Category: नर्मदापुरम

  • पर्यवेक्षक के दौरे के बीच नर्मदापुरम से ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने की चर्चा ?

    पर्यवेक्षक के दौरे के बीच नर्मदापुरम से ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने की चर्चा ?

    नर्मदा पुरम/ इटारसी//  जिले की दो विधानसभा नर्मदापुरम( होशंगाबाद ) और पिपरिया के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस के पर्यवेक्षक के रूप में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा शुक्रवार को नर्मदापुरम आ रहे हैं जो शाम के समय कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर भावी प्रत्याशियों के लिए उनकी पसंद को जानेंगे।

    केंद्रीय पर्यवेक्षक के आने से टिकट के दावेदारों में सरगर्मियां हैं। वे वरिष्ठ नेताओं से मिल कर या फ़ोन कर अपना नाम पर्यवेक्षक के सामने प्रस्तावित  करने की गुजारिश करते नज़र आए हैं।

    वैसे कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि जैसे आप पूर्व का इतिहास रहा है पर्यवेक्षकों का आना महज़ औपचारिकता ही रहती आई है, टिकट तो अंतिम समय पर जिले के माई बाप नेताओं के की मर्जी से ही तय होती है और इस बार भी तस्वीर कोई अलग होगी ऐसा नहीं लगता।

    दो दर्जन दावेदार?

     जैसी कि कांग्रेस की परंपरा रही है लगातार दो दशकों से ज्यादा समय तक भाजपा की इस अजेय सीट पर कांग्रेस के पास भले ही कार्यकर्ता न हों टिकट के  दावेदारों की कमी नहीं रहती है ।

    अभी भी कहां जा रहा है कि लगभग दो दर्जन दावेदार अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं। इस बार भी जो नाम चर्चा में हैं उनमें पूर्व जिला पंचायत सदस्य चंद्र गोपाल मलैया, कांग्रेस के जिला कार्यकारी जिलाध्यक्ष शिवराज चंद्रोल, पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष मीना वर्मा, पूर्व कांग्रेस जिलाध्यक्ष सतेंद्र फौजदार, कपिल फौजदार,पूर्व युवक कांग्रेस जिला अध्यक्ष प्रेम सिंह सोलंकी, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य शिवाकांत पांडे (गुड्डन), प्रदेश कांग्रेस के पदाधिकारी महेंद्र शर्मा, प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष मानक अग्रवाल , प्रदेश एन एस यू आई अध्यक्ष आशुतोष चौकसे ,रश्मि दीक्षित, नीरजा फौजदार, राजकुमार उपाध्याय केलू, राममोहन मलैया ,मोहन झलिया, नर्मदा पुरम नगर कांग्रेस अध्यक्ष धर्मेंद्र तिवारी , इटारसी के पूर्व नगर अध्यक्ष पंकज राठौर,अजय सैनी, सेवा दल यंग ब्रिगेड के प्रदेश अध्यक्ष गजानन तिवारी (गज्जू तिवारी) शामिल हैं । इनके आलावा भी कुछ नामों की चर्चा बनी हुई है, और यदि अखबारों की खबरों पर भरोसा किया जाए तो यह नाम कांग्रेसी विचारधारा होने के कारण कथित सर्वे टीम के माध्यम से आलाकमान तक पहुंचे हैं उसमें पूर्व विधायक अंबिका शुक्ला के बेटे हेमंत शुक्ला वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रहे स्वर्गीय समीरमल के पुत्र संजय गोठी और सर्व ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष जितेंद्र ओझा का नाम शामिल है। एक नाम को एक समाचार पत्र में प्रकाशित किया है वह सविता दीवान का, पर बताया जा रहा है कि उनकी दावेदारी सोहागपुर से है।

    एक रोचक बात यह भी कही जा रही है कि कांग्रेस के इन दावेदारों में से कुछ दावेदार ऐसे हैं वह तभी चुनाव लड़ेंगे जब भाजपा के वर्तमान विधायक चुनाव में चुनाव मैदान में नहीं होंगे, इसलिए उनकी दावेदारी तो है पर आधे अधूरे मन से, वे असमंजस में है की टिकट मांगे या न मांगे?

    एक डर ऐसा भी ?

    पिछले दिनों दिग्विजय सिंह के सामने कांग्रेस पार्टी कार्यकर्ताओं ने एक स्वर से भाजपा के आए व्यक्ति को टिकट न दिए जाने की मांग की थी, ऐसा माना जा रहा है कि नेताओं और कार्यकर्त्ताओं के रूख को देखकर फिलहाल इस तरह की चर्चाओं पर विराम सा लग गया है, पर कुछ नेता  अभी भी इस पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं उन्हें लगता है कि प्रदेश आलाकमान अंतिम समय पर भाजपा से आने वाले किसी व्यक्ति को टिकट दे सकता है।

    ब्राह्मण होगा उम्मीदवार?

    एक चर्चा क्षेत्र के राजनीतिक गली गलियारों में यह भी है कि जिले की 4 सीटों में से एक पर कांग्रेस किसी ब्राह्मण उम्मीदवार को उतारना चाहती है और फिलहाल वोटों के गणित के हिसाब से इसके लिए नर्मदापुरम सीट को ज्यादा मुफीद माना जा रहा है। क्योंकि क्षेत्र में कुर्मी और ब्राह्मण मतदाताओं की खासी संख्या रही है और ब्राह्मण उम्मीदवार यहां से जीते भी रहे हैं । पार्टी के सूत्र बताते हैं कि जिले की कांग्रेस की राजनीति के जिम्मेदार नेता सुरेश पचौरी भी यही चाहते हैं और क्षेत्र का टिकट उनकी सहमति से ही तय होगा । पर ब्राह्मण दावेदारों में से उनका पसंदीदा कौन है या होगा इसको लेकर सस्पेंस है! वैसे आधा दर्जन से ज्यादा ब्राह्मण उम्मीदवार इस क्षेत्र से टिकट के दावेदार हैं .

    मलैया की सक्रियता चर्चा में!

