Category: राजनीति

  • मध्य प्रदेश कांग्रेस में जल्द होगा बड़ा संगठनात्मक बदलाव,  नई टीम में दिखेंगे नए चेहरे


    भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए संगठन में बड़ा बदलाव करने जा रही है। प्रदेश कांग्रेस की मौजूदा कार्यकारिणी जल्द भंग कर नई टीम गठित की जाएगी। अगले दो से तीन माह में नई कार्यकारिणी का गठन पूरा होने की संभावना है।
    वर्तमान कार्यकारिणी में करीब 253 पदाधिकारी हैं। नई व्यवस्था में इनकी संख्या घटाकर लगभग 125 करने की तैयारी है। विधायकों के साथ जिला अध्यक्ष और प्रदेश पदाधिकारी की दोहरी जिम्मेदारी रखने वालों को भी प्रदेश संगठन के दायित्व से मुक्त किया जा सकता है।


    युवा चेहरे और अनुभवी नेताओं का संतुलन


    नई टीम में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन के साथ ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देने की रणनीति है, जो चुनाव लड़ने के बजाय संगठन को मजबूत करने और चुनाव लड़ाने की भूमिका निभाएं। युवा चेहरों के साथ अनुभवी नेताओं को भी जगह दी जाएगी।
    प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा है कि नई टीम सभी से विचार-विमर्श के बाद बनाई जाएगी और पार्टी का मुख्य लक्ष्य मिशन-2028 रहेगा।


    253 से घटकर 125 पदाधिकारी


    पटवारी की मौजूदा टीम में संतुलन बनाने के प्रयासों के चलते पदाधिकारियों की संख्या बढ़कर 253 तक पहुंच गई थी। पार्टी का मानना है कि बड़ी कार्यकारिणी के बावजूद अपेक्षित संगठनात्मक सक्रियता नहीं दिखी। इसी कारण अब कार्यकारिणी को छोटा और अधिक सक्रिय बनाने पर जोर है।


    युवाओं पर भी कांग्रेस का फोकस


    कांग्रेस ने युवाओं को जोड़ने के लिए युवा संवाद, आंदोलन और प्रदेशस्तरीय युवा सम्मेलन की योजना बनाई है। इसके बाद जिलों में भी युवा संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पार्टी सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को प्रदेशस्तरीय युवा सम्मेलन में बुलाने की तैयारी कर रही है। छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को 2028 के चुनाव की रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाएगा।

    वरिष्ठ कांग्रेस नेता मानक अग्रवाल को मिली बड़ी जिम्मेदारी..!

    काँग्रेस ने अपनी रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है । शनिवार को इसका आगाज करते हुए
    प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कांग्रेस के वरिष्ठ और कद्दावर नेता मानक अग्रवाल को कांग्रेस के पूर्व विधायकों के बीच समन्वय बनाने के लिए समन्वयक बनाया है। श्री अग्रवाल पीसीसी में बैठकर पूर्व विधायकों के और पीसीसी के बीच तालमेल का कार्य करेंगे।
    श्री अग्रवाल को इस जिम्मेदारी मिलने से कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान को गति मिलेगी!


    कांग्रेस का लक्ष्य: 

    नई संगठनात्मक टीम के जरिए अगले दो वर्षों में बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना और 2028 विधानसभा चुनाव की मजबूत तैयारी करना है।

  • विदेश जाने की चाह, लेकिन लौटने का इरादा भी… 10 में 8 भारतीय छात्र बोले- पढ़ाई के बाद लौटेंगे वतन

    ऑक्सफोर्ड सर्वे में बदली सोच की तस्वीर: अब विदेश की डिग्री को ‘बसने’ नहीं, ग्लोबल एक्सपीरियंस हासिल करने का रास्ता मान रहे युवा; 49% ने कहा- विदेश जाने का फैसला हमारा अपना

