Category: वन /पर्यावरण

  • जब हम आसमान में तारे देखने को तरस जाएंगे,वैज्ञानिकों ने की चौंकाने वाली भविष्यवाणी

    जब हम आसमान में तारे देखने को तरस जाएंगे,वैज्ञानिकों ने की चौंकाने वाली भविष्यवाणी

    रात को टिमटिमाते तारे हर किसी को देखना पसंद है लेकिन वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि अब वो दिन दूर नहीं जब ये तारे हमें दिखाई नहीं देखेंगे. 

    नई दिल्ली// आसमान में तारों को टिमटिमाते हम सभी बचपन से ही देखते आ रहे हैं. इन्हें रात को  निहारने का अपना अलग मजा होता है, लेकिन हो सकता है कि अब आने वाले सालों में टिमटिमाते तारे हमें दिखने बंद हो जाएं और इसके जिम्मेदार है हम इंसान और हमारे द्वारा बढ़ाया जा रहा प्रदूषण ..जी हां,!  वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि स्काईग्लो या दूसरे शब्दों में कहें तो प्रकाश प्रदूषण के  कारण मनुष्य की रात के आकाश में तारों को देखने की क्षमता केवल 20 वर्षों में समाप्त हो सकती है.
    द गार्जियन के मुताबिक को ब्रिटिश खगोलशास्त्री मार्टिन रीस ने का कहना है कि कि रात को आसमान हमारे पर्यावरण का हिस्सा होता है और अगर अगली पीढ़ी इसे हमारे कारण कभी नहीं देख पाए तो यह एक बड़ी त्रासदी होगी.

    रीस बताया किआकाश का रंग धुंधला हो रहा है, आसान शब्दो में कहें तो अब आकाश का रंग काला नहीं हल्का ग्रे दिखता है। और कुछ ही तारे दिखते हैं।  पॉल्यूशन का  ग्राफ 2016 के बाद तेजी बढ़ा है. हर साल नाइट स्काई  ब्राइटनेस 10 प्रतिशत  बढ़ रही है हैरानी की बात तो ये हैं कि अभी ही  आकाश गंगा (Milky Way) को लगभग एक तिहाई आबादी नहीं देख पा रही है। इसका एक कारण हमारे द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाला LED भी है.

    लाइट पॉल्यूशन, आर्टिफिशियल लाइट, मोबाइल,लैपटॉप, जैसे गेजेट्स, शो रूम्स के बाहर लगी चमकती लाईट, कार की हैडलाइट, होर्डिंग्स की तेज रोशनी के कारण होता है।
    पूरी बात को आसान शब्दों में समझाते हुए जर्मन सेंटर फॉर जियोसाइंसस के क्रिस्टोफर कबा ने इस मुद्दे पर कहा कि अगर एक बच्चा जो एक ऐसे स्थान पर पैदा हुआ है जहां रात को आसमान में 250 सितारे दिखाई देते हैं तो वहीं अब वह जब 18 साल का साल का हो जाएगा तो उसे केवल 100 तारे दिखेंगे और जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी ये संख्या कम होती जाएगी.।

    लाईट की चमक से पर्यावरण को भी नुकसान

    लाइट पॉल्यूशन से सिर्फ तारों का दिखना निबंध नहीं है हो रहा है बल्कि इस पोलूशन से पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंच रहा है शंघाई के रुईजीन अस्पताल के डॉक्टर यूजू कहते हैं कि अमेरिका और यूरोप के 99% लोग लाइट प्रदूषण वाले आसमान के नीचे रहते हैं । धरती का 24 घंटे का दिन रात की एक घड़ी होती, जो सूरज की रोशनी और अंधकार से तय होती है। यह इस ग्रह पर रहने वाले हर जीव पर लागू होती है लेकिन इंसानों ने इसमें छेड़छाड़ कर दी है लाइट पोलूशन की वजह से कीड़े मकोड़े परिंदों और जानवरों का जीवन चक्र बदल गया है इससे समय से पहले ही इनकी मौत हो रही है और इससे दुनिया भर में जैव विविधता का बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है।

  • बदल रही हैं पक्षियों की फूड हेबिट्स ?