    पर वही कुर्मी समाज से आने वाले कांग्रेस के नेता चंद्र गोपाल मलैया सक्रिय हो गए हैं। बताया जाता है कि उन्हें प्रदेश नेतृत्व ने फील्ड पर काम करने का इशारा दे दिया है। क्षेत्र में कुर्मी मतदाताओं की खासी संख्या है और यह माना जाता है कि यदि में लामबंद हो जाए तो विधायक उनका हो सकता है पर क्षेत्र में अभी तक ऐसा नहीं हो सका है।  पिछले कई सालों से इस समाज को भाजपा समर्थक माना जाता रहा है पर अब कहा जा रहा है कि कुर्मियों में इस बात की मांग उठने लगी है कि विधायक हमारे समाज का होना चाहिए और इस बार वे दोनों ही दलों से कुर्मी समाज के किसी व्यक्ति को टिकट देने की मांग करेंगे।

  • नर्मदापुरम में भाजपा से आने वाले किसी नेता को टिकट नहीं देगी कांग्रेस-दिग्विजय

    नर्मदापुरम में भाजपा से आने वाले किसी नेता को टिकट नहीं देगी कांग्रेस-दिग्विजय

    दिग्विजय सिंह ने किया दावा-कांग्रेस प्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी

    इटारसी// कांग्रेस नर्मदापुरम (होंशगाबाद)क्षेत्र में भाजपा से आने वाले किसी व्यक्ति को टिकट नहीं देगी। टिकट कांग्रेस के व्यक्ति को ही मिलेगा। पिछली बार सरताज सिंह की टिकट को छोड़ दें ,तो हमेशा कांग्रेस के व्यक्ति को ही टिकट मिला है। यह बात पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने गुरुवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए कही।

     दिग्विजय सिंह यहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं और मंडल सेक्टर अध्यक्षों की बैठक में भाग लेने पहुंचे थे । इटारसी की एक्सप्रेसइलेवन में आयोजित इस बैठक के पूर्व श्री सिंह ने पत्रकार वार्ता को संबोधित किया।

     यह पूछे जाने पर कि क्षेत्र में चर्चा है कि भाजपा का कोई नेता कांग्रेस में शामिल होने वाला है और उसे टिकट दिया जा सकता है? दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस बात में कोई दम नहीं है। उन्होंने कांग्रेस की टिकट प्रक्रिया तो बताते हुए कहा कि जिला एवं प्रदेश कांग्रेस कमेटी नाम प्रस्तावित करेगी ,एआईसीसी की स्क्रीनिंग कमेटी और सेंट्रल स्क्रीनिंग कमेटी नाम तय करेगी। यह पूछे जाने पर भी यह पूछे जाने पर कि क्या पार्टी किसी नए चेहरे को मैदान में उतार सकती है? तो दिग्विजय ने कहा कि यह पार्टी तय करेगी चेहरा नया हो या पुराना इतना जरूर है कि इस बार चुनाव हम मिलकर लड़ेंगे और गुटबाजी समाप्त होगी।

    दिग्विजय सिंह ने किया दावा-

    कांग्रेस प्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी

    पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने दावा किया है कि इस बार कांग्रेस मध्यप्रदेश में 135 सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी,  कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव लड़ेगी। हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि प्रदेश की जनता शिवराज सिंह सरकार से नाराज है भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है पूरे प्रदेश को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाया जा रहा है जिसमें शिवराज और कांग्रेस से गए महाराज हिस्सेदार हैं। हर काम में हिस्सेदारी मांगी जा रही है।

  • दिग्विजय सिंह का दौरा बदलेगा तस्वीर ?

    दिग्विजय सिंह का दौरा बदलेगा तस्वीर ?

    इटारसी / नर्मदापुरम//आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस खासी सक्रिय है। इस बार वह लगातार उन सीटों पर फोकस कर रही है जिन पर कांग्रेस पिछले चार-पांच चुनाव से हार झेलती आ रही है। वरिष्ठ नेताओं के दौरे इस तरह के क्षेत्र में लगातार जारी हैं। कहा जा रहा है कि इसी तारतम्य में पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य सभा सदस्य दिग्विजय सिंह गुरुवार को नर्मदा पुरम और इटारसी आ रहे हैं, वे कार्यकर्ताओं से चर्चा करेंगे और पार्टी की स्थिति को समझने और जानने का प्रयास करेंगे।

     जहां तक नर्मदापुरम( होशंगाबाद) जिले का सवाल है यहां संगठन कमजोर नहीं बल्कि ध्वस्त है और इसके लिए भोपाल मैं बैठकर जिले को अपनी जागीर मानने वाले नेता जिम्मेदार हैं । पिछले कई दशकों से उन्हीं नेताओं की पसंद के लोगों को यहां उम्मीदवार बनाया जाता रहा और यह बात खुलकर कही जाती रही है कि इन नेताओं का भाजपा के सबसे रसूखदार परिवार से गहन संबंध होने के कारण यहां कांग्रेस उनके सामने कोई मजबूत प्रत्याशी देने से बचती रही है। 

     बात कड़वी है पर सच है 

    यह बात इस क्षेत्र के राजनीतिक गलियारों में ही नहीं आम लोगों में भी खुलकर कही जाती है कि भाजपा के बगीचे से ही  कांग्रेस की टिकट तय होती है। इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना है, क्योंकि जो फार्मूला बताया जा रहा है जिसमें उम्मीदवार के चयन में स्थानीय संगठन और प्रभावशाली नेता की महत्वपूर्ण भूमिका होगी तो ऐसे में कोई बदलाव होगा ऐसा नहीं लगता। क्योंकि हाल ही में स्थानीय संगठनों में जो लोग पदाधिकारी बनाए गए हैं वह पार्टी के बजाय उन्हीं नेताओं की पसंद और निष्ठा वाले हैं। इसीलिए मंडलम की ओर से वही नाम जाएंगे जिन्हें यह नेता चाहेंगे।

    राष्ट्रवादियों की रहती है बल्ले-बल्ले

    पिछले कई बार से कांग्रेसी इलाके में चुनाव हार रही है इसके लिए कांग्रेसियों की भूमिका ही महत्वपूर्ण होती है। भीतरघात( यहां तक कि पैसे लेकर रातों-रात निष्ठा बदलने के किस्से चुनाव के बाद तक चर्चाओं में रहते हैं पिछले चुनाव में लिफाफे की चर्चा तो आज तक याद की जाती है) एक स्थायी रोग है, पर चुनाव के बाद भी इस तरह के तत्वों पर कभी कोई एक्शन पार्टी की ओर से कभी नहीं लिया गया, उल्टे उन्हें किसी ना किसी तरह से पुरस्कृत किया गया ,

     हाल ही के नपा चुनाव में कांग्रेस के भोपाल में बैठे वरिष्ठ नेताओं की जो भूमिका रही, माना जा रहा है कि उसके कारण इटारसी नगर पालिका पर कांग्रेस काबिज होते होते रह गई।  इन नेताओं ने जिन अपने चहेतों को पार्षद के टिकट दिलवाए उनमें से कुछ तो जीते ही नहीं जो जीते तो  उन्होंने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ खुलकर मतदान किया था और उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं इटारसी के एक मैदान का नाम सावरकर के नाम पर रखे जाने के मामले में भी पार्टी की लाइन से हटकर भाजपा का समर्थन करने वाले आज भी कांग्रेस के नेता बने हुए हैं और तो और भाजपा उन्हें राष्ट्रवादी बता रही है।

    अब  सवाल यह है कि दिग्विजय सिंह जी जब स्थानीय नेताओ और कार्यकर्त्ताओं से  से चर्चा करेंगें तो यह बातें उनके सामने आ सकेंगी ? और ऐसा होगा तभी दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं का दौरा और मेहनत इस तस्वीर को बदल सकेगा ।… और तस्वीर बदलेगी तभी कांग्रेस यहां जीत सकेगी।

  • खरीद कर पानी पीने को मजबूर हैं विस्थापित गावों के आदिवासी ! अधिकारियों , ठेकेदार की मिलीभगत से करोड़ों का गोलमाल ?

