Category: मध्य प्रदेश

  • मध्य प्रदेश कांग्रेस में जल्द होगा बड़ा संगठनात्मक बदलाव,  नई टीम में दिखेंगे नए चेहरे


    भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए संगठन में बड़ा बदलाव करने जा रही है। प्रदेश कांग्रेस की मौजूदा कार्यकारिणी जल्द भंग कर नई टीम गठित की जाएगी। अगले दो से तीन माह में नई कार्यकारिणी का गठन पूरा होने की संभावना है।
    वर्तमान कार्यकारिणी में करीब 253 पदाधिकारी हैं। नई व्यवस्था में इनकी संख्या घटाकर लगभग 125 करने की तैयारी है। विधायकों के साथ जिला अध्यक्ष और प्रदेश पदाधिकारी की दोहरी जिम्मेदारी रखने वालों को भी प्रदेश संगठन के दायित्व से मुक्त किया जा सकता है।


    युवा चेहरे और अनुभवी नेताओं का संतुलन


    नई टीम में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन के साथ ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देने की रणनीति है, जो चुनाव लड़ने के बजाय संगठन को मजबूत करने और चुनाव लड़ाने की भूमिका निभाएं। युवा चेहरों के साथ अनुभवी नेताओं को भी जगह दी जाएगी।
    प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा है कि नई टीम सभी से विचार-विमर्श के बाद बनाई जाएगी और पार्टी का मुख्य लक्ष्य मिशन-2028 रहेगा।


    253 से घटकर 125 पदाधिकारी


    पटवारी की मौजूदा टीम में संतुलन बनाने के प्रयासों के चलते पदाधिकारियों की संख्या बढ़कर 253 तक पहुंच गई थी। पार्टी का मानना है कि बड़ी कार्यकारिणी के बावजूद अपेक्षित संगठनात्मक सक्रियता नहीं दिखी। इसी कारण अब कार्यकारिणी को छोटा और अधिक सक्रिय बनाने पर जोर है।


    युवाओं पर भी कांग्रेस का फोकस


    कांग्रेस ने युवाओं को जोड़ने के लिए युवा संवाद, आंदोलन और प्रदेशस्तरीय युवा सम्मेलन की योजना बनाई है। इसके बाद जिलों में भी युवा संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पार्टी सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को प्रदेशस्तरीय युवा सम्मेलन में बुलाने की तैयारी कर रही है। छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को 2028 के चुनाव की रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाएगा।

    वरिष्ठ कांग्रेस नेता मानक अग्रवाल को मिली बड़ी जिम्मेदारी..!

    काँग्रेस ने अपनी रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है । शनिवार को इसका आगाज करते हुए
    प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कांग्रेस के वरिष्ठ और कद्दावर नेता मानक अग्रवाल को कांग्रेस के पूर्व विधायकों के बीच समन्वय बनाने के लिए समन्वयक बनाया है। श्री अग्रवाल पीसीसी में बैठकर पूर्व विधायकों के और पीसीसी के बीच तालमेल का कार्य करेंगे।
    श्री अग्रवाल को इस जिम्मेदारी मिलने से कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान को गति मिलेगी!


    कांग्रेस का लक्ष्य: 

    नई संगठनात्मक टीम के जरिए अगले दो वर्षों में बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना और 2028 विधानसभा चुनाव की मजबूत तैयारी करना है।

  • विदेश जाने की चाह, लेकिन लौटने का इरादा भी… 10 में 8 भारतीय छात्र बोले- पढ़ाई के बाद लौटेंगे वतन

    ऑक्सफोर्ड सर्वे में बदली सोच की तस्वीर: अब विदेश की डिग्री को ‘बसने’ नहीं, ग्लोबल एक्सपीरियंस हासिल करने का रास्ता मान रहे युवा; 49% ने कहा- विदेश जाने का फैसला हमारा अपना

    विदेश मे पढ़ाई के लिए भारतीय छात्रों का रुझान बढ़ रहा है ,लेकिन अब बड़ी संख्या मे छात्र पढ़ाई के बाद भारत लौटकर करियर बनाने की योजना बना रहे है

    नई दिल्ली। विदेश जाना है… लेकिन हमेशा के लिए नहीं! भारतीय युवाओं की विदेश पढ़ाई को लेकर सोच में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के स्टूडेंट ग्लोबल मोबिलिटी इंडेक्स सर्वे में शामिल 81% भारतीय छात्रों ने कहा कि वे विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटना चाहते हैं। यानी करीब 10 में से 8 छात्र विदेशी डिग्री के बाद अपना भविष्य भारत में देख रहे हैं।

    कभी विदेश में पढ़ाई को बेहतर नौकरी और वहीं बसने की पहली सीढ़ी माना जाता था। अब युवा विदेश को शिक्षा, अनुभव, एक्सपोजर और ग्लोबल नेटवर्किंग का ठिकाना मान रहे हैं। पढ़ाई पूरी होगी, अनुभव मिलेगा और फिर उसी अनुभव के साथ भारत लौटकर करियर बनाने की तैयारी है।

    सबसे बड़ा बदलाव: अब पैरेंट्स नहीं, बच्चे तय कर रहे विदेश जाना

    सर्वे में विदेश जाने के फैसले को लेकर भी बड़ा बदलाव सामने आया है। 2025-26 में 49% छात्रों ने कहा कि विदेश जाकर पढ़ाई करने का फैसला उनका अपना था।

    दो साल पहले यह आंकड़ा सिर्फ 29% था। यानी युवाओं में अपने करियर को लेकर निर्णय लेने की स्वतंत्रता तेजी से बढ़ी है।

    विदेश जाने का फैसला खुद लेने वाले छात्र

    2023-24 : 29%

    2024-25 : 34%

    2025-26 : 49%

    यानी 2 साल में फैसला खुद लेने वालों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत अंक बढ़ी।

    10 में 9 के परिवार में पहली बार कोई विदेश पढ़ने जाएगा

    विदेश शिक्षा अब केवल उन परिवारों तक सीमित नहीं है, जहां पहले से कोई विदेश में पढ़ चुका है। सर्वे में करीब 10 में 9 छात्र अपने परिवार में पहली बार विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले होंगे।

    यानी पहली पीढ़ी के विद्यार्थी अब ग्लोबल एजुकेशन की दौड़ में तेजी से शामिल हो रहे हैं। इनके लिए सबसे बड़ा सहारा बना है—इंटरनेट।

    गूगल बना विदेशी यूनिवर्सिटी खोजने का नया ठिकाना

    विदेशी संस्थान चुनने के लिए छात्र एजेंटों से ज्यादा खुद ऑनलाइन रिसर्च कर रहे हैं।

    39% छात्रों को अपनी पसंद का संस्थान गूगल सर्च के जरिए मिला, जबकि 35% ने एजुकेशन एजेंट्स से जानकारी ली।

    भरोसे की बात आई तो भी गूगल सबसे आगे रहा।

    गूगल : 56%

    कॉलेज इवेंट्स : 20%

    इंस्टाग्राम : 9%

    एआई टूल्स : 6%

    यूट्यूब : 5%

    यानी विदेश जाने से पहले अब युवा किसी एजेंट के ऑफिस में बैठकर सिर्फ ब्रोशर नहीं पलट रहे। मोबाइल खोल रहे हैं, गूगल पर सर्च कर रहे हैं, सोशल मीडिया देख रहे हैं और एआई से सवाल पूछ रहे हैं।

    बिजनेस-मैनेजमेंट सबसे पसंदीदा

    विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की पढ़ाई की पसंद भी दिलचस्प है।

    सबसे पसंदीदा क्षेत्र

    बिजनेस-मैनेजमेंट : 75%

    पोस्टग्रेजुएशन : 70%

    हेल्थ और मेडिसिन : 8%

    साइंस : 2%

    इंजीनियरिंग : 1%

    विदेश की डिग्री, भारत में वापसी… आखिर क्यों?