    बदल रही हैं पक्षियों की फूड हेबिट्स ?

    लंदन// इंसानों के खाने से पक्षियों की भी खाने की आदतें बदल रही है, दरअसल परिंदे भी इंसानों को खाते हुए देखकर आकर्षित होते हैं और उस तरह की चीजें खाने लगते हैं जिन्हें वे इंसानों को खाते देखते हैं। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ सक्सेस में हुए एक शोध के मुताबिक पक्षी इंसानों को खाते हुए बहुत बारीकी से देखते हैं। जिस चीज में इंसान कुछ खाते हैं पक्षी उस बर्तन या रैपर से भी आकर्षित होते हैं।

    वैज्ञानिकों ने ब्राइटन बीच पर सीगल पक्षी के साथ यह प्रयोग किया। इसमें वैज्ञानिकों ने स्नेक्स के जिस पैकेट से कुछ खाया और पक्षियों ने कुछ दूरी से उन्हें खाते हुए देखा, उसकी तरफ आकर्षित हुए । ऐसे ही जब इनके समूह में किसी खाने के पैकेट को रखा गया तो 5 में से सिर्फ एक चिड़िया उस तक पहुंची लेकिन जब वैज्ञानिकों को उन्होंने उस पैकेट से खाते हुए देखा तो आधी चिड़िया करीब 48 फीसदी उस पैकेट से खाने के लिए पहुंच गई और बाद में भी उस तरह के पैकेट किया खाने से आकर्षित हुई।

     यूनिवर्सिटी ऑफ सक्सेस के जैव वैज्ञानिक फ्रेजिस्का  फीस्ट कहती हैं – परिंदे इंसानों के व्यवहार का अवलोकन बहुत ध्यान से करते हैं और उसे अपनाने लगते हैं । यही वजह है कि चिड़ियों का भी शहरीकरण हो रहा है।

  • बाघों पर संकट – देश में डेढ़ माह में 26 बाघों की मौत !

    बाघों पर संकट – देश में डेढ़ माह में 26 बाघों की मौत !

    नई दिल्ली// देश में 1 जनवरी से 11 फरवरी के बीच कुल 26 बाघों की मौत हुई है जो पिछले 3 वर्षों में साल की शुरुआत में बाघों की मौत का सबसे बड़ा आंकड़ा है। सबसे अधिक 9 मौतें मध्य प्रदेश में हुई । इसके बाद महाराष्ट्र में सात राजस्थान में तीन कर्नाटक में दो उत्तराखंड में दो आसाम बिहार और केरल में एक -एक बाघ की मौत हुई है।
    कारणों की तलाश
    फिलहाल सरकार की बाघ संरक्षण से जुड़ी योजनाएं इन मौतों के कारणों की तलाश कर रही है।आम तौर पर कोई अन्य कारण सिद्ध नहीं होने पर हर बाघ की मौत को अवैध शिकार माना जाता है।
    राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पास बाघों की मौत के कारणों के आंकड़े सिर्फ 2020 तक के ही उपलब्ध हैं जो  बताते हैं कि 2020 में अवैध शिकार के कारण कम मौतें हुईं हैं। 2020 में अवैध शिकार के कारण सिर्फ सात बाघों की मौत हुई , जो 2018 की तुलना में काफी कम थे । 2018  में 34 बाघों की मौत हुई थी।।
    पिछले साल इसी अवधि के दौरान 18 मौतें हुई थी और 2021 में 21 मौतें हुई थी। वही पूरे देश में  2020 से अब तक 380 बाघों की मौत हो चुकी है। सबसे अधिक बाघों की मौत 2021 में दर्ज की गई जब 127 बाघों की मौत हुई थी।
    मध्य प्रदेश में ज्यादा मौतें?
    मध्य प्रदेश में 2012 से 2022 के बीच लगभग 270 बाघों की मौत दर्ज की गई है यह आंकड़ा देश में सर्वाधिक है। इसके बाद महाराष्ट्र ( 184 मौत ) और कर्नाटक (150 मौत) का स्थान है।
    दुनिया के बाघों की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी भारत में