    खरीद कर पानी पीने को मजबूर हैं विस्थापित गावों के आदिवासी ! अधिकारियों , ठेकेदार की मिलीभगत से करोड़ों का गोलमाल ?

    पुनीत दुबे

    इटारसी।  सतपुड़ा टाइगर रिर्जव क्षेत्र से विस्थापित  किए गए आदिवासी परिवार अपने आप को ठगा से महसूस कर रहे है, विस्थापित किए जाते वक्त इन आदिवासी परिवारों को जो लुभावने सपने दिखाए गए थे आज वे काफूर हो चुके हैं । हालत यह है कि विकास के नाम पर शासन से करोड़ों रूपए मिलने के बाद भी यहां रहने वाले लोगों को पीने के पानी तक की कीमत चुकानी पड़ रही है। ग्राम में पेयजल के लिए नलकूप खनन तो कराए गए लेकिन उनकी गुणवत्ता इतनी खराब थी की कुछ ही दिनों में नलकूपों ने दम तोड़ दिया। 

    अधिकारियों और ठेकेदार ने आदिवासियों से किया छलावा ?

    सतपुड़ा टाइगर रिर्जव क्षेत्र के विस्तारीकरण के तहत विभाग द्वारा रिजर्व क्षेत्र में बसे 4 ग्राम साकई, झालई, नया माना, खामदा को जमानी के पास तिलक सिंदूर मार्ग पर विस्थापित किया गया है । शासन की नीति के अनुसार विस्थापित किए गए ग्रामों में होने वाले सभी निर्माण और विकास कार्यो के साथ ही यहां रहने वाले परिवारों की सुविधाओं से जुड़े सभी कार्य विभाग को करवाना था।

    बताया जाता है कि गांव में रहने वाले लगभग 94 परिवारों की पेयजल व्यवस्था के लिए विभाग ने  सत्ताधारी दल से जुड़े एक प्रभावशाली व्यक्ति को नलकूप खनन का ठेका दिया था। लेकिन इस ठेकेदार दवारा अधिकारियों की मिली भगत के चलते नलकूप इतनी घटिया के खनन कराए गए कि उन्होने कुछ ही दिन में दम तोड़ दिया तथा कुछ नलकूप तो जमीन के अंदर ही समा गए। बताया जाता है कि गांव में लगभग 94 नलकूप का खनन किया गया था, जिसमें से लगभग डेढ़ दर्जन ही चल रहे है, शेष में कुछ बंद है और कुछ जमीन में समा गए।

     बताया जाता है कि नलकूप में घटिया स्तर की केसिंग डाली गई थी, जिसमें कारण अधिकांश नलकूप बंद हो गए। नलकूपो के बैठने के बाद यहां के लोग अब सिर्फ बरसाती फसल के भरोसे ही रह गए है। ग्रामीणों के अनुसार यदि नलकूप चलते तो वह और भी फसल का लाभ ले सकते थे। गांव के अमन, मुकेश, शिवन ने बताया कि इस समस्या को लेकर हमने अनेको बार शिकायत की है, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा।

    निजी नलकूप के भरोसे लोग

    गांव के इस  पेयजल संकट की स्थिति को देखते हुए कुछ लोगों ने  अपने निजी व्यय पर नलकूप का खनन कराया गया है, जिससे लोगों को पीने के लिए पानी उपलब्ध कराया जा रहा है, लेकिन इसके लिए ग्रामीणों को राशि का भुगतान करना पड रहा है। जिसमें हर घर से बिजली के बिल भुगतान के लिए यूनिट के हिसाब से राशि का विभाजन किया जाता है।

     कारगुजारी छिपाने में लगे हैं जिम्मेदार

    नया माना गांव के लोगों बताया  कि  गांव में व्याप्त इस समस्या को लेकर उन्होने अनेकों बार वन विभाग के अधिकारियों के सामने अपनी समस्या रखी, लेकिन अधिकारियों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। बताया जाता है कि नलकूप खनन के नाम पर हुई अनियमित्ता को छिपाने के लिए अब वन विभाग के अधिकारियों द्वारा ग्राम में नलजल योजना के तहत काम कराने पर विचार किया जा रहा है।

    रेंजर द्वारा नहीं ली गई सुध

    विस्थापित ग्रामों की देखरेख का जिम्मा वन परिक्षेत्र अधिकारी निशांत डोसी को सौंपा गया है। लेकिन अपने रूतबे के लिए मशहूर साहब यदाकदा ही विस्थापित ग्रामों का हाल जानने ग्रामों में जाते है, शेष समय तो साहब अपने भौंरा वाले घर पर ही आराम फरमाते रहते है। ग्रामीणों का कहना है कि रेंजर भी उनकी बातों को अनुसनुा कर देते है।

    क्या कह रहे हैं अधिकारी              

     बोर के अंदर कई  मोटर  फस गई है,   इस कारण उनके बोर बंद हो गए हैं प्रयास कर उन्हें ठीक  करवायेंगें. 

    संदीप फेलोस ,प्रभारी अधिकारी  सतपुड़ा नेशनल पार्क पचमढ़ी

    ग्रामीणों की व्यथा

    सन दो हजार अट्ठारह से हम इस गांव में आए हैं तभी से मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रही जिसमें पीने के पानी की समस्या बड़ी कठिन है यह हमें खरीदना पड़ता है और दूसरे मोहल्ले से पीने का पानी लाना पड़ता है।                   

     चतुर सिंह, नया माना तिलक सिंदूर रोड जमानी

  • इस सरकार ने  आउटसोर्स ,संविदा कर्मचारियों की स्थिति बंधुआ मजदूरी से भी ज्यादा बदतर की -वासुदेव शर्मा 

    इस सरकार ने आउटसोर्स ,संविदा कर्मचारियों की स्थिति बंधुआ मजदूरी से भी ज्यादा बदतर की -वासुदेव शर्मा 

    मध्यप्रदेश कांग्रेस आउटसोर्स,अस्थाई व संविदा कर्मचारी प्रकोष्ठ का संभागीय सम्मेलन संपन्न