    विदेश मे पढ़ाई के लिए भारतीय छात्रों का रुझान बढ़ रहा है ,लेकिन अब बड़ी संख्या मे छात्र पढ़ाई के बाद भारत लौटकर करियर बनाने की योजना बना रहे है

    नई दिल्ली। विदेश जाना है… लेकिन हमेशा के लिए नहीं! भारतीय युवाओं की विदेश पढ़ाई को लेकर सोच में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के स्टूडेंट ग्लोबल मोबिलिटी इंडेक्स सर्वे में शामिल 81% भारतीय छात्रों ने कहा कि वे विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटना चाहते हैं। यानी करीब 10 में से 8 छात्र विदेशी डिग्री के बाद अपना भविष्य भारत में देख रहे हैं।

    कभी विदेश में पढ़ाई को बेहतर नौकरी और वहीं बसने की पहली सीढ़ी माना जाता था। अब युवा विदेश को शिक्षा, अनुभव, एक्सपोजर और ग्लोबल नेटवर्किंग का ठिकाना मान रहे हैं। पढ़ाई पूरी होगी, अनुभव मिलेगा और फिर उसी अनुभव के साथ भारत लौटकर करियर बनाने की तैयारी है।

    सबसे बड़ा बदलाव: अब पैरेंट्स नहीं, बच्चे तय कर रहे विदेश जाना

    सर्वे में विदेश जाने के फैसले को लेकर भी बड़ा बदलाव सामने आया है। 2025-26 में 49% छात्रों ने कहा कि विदेश जाकर पढ़ाई करने का फैसला उनका अपना था।

    दो साल पहले यह आंकड़ा सिर्फ 29% था। यानी युवाओं में अपने करियर को लेकर निर्णय लेने की स्वतंत्रता तेजी से बढ़ी है।

    विदेश जाने का फैसला खुद लेने वाले छात्र

    2023-24 : 29%

    2024-25 : 34%

    2025-26 : 49%

    यानी 2 साल में फैसला खुद लेने वालों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत अंक बढ़ी।

    10 में 9 के परिवार में पहली बार कोई विदेश पढ़ने जाएगा

    विदेश शिक्षा अब केवल उन परिवारों तक सीमित नहीं है, जहां पहले से कोई विदेश में पढ़ चुका है। सर्वे में करीब 10 में 9 छात्र अपने परिवार में पहली बार विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले होंगे।

    यानी पहली पीढ़ी के विद्यार्थी अब ग्लोबल एजुकेशन की दौड़ में तेजी से शामिल हो रहे हैं। इनके लिए सबसे बड़ा सहारा बना है—इंटरनेट।

    गूगल बना विदेशी यूनिवर्सिटी खोजने का नया ठिकाना

    विदेशी संस्थान चुनने के लिए छात्र एजेंटों से ज्यादा खुद ऑनलाइन रिसर्च कर रहे हैं।

    39% छात्रों को अपनी पसंद का संस्थान गूगल सर्च के जरिए मिला, जबकि 35% ने एजुकेशन एजेंट्स से जानकारी ली।

    भरोसे की बात आई तो भी गूगल सबसे आगे रहा।

    गूगल : 56%

    कॉलेज इवेंट्स : 20%

    इंस्टाग्राम : 9%

    एआई टूल्स : 6%

    यूट्यूब : 5%

    यानी विदेश जाने से पहले अब युवा किसी एजेंट के ऑफिस में बैठकर सिर्फ ब्रोशर नहीं पलट रहे। मोबाइल खोल रहे हैं, गूगल पर सर्च कर रहे हैं, सोशल मीडिया देख रहे हैं और एआई से सवाल पूछ रहे हैं।

    बिजनेस-मैनेजमेंट सबसे पसंदीदा

    विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की पढ़ाई की पसंद भी दिलचस्प है।

    सबसे पसंदीदा क्षेत्र

    बिजनेस-मैनेजमेंट : 75%

    पोस्टग्रेजुएशन : 70%

    हेल्थ और मेडिसिन : 8%

    साइंस : 2%

    इंजीनियरिंग : 1%

    विदेश की डिग्री, भारत में वापसी… आखिर क्यों?

