालत ने कहा कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो महिलाओं की नग्नता को कलंक मानते हैं और उसे सिर्फ यौन तुष्टी से जोड़कर भर देखते हैं । फातिमा द्वारा जारी वीडियो का मकसद समाज में मौजूद इस दौरे में मापदंड का पर्दाफाश करना था। न्यायालय ने कहा कि नग्नता को सेक्स के साथ जोड़ना नहीं जोड़ना चाहिए।

    (नवभारत टाइम्स और एजेंसी खबरों के आधार पर )

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत के लिए कुंडली मिलाने का दिया आदेश, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत के लिए कुंडली मिलाने का दिया आदेश, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

    नईदिल्ली // हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा ही अनोखा और विचित्र सा फैसला दिया जिसमें रेप केस के आरोपी को जमानत देने के मामले में कोर्ट ने लखनऊ विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग को आदेश दिया था कि 3 सप्ताह में पीड़ित युवती की कुंडली की जांच कर यह बताएं कि युवती मांगलिक है या नहीं। यह रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी जाए।

     क्या है मामला ?

    इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने के आरोप में जेल में है। आरोपी शिक्षक ने अपनी जमानत के लिए हाईकोर्ट में अर्जी लगाई थी । सुनवाई के दौरान आरोपी ने अपने वकील के माध्यम से दलील दी थी कि पीड़िता मांगलिक है, इसलिए उससे शादी नहीं कर सकता। आरोपी की इस दलील को सुनने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस बृजराज सिंह ने लखनऊ विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग को रेप पीड़िता की कुंडली जांच करने का आदेश दिए। आदेश में कहा गया था कि याचिकाकर्ता का दावा है कि लड़की मांगलिक है लिहाजा उसकी शादी गैर मांगलिक आदमी के साथ नहीं हो सकती । ऐसे में यह जानने के लिए क्या वाकई लड़की मांगलिक है या नहीं? दोनों पक्ष लखनऊ विश्वविद्यालय ज्योतिष विभाग अध्यक्ष के सामने अपनी कुंडली पेश करें । हाईकोर्ट ने ज्योतिष विभाग के अध्यक्ष को कुंडलियों का मिलान और अध्ययन कर 3 हफ्ते में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए।

    इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला चर्चा में आ गया मीडिया में इसे प्रमुखता से छापा गया। मीडिया रिपोर्ट्स को देखकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर शनिवार को इसकी सुनवाई की और हाईकोर्ट के इस आदेश पर रोक लगा दी।

    शीर्ष न्यायालय ने लिया स्वत संज्ञान

    शनिवार को छुट्टी होने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय की विशेष खंडपीठ ने मामले का संज्ञान लिया । न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की पीठ ने सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर आश्चर्य व्यक्त किया।  पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश पीठ की विषय वस्तु है हम योग्यता( मेरिट) पर कुछ नहीं कहते। हम 23 मई के आदेश पर रोक लगाते हैं । शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि इस मामले में अगली तारीख में उच्च न्यायालय द्वारा गुण दोष के आधार पर फैसला लिया जाए।

    शीर्ष न्यायालय के समक्ष बहस के दौरान सॉलीसीटर जनरल ने कहा कि हाई कोर्ट का निर्देश परेशान करने वाला है और इस पर रोक लगाई जानी चाहिए। श्री मेहता का कहना था कि ज्योतिष एक विज्ञान है लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या अदालत का आदेश इसमें शामिल हो सकता है। शीर्ष अदालत का कहना है कि हमें समय समझ में नहीं आता कि यह ज्योतिष रिपोर्ट क्यों मांगी गई?  शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि आदेश पक्षकारों की सहमति से पारित किया गया था।

  • पूर्व क्रिकेटर  ने क्यों किया पंजाब केसरी पर मुकदमा ?

    पूर्व क्रिकेटर  ने क्यों किया पंजाब केसरी पर मुकदमा ?

    नई दिल्ली// पूर्व क्रिकेटर और भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने पंजाब केसरी अखबार के खिलाफ ₹2 करोड़ हर्जाने की मांग को लेकर दिल्ली एचसी के समक्ष मानहानि का मुकदमा दायर किया है

    गंभीर ने अखबार द्वारा प्रकाशित कहानियों के एक समूह के लिए पंजाब केसरी, इसके प्रधान संपादक और दो पत्रकारों पर मुकदमा दायर किया है।
    पूर्व क्रिकेटर और बीजेपी सांसद (सांसद) गौतम गंभीर ने हिंदी अखबार पंजाब केसरी के खिलाफ ₹2 करोड़ का हर्जाना मांगने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर किया है।

    गंभीर ने अखबार, उसके संपादक आदित्य चोपड़ा के साथ-साथ संवाददाताओं अमित कुमार और इमरान खान पर यह कहते हुए मुकदमा दायर किया है कि उन्होंने व्यवस्थित रूप से उन्हें निशाना बनाते हुए कई दुर्भावनापूर्ण और अपमानजनक लेख प्रकाशित करके अपनी पत्रकारिता की स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है।