    इटारसी,// मध्यप्रदेश संविदा कांग्रेस आउटसोर्स,अस्थाई व संविदा कर्मचारी प्रकोष्ठ संभागीय सम्मेलन रविवार को गुजराती भवन में संपन्न हुआ जिसमे नर्मदापुरम,बैतूल,हरदा जिले के संविदा,आउटसोर्स कर्मचारी उपस्थित हुए।

    सम्मेलन को मुख्य अतिथि प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने संबोधित करते हुए कहा कि आज लाखो की संख्या में आउटसोर्स ,संविदा कर्मचारियों की स्थिति सरकार  ने बंधुआ मजदूरी से भी ज्यादा बदतर कर दी,आज उन्हे सुविधा,जोखिम से सुरक्षा तो छोड़ो मेहनत का प्रतिफल भी नही मिलता,सरकार की नियत ठीक नही है ।मनरेगा का बजट कम करके सरकार अत्याचार कर रही है,उन्होंने कांग्रेस के सभी नेताओ से अपील की आप इन कर्मचारियों की आवाज उठाए कर्मचारी आपके साथ है।

    पूर्व नगर कांग्रेस अध्यक्ष पंकज राठौर ने कहा कि कांग्रेस ने सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना कर रोजगार की व्यवस्था की आज सरकार इन उपक्रमों को बंद कर देश में बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न कर रही है सरकार अपने उद्योगपति मित्रो को सरकारी मदद से लाखो करोड़ों का फायदा पहुंचा रहे,करोड़ों रुपए कर्ज ले रहे है पर संविदा,आउटसोर्स कर्मचारियों को वेतन विसंगति व अन्य सुविधाओं से वंचित किया जा रहा ये बहुत कष्टप्रद है।

    जिला किसान कांग्रेस अध्यक्ष विजय बाबू चौधरी ने कहा आज संविदा कर्मचारियों की स्थिति खेतिहर मजदूरों से भी बदतर है आज योग्यता के हिसाब से काम नही मिल रहा कार्यसेवा के दौरान मृत्यु की स्थिति में आज उनका परिवार समस्याओं से लड़ता रहता है उन्हे कुछ मिलता नहीं

    प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता राजकुमार उपाध्याय केलु ने कहा कि भाजपा के शासन में संविदा,अस्थाई कर्मचारियों के हालात यह है कि वो अपने हक की लड़ाई के लिए सड़को पर है कमलनाथ जी ने कांग्रेस के वचन पत्र में इनकी समस्याओं को गंभीरता से हल करने की बात कही।

    प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष कार्यक्रम आयोजक चंद्रकांत बहारे ने कहा कि यह लड़ाई बड़ी है इसमें सभी कांग्रेस नेताओ का सहयोग होगा तो निश्चित समस्याओं का हल निकलेगा।

    सम्मेलन को पूर्व जिला पंचायत सदस्य सुधीर गौर,चंद्रगोपाल मलैया,कांग्रेस पिछड़ा वर्ग प्रदेश उपाध्यक्ष मोहन झालिया,वरिष्ठ कांग्रेस नेता समीर शर्मा,प्रकोष्ठ उपाध्यक्ष रामकिशन यादव, प्रदेश महामंत्री अल्पसंख्यक विभाग परमजीतसिंह सलूजा लाली,नगर कांग्रेस अध्यक्ष मयूर जायसवाल, कांग्रेस पिछड़ा वर्ग नेता,गांधी चौपाल समन्वयक अभिषेक पटेल,गायत्री गिरि, ने संबोधित किया।

    इस अवसर पर हरदा,बैतूल,नर्मदापुरम जिले में प्रकोष्ठ पदाधिकारियों की नियुक्ति की गई 

    कार्यक्रम का संचालन चंद्रकांत बहारे व आभार प्रदर्शन अभिषेक पटेल ने किया।

    इस अवसर पर जिला अध्यक्ष दीपक यादव,केशव शर्मा, प्रदेश उपाध्यक्ष पिछड़ा वर्ग कांग्रेस मुकेश यादव, उपभोक्ता संरक्षण प्रकोष्ठ कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष डा. नरेंद्र वर्मा,सरपंच नवल पटेल,जनपद सदस्य पप्पू आठनेरे,भवानी कहार, ट्रक ऑनर्स एसोसियेशन अध्यक्ष अंटू भाटिया, युवा कांग्रेस अध्यक्ष गोल्डी बेस,नगर अध्यक्ष सौम्य दुबे,गौरव चौधरी,पप्पी ठाकुर,नर्मदा रैकवार सहित अनेक कांग्रेस संविदा आउटसोर्स,अस्थाई संविदा कर्मचारी प्रकोष्ठ के पदाधिकारी व कार्यकर्ता उपस्थित थे।

  • राशन माफियाओं के कारण  नहीं की जा रही है राशन दुकानों की गड़बड़ियों की जॉच- केलू उपाध्याय

    राशन माफियाओं के कारण  नहीं की जा रही है राशन दुकानों की गड़बड़ियों की जॉच- केलू उपाध्याय

    इटारसी/ नर्मदापुरम//  कांग्रेस कमेटी के  प्रदेश प्रवक्ता व  नर्मदापुरम जिला के मीडिया प्रभारी  राजकुमार केलू उपाध्याय ने आरोप लगाया है कि इटारसी अनुविभाग की समस्त शासकीय उचित मूल्य प्राथमिक राशन उपभोक्ता भंडारों में वितरण अनाज की जांच राजनैतिक संरक्षण प्राप्त राशन माफियाओं के कारण  नहीं की जा रही है, और न ही जॉच की जानकारी दी जा रही है।

     श्री उपाध्याय ने  एक बयान जारी कर कहा कि उनके द्वारा अनुविभागीय अधिकारी को तीन पत्र 8 जून 2020, 4 मार्च 2022 व 4 अप्रैल 2023 को इटारसी अनुविभाग की समस्त शासकीय उचित मूल्य प्राथमिक राशन उपभोक्ता भंडारों में वितरण अनाज की जांच के लिए दिए गए है लेकिन प्रशासन की जांच गति 34 माह में भी राजनैतिक संरक्षण प्राप्त राशन माफियाओं के कारण शून्यता की स्थिति में है ।

     केलू उपाध्याय ने कहा कि प्रदेश भाजपा सरकार , जिला प्रशासन,स्थानीय प्रशासन की उदासीनता का  नर्मदापुरम जिले से बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता।