    सर्वे के आंकड़े एक नई कहानी कहते हैं। भारतीय छात्र ग्लोबल एक्सपोजर चाहते हैं, लेकिन अपनी जड़ें छोड़ना जरूरी नहीं समझते।

    विदेश में पढ़ाई अब कई युवाओं के लिए ‘फाइनल डेस्टिनेशन’ से ज्यादा ‘करियर एक्सपीरियंस’ बनती जा रही है।

    यानी सोच कुछ ऐसी है—

    “डिग्री वहां से… अनुभव वहां का… लेकिन करियर अपने देश में।”

    डेटा में छिपी बड़ी तस्वीर

    81% — पढ़ाई के बाद भारत लौटना चाहते हैं49% — विदेश जाने का फैसला खुद लिया10 में करीब 9 — परिवार में पहली बार विदेश पढ़ने जाएंगे56% — जानकारी के लिए गूगल पर सबसे ज्यादा भरोसा75% — बिजनेस-मैनेजमेंट की ओर झुकाव

    बदल रहा है ‘विदेश जाने’ का मतलब

    विदेश जाने की इच्छा कम नहीं हुई है। बल्कि भारतीय युवाओं में ग्लोबल एजुकेशन का आकर्षण बना हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब विदेश जाना ‘वहीं बस जाने’ का पर्याय नहीं रह गया।

    नई पीढ़ी विदेश से सीखना चाहती है, दुनिया देखना चाहती है, अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करना चाहती है और फिर उस अनुभव को भारत में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है।

    यानी मंजिल विदेश नहीं… मंजिल बेहतर करियर है। और रास्ता चाहे जितना लंबा हो, लौटने का रास्ता भारत की ओर भी खुला है।

  • एक साल के तीन मासूम बच्चे चुने गए जगन्नाथ मंदिर के सेवादार, आइए जाने क्या है यह परंपरा ?

    एक साल के तीन मासूम बच्चे चुने गए जगन्नाथ मंदिर के सेवादार, आइए जाने क्या है यह परंपरा ?

    भुवनेश्वर। एक साल के तीन बच्चों को प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी मंदिर  का सेवादार चुना गया है। ये जगन्नाथ मंदिर में पुरोहित सेवा प्रदान करेंगे। इसके लिए इन्हें बाकायदा सालाना एक से दो लाख रुपए सैलरी के रूप में दिए जाएंगे। इनमें से बालादेब दशमोहापात्र तो अभी 10 महीने का ही है, जबकि एकांशु दशमोहापात्रा और बलदेव उम्र का एक साल पूरा कर चुके हैं।
    तीनों बच्चों को जगन्नाथ मंदिर के सेवकों के रूप में शामिल किया गया। बच्चे दैतापति निजोग श्रेणी के सेवादार होंगे,। 

    क्या है परम्परा

    दैतापति निजोग श्रेणी के सेवादार रथयात्रा के दौरान प्रमुख अनुष्ठान करते हैं। परंपरा के मुताबिक रथयात्रा से 15 दिन पहले (अनासार अवधि) या इस अवधि के आसपास जब भी दैतापति सेवक के घर लड़के का जन्म होता है, उसे भगवान की सेवा में शामिल करने के लिए चुना जाता है। इसी परंपरा के तहत इन बच्चों को सेवादार चुना गया। की रथयात्रा के आसपास इन तीनों बच्चों का जन्म हुआ था।
    जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति के सदस्य दुर्गा दशमोपात्रा ने बताया कि बलदेव दशमोहापात्रा  और एकांशु फिलहाल रथयात्रा में सेवाएं देंगे । जब भी 18 साल के हो जाएंगे इन्हें मंदिर के अंदर सेवा की अनुमति मिल जाएगी। बच्चों को मंदिर के अनासार घर में समारोह के दौरान सेवा करने का मौका भी मिलेगा। अनासार घर  वहजगह होती है जहां भगवान जगन्नाथ, बलदेव और देवी सुभद्रा रहते हैं।
    इस बार 20 जून को निकलेगी रथ यात्रा
    इस बार भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा 20 जून को निकलेगी । रथ यात्रा के लिए हर साल नए रथ बनाए जाते हैं। अक्षय तृतीया पर तीनों रथों का निर्माण शुरू किया गया था। रथों को चमकीले रंगों में रंगा जाता है। भगवान जगन्नाथ के लिए लाल पीले, भगवान बलराम के लिए लाल हरे, जबकि सुभद्रा के लिए लाल काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है।

