Category: इतिहास /पुरातत्व

  • क्या सचमुच होती थीं विषकन्याएं ?

    क्या सचमुच होती थीं विषकन्याएं ?

    वैदिक साहित्य, लोक कथाओं और इतिहास में हमेशा से ही विषकन्याओं का जिक्र मिलता है. कहा जाता है कि विषकन्या का प्रयोग राजा अपने शत्रु का छलपूर्वक अन्त करने के लिए किया करते थे। इसकी प्रक्रिया में किसी सुन्दर बालिका को बचपन से ही विष की अल्प मात्रा देकर पाला जाता था और विषैले वृक्ष तथा विषैले प्राणियों के सम्पर्क से उसको अभ्यस्त किया जाता था। इसके अतिरिक्त उसको संगीत और नृत्य की भी शिक्षा दी जाती थी, एवं सब प्रकार की छल विधियाँ सिखाई जाती थीं। अवसर आने पर इस विषकन्या को युक्ति और छल के साथ शत्रु के पास भेज दिया जाता था। इसका श्वास तो विषमय होता ही था, परन्तु यह मुख में भी विष रखती थी, जिससे संसर्ग करनेवाला पुरुष रोगी होकर मर जाता था। चाणक्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र (ग्रन्थ) में तथा कल्कि पुराण में विषकन्याओं की चर्चा है।

    विषकन्या बनाने तथा उसके प्रयोग की विधि के संकेत रामायण काल तक नहीं मिलते ,महाभारत काल में इसका उल्लेख पाया जाता है परंतु इसका प्रचुर उल्लेख बौद्ध काल के बाद ही मिलता है। एक विचित्र बात यह है कि स्वर्ण रसायन तथा विषकन्या दोनों के प्रयोग लगभग एक साथ विकसित हुए हैं। रसायन के साथ इनका जुड़ा होना बौद्ध काल में रसायन का खूब विकास होना दोनों के निकट संबंध का द्योतक है। कहा जाता है कि नागार्जुन ने अंत में स्वर्ण रसायन का आविष्कार कर लिया था, जिसके द्वारा तांबे (अथवा किसी अन्य सस्ती धातु)  को रासायनिक प्रक्रिया से सोने में परिवर्तित किया जा सकता था । यह भी विश्वास किया जाता है कि यह प्रक्रिया नागार्जुन के साथ ही लुप्त हो गई और बाद में रसायन शास्त्री इसे निरंतर खोजते रहे ।

    बौद्ध मत के पतन का कारण था इसमें आज आने वाले कर्मकांड संबंधी तथा वैचारिक दोष। हीनयान तथा महायान में विभाजित होने पर बौद्ध मत ने ही आगे चलकर हठयोगियों, नाथपंथियों, वामाचारियों तथा ऐसे अन्य संप्रदायों को उत्पन्न किया। आरंभ में विषकन्या बनाने का काम यही लोग करते थे। कापालिक, तांत्रिक तथा अघोरियों का जिक्र इस संबंध में आता है।

