Category: धर्म -संस्कृति

  • जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी..!

    जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी..!

    रामनवमी पर विशेष

    राम हमारी अनंत मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष हैं इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से पुकारा जाता है। हमारी संस्कृति में ऐसा कोई दूसरा चरित्र नहीं है जो राम के समान मर्यादित , धीर-वीर और प्रशांत हो। इस  एक विराट चरित्र को गढ़ने में भारत के सहस्त्रों प्रतिभाओं ने कई शताब्दियों तक अपनी मेधा का योगदान दिया । आदि कवि वाल्मीकि ने अपनी लेखनी और प्रतिभा से इस चरित्र को संवारा। वाल्मीकि के राम लौकिक जीवन की मर्यादाओं का निर्वाह करने वाले वीर पुरुष हैं। उन्होंने लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध किया और लोक धर्म की पुन: स्थापना की। लेकिन वे नील गगन में दैदीप्यमान  सूर्य के समान दाहक शक्ति से संपन्न ,महासमुद्र की तरह गंभीर तथा पृथ्वी की तरह क्षमाशील भी है।

     महाकवि भास कालिदास और भवभूति के राम कुल रक्षक ,आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श पिता और आदर्श प्रजा पालक राजा का चरित्र सामने रखते हैं। कालिदास ने रघुवंश में इक्ष्वाकु वंश का वर्णन किया तो भवभूति ने उत्तर रामचरित्र में अनेक मार्मिक प्रसंग जोड़े।  लेकिन तुलसीदास ने राम के चरित्र का कोई प्रसंग नहीं छोड़ा है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि रामकथा को संपूर्णता वास्तव में तुलसीदास ने ही प्रदान की है। रामचरितमानस एक कालजयी रचना है जो भारतीय मनीषा के समस्त लौकिक, पारलौकिक, आध्यात्मिक ,नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को राम के चरित्र में इस तरह जोड़ देती है मानो किसी कुशल शिल्पी ने नगीने जड़ें हों। लेकिन तुलसी के राम विष्णु के अवतार हैं। वे दुराचारियों यज्ञ विध्वंसक राक्षसों का नाश कर लौकिक मर्यादाओं की स्थापना के लिए जन्म लेते हैं । वे सांसारिक प्राणियों को की तरह सुख-दुख का भोग जरूर करते हैं पर जीवन मरण के चक्र से होकर गुजरते हैं और अंततः अपनी पारलौकिक छवि की छाप छोड़ जाते हैं ।

    दरअसल,तुलसीदास ने राम के चरित्र के कई प्रसंगों की व्याख्या करते हुए उनके ईश्वरत्व की ओर इशारा किया है। इसका अर्थ यह है कि तुलसी ने राम के चरित्र में दो परस्पर विरोधी और विपरीत धाराओं में समन्वय का प्रयास करते हुए इसे और भव्यता प्रदान करने की कोशिश की है।  राम सुख दुख ,पाप पुण्य, धर्म अधर्म, शुभ अशुभ, कर्तव्य अकर्तव्य, ज्ञान विज्ञान, योग भोग, स्थूल सूक्ष्म, जड़ चेतन, माया ब्रह्म, लौकिक पारलौकिक आदि का सर्वत्र समन्वय करते हुए दिखाई देते हैं । इसीलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम तो है ही मानव चेतना के आदि पुरुष भी हैं।  भारत के विभिन्न धार्मिक संप्रदायों और मत मतांतरों के प्रवर्तक संतों ने राम की अलग-अलग कल्पना की है। इनमें हर एक के राम अलग-अलग हैं। तुलसीदास, नाभादास ,गुरु नानक, कबीर आदि के राम अलग हैं। किसी के लिए राम दशरथ पुत्र हैं, तो किसी के लिए सबसे न्यारे हैं। तुलसीदास ने यह भी कहा है कि ‘जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’