    (मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर )

  • रिलीज होते ही विवादों में घिरी आदिपुरुष, फिल्म के खिलाफ़ दाखिल की गई याचिका।

    नई दिल्ली// ओम राउत के डायरेक्शन में बनी ‘प्रभास और कृति सेनन स्टारर फिल्म ‘आदिपुरुष’ विवादों में घिर गई है। सोशल मिडिया पर तो इसके संवादों को लेकर तहलका मचा हुआ है, साधु संत नाराज हैं और इसे आस्था से खिलवाड़ बता रहे हैं ,वहीं हिंदू सेना ने ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर मांग की है कि फिल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणित नहीं किया जाए. हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने शुक्रवार को ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की. साथ ही आरोप लगाया है कि मूवी में भगवान का काफी मजाक उड़ाया गया है।

    एनडीटीवी के अनुसार फिल्म को भगवान हनुमान की भूमिका निभाने वाले अभिनेता द्वारा बोले गए ‘टपोरी’ शैली के संवादों के लिए भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. समीक्षकों ने फिल्म की गंभीरता से समीक्षा की और इसे पुरानी फिल्मों का मिला-जुला रूप बताया है. उधर, नेपाल के फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने ‘सीता को भारत की बेटी’ बताने संबंधी संवाद पर आपत्ति जताई है. दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका में, श्री गुप्ता ने कहा, “यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत जनहित याचिका के रूप में एक रिट याचिका है, जिसमें उत्तरदाताओं को निर्देश की प्रकृति में एक उपयुक्त रिट जारी करने की प्रार्थना की गई है. धार्मिक नेताओं/चरित्रों/आकृतियों को गलत तरीके से चित्रित करने वाले आपत्तिजनक दृश्यों को हटाना की मांग की गई है. साथ ही प्रतिवादियों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए फीचर फिल्म आदिपुरुष को प्रमाणित नहीं करने और इस तरह के अन्य या आगे के आदेश को पारित करने का निर्देश देने के लिए मांग की गई है.”याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि फिल्म ‘धार्मिक नेताओं/पात्रों/आंकड़ों को गलत और अनुचित तरीके से चित्रित करके हिंदू समुदाय की भावनाओं को आहत करती है.’ हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने याचिका में रामायण, भगवान राम और देश की संस्कृति का मजाक बनाने का आरोप लगाया है. इसके अलावा उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट से ‘आदिपुरुष’ में रावण, राम, सीता और हनुमान के कई अपमानजनक सीन्स भी हटाने के लिए आदेश देने की मांग की है. 