    फिलहाल दुनियाभर में साढ़े चार हजार बाघ हैं जिनमें से 2,967 भारत में बताए जाते हैं. प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ  द इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आई यू सी एन) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में बाघों की संख्या 3200 हो गई थी और 2022 में इनकी संख्या 4500 है.
    भारत दुनिया का सबसे अधिक बाघ की आबादी वाला देश है, जहां पूरी दुनिया के 70 फीसदी से ज्यादा बाघ पाए जाते हैं। 2010 में बाघों की संख्या  1,706थी जो  2018 तक बढ़कर 2, 967 पहुंच गई । यह एक उल्लेखनीय वृद्धि मानी जाती है। सरकार ने 2022के आंकड़े जारी नहीं किए हैं, लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि देश में बाघों की आबादी 3000के आंकड़े को पार कर लेगी। भारत में बाघों सबसे ज्यादा मध्य भारत, पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट में पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में दो हजार से ज्यादा बाघ रहते हैं।
    संरक्षण बजट में की गई है कमी
    1973 में बाघों को विलुप्त होने से बचाने और उनके प्राकृतिक आवासों में एक व्यवहार्य आबादी सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की थी ।हाल के वर्षों में इस कार्यक्रम पर होने वाले खर्च में कमी आई है, क्योंकि बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है , 2018-19 में जहां बाघों के संरक्षण पर 323. 44 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे वहीं चालू वित्त वर्ष में केंद्र द्वारा परियोजना पर मात्र 128 करोड खर्च करने का अनुमान है।

  • क्यों संकट में हैं वनराज ? सूबे में एक साल में 32 बाघों की मौत

    क्यों संकट में हैं वनराज ? सूबे में एक साल में 32 बाघों की मौत

    भोपाल // पिछले दिनों पन्ना टाइगर रिजर्व में विक्रमपुर गाँव के पास  एक युवा बाघ के शव के फंदे में लटके मिलने की हैरान करने वाली घटना सामने आने से एक बार फिर टाइगर स्टेट में बाघों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गये हैं . मध्य प्रदेश बाघों की मौत के मामले में भी देश में पहले स्थान पर है । राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ( नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी ) के आंकड़ों के अनुसार पिछले पिछले एक साल के दौरान पूरे भारत में 99 टाइगरों की मौत हुई हैं, जिनमें सबसे ज्यादा 32 मौतें मध्य प्रदेश में दर्ज की गई हैं, मध्य प्रदेश में नवंबर के महीने तक 31 बाघों की मौत हुई थी, जबकि आज पन्ना टाइगर रिजर्व में मिले बाघ के शव के बाद यह आंकड़ा 32 पहुंच गया। पहली मौत मादा टाइगर की 8 जनवरी 2022 को बांधगढ़ में हुई थी। सबसे ज्यादा 66 टाइगरों की मौत बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में दर्ज की गई हैं। ऐसे में बाघों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बता दें कि पिछले साल ही दोबारा से मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा मिला था, लेकिन टाइगरों की मौत के मामले में भी मध्य प्रदेश सबसे आगे है।

    जबकि बाघों की मौत  के मामले में देश में दूसरे नंबर के राज्य कर्नाटक में 14 और तीसरे नंबर पर रहे उत्तराखंड में इस वर्ष अब तक छह बाघों की मौत हुई है। यदि बाघों की मौत के आंकड़े देखें, तो पिछले चार साल में प्रदेश में 134 बाघों की मौत हुई है। इनमें से 35 मामले शिकार के हैं। जबकि आपसी लड़ाई, कुएं में गिरने या सड़क दुर्घटना में 80 बाघ मरे हैं।

    सुरक्षा नाकाफी ?