    कुछ लोग बौद्ध मत को नकारात्मक मानते है, क्योंकि उसमें न केवल संसार में भोग विलास की अस्वीकृति है ,अपितु स्वयं संसार को ही दुखमय, क्षणिक एवं मिथ्या माना गया है।  कुछ कापालिकों, वामाचारियोंं और योगियों में एक परंपरा यह चल पड़ी थी कि उनके इंद्रिय निग्रह का प्रमाण यह माना जाएगा कि विषय वासना की प्रतीक नारी के साथ रहकर भी इन साधकों में उनके प्रति आसक्ति आकर्षण ना हो । ध्यान देने की बात यह है कि इन्हीं साधकों का एक वर्ग यौन आनंद को ब्रह्मानंद मानकर विशेष प्रकार की तांत्रिक प्रक्रियाओं का विकास कर रहा था ,फिर हुआ यह होगा कि नारी के आकर्षण से बचने के लिए उसे विष समान बताया गया और विशेष वर्ग के साधकों ने “विषकन्या” का आविष्कार किया।
    लोग आश्चर्य करते हैं कि आखिर विषकन्या है क्या? मान्यता यह थी कि यदि किसी कन्या को जन्म के तुरंत बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में इतना विष खिलाया जाए कि वह मरे नहीं, तो क्रमश: उसे उस मात्रा में विष को आत्मसात करने की आदत पड़ जाएगी, फिर धीरे-धीरे उसके भोजन में विष की मात्रा को क्रमश: बढ़ाया जाए, तो जब तक वह युवती होगी, तब तक उसके नित्य के भोजन में इतना विष सम्मिलित होगा कि जिसमें 50 से 100 व्यक्ति तक मर सकते हैं , परंतु उसके स्वास्थ्य पर उसका प्रभाव नहीं होगा । यही नहीं ,वह उस मात्रा के उत्तरोत्तर परिवर्तित होने वाले विष के बिना नहीं रह सकेगी।  बात वही है , जो आज ‘ड्रग एडिक्शन’ में होती है । इसके साथ साथ यह विश्वास चल पड़ा कि उस विषकन्या के शारीरिक संपर्क मात्र से व्यक्ति तुरंत मर सकता है। कुछ विषकन्या इतनी तीव्र प्रभावशाली मानी जाती थीं कि उनके स्पर्श -चुंबन मात्र से व्यक्ति की मृत्यु  हो जाती थी।
    ऐसी थी विष कन्या बनाने की विधि?
    कहते हैं कि विषकन्या बनाने में 15 से 20 वर्ष तक लगते थे।  विधि यह थी कि उस बालिका को आरंभ में संखिया ( कभी-कभी धतूरा भी ) दिया जाता था। एक चिकने पत्थर पर संखिया की ढेली से लकीरें खींची जाती और उसे उस कन्या को चटाया जाता था । लकीरों का आकार तथा उनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ाई जाती थी।  इस प्रकार उस कन्या के प्रतिदिन के भोजन में विशेषकर प्रातः के प्रथम कलेउ में विष की मात्रा बढ़ते बढ़ते आधी छटांक तक हो जाती थी । सर्वाधिक विषाक्त विषकन्या का स्पर्श मात्र घातक होता था।

    कहा जाता है कि कालांतर में राजनीति तथा कूटनीति में इनका प्रयोग होने लगा।  एक राजा दूसरे राजा को मारने के लिए सुंदरी विषकन्या का प्रयोग करता था। धोखे से विषकन्या पर आसक्त कराकर शत्रु को मारने का विधान शास्त्री दृष्टि से चाणक्य की कूटनीति में भी पाया जाता है। प्राचीन नाटकों में भी इसके उल्लेख मिलते हैं।
    वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो वह केवल कपोल कल्पना है।  इसका केवल इतना भाग सच है कि यदि आरंभ से विष या अन्य कोई वस्तु खिलाई जाए तो मानव शरीर उसका अभ्यस्त हो जाता है और फिर उसकी उत्तरोत्तर बढ़ती हुई मात्रा को भी सहन कर सकता है, जैसा कि अफीम, हीरोइन आदि नशीली वस्तुओं के साथ होता है।  यह एकदम गलत है कि विषकन्या से शारीरिक संसर्ग या स्पर्श होते ही कोई व्यक्ति मर सकता है ,वास्तव में होता यह था कि कुछ परम सुंदरियां स्त्रियों , नर्तकियों और वेश्याओं आदि को विष के प्रयोग की शिक्षा दी जाती थी और वह संबद्ध व्यक्ति को मुग्ध करके उसे खाने पीने के पदार्थों के साथ विष दे देती थीं। उसके बाद या तो वे भाग जाती थीं या पकड़े जाने पर मारी जाती थी।  इन्हीं विषकन्या देने वाली  स्त्रियों को विषकन्या कहा जाता था। यद्यपि यह सत्य की प्राचीन विश्वास के कारण अनेक योगियों -अघोरियों  ने कुछ कन्याओं को विष खिलाकर उन्हें विषकन्या बनाने का प्रयत्न किया है और इस सिलसिले में असंख्य सुंदर अबोध दुधनी दूधमुहीं कन्याएं मरी हैं।
    कर्नाटक में हेलेबिड के प्राचीन मंदिरों में सांपों के साथ विश्व कन्याओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हुई मिलती हैं। समझा जाता था कि कुछ विषकन्याएं सर्प विष खाकर उनकी उसकी मात्रा को क्रमश: बढ़ाते हुए पूर्ण विषकन्या की स्थिति को प्राप्त होती थी। सांपों को पकड़ना उनको पालना उनका विष निकालना तथा उनके साथ खेलना उनका स्वभाव हो जाता था।
    यदि विषकन्या की कल्पना में कुछ भी वास्तविकता है तो इससे भयानक मनोवैज्ञानिक अत्याचार और कोई नहीं है। निर्दोष अबोध कन्याओं के जीवन को नष्ट करने की यह विधि परम भयावह रही होगी । यह निश्चित हुआ करता था कि विषकन्या का अंत जवानी में ही हो जाता था क्योंकि उसका प्रयोग तभी तक हो सकता था जब तक उसका शरीर सुंदर तथा आकर्षक रहता था। पकड़े जाने पर तुरंत बध या अग्नि में जलाया जाना कि उसके भाग्य में होता था।
    (रविवार 1985 में प्रकाशित आर्केश परंतप के लेख पर आधारित)