    सर्वे के आंकड़े एक नई कहानी कहते हैं। भारतीय छात्र ग्लोबल एक्सपोजर चाहते हैं, लेकिन अपनी जड़ें छोड़ना जरूरी नहीं समझते।

    विदेश में पढ़ाई अब कई युवाओं के लिए ‘फाइनल डेस्टिनेशन’ से ज्यादा ‘करियर एक्सपीरियंस’ बनती जा रही है।

    यानी सोच कुछ ऐसी है—

    “डिग्री वहां से… अनुभव वहां का… लेकिन करियर अपने देश में।”

    डेटा में छिपी बड़ी तस्वीर

    81% — पढ़ाई के बाद भारत लौटना चाहते हैं49% — विदेश जाने का फैसला खुद लिया10 में करीब 9 — परिवार में पहली बार विदेश पढ़ने जाएंगे56% — जानकारी के लिए गूगल पर सबसे ज्यादा भरोसा75% — बिजनेस-मैनेजमेंट की ओर झुकाव

    बदल रहा है ‘विदेश जाने’ का मतलब

    विदेश जाने की इच्छा कम नहीं हुई है। बल्कि भारतीय युवाओं में ग्लोबल एजुकेशन का आकर्षण बना हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब विदेश जाना ‘वहीं बस जाने’ का पर्याय नहीं रह गया।

    नई पीढ़ी विदेश से सीखना चाहती है, दुनिया देखना चाहती है, अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करना चाहती है और फिर उस अनुभव को भारत में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है।

    यानी मंजिल विदेश नहीं… मंजिल बेहतर करियर है। और रास्ता चाहे जितना लंबा हो, लौटने का रास्ता भारत की ओर भी खुला है।

  • नागदेव ने रोका रास्ता… बोले- आस्था मन में रखिए……

    नागदेव ने रोका रास्ता… बोले- आस्था मन में रखिए……


    पचमढ़ी। दुर्गम पहाड़ी रास्ता… चारों तरफ घना जंगल… नागद्वारी गुफा और देवस्थल के दर्शन की आस में आगे बढ़ता श्रद्धालु। तभी रास्ते में सामने आता है एक विशाल नागदेव। श्रद्धालु ठिठक जाता है। नागदेव उससे सवाल करते हैं—“दर्शन करने आए हो, लेकिन क्या इस जंगल की जिम्मेदारी भी समझते हो?”
    यहीं से शुरू होती है सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की वह कहानी, जो इस बार नागद्वारी मेले में श्रद्धालुओं को आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश दे रही है।
    नागद्वारी मेला शुरू हो चुका है और 17 अगस्त, नाग पंचमी तक चलेगा। करीब 10 दिन चलने वाले इस मेले को प्रशासन ने इस बार ग्रीन और प्लास्टिक मुक्त मेला बनाने की थीम रखी है। इसी अभियान को प्रभावी बनाने के लिए सतपुड़ा टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने एक रचनात्मक एनिमेटेड वीडियो जारी किया है। इसमें नागदेव स्वयं श्रद्धालुओं को जंगल की अहमियत समझाते नजर आते हैं।


    “यह रास्ता सिर्फ आपका नहीं, वन्यजीवों का भी घर है”
    वीडियो में श्रद्धालु नागद्वारी की कठिन यात्रा पर निकलता है। रास्ते में उसकी मुलाकात नागदेव से होती है। बातचीत में नागदेव बताते हैं कि जिस जंगल से होकर श्रद्धालु गुजर रहे हैं, वह केवल तीर्थयात्रियों का रास्ता नहीं है। यह असंख्य जीव-जंतुओं और वन्यप्राणियों का घर भी है।
    श्रद्धालु जब आस्था के नाम पर जंगल में कपड़े, प्रसाद सामग्री या दूसरी चीजें छोड़ने की बात करता है, तो नागदेव उसे समझाते हैं—श्रद्धा मन में होती है, जंगल में कपड़े या प्लास्टिक छोड़ने में नहीं।
    संदेश साफ है—भगवान का आशीर्वाद लेने आए हैं तो उनके बनाए जंगल का सम्मान करना भी सीखिए।


    बोतल, रैपर और पुराने कपड़े बन रहे संकट
    मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से प्लास्टिक बोतलें, रैपर, पॉलीथिन, दोने-पत्तल और पुराने कपड़ों का कचरा जंगल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। यही वजह है कि प्रशासन प्रवेश मार्गों पर वाहनों की जांच और प्लास्टिक सामग्री पर नियंत्रण की तैयारी कर रहा है।
    एसटीआर का वीडियो श्रद्धालुओं को यह भी संदेश देता है कि जो सामान लेकर जंगल में आए हैं, उसे वापस भी साथ लेकर जाएं। कचरा रास्ते में छोड़ने के बजाय अपने बैग में रखें और बाहर निकलकर निर्धारित स्थान पर ही डालें।


    श्रद्धालु ने उठाया कचरा, नागदेव ने दिया आशीर्वाद
    कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा तब आता है जब श्रद्धालु नागदेव की बात समझता है। वह रास्ते में बिखरा प्लास्टिक और कचरा खुद उठाकर अपने बैग में भर लेता है और जंगल को साफ रखने का संकल्प लेता है।
    उसकी इस पहल से प्रसन्न होकर नागदेव पंचमुखी अवतार में उसे आशीर्वाद देते हैं।
    वीडियो का संदेश भी इसी दृश्य के साथ सामने आता है—प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति जिम्मेदारी निभाना ही सच्ची तीर्थयात्रा है।


    आस्था भी रहे, जंगल भी बचे
    नागद्वारी यात्रा सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सतपुड़ा के संवेदनशील जंगलों से होकर गुजरने वाली यात्रा भी है। इसलिए एसटीआर प्रबंधन श्रद्धालुओं से अपील कर रहा है कि वे प्लास्टिक बोतल, पॉलीथिन, रैपर, पुराने कपड़े और अन्य कचरा जंगल में न छोड़ें।
    प्रशासन की कोशिश है कि इस बार श्रद्धालु दर्शन की पुण्य स्मृति लेकर लौटें, लेकिन जंगल के हिस्से में अपना कचरा छोड़कर नहीं।
    नागदेव का संदेश सीधा है—भगवान को प्रसाद चढ़ाइए, जंगल को कचरा नहीं।

  • नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा का ‘पीढ़ी परिवर्तन’ प्लान,  युवा चेहरों पर दांव;  पुराने नेताओं की बढ़ सकती है मुश्किल


    मध्य प्रदेश में 2027 के निकाय चुनाव की तैयारियां तेज, पार्षद से लेकर महापौर तक नए चेहरों को मौका देने की रणनीति; गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों पर भी नजर


    भोपाल। मध्य प्रदेश में वर्ष 2027 में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन भाजपा ने इसकी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। संगठन स्तर पर चल रहे पीढ़ी परिवर्तन के अभियान का असर अब नगरीय निकायों में भी दिखाई देने की तैयारी है। पार्टी इस बार बड़ी संख्या में नए और युवा चेहरों को मैदान में उतारने के साथ साफ छवि वाले गैर राजनीतिक लोगों को भी मौका देने की रणनीति पर काम कर रही है।
    प्रदेश के 413 नगरीय निकायों में होने वाले चुनाव में महापौर के साथ नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्ष के चुनाव भी प्रत्यक्ष प्रणाली से कराने की तैयारी है। यानी मतदाता सीधे अध्यक्ष और महापौर का चुनाव करेंगे। यही बदलाव भाजपा की रणनीति को महत्वपूर्ण बना रहा है, क्योंकि सीधे चुनाव में संगठन के बजाय उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, छवि और स्थानीय स्वीकार्यता भी निर्णायक होगी।


    30 से 50 साल के नेताओं पर फोकस


    भाजपा की रणनीति में उम्र भी महत्वपूर्ण फैक्टर बन सकती है। पार्टी स्तर पर यह विचार चल रहा है कि पार्षद पद पर 30 से 50 वर्ष की उम्र के नेताओं को अधिक अवसर दिया जाए। वहीं अध्यक्ष और महापौर पद के लिए अधिकतम उम्र करीब 60 वर्ष रखने की गाइडलाइन पर विचार है। हालांकि विशेष परिस्थितियों में अपवाद की संभावना भी रहेगी।
    इसका सीधा असर उन नेताओं पर पड़ सकता है, जो वर्षों से निकाय की राजनीति में सक्रिय हैं और लगातार टिकट की दावेदारी करते रहे हैं। पार्टी संगठन में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति को अब स्थानीय सरकार तक ले जाने की तैयारी कर रही है।


    गैर राजनीतिक चेहरों पर भी नजर


    भाजपा की रणनीति का दूसरा अहम हिस्सा गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति में अवसर देना है। सामाजिक कार्य, व्यापार, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय लेकिन साफ छवि रखने वाले लोगों को निकाय चुनाव में उतारने पर विचार हो सकता है।
    पार्टी का आकलन है कि ऐसे चेहरों से स्थानीय स्तर पर नई स्वीकार्यता बनाई जा सकती है। साथ ही लंबे समय से चले आ रहे गुटीय समीकरणों और आपसी खींचतान से भी संगठन को बाहर निकलने का मौका मिलेगा।


    पुराने अध्यक्षों की एंटी-इनकमबेंसी चुनौती


    2022 में हुए निकाय चुनाव के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय स्तर पर उभरा असंतोष रहा। उस चुनाव में महापौर को छोड़कर नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से हुए थे। पार्षदों द्वारा चुने गए कई अध्यक्षों के खिलाफ बाद में असंतोष और गुटबाजी सामने आई।
    2024-25 में शिवपुरी और देवरी समेत करीब 100 निकायों में अध्यक्षों के खिलाफ पार्षदों की नाराजगी खुलकर सामने आई थी। सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव की समय-सीमा को दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष किया। साथ ही अध्यक्ष को हटाने के लिए जरूरी पार्षदों के समर्थन की सीमा भी दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई कर दी गई।
    इस बदलाव से निकायों में चुनाव से पहले बड़े राजनीतिक टकराव की स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश हुई।


    1000 से ज्यादा एल्डरमैन से साधे असंतुष्ट


    सरकार द्वारा नगर निगमों और नगर पालिकाओं में 1,000 से अधिक एल्डरमैन की नियुक्ति को भी निकाय चुनाव की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इनके जरिए लंबे समय से उपेक्षित या असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साधने के साथ सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार भी किया जाएगा।


    वार्डों का पुनरीक्षण, मतदाता सूची भी तैयार


    निकाय चुनाव की प्रशासनिक तैयारियां भी आगे बढ़ चुकी हैं। नगरीय विकास विभाग वार्डों का पुनरीक्षण कर चुका है और राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता सूची का प्रकाशन कर चुका है। ऐसे में भाजपा संगठन अब संभावित उम्मीदवारों की सामाजिक और राजनीतिक पकड़ का आकलन करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
    हालांकि पार्टी के भीतर निकाय चुनाव को आगे बढ़ाने की संभावना पर भी चर्चा है। अंतिम कार्यक्रम और चुनाव की समय-सीमा पर तस्वीर बाद में साफ होगी।
    फिलहाल संकेत साफ हैं—भाजपा निकाय चुनाव को सिर्फ सत्ता की पुनरावृत्ति का चुनाव नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में नई पीढ़ी को स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रही है। अगर उम्र और नए चेहरे की रणनीति लागू हुई तो कई पुराने दावेदारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट बचाने की ही होगी।

  • दतिया जीत से कांग्रेस को मिला नया चुनावी मॉडल, 2028 के लिए बूथ स्तर तक जमावट

    सेक्टर फॉर्मूले से हर बूथ पर नजर; कमजोर प्रदर्शन वाले क्षेत्रों की होगी समीक्षा, कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण शुरू

    निशाना न्यूज


    भोपाल। दतिया उपचुनाव में मिली जीत ने मध्यप्रदेश कांग्रेस को सिर्फ राजनीतिक संजीवनी ही नहीं दी, बल्कि मिशन 2028 के लिए बूथ मैनेजमेंट का नया मॉडल भी दे दिया है। दतिया में अपनाए गए क्लस्टर-सेक्टर फॉर्मूले को अब पूरे प्रदेश में लागू करने की तैयारी है। इसके जरिए हर बूथ की नियमित मॉनीटरिंग, स्थानीय सामाजिक समीकरणों के हिसाब से जनसंपर्क और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय की जाएगी।कांग्रेस ने दतिया विधानसभा क्षेत्र को अलग-अलग क्लस्टर में बांटकर आसपास के 4-5 बूथों को एक सेक्टर में रखा था। प्रत्येक क्लस्टर की जिम्मेदारी वरिष्ठ और लोकप्रिय नेता को दी गई, जबकि सेक्टर स्तर पर दो-तीन नेताओं को मॉनीटरिंग की जिम्मेदारी मिली। बूथ कमेटियों के गठन के साथ नियमित रिपोर्टिंग की व्यवस्था भी की गई।क्लस्टर प्रभारी रोजाना सेक्टर प्रभारियों से बूथवार रिपोर्ट लेते थे। जहां पार्टी कमजोर दिखी, वहां तत्काल जमावट की जाती थी। विधायकों, पूर्व सांसद-विधायकों और वरिष्ठ नेताओं को क्षेत्रवार जनसंपर्क की जिम्मेदारी दी गई। जाति, समाज और वर्ग के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए घर-घर संपर्क के लिए अलग-अलग नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगाया गया।