    मध्य प्रदेश में बाघों की सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी साबित हो रहे हैं। संरक्षित क्षेत्रों में बाघों की संख्या बढ़ी है पर सुरक्षाकर्मी नहीं बढ़ाए गए। बल्कि स्वीकृत पदों से कम कर्मचारी पदस्थ हैं। इस कारण पार्क और उससे सटे क्षेत्र में प्रभावी गश्त नहीं हो पा रही है। यही कारण है कि हर साल बाघों-तेंदुओं का शिकार होता है।

    इस साल अब तक छह बाघों के शिकार की जानकारी सामने आई है। वहीं बाघों की बढ़ती संख्या भी सुरक्षा इंतजामों पर भारी पड़ रही है। बाघ, संरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकल रहे हैं। जिससे उनकी सुरक्षा करना मुश्किल हो रहा है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 के बाघ आकलन के अनुसार मध्य प्रदेश में 526, कर्नाटक में 524 और उत्तराखंड में 442 बाघ हैं।

    मवेशियों के शिकार के कारण निशाने पर आते हैं बाघ

    बस्ती से सटे जंगलों में सक्रिय बाघों का सबसे अधिक शिकार होता है। दरअसल, वे मवेशियों का शिकार करने के आदी हो जाते हैं। इसमें ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती है। ऐसे में मवेशी मालिक बाघ को जहर देकर, करंट लगाकर या फंदे में फंसाकर मार देते हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में शिकारी शाकाहारी वन्यप्राणियों के लिए करंट और फंदे लगाते हैं, जिनमें कई बार बाघ या तेंदुआ भी फंस जाते हैं।

    अब ड्रोन से भी निगरानी

    शिकार की घटनाओं को रोकने और संरक्षित क्षेत्र में अनाधिकृत प्रवेश रोकने के लिए प्रदेश के सभी छह टाइगर रिजर्व में ड्रोन से निगरानी शुरू कर दी गई है। पन्ना, बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, सतपुड़ा और संजय दुबरी टाइगर रिजर्व में इससे शिकार की घटनाएं कम हुई हैं पर पूरी तरह से रोक नहीं लगी है।

     बाघों के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार ने बाघ अभयारण्य बनाए हैं और भारत में कुल 53 बाघ संरक्षित क्षेत्र हैं। हालांकि मरने वाले बाघों का कुल आंकड़ा अभी बीते साल अक्तूबर तक दर्ज 104 तक पहुंच गया था। बाघों का शिकार की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों तक आना भी उनकी मौत की वजह बना है, बीते दिनों ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां बाघ आबादी वाले क्षेत्रों में आया है और उससे लोगों को नुकसान हुआ है।

  • प्रकृति के उपहारों से खाली होती जा रही दुनिया 

    प्रकृति के उपहारों से खाली होती जा रही दुनिया 

    सुधांशु मिश्र

    प्रकृति खतरे में है,डायनासोर युग का अंत होने के बाद प्रकृति को अब तक के सबसे बड़े स्तर पर क्षति पहुंच रही है। दक्षिण आस्ट्रेलिया की फ्लैंडर्स यूनिवर्सिटी और यूरोपीय आयोग की टीम ने हाल ही में किए शोध ने बताया कि दुनिया में जलवायु और जमीन के उपयोग में तेजी से हो रहे बदलाव के चलते 2100 तक दुनिया की की एक चौथाई से अधिक जैव विविधता का सफाया हो जाएगा । विडंबना यह है कि आपस में जुड़ी प्रजातियों के इस नुकसान को टाला नहीं जा सकता ।
    शोध के मुताबिक 2050 तक धरती 6 से 10% तक  जानवर और वनस्पतियों को खो देगी सदी के अंत की आंकड़ा 27% तक पहुंच जाएगा। विश्लेषण यह भी बताता है कि अब तक पृथ्वी जैव विविधता पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करके आंका गया है और यदि सुधार नहीं किए तो हम धरती पर जीवन को बचाए रखने वाली महत्वपूर्ण चीजों को खो देंगे ।