  • इमा कैथल  यानी  500 साल पुराना अनोखा बाज़ार

    इमा कैथल यानी 500 साल पुराना अनोखा बाज़ार

    सिर्फ बाज़ार ही नहीं संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की पूरी कहानी है

     इम्फाल // भारत विविधताओं से भरा देश है. इसका इतिहास,भूगोल,धर्म और संस्कृति का मिल जुल कर कई बार इसे ऐसा रूप दे देती है कि हैरानी होती है . ऐसी ही एक हैरान करने वाली जगह है इमा कैथल

    क्या है इमा कैथल

    इमा कैथल मणिपुर की राजधानी इम्फाल का एक ऐसा बाजार है जो हमारे देश की अनमोल और अनूठी सांस्कृतिक विरासत का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है. इस अनोखे  बाजार की खास बात यह थी कि यहां दुकानदार केवल और केवल महिलाएं हैं । इस बाजार में  पारंपरिक वेशभूषा में हजारों महिलाएं अपनी दुकानें सजाकर बैठती हैं। इस बाजार में करीब 5000 महिलाएं दुकानदारी करती हैं। इसे एशिया का सबसे बड़ा महिला बाजार माना जाता है।

    मैतेई (मणिपुरी) शब्द ‘इमा’ का अर्थ है माँ और ‘कैथल’ का अर्थ है ‘बाज़ार’. इसे नुपी कैथल (महिलाओं का बाज़ार) भी कहते हैं . इस बाज़ार में केवल विवाहित महिलाओं को व्यापार करने की अनुमति है. परम्परा को जीवित रखने के लिए यहाँ पुरुषों को किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि करने की इजाजत नहीं है . 

    संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की कहानी

    इस बाजार का इतिहास 500 साल पुराना है, जो संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की पूरी कहानी है ।  माना जाता है कि मणिपुर में 16 वीं शताब्दी में लुलुप-काबा यानी बंधुवा मजदूरी की प्रथा थी, जिसमें 17 से 60 वर्ष के पुरुषों को खेती करने और युद्ध लड़ने के लिए दूर भेज दिया जाता है। ऐसे में महिलाएं ही घर चलाती थी। खेतों में काम करती थी और बोए गए अनाज को बेचती थी। इससे एक ऐसे बाजार की जरूरत महसूस हुई जहां केवल महिलाएं ही सामान बेचती हों। प्रारंभ में यह महिलाओं के लिए घरेलू सामान , करघे उपकरण, खाने की चीजें ,कपड़े आदि उत्पाद बेचने का मुख्य केंद्र बना