    156 बूथों पर कांग्रेस की जीत

    दतिया के 35 क्लस्टरों में कांग्रेस ने 156 बूथों पर जीत दर्ज की। कई बूथों पर पार्टी को एकतरफा बढ़त मिली। वहीं भाजपा सीमित सेक्टरों में ही कांग्रेस को चुनौती दे सकी। कांग्रेस अब दतिया के इस प्रयोग का विधानसभा स्तर पर अध्ययन कर कमजोर और मजबूत क्लस्टरों की पहचान कर रही है।

    इन क्लस्टरों का प्रदर्शन रहा कमजोर

    कुछ क्लस्टरों में कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। पूर्व मंत्री प्रभु सिंह ठाकुर के प्रभार वाले क्लस्टर नंबर-5 में 29 में से सिर्फ 2 बूथ कांग्रेस जीत सकी, जबकि 27 बूथ भाजपा के खाते में गए। विधायक दिनेश गुर्जर, पूर्व विधायक सत्यपाल नीटू सिकरवार और विधायक सचिन यादव के प्रभार वाले क्लस्टरों में भी कांग्रेस को आधे से अधिक बूथों पर हार का सामना करना पड़ा।

    ये तीन बने ‘सुपर कैंपेनर’

    कांग्रेस की आंतरिक समीक्षा में जयवर्धन सिंह, पंकज उपाध्याय और बैजनाथ कुशवाह के क्लस्टरों का प्रदर्शन सबसे बेहतर माना गया।जयवर्धन सिंह: 35 में से 30 बूथ कांग्रेस के पक्ष मेंपंकज उपाध्याय: 29 में से 24 बूथों पर कांग्रेस विजयीबैजनाथ कुशवाह: क्लस्टर में कांग्रेस को एकतरफा बढ़तइनके अलावा पूर्व मंत्री लाखन सिंह यादव के नेतृत्व वाले क्लस्टर का प्रदर्शन भी बेहतर रहा। यहां 34 में से 18 बूथ कांग्रेस के पक्ष में गए।

    अब पूरे प्रदेश में लागू होगा दतिया मॉडल

    प्रदेश कांग्रेस संगठन ने दतिया की रणनीति को ‘संगठन सृजन’ का हिस्सा माना है। संगठन महामंत्री संजय कामले के मुताबिक, विधानसभा प्रभारी, मंडलम, सेक्टर, वार्ड और ग्राम पंचायत समितियों में जिम्मेदारियां बांटी जा रही हैं। बूथ लेवल एजेंट (BLA) भी तय किए जा रहे हैं।इन सभी को दतिया मॉडल की तर्ज पर चुनाव से काफी पहले सक्रिय किया जाएगा। कार्यकर्ताओं का संभागवार प्रशिक्षण शुरू हो चुका है।कामले के मुताबिक, दतिया उपचुनाव में अपनाया गया मॉडल पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सफल रहा है। हालांकि 2028 के विधानसभा चुनाव में बड़े नेता खुद प्रत्याशी होंगे, इसलिए चुनाव लड़वाने वाली टीम की भूमिका अलग होगी। इसके लिए भी अलग स्तर पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।

    कांग्रेस की रणनीति के तीन फोकस

    1. हर बूथ की नियमित मॉनीटरिंग
    2. सामाजिक समीकरण के हिसाब से माइक्रो मैनेजमेंट
    3. चुनाव से पहले ही कार्यकर्ताओं और बूथ कमेटियों को सक्रिय करनाकांग्रेस की कोशिश अब दतिया के इस प्रयोग को प्रदेशभर में दोहराकर भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट का मुकाबला करने की है।

  • क्या जेन जी गढ़ रहे हैं नई भाषा..? जेन जी के स्लैंग शब्दों को समझने में नाकाम हुए दिग्गज?

    नई दिल्ली,// भाषा हमेशा बदलती रही है, यह  बदलाब अस्वाभाविक नहीं माना जाता है लेकिन इस डिजिटल दौर में यह बदलाव पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गया है। जेन जी (Generation Z – 1997 से 2012 के बीच जन्मे)  की नई शब्दावली जिसे आमतौर पर ‘स्लैंग’ कहा जाता है, अब सिर्फ मजाक या ट्रेंड नहीं रह गई, बल्कि एक तरह का ‘कोड’ बन चुकी है। ऐसा कोड, जो कुछ लोगों को जोड़ता है और बाकी को बाहर कर देता है।
    बूमर्स (1946-1964) और यहाँ तक कि मिलेनियल्स (1981-1996) के लिए उन्हें समझना मुश्किल हो रहा है।
    स्लैंग क्यों समझ नहीं आते?
    ये शब्द अक्सर संदर्भ (context) पर निर्भर होते हैं, और पुराना जनरेशन, जो औपचारिक भाषा का आदी है, इन्हें “आलसी” या “बेतुका” मान लेता है। 
    दिलचस्प बात यह है कि इस बदलती भाषा को समझने की कोशिश सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े सितारे और नेता भी कर रहे हैं लेकिन अक्सर नाकाम रहते हैं।
    ये शब्द अक्सर पारंपरिक अंग्रेजी अर्थों से बिल्कुल अलग होते हैं, जो बातचीत में भ्रम पैदा करते हैं। जेन ज़ी पीढ़ी की अपनी अलग भाषा है, जो वाक्यों में कम और स्लैंग में ज्यादा बातें करती है। ये जनरेशन टेक्नो-सेवी है और सोशल मीडिया में माहिर है।