    शोध में सुपर कंप्यूटर का इस्तेमाल
    एक दूसरे से आपस में जुड़ी प्रजातियों का भविष्य जानने के लिए अध्ययन में सबसे शक्तिशाली सुपर कंप्यूटर का इस्तेमाल किया गया। सुपर कंप्यूटर की मदद से वैज्ञानिकों ने आभासी प्रजातियों और 15000 से ज्यादा खाद्य जालों के साथ नकली धरती का निर्माण किया इस धरती पर जलवायु और भूमि उपयोग में बदलाव किए गए कंप्यूटर मॉडलिंग में पाया गया कि जैसे ही जलवायु परिवर्तन हुआ आभासी प्रजातियों ने अपने स्थान बदल दिए कुछ नए परिवर्तनों को स्वीकार किया तो कुछ विलुप्त हो गई।

    दुनिया भर में जैवविविधता पर तेज होता खतरा
    द इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडाइवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज- आईपीबीईएस का अनुमान है कि दुनिया भर में कम से कम 80 लाख प्रजातियां मौजूद हैं. लेकिन उसने आगाह किया है कि 2030 तक करीब 10 लाख प्रजातियां गायब हो सकती हैं. जैवविविधता क्षरण की दर खतरे के निशान पर पहुंच चुकी है- हर 10 मिनट में औसतन एक प्रजाति खत्म हो रही है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, हम लोग दुनिया की छठी सामूहिक विलुप्ति के बीचोबीच पहुंच गए हैं.

    मनुष्य ने धरती और इसके प्राकृतिक संसाधनों पर अपना एकाधिकार मान लिया है जिसके चलते प्राकृतिक संसाधनों का बेहताशा दोहन ,श्रीकरं ,जंगलों की अंधाधुंध कटाई, औद्योगिकरन,और शिकार से जैव विविधता के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है . मनुष्य के अतिरिक्त धरती पर मौजूद सभी जीवित इकाइयाँ प्रकृति को बहुत कम नुकसान पहुंचाती है.

    जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से बढ़ रही गर्मी ने जैव विविधता पर बहुत बुरा असर डाला है .अमेरिकी एजेंसी नासा ने अपने अध्यन में पाया है की मौसमी बदलाव की वजह से धरती के 65 फीसदी कीट अगली सदी तक विलुप्त हो जाएंगें. जलवायु परिवर्तन ने हमारे पारिस्थितिकी तंत (ईको सिस्टम) को गड़बड़ा दिया है,धीरे धीरे पेड़ पोधे पशु पक्षी गायब होते जा रहे हैं ,आज हमें आसपास गौरैया जैसी घरेलू चिड़िया नजर आना कम हो गयी हैं ,तितलियाँ,मधुमक्खियाँ ,सहित जाने पहचाने कीट पतंगें देखने को तरस गये हैं .  


    आंकड़े और तथ्य चिंतित करने और डराने वाले हैं.  वैज्ञानिकों का कहना है कि हर प्रजाति किसी न किसी रूप में एक दूसरे पर निर्भर है ।ग्लोबल वार्मिंग के कारण शिकारी प्रजाति शिकार हो रही है या नुकसान प्राथमिक विलुप्तीकरण है, शिकारी प्रजाति के लिए भोजन का संकट कराया तो एक समय बाद विलुप्त हो जाएगी।

    दुनिया भर में है चिंता ?