    अधिवक्ता जय अनंत देहदराई के माध्यम से दायर अपने मुकदमे में, गंभीर ने दावा करने के लिए रिपोर्टों के एक समूह का हवाला दिया कि कागज ने अपनी कहानियों को एक भ्रामक स्पिन दिया। एक रिपोर्ट में उनकी तुलना पौराणिक राक्षस भस्मासुर से भी की गई थी, इसका विरोध किया गया था।

    सूट में उल्लिखित कुछ रिपोर्ट हैं:

    सांसद गौतम गंभीर लापता गली-गली में लगे पोस्टर;

    दिल्ली के लापता सांसद लखनऊ सुपर जाइंट्स के लिए बने भस्मासुर (लखनऊ सुपर जायंट्स के लिए दिल्ली का लापता सांसद बना भस्मासुर);

    आदेश गुप्ता बोलते रह गए, गौतम गंभीर उठ चले (आदेश गुप्ता बोलते रहे, गौतम गंभीर चले गए);

    ये नए मिजाज के सांसद है जरा फासलो से मिला करो।

    गंभीर ने तर्क दिया कि ये रिपोर्ट उनके काम के बारे में एक झूठी और गहरी अपमानजनक कहानी बनाती हैं और पाठकों के मन में एक सांसद के रूप में रहती हैं।

    रिपोर्ट में उन्हें एक जातिवादी व्यक्ति और एक उच्च नाक वाले राजनेता के रूप में चित्रित किया गया था, यह इंगित किया गया था।

    गंभीर ने धर्मार्थ संगठनों को 2 करोड़ रुपये का हर्जाना देने की मांग की है। उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि प्रतिवादियों को बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए और इसे पंजाब केसरी द्वारा प्रसारित सभी समाचार पत्रों (डिजिटल संस्करणों सहित) में प्रकाशित किया जाना चाहिए।

    उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया कि उनके खिलाफ किए गए प्रत्येक अपमानजनक प्रकाशन को वापस लेने के लिए कागज को निर्देश जारी किए जाने चाहिए।

    वाद को न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

  • आधार कार्ड आयु के निर्धारण का आधार नहीं- हाईकोर्ट

    आधार कार्ड आयु के निर्धारण का आधार नहीं- हाईकोर्ट

    जुवेनाइल जस्टिस पर महत्वपूर्ण निर्णय

    जबलपुर // मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय कहा है कि आयु निर्धारण के लिए आधार कार्ड स्वीकार नहीं है . इस मामले में उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर भरोसा किया जिसमे कहा गया कि आधार केवल UIDAI द्वारा जारी किया गया एक दस्तावेज है और इस प्रकार जेजे अधिनियम के वैधानिक प्रावधानो का अधिक्रमण नही कर सकता है।
    मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने हाल ही में कहा है कि आधार कार्ड नाबालिग बलात्कार पीड़िता की उम्र निर्धारित करने का प्रमाण नहीं है। [मनोज कुमार यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य]।

    एकल न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल ने कहा कि नाबालिग बलात्कार पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए अदालतों को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया पर विचार करना होगा।

    मामले में तथ्य यह है कि याचिकाकर्ता पर नाबालिग से कथित रूप से बलात्कार करने का मुकदमा चल रहा है .सुनवाई के दौरान उसने ट्रायल कोर्ट के समक्ष आवेदान दिया ,जिसमे नाबालिग शिकायतकर्ता के आधार कार्ड की मूल प्रति लाने का निर्देश देने की मांग की गई ,कोर्ट ने यह आवेदन निरस्त कर दिया ,इसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट का रुख किया .

    पीठ ने कहा कि जेजे एक्ट किसी व्यक्ति की आयु निर्धारित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र और स्कूल छोड़ने के प्रमाण पत्र पर निर्भर होने का प्रावधान करता है। बेंच ने कहा कि उन दस्तावेजों की अनुपस्थिति में, अधिनियम में किसी व्यक्ति की उम्र निर्धारित करने के लिए अस्थि परीक्षण का प्रावधान है।

    पीठ ने 19 अप्रैल के आदेश में कहा, “इसलिए, उपलब्ध वैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए और अधिनियम के तहत निर्धारित अनुमान और आयु के निर्धारण के लिए आधार कार्ड को आयु के प्रमाण के रूप में लेने का कोई प्रावधान नहीं है, मेरी राय है कि इस उच्च न्यायालय के पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप की मांग करने वाले आक्षेपित आदेश में कोई अवैधता नहीं है।”

    न्यायमूर्ति अग्रवाल को एक विशेष अदालत द्वारा 8 अप्रैल, 2023 को आयु के प्रमाण के रूप में आधार कार्ड को स्वीकार करने से इनकार करने के आदेश में संशोधन की मांग करने वाली एक याचिका जब्त की गई थी।