     उन्होंने कहा कि मेरे द्वारा 32 माह में तीन पत्र दिए गए इन पत्रों में इटारसी अनुविभाग के अंतर्गत समस्त शासकीय उचित मूल्य राशन दुकानों द्वारा वितरण खाद्यान्न की सूक्ष्मता के साथ भौतिक सत्यापन के माध्यम से जांच कर साथ ही लगभग 50 प्रतिशत राशन उपभोक्ताओ से कथन व खाद्यान्न वितरण की जानकारी लिए जाने की मांग की गई है तथा इसमें होने वाली अनियमितता पर कार्यवाही की भी मांग की थी।पत्र के माध्यम से कोविड-19 (कोरोना महामारी) के संकटकाल में केंद्र व राज्य सरकार द्वारा वितरण किए गए खाद्यान्न की जांच 4 अप्रैल 2023 के दिए पत्र के पूर्व कितनी शासकीय राशन दुकानों की जांच इन बिंदुओं पर की गई इसकी जानकारी दिए जाने की मांग प्रमुखता से की है. लेकिन विगत 34 माह बाद भी इन पत्रों की जानकारी अभी तक नहीं मिली है ।

    उनका कहना है कि इन मामलों में कई पात्र गरीब परिवार अपात्रों व पात्रता पर्चीयो की बंदरबांट में राशन पाने से वंचित रहे वहीं कई अपात्रों को पात्रता पर्ची वितरण में राशन मिल गया । अपात्र परिवार राशन ले रहे हैं वास्तविक गरीब पात्र परिवार भटक रहे हैं वही राशन दुकानों के वितरण व खुलने के दिन समय भी अधिकारियों की रहम,लापरवाही के कारण नियमित नहीं है ।प्रशासन इसकी  महीनों जांच नहीं करता है इससे राशन माफिया हावी है गरीब जनता परेशान है। उन्होंने बताया कि  पत्र की प्रति प्रदेश के खाद्य मंत्री,प्रमुख सचिव खाद्य विभाग व नर्मदापुरम जिलाधीश(कलेक्टर) को ट्विटर के माध्यम से भेजी गई है।

  • जब जिले में चना 1रूपये  का साठ सेर और गेहूं 50 सेर मिलता था।

    जब जिले में चना 1रूपये का साठ सेर और गेहूं 50 सेर मिलता था।

    इटारसी // आज महंगाई के चर्चे चारों ओर हैं, आम आदमी महंगाई से परेशान हैं, अनाज के दाम आसमान पर हैं। पर क्या आप जानते हैं कि करीब दो सौ साल पहले 1826-30 के आसपास होशंगाबाद जिले (अब नर्मदा पुरम ) जिसमें नरसिंहपुर  से लेकर हरदा जिले तक का क्षेत्र शामिल था, में अनाज की  क्या कीमत थी?  उसकी आज कल्पना नहीं की जा सकती।
    आइए जानते हैं नर्मदापुरम जिले में दो शताब्दी में हुई अनाजों की कीमतों के उतार चढ़ाव की रोचक दास्तान…!