     1904 और 1939 में अंग्रेजी शासन के दौर में जब मणिपुर में जबरन आर्थिक सुधार लागू करने की कोशिश की तो इमा कैथल की इन साहसी महिलाओं ने इसका खुलकर विरोध किया। इन महिलाओं ने एक आंदोलन शुरू किया जिसे नुपी लेन (औरतों की जंग) कहा गया। नुपी लेन के दौरान महिलाओं ने अंग्रेजों की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, चक्काजाम और जुलूस आयोजित किए। यह आंदोलन दूसरे विश्र्वयुद्ध तक चलता रहा। इमा कैथल केवल एक बाजार न रहकर मणिपुर की मातृशक्ति का पर्याय बन गया  । आजादी के बाद भी यह सामाजिक विषयों पर चर्चा की एक जगह के रूप में स्थापित हुआ। यह भी कहा जाता है कि प्रिंट मीडिया की अनुपस्थिति में लोग यहां इसलिए भी आते थे ताकि उन्हें आस-पास की खबरें पता चल सकें। इस बाजार में केवल विवाहित महिलाएं ही दुकान चला सकती हैं। इन महिलाओं का अपना एक संगठन भी है जो जरूरत पड़ने पर इन्हें लोन भी देता है।अगर आप यहां रात में आएंगे तो बिजली की रोशनी में महिलाओं के उजले जगमगाते चेहरे आपका मन मोह लेंगे। गजब का आत्मविश्र्वास होता है इन महिलाओं में। आस-पास के चहल-पहल को देखना भी एक अनूठा अनुभव होता है। यहां महिलाओं को पारंपरिक फेनेक (एक तरह की लुंगी जिसे शरीर के निचले हिस्से में पहना जाता है) और ऊपर इनेफिस (एक तरह का शॉल) पहने हुए नजर आती हैं।

    आज ऐसा है बाज़ार

    वर्तमान मैं इमा कैथल परिसर में तीन बड़ी इमारतें हैं। हर इमारत के भूतल इमाओं के लिए निर्धारित किए गए हैं । प्रत्येक मंजिल को बाजार में बेची जाने वाली वस्तुओं के आधार पर अलग-अलग बांटा गया है।  लैमरेल सिदवी इमाया (पुराना बाजार) इस परिसर की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी संरचना है । यहां की दुकानों पर बांस से बनी वस्तुएं ,शुद्ध रुई के धागों और गहनों से लेकर अलग-अलग प्रकार के फल ,फूल मछलियां, मसाले आदि बेचे जाते हैं। 

    पुराना बाजार में मैतेइयो यानी मणिपुरी लोगों की देवी कैथल लैरेंबी और उनके पति लैरेंबा का एक छोटा सा तीर्थ स्थान भी है। मैतेई  लोगों की पौराणिक कथाओं में देवी कैथल लैरेंबी का एक महत्वपूर्ण स्थान है और माना जाता है कि वह कैथल लैरेंबी बाज़ार और महिला वर्ग की रक्षक हैं।

    इमोएनू इमा कैथल या लक्ष्मी बाजार इस परिसर की सबसे छोटी संरचना है। यहां की दुकानों पर पलंग पोश, मच्छरदानी जैसी घरेलू चीजें शाल तथा पारंपरिक पोशाकों जैसे वस्त्र उत्पाद बेचे जाते हैं। इन दुकानों को मणिपुर के अलग-अलग देशज समुदाय से संबद्ध रंग बिरंगी शालों से सजाया जाता है। फूईबी इमा कैथल या नया बाजार में मुख्य रूप से करघे पर बनी वस्तुएं उसमें भी खासतौर पर मैतई लोगों की पारंपरिक पोशाके  बेची जाती हैं, जिसमें विभिन्न तरह के समय साड़ियां और इनाफी शामिल हैं।

    आज इमा कैथल व्यापार और व्यवसाय का एक समृद्ध केंद्र होने के साथ साथ मणिपुर की महिलाओं को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सहभागी होने में सक्षम बनाता है

  • बुजुर्ग  स्वतंत्रता सेनानी ने भगत सिंह से क्यों कहा कि प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?

    बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी ने भगत सिंह से क्यों कहा कि प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?