    7 दिसंबर से 19 दिसंबर 2022 तक जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र संघ का एक महत्वपूर्ण सम्मेलन कॉप 15 (cop15) कनाडा के मांट्रियल शहर में संपन्न हुआ। जहां 200 देशों के प्रतिनिधियों ने मानवीय गतिविधियों के कारण प्रकृति के चिंताजनक विनाश को रोकने के लिए लक्ष्य स्थापित करने पर चर्चा की । सम्मेलन में यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि प्रकृति के बिना हमारे पास कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जंगलों की कटाई मरुस्थलीकरण रसायन और कीटनाशकों के दुरुपयोग से हमारी धरती  क्षरण  की शिकार हुई है और बढ़ती विश्व आबादी के लिए भोजन जुटाना कठिन होता जा रहा है मानवता सामूहिक विनाश का हथियार बन गई है।
    इस सम्मेलन में नया वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क पारित किया गया और एक ऐतिहासिक समझौता हुआ,जिसमे 2030 तक जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली 30 फीसदी भूमि और जल का संरक्षण  किया जाएगा ,वर्तमान में 17 फीसदी भूमि व् 10 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र का संरक्षण किया गया है. समझौते में लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण ,जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और प्रदूषण की कम करने के प्रयासों को गति देने की बात कही गई है .मसौदे में 2030 तक जैव विवधता के लिए 200 अरब डॉलर जुटाने और सब्सिडी को चरण बद्ध तरीके से खत्म का कम किया जायेगा . समझौते के तहत गरीब देशों के लिए सालाना वित्तीय मदद को 2025 तक बढाकर 20 अरब डॉलर किया जाएगा,जो 2030 तक बढ़कर 30अरब डालर सालाना हो जाएगी . यह बात ध्यान देने की है कि सम्मेलन में भारत ने ही जैव विविधता संरक्षण के लिए नया और समर्पित कोष बनाए जाने की तत्काल जरूरत पर जोर दिया था ,भारत का कहना था कि जैव विविधता के संरक्षण के लक्ष्यों को लागू करने का बोझ ज्यादा विकासशील देशों पर पड़ता है .  

    जैवविविधता रक्षा के लिये तीन उपाय

    इस सम्मेलन में यूएन महासचिव ने प्रकृति की रक्षा सुनिश्चित करने के लिये तीन अहम उपायों पर बल दिया है.

    पहला, उन राष्ट्रीय योजनाओं लिये सब्सिडी और टैक्स में छूट को ख़त्म किया जाए, जिनमें प्रकृति को क्षति पहुँचाने वाली गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है . इसके बजाय, हरित समाधानों जैसे कि नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहन, प्लास्टिक के इस्तेमाल को घटाने, प्रकृति-अनुकूल खाद्य उत्पादन और संसाधनों के टिकाऊ दोहन की ओर बढ़ना होगा.इन योजनाओं में आदिवासी आबादी व स्थानीय समुदायों के अधिकारों को मान्यता दी जाएगी, जोकि प्रकृति के संरक्षक हैं.

    दूसरा, निजी सैक्टर को मुनाफ़ा और संरक्षण को एक साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम करना होगा होगा, और खाद्य व कृषि उद्योग को सतत उत्पादन, कीटनाशक नियंत्रण,परागण के प्राकृतिक रास्तों पर ध्यान देना होगा.  
    यूएन के शीर्षतम अधिकारी ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा  कि वे अपने बैंक खाते भर रहे हैं जबकि दुनिया प्रकृति के उपहारों से खाली होती जा रही है .
    उन्होंने हरित लीपापोती की प्रवृत्ति की आलोचना की, जिसके ज़रिये कम्पनियाँ प्रकृति संरक्षण के लिये बड़े-बड़े दावे करती हैं, और कहा कि निजी सैक्टर की उसके क़दमों के लिये जवाबदेही तय की जानी होगी.
    तीसरा, विकसित देशों को वैश्विक दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित देशों को साहसिक वित्तीय पोषण प्रदान करना होगा, चूँकि उनके अनुसार, यह बोझ केवल विकासशील देशों के कन्धों पर नहीं छोड़ा जा सकता है.
    अमेरिका के कंजर्वेशन इंटरनेशनल में जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता वैज्ञानिक डेव होले का कहना है कि कुदरत हमें जो देती है उसी से  हमारा अस्तित्व है,  पर हम उसकी बिलकुल प्रवाह नही कर रहे हैं, वे कहते है कि सुबह सुबह जब प्लेट में अनाज से बना खाना हमारे सामने होता है तो हम यह नहीं सोचते कि प्रकृति ने इन फसलों को उगाने में कितनी है जिसकी बदौलत यह अन्न तैयार हुआ है ,रोजमर्रा के स्टार पर कुदरत जो हमारे लिए कर रही है  वह हमें दिखता ही नहीं .