    अपीलकर्ता ने जब्बार बनाम राज्य के मामले में दिए गए दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें उच्च न्यायालय ने कहा था कि आधार एक श्रेष्ठ दस्तावेज है और उम्र का निर्धारण करते समय इस पर विचार किया जाना चाहिए।

    पीठ ने, हालांकि, जरनैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों पर भरोसा किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि जेजे अधिनियम के तहत वैधानिक नियमों को केवल इसलिए नहीं बदला जा सकता है क्योंकि भारत सरकार द्वारा एक विशेष दस्तावेज जारी किया गया है। .

    वास्तव में वह दस्तावेज भारत सरकार द्वारा जारी नहीं किया जाता है, बल्कि एक स्वतंत्र एजेंसी, अर्थात् भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) द्वारा जारी किया जाता है।

    शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा,

    “इस प्रकार, मेरी राय में चूंकि आधार कार्ड अभियोजिका की उम्र का प्रमाण नहीं है और उसकी उम्र को जेजे अधिनियम के अनुसार आवश्यक रूप से निर्धारित किया जाना है, यह पुनरीक्षण याचिका विफल होती है और खारिज की जाती है।”

  • पूरा फैसला तैयार किये बिना जज नहीं सुना सकते अंतिम निर्णय, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

    पूरा फैसला तैयार किये बिना जज नहीं सुना सकते अंतिम निर्णय, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

    नयी दिल्ली, // उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि एक न्यायिक अधिकारी फैसले के पूरे पाठ को तैयार किए बिना या लिखे बिना, उसके निष्कर्ष वाले हिस्से को खुली अदालत में सुना नहीं सकता।

    साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में निचली अदालत के उस न्यायाधीश को बर्खास्त करने का भी निर्देश दिया, जिन्हें एक मामले में फैसला तैयार किए बिना, उसका निष्कर्ष वाला हिस्सा सुना देने का दोषी पाया गया था।

    उच्चतम न्यायालय की यह व्यवस्था कर्नाटक उच्च न्यायालय के महापंजीयक (रजिस्ट्रार जनरल) की एक अपील पर आई है । इस अपील में पूर्ण अदालत द्वारा न्यायाधीश को बर्खास्त करने संबंधी दिए गए आदेश को रद्द कर उनकी बहाली के लिए दिए गए उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश को चुनौती दी गई थी।

    न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल  की पीठ ने गंभीर आरोपों को ‘‘छिपाने’’ के लिए कर्नाटक उच्च न्यायालय पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि न्यायाधीश का आचरण अस्वीकार्य है।

    पीठ ने कहा ‘‘यह सच है कि कुछ आरोपों का न्यायिक घोषणाओं और न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से संबंध होता है लेकिन वे विभागीय कार्यवाही का आधार नहीं बन सकते हैं।’’

    आगे पीठ ने कहा ‘‘इसलिए, हम उन आरोपों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। ’’ पीठ के अनुसार, लेकिन जो आरोप प्रतिवादी की ओर से निर्णय तैयार करने/लिखने में घोर लापरवाही और उदासीनता से संबद्ध तथा अपरिवर्तनीय हैं, वे पूरी तरह से अस्वीकार्य और एक न्यायिक अधिकारी के लिए अशोभनीय हैं।

    शीर्ष अदालत ने कहा कि जज का अपने बचाव में यह कहना भी पूर्णत: अस्वीकार्य है कि अनुभव की कमी और स्टेनोग्राफर की अक्षमता इसके लिए जिम्मेदार है।

    पीठ के अनुसार, ‘‘लेकिन दुर्भाग्य से, उच्च न्यायालय ने न केवल पंचतंत्र की इस कहानी को स्वीकार किया, बल्कि गवाह के रूप में स्टेनोग्राफर से जिरह नहीं करने के लिए प्रशासन तक को दोषी ठहरा दिया। इस तरह का दृष्टिकोण पूरी तरह से अस्थिर है।’’

    पीठ ने कहा, ‘‘अगर प्रतिवादी का यह मानना था कि सारा दोष स्टेनोग्राफर का है, तो स्टेनोग्राफर को गवाह के रूप में बुलाना उसका जिम्मा था। उच्च न्यायालय ने दुर्भाग्य से सबूत की जिम्मेदारी ही बदल दी।’’

    साथ ही पीठ ने कहा कि उसके सामने ऐसा कोई मामला नहीं आया जिसमें उच्च न्यायालय ने जुर्माने का आदेश खारिज करते हुए यह कहा हो कि कसूरवार के खिलाफ आगे जांच नहीं होगी । ‘‘लेकिन इस मामले में, एक नया उदाहरण तैयार करते हुए उच्च न्यायालय ने वैसा ही किया।’’