    भगत सिंह जब जेल में थे तब उन्होंने एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ” मैं नास्तिक क्यों हूं” यह लेख 27 सितंबर 1931 को लाहौर के अखबार ‘द पीपल’ में प्रकाशित हुआ था ।
    उन दिनों (1930-31) स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह  में जेल में थे। उन्हें यह जानकर कष्ट हुआ  कि भगत सिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की कोठरी तक पहुंचे और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। काफी समझाने और प्रयास के बाद असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर भगत सिंह से कहा कि” प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे की तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है” इस टिप्पणी के जवाब में ही भगत सिंह ने यह लिखा था ।
    मैं नास्तिक कैसे बना
    लेख में भगत सिंह ने लिखा था.. प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डीएवी स्कूल लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे 1 साल छात्रावास में रहा, वहां सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त में घंटों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों में पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहां का धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतंत्रता के लिए के लिए अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली, किंतु वह नास्तिक नहीं हैं।… मैंने तो तभी ईश्वर को मानना बंद कर दिया था जब मैं अज्ञात नवयुवक ही था और मेरे दोस्त ईश्वर के अस्तित्व के बारे में सजग भी नहीं थे। मैंने अराजकतावादी  नेता बाकुनिन को पढ़ा। समाजवाद के पितामह मार्क्सवाद का कुछ लेखन पढ़ा और अपने देशों में सफल क्रांति क्रांति लाने वाले लेनिन, ट्राटस्की तथा कुछ अन्य नेताओं को पढ़ा। वे सब नास्तिक थे। बाकुनिन की पुस्तक ‘ईश्वर एवं राज्य’ अधूरी सी होने के बावजूद इस विषय का दिलचस्प अध्ययन है। इसके बाद मुझे निर्लंब स्वामी की किताब ‘सहज ज्ञान’ मिली।  इस किताब में आध्यात्मिक नास्तिकवाद था। इस विषय में मेरीदिलचस्पी काफी बढ़ गई। 1926 के अंत तक मेरा यह विश्वास दृढ़ हो चुका था कि ब्रह्मांड के सृजनकार, पालने वाले और सर्वशक्तिमान के अस्तित्व का सिद्धांत निराधार है। मैंने इस विषय पर दोस्तों से बहस करना शुरू किया अब मैं घोषित नास्तिक बन चुका था।
    ….जब मैंने अपने दोस्त को नास्तिक होने की बात बताई तो उसने कहा” अपने अंतिम दिनों में तो विश्वास करने लगोगे” मैंने कहा “नहीं प्यारे दोस्त ऐसा नहीं होगा, मैं इसे अपने लिए अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझता हूं। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूंगा” पाठकों और दोस्तों क्या यह अहंकार है? अगर है तो मैं इसे स्वीकार करता हूं?
    लेख में भगत सिंह ने ईश्वर के अस्तित्व पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किए थे इस संसार के निर्माण मनुष्य के जन्म मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ संसार में मनुष्य की दीनता उसके शोषण दुनिया में व्याप्त अराजकता और वर्ग भेद की स्थितियों का विश्लेषण किया।

  • रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    इटारसी। इटारसी से लगभग 7 किलोमीटर पर स्थित रैसलपुर ग्राम  के निवासी राजेन्द्र प्रसाद चौधरी के घर के पीछे बाड़े में पाई गई दुर्लभ बौद्ध प्रतिमा अब नर्मदापुरम जिला पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित की जा सकती है, पिछले दिनों  राज्य के  पुरातत्व विभाग के अधिकारी ने पहुंच कर मूर्ति का निरीक्षण किया उनके साथ दा बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक और सदस्य भी थे।

    पुरातत्व विभाग के सीनियर गाइड  हुकुमचंद मलिक ने बताया की यह  मूर्ति पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है  बुद्ध की मूर्ति का यहां मिलना बहुत  दुर्लभ है और पूरे नर्मदापुरम के लिए गौरव की बात है। 

    इस मूर्ति की यहां उपस्थिति की ओर सबसे पहले वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु मिश्र और ख़बर भारतवर्ष की टीम ध्यान आकर्षित करवाया था, इसके बाद द बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक प्रहलाद निकम ने पुरातत्व विभाग से संपर्क कर इस तरफ़ ध्यान आकर्षित किया, 

    क्या है बुद्ध प्रतिमा की विशेषता ?

    ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण एक बुद्ध प्रतिमा है जो  गाँव के ही एक कृषक के बाड़े में एक सीमेंट के छोटे से चबूतरे पर रखी हुई है । इस प्रतिमा का क्षेत्र में होना दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । बलुआ पत्थर से बनी करीब 4 फुट ऊंची और 3 फुट से ज्यादा चौड़ी यह प्रतिमा करीब डेढ़ फुट मोटे शिलाखंड पर उकेरी गई है । मूर्ति में भगवान बुद्ध ध्यानस्थ मुद्रा में है। चेहरा शांत और सौम्य है, केश विन्यास अद्वितीय है । बुद्ध के दोनों और चँवरधारी पुरुष है और सिर के दोनों और दो मालाधारी स्त्री प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से अंकित है । प्रतिमा के ऊपर त्रीछत्र बना हुआ है । प्रतिमा बीच में से टूटी हुई है जिसे जोड़ कर रखा गया है। 

    देवराज बाबा के नाम से होती थी पूजा

    कृषक श्यामसुंदर चौधरी बताते हैं कि उनके भाई राजेंद्र चौधरी के घर के पीछे यह मूर्ति वर्षों से बाड़े में गड़ी हुई थी । इस मूर्ति का ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता था । हमारे पूर्वज  देवराज बाबा के नाम से कई सदियों तक इसकी पूजा करते रहे पर करीब 20 साल पहले जब आसपास की मिट्टी का क्षरण हुआ  तो मूर्ति का सिर दिखाई दिया । जब खुदाई की तो बुद्ध की चार पांच फीट ऊंची प्रतिमा दो टुकड़े में निकली। जिसे हमने चबूतरा बनाकर स्थापित कर दिया है। 

    क्या कभी यहां भव्य मंदिर था ?

    पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र की ज्यादातर प्रतिमाएं 12 वीं शताब्दी की हैं । इस क्षेत्र में बुद्ध की प्रतिमा का मिलना बहुत ही दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । उनका अनुमान है कि इस स्थान पर कोई भव्य मंदिर रहा होगा जो किसी कारण से नष्ट हो गया या कर दिया गया हो और उसके अवशेष आज भी यहां बिखरे हैं। जिन्हे संरक्षण की जरूरत है।

    पुरातत्व सम्पदा से भरपूर है यह क्षेत्र

    इटारसी और उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्र पुरातत्वीय अवशेषों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। अंचल में प्राचीन प्रतिमाएं बहुतायत में फैली हुई है जो कलात्मक दृष्टि से बहुत ही प्राचीन और महत्वपूर्ण हैं। अनेक मूर्तियों को तो ग्रामीण सिंदूर आदि पोत कर देवी देवताओं की तरह पूज रहे हैं। ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, इसके अलावा गांव में अनेक स्थानों पर प्राचीन मूर्तियां सती शिलाएँ, स्थापत्य खंड, स्तंभ आदि बिखरे पड़े हुए हैं । जिसमें प्रमुख रुप से उमा महेश्वर की प्रतिमा का ऊपरी भाग है इस मूर्ति में पार्वती हाथों में दर्पण है। ऊपर अनेक देव प्रतिमाएं हैं। वक्त के कारण मूर्ति अस्पष्ट हो गई है। गांव के मंदिर प्रांगण में पेड़ के नीचे कई मूर्तियाँ रखी  है।शिव की एक अस्पष्ट और खंडित प्रतिमा है जिसमें वे सर्प पकड़े हुए हैं वही अंबिका की प्रतिमा है।  लगभग 17 वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा मंदिर परिसर में दीवार में जड़ी हुई है । सूंड दाहिनी ओर मुड़ी हुई है। गणेश के  सिर और कान शरीर की तुलना में काफी बड़े हैं। शैली के कारण यह प्रतिमा अन्य प्रतिमाओं से अलग है।  गांव में कई पत्थर के बने स्तंभ यहां-वहां बिखरे हुए हैं । उनमें कई बहुत अच्छी स्थिति में है, जिन पर सुंदर नक्काशी और प्रतिमाएं अंकित हैं । कई स्तंभ जमीन में धँसे हुए हैं और उनके बारे में गांव वालों की अपनी अपनी धारणाएं हैं। कुछ सती स्तंभ है जो बहुत अच्छी स्थिति में है। अन्य प्रतिमाएं भी हैं जिनका संरक्षण किया जाना जरूरी है.