    पर पर्यावरण की चिंता और उन पर काम करने वाले विशेषज्ञ और पर्यावरणविद इस तरह के अंतरराष्ट्रीय (कांफ्रेंस/सेमीनार) को बहुत अधिक सार्थक नहीं मानते ,उनका मानना है कि इस तरह के लक्ष्य कई बार निर्धारित हो चुके हैं पर कुछ सार्थक नहीं निकला ,उदाहरण के लिए 80 के दशक में यूनाइटेड नेशन में मेनएंड बायोस्फियर नाम की योजना चलाई थी ,जिसे वन्य जीवों और पेड़ पोधों को बचाने और संरक्षित रखने के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया गया था ,दुनिया भर में कई बायोस्फियर पार्क ,सेंचुरी और नेशनल पार्क इसके तहत बने ,पर अपेक्षित परिणाम नही आ सके .

    प्रकृति की बरबादी रोकने के लिए इस तरह के बड़े-बड़े समझोते या लक्ष्य उतने कारगर नहीं होंगें जितने की देशीय या स्थानीय स्तर के उपाय . सिर्फ आर्थिक मदद या बड़े प्रोजेक्ट से किसी देश की जैव विविधता को नहीं बचाया जा सकता . भारत के पर्यावरण को सुधारने  के लिए अमेरिका में बात नहीं की जा सकती . भारत को अपने उपाय खोजने होगें ,

    पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरण विद डॉ अनिल प्रकाश जोशी ने पिछले दिनों एक लेख में लिखा था कि “अगर कहीं कोई समाधान छुपा है तो वो अपने देश में बाकी बचे जंगलों ,तालाबों ,नदियों के संरक्षण से ही सम्भव है . यह भी जानना आवश्यक है कि जितना ज्यादा पानी होगा ,जितना ज्यादा वन होगें ,बेहतर मिट्टी होगी ,ये स्वयं भी जलवायु परिवर्तन में और तापक्रम स्थिर करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं .यह सवाल इसलिए बार-बार है की  हम इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों से क्या पा रहे हैं ? और पिछले लगातार दशकों से होने वाली गोष्ठियों किस बेहतर परिणाम की तरफ हमें ले जा चुकी हैं? क्योंकि प्रकृति और पारिस्थितिकी दुनिया भर अगर लगातार गिरती चली जा रही हो तो सवाल इस तरह के अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों के प्रति खड़ा होना ही चाहिए .प्रकृति को बचाना है तो अपनी प्रवृति को पहले सुधारना होगा .हमें अपनी आवश्यकताओं पर अंकुश लगाना चाहिए विलासिताओं को त्याग कर ही शायद हम प्रकृति संरक्ष्ण के बड़े वाहक बन सकते हैं .

    यदि हमें अपना अस्तित्व बचाना है तो हमें जैव विविधता को बनाये रखना होगा ,क्योंकि जैव विविधता के क्षरण का सीधा असर हमारे भोजन तंत्र पर पड़ेगा ,वह  तहस नहस हो सकता है.अब हमें इसका दोहन रोकना होगा और प्रभावी संरक्षण करना होगा . ,समय रहते मनुष्य ने प्रभावी कदम नहीं उठाये तो हमारे पास पछताने के सिवाय कुछ नहीं रहा जाएगा .