  • इमा कैथल  यानी  500 साल पुराना अनोखा बाज़ार

    इमा कैथल यानी 500 साल पुराना अनोखा बाज़ार

    सिर्फ बाज़ार ही नहीं संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की पूरी कहानी है

     इम्फाल // भारत विविधताओं से भरा देश है. इसका इतिहास,भूगोल,धर्म और संस्कृति का मिल जुल कर कई बार इसे ऐसा रूप दे देती है कि हैरानी होती है . ऐसी ही एक हैरान करने वाली जगह है इमा कैथल

    क्या है इमा कैथल

    इमा कैथल मणिपुर की राजधानी इम्फाल का एक ऐसा बाजार है जो हमारे देश की अनमोल और अनूठी सांस्कृतिक विरासत का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है. इस अनोखे  बाजार की खास बात यह थी कि यहां दुकानदार केवल और केवल महिलाएं हैं । इस बाजार में  पारंपरिक वेशभूषा में हजारों महिलाएं अपनी दुकानें सजाकर बैठती हैं। इस बाजार में करीब 5000 महिलाएं दुकानदारी करती हैं। इसे एशिया का सबसे बड़ा महिला बाजार माना जाता है।

    मैतेई (मणिपुरी) शब्द ‘इमा’ का अर्थ है माँ और ‘कैथल’ का अर्थ है ‘बाज़ार’. इसे नुपी कैथल (महिलाओं का बाज़ार) भी कहते हैं . इस बाज़ार में केवल विवाहित महिलाओं को व्यापार करने की अनुमति है. परम्परा को जीवित रखने के लिए यहाँ पुरुषों को किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि करने की इजाजत नहीं है . 

    संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की कहानी

    इस बाजार का इतिहास 500 साल पुराना है, जो संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की पूरी कहानी है ।  माना जाता है कि मणिपुर में 16 वीं शताब्दी में लुलुप-काबा यानी बंधुवा मजदूरी की प्रथा थी, जिसमें 17 से 60 वर्ष के पुरुषों को खेती करने और युद्ध लड़ने के लिए दूर भेज दिया जाता है। ऐसे में महिलाएं ही घर चलाती थी। खेतों में काम करती थी और बोए गए अनाज को बेचती थी। इससे एक ऐसे बाजार की जरूरत महसूस हुई जहां केवल महिलाएं ही सामान बेचती हों। प्रारंभ में यह महिलाओं के लिए घरेलू सामान , करघे उपकरण, खाने की चीजें ,कपड़े आदि उत्पाद बेचने का मुख्य केंद्र बना

     1904 और 1939 में अंग्रेजी शासन के दौर में जब मणिपुर में जबरन आर्थिक सुधार लागू करने की कोशिश की तो इमा कैथल की इन साहसी महिलाओं ने इसका खुलकर विरोध किया। इन महिलाओं ने एक आंदोलन शुरू किया जिसे नुपी लेन (औरतों की जंग) कहा गया। नुपी लेन के दौरान महिलाओं ने अंग्रेजों की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, चक्काजाम और जुलूस आयोजित किए। यह आंदोलन दूसरे विश्र्वयुद्ध तक चलता रहा। इमा कैथल केवल एक बाजार न रहकर मणिपुर की मातृशक्ति का पर्याय बन गया  । आजादी के बाद भी यह सामाजिक विषयों पर चर्चा की एक जगह के रूप में स्थापित हुआ। यह भी कहा जाता है कि प्रिंट मीडिया की अनुपस्थिति में लोग यहां इसलिए भी आते थे ताकि उन्हें आस-पास की खबरें पता चल सकें। इस बाजार में केवल विवाहित महिलाएं ही दुकान चला सकती हैं। इन महिलाओं का अपना एक संगठन भी है जो जरूरत पड़ने पर इन्हें लोन भी देता है।अगर आप यहां रात में आएंगे तो बिजली की रोशनी में महिलाओं के उजले जगमगाते चेहरे आपका मन मोह लेंगे। गजब का आत्मविश्र्वास होता है इन महिलाओं में। आस-पास के चहल-पहल को देखना भी एक अनूठा अनुभव होता है। यहां महिलाओं को पारंपरिक फेनेक (एक तरह की लुंगी जिसे शरीर के निचले हिस्से में पहना जाता है) और ऊपर इनेफिस (एक तरह का शॉल) पहने हुए नजर आती हैं।