    इस तरह पहले भी हो चुके हैं बदलाव!
    असल में यह पहली बार नहीं है जब नई पीढ़ी ने अपनी अलग भाषा बनाई हो। 1970 के दशक में ‘ग्रोवी’ और ‘बमर’, 1980 में ‘रेडिकल’ और ‘डवीब’ और 1990 में ‘सप’ और ‘एज इफ’ जैसे शब्द आए। हर दौर में ऐसे शब्द रहे हैं, जो उस समय के युवाओं की पहचान बनते थे और बड़ों को ‘आउटसाइडर’ जैसा महसूस कराते थे। लेकिन जेन जी स्लैंग सिर्फ मजेदार या स्टाइलिश नहीं है। यह सामाजिक और राजनीतिक अनुभवों को भी व्यक्त करती है। उदाहरण के लिए मैन्सप्लैनिंग(जब पुरुष महिलाओं को जरूरत से ज्यादा समझाते हैं), गैसलाइटिंग (किसी को मानसिक रूप से भ्रमित करना), घोस्टिंग (अचानक संपर्क तोड़ देना) और कैंसल कल्बर (गलत व्यवहार पर सार्वजनिक बहिष्कार) जैसे शब्द सिर्फ ट्रेंड नहीं हैं, बल्कि समाज में मौजूद समस्याओं को नाम देते हैं और उन्हें सामने लाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार,
    जेन जी स्लैंग एक तरह की ‘माइक्रो-सोसाइटी’ बना रही है। जो लोग इन शब्दों को समझते हैं, वे एक समूह का हिस्सा बन जाते हैं। हालांकि पहले स्लैंग धीरे-धीरे फिल्मों, किताबों या पॉप कल्चर के जरिए फैलती थी। इंटरनेट ने अभी इसे वैश्विक बना दिया है।

    रेयान गोसलिंग भी अटके

    हॉलीवुड अभिनेता रेयान गोसलिंग ने अपनी फिल्म प्रोजेक्ट हैल मेरी के प्रमोशनल वीडियो में जेन जी स्लैंग इस्तेमाल करने की कोशिश की। उन्होंने ‘टी’ (गॉसिप), ‘स्ले’ (शानदार करना), ‘नो कैप’ (सच कहना) जैसे शब्द बोले। लेकिन यही वीडियो मजेदार इसलिए बन गया क्योंकि यह सब उनके मुंह से ‘नेचुरल’ नहीं लग रहा था। उनकी कोशिश में एक अजीब-सी असहजता दिखी और वही दर्शकों के लिए हंसी का कारण बन गई।


    भारत में भी यही हाल

    भारत में भी यही ट्रेंड देखने को मिल रहां है। युवा कलाकार जैसे अनन्या पांडे आसानी से ‘एनजीएल’ (नॉट गोना लाई) या ‘गिविंग’ जैसे शब्द समझा देती हैं, जबकि कई वरिष्ठ कलाकार इन शब्दों से अनजान नजर आते हैं। दूसरी ओर डलकोर सलमान जैसे कुछ अभिनेता इन शब्दों को समझते हैं और इसका श्रेय अपने जेन जी परिवार के सदस्यों को देते हैं। राजनीति भी इससे अछूती नहीं है। राहुल गांधी से जब छात्रों ने ‘पोकी’ (प्यार से बुलाने वाला शब्द) और ‘रिज्ज’ (आकर्षण/करिश्मा) का मतलब पूछा, तो उन्होंने मजाक में कहा- ‘अब मैं फंस गया हूं।’ इसी तरह शशि थरूर जैसे शब्दों के उस्ताद नेता भी ‘फिन्स्ट्रा’ (फेक इंस्टाग्राम) और ‘ओओटीडी’ (आउटफिट ऑफ द डे) जैसे शब्द नहीं पहचान पाए।
    अभी हाल ही में मनोज बाजपेयी से इंटरव्यू में पूछा गया कि ‘बेंचिंग’ किसे कहते हैं, तो उसपर उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि ‘’बेंचिंग तो उसे कहते हैं जो बैंच पर बैठते हैं’’ इसपर सभी हंसने लगे, लेकिन जवाब गलत था जिसके बाद उन्हें सही किया गया
    इसपर एंकर ने समझाया कि रिलेशनशिप में बैंचिंग का मतलब होता है किसी को उम्मीद में लगाए रखना। यानी सामने वाला आपमें दिलचस्पी दिखाता है, लेकिन असली रिश्ते में आने से बचता है। वो आपको एक तरह से “साइड ऑप्शन” की तरह रखता है। जब उसे अकेलापन महसूस हो या इमोशनल सपोर्ट चाहिए हो, तभी वो आपको याद करता है। बाकी समय वो आपको इग्नोर करता रहता है। ऐसे में इंसान को लगता है कि रिश्ता आगे बढ़ेगा, लेकिन असल में दूसरा सिर्फ अपनी सुविधा के लिए आपको पकड़े रखता है
    दिग्गजों को परेशान करने वाले प्रमुख जेन जी स्लैंग (Gen Z Slang Dictionary):

    • Rizz (रिज़): ‘Charisma’ (आकर्षण) शब्द से बना है, जिसका अर्थ है किसी को आकर्षित करने या रिझाने की क्षमता।
    • Sus (सस): ‘Suspicious’ का संक्षिप्त रूप, जिसका अर्थ है संदेहास्पद या जिस पर भरोसा न किया जा सके।
    • Bet (बेट): किसी बात से सहमति जताना या ‘हाँ’ या ‘ठीक है’ के अर्थ में उपयोग होता है।
    • Slay (स्ले): बहुत अच्छा प्रदर्शन करने या अद्भुत दिखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
    • Gyatt (ग्याट): सोशल मीडिया पर अक्सर किसी व्यक्ति की तारीफ (क्यूट) के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द।
    • Pookie (पूंकी): किसी बेहद प्यारे या करीबी दोस्त के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला निकनेम।
    • No Cap (नो कैप): ‘कोई झूठ नहीं’ या ‘सच में’ (Honestly) के अर्थ में, जो बात की सच्चाई पर जोर देता है।
    • Delulu (डेलुलू): ‘Delusional’ का संक्षिप्त रूप, जो अव्यावहारिक मान्यताओं या कल्पनाओं को दर्शाता है।
    • Mid (मिड): औसत दर्जे का या कम गुणवत्ता (Mediocre) वाली चीज़ के लिए।
    • Yeet (यीत): किसी वस्तु को उत्साह या जोर से फेंकना।
    • Ick (इक्क): किसी व्यक्ति से अचानक घृणा या नापसंदगी महसूस होना।
    • Sigma (सिग्मा): सोशल मीडिया पर लोकप्रिय एक व्यक्तित्व प्रकार, जिसे अक्सर आत्मविश्वासी या सफल के रूप में देखा जाता है।

  • गेंहू की फसल पर “मामा” का प्रकोप “.

    गेंहू की फसल पर “मामा” का प्रकोप “.