    उन दिनों के रिकॉर्ड से अनाज की कीमतों का रोचक विवरण सामने आता है ।  यह भी पता चलता है कि बाद में आकाल और अन्य स्थानीय कारणों से कैसे धीरे-धीरे कीमत बढ़ती गईं।
    जिले में 1830 तक गेहूं ₹ 1 का 50 सेर था (सेर यानी आज के 1 किलो ग्राम से कुछ ज्यादा)  तो चना ₹1 में 60 सेर से ज्यादा मिलता था। 1832 में इलाक़े की फसलों पर गेरुआ रोग का प्रकोप हो गया तो  कीमतों में एकदम तेजी आई और 1832 33 में गेहूं की कीमत  ₹1 में 17 सेर तक  पहुंच गई   1833 में चना  ₹1 का 18 सेर हो गया था। वैसे बाद के सालों में कीमतें कम हुई पर पहले की सबसे कम कीमतों पर नहीं पहुंच सकीं।
    1836-40 में गेहूं 1रुपए का 40 सेर था, चना 46 सेर । वहीं 1846 में यहीं आंकड़ा क्रमश: 31और 39 हो गया।1856-60में फिर कीमतें कम हुईं और गेहूं एक रुपए का साढ़े चवालीस किलो और चना 54किलो मिलने लगा ।
    पर  1861से 65के बीच  फिर तेजी से दाम बढ़े और गेहूं एक रुपए का साढ़े इक्कीस किलो और चना साढ़े चौबीस किलो मिलने लगा और इसका कारण था अमेरिका का युद्ध जिसके कारण कपास की मांग बढ़ गई थी, आसपास के क्षेत्रों के लोग अपनी जमीन पर गेहूं छोड़ कपास उगाने लगे थे, गेहूं का उत्पादन कम हो गया था।
    फिर 1968 में बुंदेलखंड में अकाल पड़ा दो आसपास के जिलों में अनाज का संकट पैदा हुआ तो कीमतें बढ़ी अकाल के दौरान और बाद में ज्वार पैदा की जाने लगी तो गेहूं और चने के दाम बढ़ गए। 1870 के आसपास इस क्षेत्र में रेल लाइन आ गई इससे निर्यात शुरू हो गया तो कीमतें बढ़ने लगी। 1878 में फिर अकाल पड़ गया तो अनाज महंगा हुआ । 1878 में गेहूं का भाव प्रति रुपए 12 सेर हो गया । अमेरिका युद्ध के समय से हुई सामान्य वृद्धि से 1871- 76 के बीच बंदोबस्त के समय लगाए अनुमान के अनुसार गेहूं 32 सेर से 16 सेर तथा चना 40 सेर से 20 सेर हो गया था। ज्वार की कीमत वैसे उस समय कम थी पर उसमें भी उतार-चढ़ाव देखे गए। 1861 से 1880  तक ज्वार की कीमत औसत रूप से एक रुपए में साढ़े बाइस सेर थी।
    19 वी सदी के अंतिम दशक में मौसम और मांग पूर्ति में बदलाव के कारण गेहूं और ज्वार की कीमतों में अनिश्चित रूप से उतार-चढ़ाव होते रहे। 1893 में गेहूं का सबसे कम दाम ₹1 में 16.4 सेर था और सबसे ज्यादा कीमत 1897 में 8.3 सेर प्रति रुपए थी, वहीं ज्वार का भाव 1874 में सबसे कम था यानी ₹1 का 22.8 सेर, पर 1897 में गेहूं का मुकाबला करते हुए ज्वार का भाव ₹1 का 10.8 सेर तक पहुंच गया, कहते हैं यह भाव अकाल के कारण पहुंचा था ।18 97 में गेहूं का एक रुपए में 8 सेर से कुछ ज्यादा मिलता था ।1898 में दाम कुछ कम हुए तो ₹1 में 11.2 सेर भी मिला हां ज्वार का भाव भी कम हुआ, वह एक रुपए में 20.9 सेर मिलने लगी। आगे अकाल पढ़ जाने के कारण 1900  में इन अनाजों की कीमतें बढ़ी।
    20 वीं सदी के प्रारंभ में
    बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में स्थिति सामान्य होने अच्छी फसल होने के कारण भाव में निरंतर गिरावट आती गई और अनाज के दाम 1903 में सबसे कम हो गए अर्थात ज्वार एक रुपए की 27.2 सेर तक पहुंच गई तथा 1904 में गेहूं ₹1 का 15.2 सेर हो गया था। बाद के वर्षों में फिर दामों में अनिश्चितता की स्थिति रही। 1908 में दामों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जब अनाज के दाम अपने शिखर पर पहुंच गए अर्थात गेहूं ₹1 का 8.06 सेर तथा ज्वार एक रुपए की 10.15 से तक बिकी। यह ठीक है की इन असामान्य भावों की तुलना आज के भावों से नहीं की जा सकती लेकिन वह हमें तुलना करने का एक दिलचस्प आधार जरूर प्रदान करते हैं।
    प्रथम विश्व युद्ध
    आगामी दशक के बाद के वर्षों में प्रथम विश्व युद्ध हुआ था, जिसका असर अनाज के दामों पर मौसम और स्थानीय कारणों से ज्यादा दिखा, ज्वार और चना भी गेहूं के लगभग बराबर हो गया था।
    1919 में गेंहू एक रूपए का 5.03 सेर, जुआर 6 सेर और चना 6.22 सेर तक बिका।
    तीसरे दशक में अनाज की कीमतों कम ज्यादा होती रही 1923 का साल सबसे सस्ता साल रहा इस साल गेहूं चना और ज्वार का भाव क्रमश: एक रुपए का 9.16 12.35 तथा 13.58 सेर रहा। अगले दशक में सभी भाव 1929 में आई भारी मंदी के कारण एक बार फिर कम हो गए । 1933 -34 तक भाव पहले विश्व युद्ध के स्तर तक आ गए थे  यानी गेहूं 1रूपए का 14.92, चना 16.91और ज्वार 19.62 सेर तक आ गई थी।
    द्वितीय विश्व युद्ध
    मंदी के भाव पूरे चौथे दशक में बने रहे, इस दशक में सबसे महंगा गेंहू 1937 में 1रूपए का 10.37सेर मिलता था। द्वितीय विश्व युद्ध की घोषणा के साथ ही मंदी खत्म हो गई। मूल्य नियंत्रण और मुद्रा स्फीति के कारण लगातर बढने वाले मूल्यों के युग का सूत्रपात हुआ। आगामी चार साल अनाज के दाम तेजी से बढ़े । जहां 1940-41में गेंहू का दाम 1रूपए का 9.91चने का 11.25 और ज्वार 6.07 था, वहीं 1944 में गेंहू 2.79 सेर और चना 4.35 सेर तक पहुंच गया।
    आजादी के बाद की कीमतें
    अनाज के दामों के बढने की शुरुआत आजादी के पहले से हो चुकी थी। 1947 मैं भी एक रुपए का चार सेर गेहूं मिलता था यह भाव जिले के थोक भाव का औसत था देश के विभाजन के कारण बढ़ी वित्तीय कठिनाई के कारण सामान के दाम बढ़ गए थे । प्रथम पंचवर्षीय योजना में अनाज के उत्पादन को बढ़ाने पर जोर दिया गया था दूसरी पंचवर्षीय योजना तक यानी साठ के दशक तक दामों में कोई ज्यादा वृद्धि नहीं हुई। गेहूं का भाव 1962- 63 में 35.8 ₹ प्रति क्विंटल था जो 1968 – 69 तक 80.67 रुपए प्रति क्विंटल हो गया यानी 1962- 63 में गेहूं ₹1 का 2.79 किलो मिलता था तो चना ₹1 का 2.93  किलो 1968- 69 में गेहूं एक रुपए का 1.23 किलो मिलता था और चना एक रूपए का 1.29 किलो तक पहुंच गया। इस दौर में सिर्फ अनाज ही नहीं सभी वस्तुओं के दाम बढ़ने लगे थे।
    1974 -75 तक गेहूं का मूल्य 162.84  रूपए प्रति क्विंटल था तो चना 168.18 रूपए और ज्वार 142.98 रूपए प्रति क्विंटल थी, यानी गेंहू की कीमत 1.62प्रति किलो तक पहुंच गई ।
    और आज की कीमत तो आप जानते ही हैं।
    गेहूं रही है जिले की पहचान
    गेहूं सदैव से ही जिले की एक प्रमुख फसल रही है। गेहूं पैदा करना होशंगाबाद जिले के किसानों की विशेषता रही है। काफी समय पहले 1864 में रैसलपुर ग्राम से जलालिया गेहूं का नमूना लिया गया जिसे लखनऊ की प्रदर्शनी में प्रतियोगिता की भारी संख्या के बीच प्रदर्शित किए गेहूं में सबसे बड़े तथा सबसे अच्छे गेहूं के रूप में पुरस्कार मिला था। सफेद पिसी का इंग्लैंड को भारी मात्रा में निर्यात किया जाता था जहां इसका उपयोग अच्छी अमेरिकन किस्में मिलाने के लिए किया जाता था। रैली ब्रदर्स का विचार था कि मध्य प्रांत में सिवनी मालवा की पिसी सबसे अच्छी किस्म की थी । पुराने गजेटियर के अनुसार उस समय पैदा की जाने वाली किसमें थी जलालिया, कठिया सफेद पिसी लाल पिसी, बंसी, बगासिया, मुंडी पिसी तथा लौजिया या सहारिया थीं।

  • रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    इटारसी। इटारसी से लगभग 7 किलोमीटर पर स्थित रैसलपुर ग्राम  के निवासी राजेन्द्र प्रसाद चौधरी के घर के पीछे बाड़े में पाई गई दुर्लभ बौद्ध प्रतिमा अब नर्मदापुरम जिला पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित की जा सकती है, पिछले दिनों  राज्य के  पुरातत्व विभाग के अधिकारी ने पहुंच कर मूर्ति का निरीक्षण किया उनके साथ दा बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक और सदस्य भी थे।

    पुरातत्व विभाग के सीनियर गाइड  हुकुमचंद मलिक ने बताया की यह  मूर्ति पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है  बुद्ध की मूर्ति का यहां मिलना बहुत  दुर्लभ है और पूरे नर्मदापुरम के लिए गौरव की बात है। 

    इस मूर्ति की यहां उपस्थिति की ओर सबसे पहले वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु मिश्र और ख़बर भारतवर्ष की टीम ध्यान आकर्षित करवाया था, इसके बाद द बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक प्रहलाद निकम ने पुरातत्व विभाग से संपर्क कर इस तरफ़ ध्यान आकर्षित किया, 

    क्या है बुद्ध प्रतिमा की विशेषता ?

    ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण एक बुद्ध प्रतिमा है जो  गाँव के ही एक कृषक के बाड़े में एक सीमेंट के छोटे से चबूतरे पर रखी हुई है । इस प्रतिमा का क्षेत्र में होना दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । बलुआ पत्थर से बनी करीब 4 फुट ऊंची और 3 फुट से ज्यादा चौड़ी यह प्रतिमा करीब डेढ़ फुट मोटे शिलाखंड पर उकेरी गई है । मूर्ति में भगवान बुद्ध ध्यानस्थ मुद्रा में है। चेहरा शांत और सौम्य है, केश विन्यास अद्वितीय है । बुद्ध के दोनों और चँवरधारी पुरुष है और सिर के दोनों और दो मालाधारी स्त्री प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से अंकित है । प्रतिमा के ऊपर त्रीछत्र बना हुआ है । प्रतिमा बीच में से टूटी हुई है जिसे जोड़ कर रखा गया है। 

    देवराज बाबा के नाम से होती थी पूजा

    कृषक श्यामसुंदर चौधरी बताते हैं कि उनके भाई राजेंद्र चौधरी के घर के पीछे यह मूर्ति वर्षों से बाड़े में गड़ी हुई थी । इस मूर्ति का ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता था । हमारे पूर्वज  देवराज बाबा के नाम से कई सदियों तक इसकी पूजा करते रहे पर करीब 20 साल पहले जब आसपास की मिट्टी का क्षरण हुआ  तो मूर्ति का सिर दिखाई दिया । जब खुदाई की तो बुद्ध की चार पांच फीट ऊंची प्रतिमा दो टुकड़े में निकली। जिसे हमने चबूतरा बनाकर स्थापित कर दिया है। 

    क्या कभी यहां भव्य मंदिर था ?

    पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र की ज्यादातर प्रतिमाएं 12 वीं शताब्दी की हैं । इस क्षेत्र में बुद्ध की प्रतिमा का मिलना बहुत ही दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । उनका अनुमान है कि इस स्थान पर कोई भव्य मंदिर रहा होगा जो किसी कारण से नष्ट हो गया या कर दिया गया हो और उसके अवशेष आज भी यहां बिखरे हैं। जिन्हे संरक्षण की जरूरत है।

    पुरातत्व सम्पदा से भरपूर है यह क्षेत्र

    इटारसी और उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्र पुरातत्वीय अवशेषों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। अंचल में प्राचीन प्रतिमाएं बहुतायत में फैली हुई है जो कलात्मक दृष्टि से बहुत ही प्राचीन और महत्वपूर्ण हैं। अनेक मूर्तियों को तो ग्रामीण सिंदूर आदि पोत कर देवी देवताओं की तरह पूज रहे हैं। ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, इसके अलावा गांव में अनेक स्थानों पर प्राचीन मूर्तियां सती शिलाएँ, स्थापत्य खंड, स्तंभ आदि बिखरे पड़े हुए हैं । जिसमें प्रमुख रुप से उमा महेश्वर की प्रतिमा का ऊपरी भाग है इस मूर्ति में पार्वती हाथों में दर्पण है। ऊपर अनेक देव प्रतिमाएं हैं। वक्त के कारण मूर्ति अस्पष्ट हो गई है। गांव के मंदिर प्रांगण में पेड़ के नीचे कई मूर्तियाँ रखी  है।शिव की एक अस्पष्ट और खंडित प्रतिमा है जिसमें वे सर्प पकड़े हुए हैं वही अंबिका की प्रतिमा है।  लगभग 17 वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा मंदिर परिसर में दीवार में जड़ी हुई है । सूंड दाहिनी ओर मुड़ी हुई है। गणेश के  सिर और कान शरीर की तुलना में काफी बड़े हैं। शैली के कारण यह प्रतिमा अन्य प्रतिमाओं से अलग है।  गांव में कई पत्थर के बने स्तंभ यहां-वहां बिखरे हुए हैं । उनमें कई बहुत अच्छी स्थिति में है, जिन पर सुंदर नक्काशी और प्रतिमाएं अंकित हैं । कई स्तंभ जमीन में धँसे हुए हैं और उनके बारे में गांव वालों की अपनी अपनी धारणाएं हैं। कुछ सती स्तंभ है जो बहुत अच्छी स्थिति में है। अन्य प्रतिमाएं भी हैं जिनका संरक्षण किया जाना जरूरी है.

  • ज़िले की सियासत: चुनावी साल में भाजपा में बढ़ी खेमेबाजी?  

    ज़िले की सियासत: चुनावी साल में भाजपा में बढ़ी खेमेबाजी?  

    इटारसी -नर्मदापुरम // पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से साफ जाहिर हो रहा है कि जो पार्टी” पार्टी विद डिफरेंस”होने का दावा करती थी, जिसे उसे अपने अनुशासित और संस्कारित पार्टी और कार्यकर्ताओं पर गर्व था ,वह पार्टी अब भीतर से दरकने लगी है। उसमें गुटबाजी और खेमेबाजी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी है। वैसे पार्टी के नेता इसे नहीं स्वीकार रहे हैं , घटनाओं को सामान्य मतभेद बताकर सवालों से कन्नी काट रहे हैं। पर घटनाएं असलियत बयां कर रही हैं।

     भाजपा जिलाध्यक्ष के विरोध में पदाधिकारियों का इस्तीफा ?

    लगभग 10 दिन पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष माधव दास अग्रवाल के विरोध में उनके ही गृह क्षेत्र पिपरिया- खापाखेड़ा के पदाधिकारियों के इस्तीफे का एक वायरल पत्र चर्चा में रहा। यह कथित पत्र पिपरिया मंडल अध्यक्ष के लेटर पैड पर लिखा गया था। इस पत्र में करीब 25 पदाधिकारियों ने मय नाम हस्ताक्षर किए गए थे ।यह पत्र 18 दिसंबर 2022 का बताया गया। वायरल पत्र में यह आरोप लगाया गया था कि जिला अध्यक्ष की कार्यप्रणाली ठीक नहीं है, इसी वजह से नर्मदापुरम में कांग्रेस का जिला पंचायत अध्यक्ष बना था, जबकि जिला पंचायत में भाजपा के 12 सदस्य और कांग्रेस के मात्र 3 सदस्य ही थे ।इस मामले में प्रदेश संगठन ने जो जांच समिति बनाई थी उसमें भी जिलाध्यक्ष को जिम्मेदार माना गया था। बताया जा रहा है कि जिले के चारों विधायक व सांसद ने भी प्रदेश संगठन से जिलाध्यक्ष की शिकायत की थी, पर जब मामला चर्चा में आया तो पदाधिकारियों ने इस्तीफे से इंकार कर दिया संगठन के लोगों ने इस तरह के किसी भी पत्र के अस्तित्व से इंकार कर दिया। पार्टी की ओर से पत्र को फर्जी बताया है और सच्चाई का पता लगाने थाने में रिपोर्ट करने की बात की पर अभी तक क्या सच्चाई है? और यदि पत्र फर्जी है तो क्या खाने में इसकी शिकायत की गई है इसका पता नहीं चल सका है।

    किसान संघ और भाजपा नेता पीयूष शर्मा का विवाद ?