    आज ऐसा है बाज़ार

    वर्तमान मैं इमा कैथल परिसर में तीन बड़ी इमारतें हैं। हर इमारत के भूतल इमाओं के लिए निर्धारित किए गए हैं । प्रत्येक मंजिल को बाजार में बेची जाने वाली वस्तुओं के आधार पर अलग-अलग बांटा गया है।  लैमरेल सिदवी इमाया (पुराना बाजार) इस परिसर की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी संरचना है । यहां की दुकानों पर बांस से बनी वस्तुएं ,शुद्ध रुई के धागों और गहनों से लेकर अलग-अलग प्रकार के फल ,फूल मछलियां, मसाले आदि बेचे जाते हैं। 

    पुराना बाजार में मैतेइयो यानी मणिपुरी लोगों की देवी कैथल लैरेंबी और उनके पति लैरेंबा का एक छोटा सा तीर्थ स्थान भी है। मैतेई  लोगों की पौराणिक कथाओं में देवी कैथल लैरेंबी का एक महत्वपूर्ण स्थान है और माना जाता है कि वह कैथल लैरेंबी बाज़ार और महिला वर्ग की रक्षक हैं।

    इमोएनू इमा कैथल या लक्ष्मी बाजार इस परिसर की सबसे छोटी संरचना है। यहां की दुकानों पर पलंग पोश, मच्छरदानी जैसी घरेलू चीजें शाल तथा पारंपरिक पोशाकों जैसे वस्त्र उत्पाद बेचे जाते हैं। इन दुकानों को मणिपुर के अलग-अलग देशज समुदाय से संबद्ध रंग बिरंगी शालों से सजाया जाता है। फूईबी इमा कैथल या नया बाजार में मुख्य रूप से करघे पर बनी वस्तुएं उसमें भी खासतौर पर मैतई लोगों की पारंपरिक पोशाके  बेची जाती हैं, जिसमें विभिन्न तरह के समय साड़ियां और इनाफी शामिल हैं।

    आज इमा कैथल व्यापार और व्यवसाय का एक समृद्ध केंद्र होने के साथ साथ मणिपुर की महिलाओं को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सहभागी होने में सक्षम बनाता है

  • सीताजी के जन्म की कुछ जानी-अनजानी कथाएं

    सीताजी के जन्म की कुछ जानी-अनजानी कथाएं

    जानकी जयंती पर विशेष

    फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को सीता जी का जन्म उत्सव मनाया जाता है इसे सीता माता की जयंती या जानकी जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष यह 13-14फरवरी को मनाई जा रही है। गौरतलब है कि माता सीता के जन्म जयंती को भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में कुछ हिंदू समुदायों के लिए सीता नवमी के रूप में जाना जाता है और वैशाख महीने अप्रैल-मई में मनाया जाता है।

     रामायण दशरथ पुत्र राम की कथा ही नहीं वह जनक पुत्री सीता की भी कथा है। रामायण यानी राम का अयन। अयन का शाब्दिक अर्थ प्रयाण या अभियान होता है। वाल्मीकि ने रामायण में कई स्थानों पर जानकी या सीता के लिए ‘रामा’ शब्द का प्रयोग किया है, ऐसे में रामायण शब्द का दो तरह से विग्रह किया जा सकता है- राम का अयन और रामा का अयन । यानी रामायण राम और सीता का समन्वित अयन (अभियान या चरित्र) है । इस प्रकार रामकथा में सीता को राम के समान महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। विद्वानों ने सीता को वाल्मीकि की की अद्भुत और रहस्यमयी सृष्टि माना है।

    पर क्या आप जानते हैं कि पूरे विश्व में लगभग 300 से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं ,जिनमें वर्णित अनेक तथ्य एवं घटनाएं एक दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाते, लेकिन यह भी सत्य है कि इन सभी रामायणों का मूल स्रोत वाल्मीकि रामायण ही है। वाल्मीकि रामायण एकमात्र आधिकारिक एवं सर्वोपरि ग्रंथ है और सभी रचनाकारों ने इसी रामायण को अपना आधार बनाकर अपनी अपनी रामायण की रचनाएं की हैं ।