    नर्मदापुरम//
    कभी पंजाब हरियाणा में गेंहू की फसल के लिए समस्या बनी खरपतवार जिसे वहां ‘ गेहूं  का मामा ‘ कहा जाता है, अब मध्य प्रदेश में भी अपने पैर पसार चुका है और उसमें तेजी आ रही है…. आई सी ए आर की रिपोर्ट के मुताबिक नर्मदापुरम , नरसिंहपुर,बैतूल, विदिशा, सीहोर, कटनी, जबलपुर  सहित कई जिलों में इसके प्रकोप  को देखा जा रहा है ।   नर्मदापुरम में इस खरपतवार को गुल्ली-डंडा कहा जाता है…. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय  पर इसको नियंत्रित नहीं किया जाए तो यह फसल  को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
    इसे पहचाना मुश्किल होता है
    फैलारिस माइनर वैज्ञानिक नाम वाली यह खरपतवार गेहूं जैसी दिखती है, इसलिए इसे पहचाना मुश्किल होता है और गेंहू के पौधों के पोषक तत्वों  और पानी को चुराकर जड़ों को  खोखला कर गेहू की वृद्धि को पर असर डालती है. दाने में भराव कम हो जाता है।
    विशेषज्ञों के अनुसार समय पर नियंत्रण नहीं होने पर यह खरपतवार गेहूं के उत्पादन में 30- 35फीसदी तक असर डाल सकता है।
    शुरुआती अवस्था में यह बिल्कुल गेहूं की तरह दिखता है, इसमें गेहूं जैसी बाली भी निकलती है, लेकिन बालियों में कांटे नहीं होते और कॉलर वाला हिस्सा हल्के गुलाबी रंग का होता है।
    जानकार किसानों का कहना है कि यह खरपतवार उस जमीन पर ज्यादा मात्रा में होती है जहां जल भराव होता है, या जमीन नमी पकड़ कर चलती है। नमी वाले खेतों में इसका प्रकोप ज्यादा होता है, वैसे क्षेत्र में इसका प्रकोप लगातार बढ़ रहा है।

    इसके नियंत्रण के लिए रासायनिक दवाएं (जैसे फिनोक्सीडॉन ,क्लोडिनाफॉप, मेट्रिब्यूज़िन) और फसल चक्र अपनाना ज़रूरी है। 

    इसे ‘मामा’ और  गुल्ली डंडा क्यों कहते हैं ?
    इस खरपतवार के नामों की कहानी भी दिलचस्प है। इस खरपतवार को  बहरूपिया कहा जा सकता है बिल्कुल गेहूं जैसी दिखने वाली यह खरपतवार गेहूं की फसल में छिप जाता है  जिससे किसान इसे पहचान नहीं पाते और अंत में यह फसल को नुकसान पहुँचाता है, ग्रामीण  अंचलों में मामा और भांजे का जो रिश्ता होता है, वह बहुत ही अटूट और  दोस्ताना सा होता । खरपतवार और गेहूं में काफी समानता होती है।ठीक वैसे ही जैसे मामा कभी-कभी अपने भांजों और बच्चों को शरारत से परेशान करते हैं यह गेहूं की फसल को परेशान करती है।इसीलिए इसे गेहूं का मामा बुलाने लगे हैं.और यह नाम प्रचलन में भी आ गया है.
    कुछ जगह पर इसे गुल्ली डंडा भी बोला जाता है. इसकी वजह ये है, इसकी जो बनावट होती है,  इसका तना सीधा, पतला और सख्त होता है. दिखने में बिल्कुल डंडे की तरह होता है, तो वहीं इसका ऊपर का जो हिस्सा है, जो बीच का गुच्छा बनता है, वो छोटा और बेलनाकार होता है, जो कि बिल्कुल गुल्ली की तरह दिखता है. इसीलिए इसे गुल्ली डंडा के नाम से भी ग्रामीण क्षेत्रों में जानते हैं. वैसे इसे भंडूसी, कनकी, कैनरी ग्रास भी बोला जाता है।
    कहां से आई यह खरपतवार !
    इस खरपतवार का ओरिजन उत्तरी अफ्रीका यूरोप के देशों में माना जाता है। जानकारों के अनुसार हरित क्रांति के पहले देश में अनाज की कमी थी, उस समय अमेरिका मेक्सिको से हमारे यहां अनाज आयात किया गया था, तब यह गेहूं के साथ आ चुका था।

  • पूर्व क्रिकेटर  ने क्यों किया पंजाब केसरी पर मुकदमा ?

    नई दिल्ली// पूर्व क्रिकेटर और भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने पंजाब केसरी अखबार के खिलाफ ₹2 करोड़ हर्जाने की मांग को लेकर दिल्ली एचसी के समक्ष मानहानि का मुकदमा दायर किया है

    गंभीर ने अखबार द्वारा प्रकाशित कहानियों के एक समूह के लिए पंजाब केसरी, इसके प्रधान संपादक और दो पत्रकारों पर मुकदमा दायर किया है।
    पूर्व क्रिकेटर और बीजेपी सांसद (सांसद) गौतम गंभीर ने हिंदी अखबार पंजाब केसरी के खिलाफ ₹2 करोड़ का हर्जाना मांगने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर किया है।

    गंभीर ने अखबार, उसके संपादक आदित्य चोपड़ा के साथ-साथ संवाददाताओं अमित कुमार और इमरान खान पर यह कहते हुए मुकदमा दायर किया है कि उन्होंने व्यवस्थित रूप से उन्हें निशाना बनाते हुए कई दुर्भावनापूर्ण और अपमानजनक लेख प्रकाशित करके अपनी पत्रकारिता की स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है।

    अधिवक्ता जय अनंत देहदराई के माध्यम से दायर अपने मुकदमे में, गंभीर ने दावा करने के लिए रिपोर्टों के एक समूह का हवाला दिया कि कागज ने अपनी कहानियों को एक भ्रामक स्पिन दिया। एक रिपोर्ट में उनकी तुलना पौराणिक राक्षस भस्मासुर से भी की गई थी, इसका विरोध किया गया था।

    सूट में उल्लिखित कुछ रिपोर्ट हैं:

    सांसद गौतम गंभीर लापता गली-गली में लगे पोस्टर;

    दिल्ली के लापता सांसद लखनऊ सुपर जाइंट्स के लिए बने भस्मासुर (लखनऊ सुपर जायंट्स के लिए दिल्ली का लापता सांसद बना भस्मासुर);

    आदेश गुप्ता बोलते रह गए, गौतम गंभीर उठ चले (आदेश गुप्ता बोलते रहे, गौतम गंभीर चले गए);

    ये नए मिजाज के सांसद है जरा फासलो से मिला करो।

    गंभीर ने तर्क दिया कि ये रिपोर्ट उनके काम के बारे में एक झूठी और गहरी अपमानजनक कहानी बनाती हैं और पाठकों के मन में एक सांसद के रूप में रहती हैं।

    रिपोर्ट में उन्हें एक जातिवादी व्यक्ति और एक उच्च नाक वाले राजनेता के रूप में चित्रित किया गया था, यह इंगित किया गया था।

    गंभीर ने धर्मार्थ संगठनों को 2 करोड़ रुपये का हर्जाना देने की मांग की है। उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि प्रतिवादियों को बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए और इसे पंजाब केसरी द्वारा प्रसारित सभी समाचार पत्रों (डिजिटल संस्करणों सहित) में प्रकाशित किया जाना चाहिए।

    उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया कि उनके खिलाफ किए गए प्रत्येक अपमानजनक प्रकाशन को वापस लेने के लिए कागज को निर्देश जारी किए जाने चाहिए।

    वाद को न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

  • क्यों बिकती हैं भारत में सफेद कारें ज्यादा ?