     लेकिन यहां एक बात रह रह कर मन में कौंधती है कि आखिर यह देश दो अक्षरों के एक राम नाम के पीछे पागलपन की हद तक क्यों पड़ा है ? सुबह बिस्तर से उठते राम! बाहर निकलते ही राम -राम, दिनभर राम नाम की अटूट श्रृंखला। फिर शाम को राम का नाम और जीवन की अंतिम यात्रा भी ‘राम नाम सत्य है’ के साथ। आखिर इसका रहस्य क्या है ? घर में राम, मंदिर में राम, सुख में राम, दुख में राम।  शायद यही देखकर अल्लामा इकबाल को भी लिखना पड़ा – है राम के वजूद पर हिंदुस्तान को नाज, अहले वतन समझते हैं, उनको इमाम ए हिंद ।

    यहां माता-पिता राम जैसे पुत्र की कामना करते हैं। इस मर्यादावादी देश में राम कहीं भी लौकिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करते हुए दिखाई नहीं देते। वे लंका विजय के बाद भी वहां का राज विभीषण को सौंप देते हैं। सीता हरण के प्रसंग में भी वे उद्विग्न नहीं होते। वनवास मिलने पर भी उसी सहजता से स्वीकार करते हैं और पिता की आज्ञा मानकर वन को प्रस्थान करते हैं। उनके मन मैं विमाता कैकयी और भाई भरत के लिए स्नेह बना रहता है । उनका ह्रदय करुणा से ओतप्रोत है। वे जब रावण का वध करते हैं तो पश्चाताप करते हैं। लौकिक जीवन की मर्यादा एवं राज धर्म के निर्माण के लिए धोबी के ताने सुनकर सीता का परित्याग कर देते हैं । उन्हें अपने जीवन की खुशियों से बढ़कर लोकजीवन की चिंता है। राजा के इस आदर्श के कारण ही भारत में रामराज की आज तक कल्पना की जाती है। राम के बिना भारतीय समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है?

    (संकलित )

  • रूद्र से शिव तक का सफर -शिव पूजा की प्राचीनता –

    रूद्र से शिव तक का सफर -शिव पूजा की प्राचीनता –

    शिव रात्रि पर्व पर विशेष

    फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। शिव चतुर्दशी तिथि के स्वामी है आता है उनकी रात्रि में व्रत किए जाने से इस व्रत का नाम शिवरात्रि पड़ा। यद्यपि प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि होती है किंतु फाल्गुन  कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ ( अर्ध रात्रि) में शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था इस कारण यह महाशिवरात्रि मानी जाती है। चतुर्दशी की इस रात्रि के चारों पहर में अलग-अलग विधियों द्वारा भगवान भोलेनाथ की पूजा एवं अभिषेक करने का शास्त्रीय विधान है। हालांकि शिवरात्रि का व्रत इतना जटिल है कि इसे वेद पाठी विद्वान ही यथा विधि संपन्न कर सकते हैं लेकिन यह उतना ही सरल भी है कि विद्वान, अनपढ़, धनी- निर्धन सभी अपनी अपनी सुविधा तथा सामर्थ के अनुसार शिव की पूजा कर सकते हैं ।दयालु आशुतोष भगवान छोटी से छोटी तथा बड़ी से बड़ी सभी पूजा से प्रसन्न होते हैं। शिव पुराण के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा ने इसी दिन रूद्र रूप शिव को उत्पन्न किया था ।
    शिव एवं हिमालय की पुत्री पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था अतः यह शिव और शक्ति के पूर्ण होने की रात्रि भी है।
    शिव एक ही परम तत्व की तीन मूर्तियों (ब्रह्मा विष्णु और शिव )में अंतिम मूर्ति हैं ब्रह्मा का कार्य सृष्टि, विष्णु का कार्य  स्थिति (पालन) और शिव का कार्य संहार करना है। परंतु शैव मत  के अनुसार शिव ही परम तत्व हैं,उनके कार्यों में संहार के अतिरिक्त सृष्टि और स्थिति के कार्य भी सम्मिलित हैं। शिव परम कारुणिक भी है और उनमें अनुग्रह अथवा प्रसाद तथा तिरोभाव (गोपन और लोपन) की क्रिया भी पाई जाती है ।इस प्रकार उनके पांच प्रकार के कार्य हैं। शिव की विभिन्न अभिव्यक्तियों या रूपों से यह कार्य किसी न किसी प्रकार से संबद्ध हैं।
    इनका उद्देश्य भक्तों का कल्याण करना है। शिव विभिन्न कलाओं और सिद्धियों के प्रवर्तक भी माने गए हैं ।संगीत, नृत्य, योग व्याकरण, व्याख्यान , भैषज्य आदि के मूल प्रवर्तक शिव हैं। इनकी कल्पना सब जीव धारियों के स्वामी के रूप में की गई है। इसलिए यह पशुपति, भूपति, भूतनाथ कहलाते हैं। यह सभी देवी देवताओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं अत: महेश्वर और महादेव के रूप में पाए जाते हैं । इनमें माया की अनंत शक्ति है अतः यह मायापती भी हैं। उमा के पति होने से इनका एक पर्याय उमापति है। इनके अनेक विरूद या पर्याय हैं। महाभारत में इसकी एक लंबी सहस्त्रनाम सूची दी हुई है।