    भारतीय जनमानस में कई सौ सालों से जो रामायण गहरे तक बैठी हुई है वह गोस्वामी तुलसीदास कृत ” रामचरितमानस ” है और विशेषकर हिंदू जनमानस के मन मस्तिष्क में इस कृति के पात्रों एवं घटनाओं पर अटूट श्रद्धा और विश्वास है ।यह विश्वास इतना अटल है कि इससे इतर वह कुछ कल्पना भी नहीं कर सकते। रामचरितमानस हिंदुओं का एक सबसे पूजनीय ग्रंथ है।

     लेकिन क्या आप यह भी जानते हैं कि विश्व की अन्य भाषाओं  की रामायण में सीता जी का कैसा और किस रूप में वर्णन है? हिंदू जनमानस में सीता जी की जो छवि प्रचलित है उससे अलग छवि इन रामायण में नजर आती है जो इन्हें रहस्यमयी और विवादास्पद भी बनाती है।

     विद्वानों के शोध के अनुसार वाल्मीकि से पहले भी जातक कथाओं के रूप में राम कथाओं का प्रचलन था ,जिसमें राम, लक्ष्मण ,सीता ,दशरथ ,कौशल्या आदि चरित्र थे, लेकिन विद्वानों में अभी भी यह विवाद है कि वाल्मीकि का महाकाव्य पहले रचा गया या जातक कथाएं? यह माना जाता है कि जातक कथाएं पहले रची गई थीं। आइए जाने सीता जी को लेकर अन्य ग्रंथ क्या कहते हैं?

     “दशरथ जातक ” में राम, लक्ष्मण और सीता दशरथ के पुत्र पुत्री हैं । दशरथ बनारस के राजा हैं और उनकी 16हजार पत्नियां है । इसमें सीता हरण आदि की कोई घटना नहीं है। इस कथा में रावण भी नहीं है। इस ग्रंथ में 12 वर्ष बीतने पर राम बनारस लौट कर आते हैं और उनका राज्याभिषेक होता है। सीता sa साम्राज्ञी के पद पर प्रतिष्ठित होती हैं ।अब इस कथा में राम सीता का विवाह कैसे हो जाता है? इस संबंध में विद्वान दिनेश चंद्र सेन कहते हैं कि प्राचीन काल में मिस्रऔर बेबिलोनिया में एक ही परिवार में होने वाले विवाह की प्रथा थी। भारतवर्ष में भी शाक्यों में रक्त  शुद्धता के आग्रह के कारण एक परिवार में विवाह की मान्यता थी। सेन साहब का कहना है कि इस कारण से दशरथ जातक में राम सीता को पति-पत्नी के रूप में दिखाना असंगत नहीं है। लेकिन वह यह भी कहते हैं कि हिंदुओं में इस कथा की स्वीकार्यता कठिन थी। इस कारण वाल्मीकि ने सीता के जन्म की बिल्कुल नई कल्पना की।

     लेकिन सीता का जन्म रहस्य के आवरण में हैं जो वाल्मीकि के लिए ही नहीं बल्कि सभी राम कथाओं के लिए समस्या रहा है, सभी राम कथाओं में सीता जन्म की कथा एक सी नहीं है। एक शोध आलेख में बताया गया है कि सिर्फ महाभारत के “रामोख्यान”और विमल सूरी के ” पउमचरिउ” में सीता जनक की वास्तविक पुत्री हैं। संभवत इसका आधार या तो वाल्मीकि रामायण या फिर आदि रामायण हो, जैसा फादर कामिल बुल्के ने अपने शोध में संकेत किया है।