    कुछ दिन पूर्व भारतीय जनता पार्टी के किसान संगठन भारतीय किसान संघ और भाजपा नेता पीयूष शर्मा के बीच खटपट की खबरें मीडिया की सुर्खियों में रहीं। बताया जाता है कि पीयूष शर्मा ने माखन नगर के ताल केसरी में एक श्रद्धांजलि सभा के दौरान यह कहा था कि “आज किसानों की जो दुर्दशा है, खाद की किल्लत है, आदि के लिए भारतीय किसान संघ जिम्मेदार है” इस बयान से किसान संघ के पदाधिकारी नाराज हो गए .संघ के अध्यक्ष सर्वज्ञ दीवान ने यहां तक कह दिया कि भाजपा नेता ने पूरे किसान समाज का अपमान किया है और उन्होंने नर्मदा पुरम के साथ रास्ते पर भाजपा नेता पीयूष शर्मा के पुतला दहन की घोषणा कर दी।

     इस मामले में पीयूष शर्मा का कहना था कि बात अनौपचारिक थी मेरी बात का गलत मतलब निकाला गया, मेरी मंशा भारतीय किसान संघ भारतीय किसान संघ की भावनाओं को आहत करने की नहीं थी ,यह कहते हुए उन्होंने माफी मांग ली ।शर्मा के माफी मांगने पर किसान संघ ने भी अपना पुतला दहन का कार्यक्रम निरस्त कर दिया

     भाजपा नेताओं में हाथापाई ,पिस्टल तक निकलने की खबरें !!

    पिछले शुक्रवार को जब भाजपा के प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव सर्किट हाउस में कार्यकर्ताओं को चुनाव जीतने का गणित समझा रहे थे, उसी दौरान पार्टी के दो नेता आपस में भिड़ गए नौबत यहां तक आ गई कि एक पक्ष ने पिस्तौल तक निकाल ली। बताया जा रहा है कि भाजपा नेता रेवेंद्र चौहान सर्किट हाउस के एक कमरे में अपने कुछ साथियों के साथ खाना खा रहे थे, उसी दौरान भाजपा के नेता पीयूष शर्मा ने उनसे भोजन स्थल पर जाकर भोजन करने को कहा।इस बात को लेकर दोनों में विवाद हो गया और बात  गाली गलौज हाथापाई और पिस्टल निकलने तक पहुंच गई। दोनों के समर्थक सर्किट हाउस में जमा हो गए। विवाद बढ़ता देख कुछ वरिष्ठ नेताओं ने बीच-बचाव कर मामले को शांत कराया खबर यह भी है कि स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि दोनों गुटों के कार्यकर्ताओं को अलग-अलग वहां वाहनों से वहां से ले जाया गया ।घटना के वक्त प्रभारी मुरलीधर राव भी सर्किट हाउस में थे उन्हें भी घटना की जानकारी लगी । वैसे घटना को लेकर संगठन और नेताओं ने चुप्पी साध रखी है।

    प्रदेश प्रभारी के दौरे में शक्ति प्रर्दशन जैसा माहौल?

    भाजपा के प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव का दौरा भी यह संकेत दे गया कि भाजपा में खेमेबाजी और आपसी प्रतिद्वंद्विता चरम पर है। चुनाव से पहले जमीनी हकीकत का पता लगाने आए प्रदेश प्रभारी के सामने जिलेभर से आए विधायक की टिकट के दावेदारों ने अपनी दावेदारी कुछ-कुछ शक्ति प्रदर्शन जैसी ही की।  प्रदेश प्रभारी श्री राव के आने के पहले ही और आने के दिन अखबारों में एक  गुट विशेष द्वारा बड़े-बड़े स्वागत विज्ञापन प्रकाशित किए गए। उन विज्ञापनों में छपी फोटो की आकार प्रकार को देखकर भी गुटबाजी की चर्चा रही। भाजपा के नए नए नेता डा राजेश शर्मा जो कि नर्मदापुरम से टिकट के दावेदार माने जा रहे हैं ने एक समाचार पत्र में प्रभारी राव पर एक आलेख भी लिखा जिसकी खासी चर्चा रही।

     बताया जाता है कि प्रदेश प्रभारी को जिले में भारी गुटबाजी और खेमे बाजी का एहसास हो गया है, उन्होंने चर्चा के दौरान मिलजुल कर काम करने की सीख नेता और कार्यकर्ताओं को दी हैं, वहीं कई नेताओं ने व्यक्तिगत तौर पर प्रभारी को पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी की जानकारी भी दी।

    सब्ज़ी मंडी दुकानों की जांच और गुटबाजी !

    इटारसी सब्जी मंडी की दुकानों के आवंटन में हुई गड़बड़ियों की फाइल एक बार फिर खुल गई है। कमिश्नर द्वारा जांच के बाद आवंटन रद्द करने और जिम्मेदारों पर कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश के बाद लंबे समय तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही फाइल के फिर से खुलने के पीछे लोग स्थानीय राजनीति और भाजपा की गुटबाजी देख रहे हैं ।  नगर पालिका चुनाव के दौरान की खींचतान अब रंग लाती दिख रही है । बताया जाता है कि इस आवंटन में भाजपा नेता के सबसे ज्यादा जिम्मेदार होने की बात की जा रही है वह भी विधानसभा की टिकट के दावेदार हैं, और वर्तमान के लोग इस तरह की कोई चुनौती नहीं चाहते ,जबकि उस नेता की सत्ता और संगठन में अच्छी पकड़ बताई जा रही है । उसे भाजपा के सांसद खेमे का भी समर्थन है। लोगों का कहना है कि दूकानों के निर्माण और आवंटन के समय से ही इसमें गड़बड़ी की चर्चा थी, तब जन प्रतिनिधियों ने जांच की मांग क्यों नहीं की?

    कुल मिलाकर भाजपा की अंदरूनी कलह और गुटबाजी  से प्रदेश आलाकमान वाकिफ और परेशान है, पर इसमें कमी आने की संभावना नजर नहीं आ रही है, जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे और टिकट के लिए दावेदारियां बढ़ेंगी । नए पुराने दावेदारों के बीच कड़वाहट बढ़ेगी। देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस समस्या से कैसे निपटती है और यह भाजपा के चुनाव कितना नुकसान पहुंचाती है?