  • लापता हैं देश भर के 50 पुरातात्विक महत्व के स्मारक !

    लापता हैं देश भर के 50 पुरातात्विक महत्व के स्मारक !

    केंद्र सरकार ने संसद में दी जानकारी

    नई दिल्ली // संस्कृति मंत्रालय ने कहा है कि राष्ट्रीय महत्व के कई स्मारक (Monuments) तेजी से शहरीकरण, जलाशयों और बांधों से जलमग्न होने के कारण पिछले कुछ सालों में लापता हो गए.

     देश में केंद्र सरकार की ओर से संरक्षित 50 स्मारक गायब हो गए हैं. केंद्र सरकार ने इस संबंध में संसद में जानकारी दी है. केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया है कि देश के 3,693 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों (Centrally Protected Monuments) में से 50 स्मारक लापता हैं. केंद्र सरकार ने कहा है कि स्मारकों का गायब होना गंभीर चिंता की बात है.

    लापता स्मारकों में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के 11 स्मारक शामिल हैं. इसके साथ ही दिल्ली और हरियाणा में दो-दो स्मारक गायब बताए गए हैं. . इसके अलावा सूची में असम, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड के स्मारक भी शामिल हैं

    विडम्बना यह है कि इस बात की जानकारी केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संसद में साल 2013, 2016, 2017, 2020 और 2022 में भी दो बार दी गई है। इसके बावजूद स्मारकों के गायब होने का सिलसिला जारी है।

    8 दिसंबर को संसद में जानकारी
    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से 8 दिसंबर को परिवहन, पर्यटन और संस्कृति पर संसदीय स्थायी समिति को एक रिपोर्ट के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने 18 मई 2022 को संस्कृति सचिव गोविंद मोहन, एएसआई महानिदेशक वी विद्यावती और कई वरिष्ठ अधिकारियों के विचार सुने थे.

    संसद में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) की ओर से कहा गया, ”यह गंभीर चिंता का विषय है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (संस्कृति मंत्रालय) के संरक्षण में राष्ट्रीय महत्व के कई स्मारक तेजी से शहरीकरण, जलाशयों और बांधों की वजह से जलमग्न होने के कारण पिछले कुछ सालों में लापता हो गए हैं. दूरस्थ स्थानों और घने जंगलों में पता लगाने में दिक्कतों की वजह से कुछ स्मारक गायब हुए हैं”

    क्यों और कहां से लापता हैं स्मारक?
    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के मुताबिक इन स्मारकों में से 14 तेजी से शहरीकरण के कारण खो गए हैं, जबकि 12 जलाशयों या बांधों से जलमग्न हैं. बाकी 24 स्मारकों के स्थान पता नहीं चल रहे(अनट्रेसेबल या जिसका अस्तित्व नहीं रहा) हैं।

    अधिकारियों ने बताया कि इनमें कई स्मारक शिलालेखों से जुड़े थे, जिनका कोई निश्चित स्थान पता नहीं है. इन्हें स्थानांतरित या क्षतिग्रस्त किया जा सकता है और उनका पता लगाना मुश्किल हो सकता है. अधिकारियों ने ये भी कहा कि 1930, 40 और 50 के दशक में केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों की एक बड़ी संख्या की पहचान की गई थी और आजादी के बाद के दशकों में उन्हें संरक्षित करने के बजाय नए स्मारकों की खोज पर ध्यान केंद्रित किया गया था. पहली बार जब स्मारकों का भौतिक सत्यापन किया जा रहा था तो 2013 में पता चला कि 92 स्मारक गायब हैं। इन 92 स्मारकों में से एएसआई 42 की पहचान करने में कामयाब रहा है ।

    रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारियों ने बताया कि आजादी के बाद की सरकारों की प्राथमिकताएं स्वास्थ्य और विकास रही, इसलिए विरासत को भी नजरअंदाज किया गया. अब भी कई बड़े और छोटे स्मारक (Monuments) देखभाल में कमी की वजह से विलुप्त होने के कागार पर हैं.

    (चित्र प्रतीकात्मक है )