    वाल्मीकि के संस्कृत महाकाव्य और कम्ब के तमिल काव्य में संतान प्राप्ति के लिए एक अनुष्ठान में भूमि पर हल चलाते समय जनक को सीता प्राप्त होती है । इसी का एक और रूप क्षेमेंद्र की “रामायण मंजरी” में मिलता है, जिसमें जनक को आकाशवाणी होती है और वह अप्सरा मेनका को देखकर संतान प्राप्ति की कल्पना करते हैं और फिर हल चलाते समय सीता प्राप्त होती है और उसी आकाशवाणी में बताया जाता है कि वह कन्या मेनका जाया है।

     संघदास के जैन ग्रंथ “वसुदेव हिंदी” में सीता को रावण की पुत्री बताया गया है, क्योंकि ज्योतिष भविष्यवाणी करते हैं कि मंदोदरी-रावण विवाह से उत्पन्न पहली संतान रावण के वंश का नाश कर देगी और जब मंदोदरी एक कन्या को जन्म देती है तो रावण उसे एक पात्र में बंद कर  सुदूर प्रदेश में जाकर गाड़ देते हैं जो जनक के राज्य में हैं । बाद में जनक को यही कन्या मिलती है जिसे वह पुत्री के रूप में पालते हैं ।

    गुणभद्र के “उत्तर पुराण” की कथा अनुसार अलकापुरी के राजा की कन्या मणिवती की तपस्या में रावण विघ्न डालता है तो वह प्रतिज्ञा करती है कि वह रावण कन्या के रूप में जन्म लेकर उससे प्रतिशोध लेगी। बाद में वह मंदोदरी की कन्या के रूप में जन्म लेती है जिसे ज्योतिष ही रावण के लिए अशुभ बताते हैं तब रावण कन्या को एक पात्र में बंद कर मिथिला प्रदेश में गाड़ आता है जो किसानों को मिलती है, जिसे वे जनक को सौंप देते हैं ।

    सीता जन्म की लगभग ऐसी कथाएं तिब्बत रामायण ,चीनी ,तुर्किस्तान की खोटानी रामायण या  संस्कृत के दशावतार में मिलती हैं।

    अद्भुत रामायण में कुछ अंतर है। रावण ऋषियों के रक्त से भरा पात्र मंदोदरी को सावधानी से रखने को देता है और कहता है कि पात्र का द्रव्य ना तो वह स्वयं चखे और ना ही किसी को चखने दे ,लेकिन रावण के साम्राज्य विस्तार के अभियान पर निकलते ही प्राणांत की आशा से मंदोदरी पात्र में रखा द्रव्य पी लेती है लेकिन मरने के स्थान पर वह गर्भवती हो जाती है। लोकोपवाद की आशंका से घबरा कर मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने अपने भ्रूण को जमीन में गाड़ देती है।

    सिंगारवेलु ने अपने अध्ययन में सत्रह रामकथाओं को आधार बनाया है। उनके  निष्कर्षो को देखें –

    1-बारह रामकथाओं में सीता या तो किसी देवी जैसे लक्ष्मी उमा इंद्राणी की अवतार हैं या तपस्वी कन्या जो रावण से प्रतिशोध लेने अवतरित होती है।

    2-वाल्मीकि एवं कंब रामायण में सीता का जन्म चमत्कारिक रूप से पृथ्वी से होता है।

    3-विमलसूरी के पउमचरिउ एवं महाभारत के ‘रामोपख्यान ‘ में सीता जनक की पुत्री हैं।

    4-अधिकतर राम कथाओं में सीता रावण और उसकी पत्नी की कन्या हैं।

    और भी कथाएं सीता के जन्म को लेकर अनेक  रामायणों में अलग अलग तरीके से प्रचलित हैं, जिनका वर्णन ए. के. रामानुजन की “तीन सौ रामायण”नामक पुस्तक में है जो कि वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है। उपरोक्त तथ्य भी इसी पुस्तक पर आधारित हैं।