    नई दिल्ली // क्या आप जानते हैं भारत में अमूमन लोग सफेद रंग की कार खरीदना पसंद करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल यानी 2022 में देश में बिकने वाली करीब 42.2 फ़ीसदी कारें सफेद रंग की थीं। सफेद रंग के बाद खरीदने वालों की पसंद सिल्वर फिर ग्रे है .

     आर्थिक अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड ने विगत दिनों वाहन सलाहकार कंपनी जाटो डायनामिक्स के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर एक खबर छपी है,  जिसके अनुसार पिछले साल देशभर में बिकने वाली 42.2 फ़ीसदी कारें सफेद थी, जबकि यह संख्या 2021 में थोड़ी अधिक 43.9 फ़ीसदी थी, हां, 2021 की तुलना में 2022 में दूसरे रंग जिनमें काली, सिलेटी, नीले, लाल,हरे और सुनहरे रंगों की  कारों की बिक्री में कुछ फ़ीसदी की वृद्धि हुई है ,

    सफेद कार ज्यादा बिकने के कई हैं कारण

     विशेषज्ञों के मुताबिक सफेद कारों के ज्यादा बिकने के कारणों की फेहरिस्त लंबी है ।सबसे अव्वल तो सफेद रंग की गाड़ियों का रखरखाव आसान होता है। यह रंग दूसरे रंगों की तरह जल्दी अपनी चमक नहीं खोता। यह रंग परिवार के सदस्यों की आम पसंद भी हो जाता है । इस रंग की गाड़ी की रीसेल वैल्यू ज्यादा होती है यानी दोबारा बिक्री करने पर ज्यादा पैसा मिलता है। इसके अलावा सुरक्षा के मामले में भी सफेद रंग के अलग फायदे हैं, यह रात को बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है ।गर्मी के मौसम में कम  गर्मी अवशोषित करता है और छोटी कारें भी सफेद रंग की वजह से बड़ी दिखती हैं। और वास्तु और ज्योतिष कारणों से इस रंग को शुभ नहीं माना जाता है ।

    आखिर कंपनियां क्यों बनाती हैं इतने रंगों की कारें?

     भारत के लोग कई तरह की कारों का अनुभव लेने और प्रयोग करने में पीछे नहीं हैं। पिछले साल कुल यात्री वाहन की बिक्री में 1 फ़ीसदी से थोड़ा अधिक हिस्सेदारी सफेद के अलावा दूसरे रंग के वाहनों की हुई थी। कार बिक्री पर नजर रखने वालों का कहना है कि सफेद रंग के अलावा दूसरे रंग की कारों की बिक्री इसलिए बढ़ी है, क्योंकि उनके लिए कम इंतजार करना पड़ता है। इसके अलावा स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) सेग्मेंट के वाहनों की बिक्री में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिल रही है, क्योंकि इस तरह के वाहन लग्जरी सुविधाओं से लैस होने के साथ काफी मजबूत होते हैं इस सेगमेंट में लोग अधिकतर गहरे रंगों वाले मॉडल खरीदते हैं। मारुति सुजुकी इंडिया के वरिष्ठ  कार्याधिकारी ( विपणन और बिक्री) शशांक श्रीवास्तव के मुताबिक किसी भी बढ़ती अर्थव्यवस्था और परिपक्व  कार बाजार में सलेटी के अलावा दूसरे रंग की कारों को कम पसंद किया जाता है

    महिला खरीददारों के कारण चमकीले और गहरे और रंगों के वाहनों की मांग बढ़ी

    जानकारों के मुताबिक आजकल करों की खरीदी में 10 से 12 फीसदी की हिस्सेदारी महिलाओं की है जो ब्राईट रंग खरीदना पसंद करती हैं . अब भारत में रंगीन गाड़ियों को प्राथमिकता मिलना शुरू हो गई हैं, वैसे आंकड़े यह भी बताते हैं कि पिछले 3 दशकों तक भारत में सफेद, सिल्वर और सलेटी गाड़ियों की हिस्सेदारी 65 से 70 फ़ीसदी रही है । एक वक्त सिल्वर कार बहुत खरीदी जाती थी।

     पिछले साल यानी 2022 सबसे अधिक 38 लाख़ यात्री वाहन बिके जो 2018 के पिछले रिकॉर्ड से 4.38 लाख ज्यादा थे।

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  • पत्रकार फर्जी खबरों पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को अधिकार देने के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहे हैं?

    पत्रकार फर्जी खबरों पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को अधिकार देने के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहे हैं?

    सरकार की अधिकृत सूचना इकाई पीआईबी को सोशल मीडिया मंचों पर फ़र्ज़ी ख़बरों की निगरानी का अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव पर विभिन्न मीडिया संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. इससे पहले एडिटर्स गिल्ड ने कहा था कि फ़र्ज़ी ख़बरों का निर्धारण सिर्फ़ सरकार के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है, इसका नतीजा प्रेस को सेंसर करने के रूप में निकलेगा.

    नई दिल्ली//  संपादकों की शीर्ष संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर उनसे आईटी नियमों में संशोधन को ‘हटाने’ का आग्रह किया है, जो सरकार की मीडिया शाखा ‘पत्र सूचना कार्यालय’ (पीआईबी) की फैक्ट चेकिंग इकाई द्वारा ‘फर्जी’ के रूप में पहचाने गए समाचार या सूचना को हटाने का निर्देश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को देता है. वैष्णव को भेजे गए एक पत्र में गिल्ड ने मंत्रालय से डिजिटल मीडिया के लिए नियामक ढांचे पर प्रेस निकायों, मीडिया संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ परामर्श शुरू करने के लिए कहा, ताकि प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर न किया जा सके.

    समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, गिल्ड ने कहा कि वह प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) को व्यापक अधिकार देने वाले प्रस्तावित संशोधन से ‘बेहद चिंतित’ है.

    पत्र में कहा गया है, ‘यह नई प्रक्रिया मूल रूप से स्वतंत्र प्रेस को दबाने का काम करती है और पीआईबी या तथ्य जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी अन्य एजेंसी को व्यापक अधिकार देगी, ताकि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को ऐसी किसी भी सामग्री को हटाने के लिए मजबूर किया जा सके, जिससे सरकार को परेशानी हो सकती है.’ इस प्रस्तावित संशोधन से इस एजेंसी को व्यापक नियामक शक्तियां देने की मांग की गई है, जो स्पष्ट रूप से अवैध और असंवैधानिक है.’ गिल्ड ने नोट किया कि पीआईबी की भूमिका सरकार के मामलों पर समाचार संगठनों को सूचना प्रसारित करने तक सीमित है .

    गिल्ड ने दोहराया कि प्रक्रियाओं की परवाह किए बिना संशोधन अपने आप में एक अवैध कदम था, क्योंकि पीआईबी के पास किसी भी क्षमता में प्रेस का नियामक होने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है.

    इससे पहले बीते 18 जनवरी को भी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक बयान में इस प्रस्ताव पर गहरी चिंता जताते हुए ने कहा था कि फर्जी खबरों का निर्धारण सिर्फ सरकार के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है, क्योंकि इसका नतीजा प्रेस को सेंसर करने के रूप में निकलेगा.

    दरअसल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बीते 17 जनवरी को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (आईटी नियम) के मसौदे में संशोधन जारी किया, जिसे पहले सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया था.

    इसमें सोशल मीडिया पर गलत, फर्जी या भ्रामक सामग्री की पहचान का जिम्मा पीआईबी या किसी अन्य सरकारी एजेंसी को देने का जिक्र है. इसे ऑनलाइन मीडिया के एक हिस्से ने सरकारी नियंत्रण की कोशिश बताया है.

    इसमें कहा गया है कि पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की फैक्ट-चेकिंग इकाई द्वारा ‘फर्जी (फेक)’ मानी गई किसी भी खबर को सोशल मीडिया मंचों समेत सभी मंचों से हटाना पड़ेगा.

    ऐसी सामग्री जिसे ‘फैक्ट-चेकिंग के लिए सरकार द्वारा अधिकृत किसी अन्य एजेंसी’ या ‘केंद्र के किसी भी कार्य के संबंध में’ भ्रामक के रूप में चिह्नित किया गया है, उसे ऑनलाइन मंचों (Intermediaries) पर अनुमति नहीं दी जाएगी.

    नए संशोधन प्रस्ताव को लेकर विभिन्न मीडिया संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अलावा प्रेस एसोसिएशन, डिजिपब फाउंडेशन ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन जैसे मीडिया संगठनों ने भी सरकार से संशोधन को वापस लेने की मांग की है.

    इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन ने ‘फर्जी समाचार’ पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को सशक्त बनाने के कदम का विरोध किया और सभी पार्टियों के सांसदों से हस्तक्षेप की मांग की है .  सांसदों को लिखे एक खुले पत्र में, IJU ने सांसदों से “संविधान में निहित सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार” की रक्षा के प्रयासों के लिए अपनी आवाज़ देने की अपील की है। पत्रकारों के निकाय ने ऑनलाइन सामग्री के नियमन के लिए भारतीय प्रेस परिषद की तर्ज पर एक स्वतंत्र निकाय के गठन की भी मांग की है।

    इस बीच इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) ने सरकार से अनुरोध किया कि आईटी नियमों में उस मसौदा संशोधन को वापस लिया जाए, जिसके तहत सोशल मीडिया मंचों के लिए पीआईबी की फैक्ट चैकिंग इकाई द्वारा फर्जी घोषित खबर या सूचना को हटाना जरूरी होगा.संगठन  ने कहा, ‘अपने स्वयं के मामले में न्यायाधीश बनने के लिए कानून बनाकर, सरकार नियमों के एक सेट में प्रस्तावित संशोधन के माध्यम से, जो अन्यथा भी चिंता का कारण बनता है, प्रभावी रूप से आलोचना और यहां तक ​​कि निष्पक्ष टिप्पणी को दबाने के लिए कदम उठा रही है.’

    आईएनएस के अलावा न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (एनबीडीए) ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों के संशोधनों के मसौदे को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि  बिना किसी नियंत्रण और संतुलन के सरकार को इस तरह की शक्तियां प्रदान करने से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गला घोंट दिया जाएगा और मीडिया पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.

    एनबीडीए ने कहा कि समाचार मीडिया को विनियमित करने के लिए पर्याप्त कानून, विनियम और वैधानिक निकाय हैं तथा इस तरह के संशोधन से सरकार द्वारा अत्यधिक विनियमन होगा जो न तो वांछनीय और न ही स्वीकार्य है. एनबीडीए ने कहा, ‘संविधान में इस तरह की सेंसरशिप की परिकल्पना नहीं की गई है.’

    मालूम हो कि इससे पहले डिजिटल मीडिया संगठनों के एक संघ ‘डिजीपब’ ने बीते 19 जनवरी को कहा था कि आईटी नियमों में प्रस्तावित संशोधन संभावित रूप से प्रेस की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाने के लिए एक सुविधाजनक संस्थागत तंत्र बन सकता है.

    इसके अलावा, प्रेस एसोसिएशन ने एक बयान में कहा था, ‘प्रेस काउंसिल पहले से ही फर्जी समाचार की कई शिकायतों पर फैसला कर रही है. पीआईबी जैसी विशुद्ध रूप से सरकारी संस्था को फर्जी समाचार को निर्धारित करने और कार्रवाई करने की शक्ति मिलने से प्रेस काउंसिल का अधिकार, स्वतंत्रता कम हो जाएगी, जो 1966 से सुचारू रूप से काम कर रही है.’

    गौरतलब है कि 2019 में स्थापित पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई, जो सरकार और इसकी योजनाओं से संबंधित खबरों को सत्यापित करती है, पर वास्तविक तथ्यों पर ध्यान दिए बिना सरकारी मुखपत्र के रूप में कार्य करने का आरोप लगता रहा है.

    मई 2020 में  वेब साईट न्यूज़लॉन्ड्री ने ऐसे कई उदाहरण बताए थे, जहां पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई वास्तव में तथ्यों के पक्ष में नहीं थी, बल्कि सरकारी लाइन पर चल रही थी.

    फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के संस्थापक प्रतीक सिन्हा का भी कहना है कि समस्या यह भी है कि पीआईबी किन खबरों का फैक्ट-चेक करने का फैसला करता है और किनको नजरअंदाज करता है.

    उन्होंने वेब साईट न्यूजलॉन्ड्री से कहा था कि , ‘मुद्दा यह है कि पीआईबी फैक्ट चेक इकाई क्या सत्यापित करने का फैसला करती है. यदि आप पीआईबी द्वारा किए गए फैक्ट-चेक देखते हैं तो कुछ अपवादों को छोड़कर वे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचने से बचाने की कोशिश करते हैं. वे उन चुनिंदा खबरों का फैक्ट-चेक करते हैं, जो स्वभाव से राजनीतिक हैं और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए आलोचनात्मक हैं.’

    उन्होंने कहा था, ‘यह कहना कि केवल पीआईबी फैक्ट-चेकिंग इकाई ही यह तय करेगी कि क्या सच है और क्या झूठ है, बताता है कि केवल सरकार के खिलाफ गलत सूचना को हटाया जाएगा. अन्य सभी गलत सूचनाओं को ऑनलाइन बने रहने की अनुमति होगी.’

    पीआईबी को ऑनलाइन सामग्री की पड़ताल का अधिकार देने पर अगले महीने चर्चा: मंत्री

    इस बीच  इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री चंद्रशेखर मंगलवार को कहा कि सरकार की अधिकृत सूचना इकाई पीआईबी को सोशल मीडिया मंचों पर फर्जी खबरों की निगरानी का अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव पर अगले महीने सभी हितधारकों के साथ चर्चा की जाएगी. हम अगले महीने की शुरुआत में इस पर अलग से चर्चा करेंगे.’