    रूद्र से शिव तक का सफर

    शिव की कल्पना की उत्पत्ति और विकास का क्रम वैदिक साहित्य से ही मिलना प्रारंभ हो जाता है। ऋग्वेद में रुद्र की कल्पना में ही शिव की अनेक विशेषताओं और उससे जुड़ी पौराणिक गाथाओं के मूल का समावेश है । इसी प्रकार शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता संहिता (अध्याय 16) में जो शत रुद्री पाठ है उसमें शिव का मूल रूप दिखाई देता है। उसमें शिव को गिरीश यानी पर्वत पर रहने वाला,पशु चर्म धारण करने वाला (कृतिवास) तथा  जटाजूट रखने वाला (कपर्दी) कहा गया है। अथर्ववेद में रूद्र की बड़ी महिमा बताई गई है और उनके लिए भव , शर्व, रुद्र ,पशुपति, उग्र, महादेव और ईशान जैसे नामों का प्रयोग किया गया है। सिंधु घाटी के उत्खनन से जो धार्मिक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं उसमें योगी शिव की भी एक प्रतिकृति है। उत्तर वैदिक साहित्य में शिव रूद्र के पर्याय के रूप में मिलने लगते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद में रुद्र के अनेक नामों में शिवएक है । शांखायन, कौषीतकि आदि ब्राह्मणों ग्रंथो में रुद्र के शिव, महादेव, महेश्वर ईशान आदि  नाम मिलते हैं। शतपथ और कौषीतकि ब्राह्मण ब्राह्मण ग्रंथों में रुद्र का एक अन्य विरुद अशनि भी पाया जाता है। इन आठ विरूदों में से रुद्र, शर्व, उग्र तथा अशनि घोर (भयंकर) रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसी प्रकार भव, पशुपति, महादेव, और ईशान उनके सौम्य (सुन्दर) रूप का। यजुर्वेद में उनके मांगलिक विरुद शंभु और शंकर का भी उल्लेख है।
    शिव की पूजा का विकास किस क्रम में हुआ यह बतलाना कठिन है। किंतु यह निश्चित है कि ईसा पूर्व में ही शैव संप्रदाय का उदय हुआ था। पाणिनी ने अष्टाध्यायी(4.1.115) में शिव उपासकों (शैवों) का उल्लेख किया है।
    शैवमत का मूल रूप ऋग्वेद में रुद्र की कल्पना में मिलता है रुद्र के भयंकर रूप की अभिव्यक्ति वर्षा पूर्व झंझावात के रूप में होती थी रूद्र के उपवास को ने अनुभव किया कि झंझावात के पश्चात जगत को जीवन प्रदान करने वाला शीतल जल बरसता है और उसके पश्चात एक गंभीर शांति और आनंद का वातावरण निर्मित हो जाता है अतः रुद्र का ही दूसरा स्वरूप शिव जनमानस में शुरू हो गया शिव के 3 नाम शंभू, शंकर और शिव प्रसिद्ध हुए इन्हीं नामों से उनकी प्रशंसा और प्रार्थना होने लगी
    पतंजलि ने महाभाष्य में रुद्र और शिव का उल्लेख किया है। महाभाष्य में यह भी कहा गया है कि शिवभागवत अय:शूल (लोहे का त्रिशूल) और दंड अजिन धारण करते थे। पुराणों में (विशेषत: शैव पुराणों में) शिव का विस्तृत वर्णन और शिव तत्व का विवेचन पाया जाता है। संस्कृत साहित्य और अभिलेखों में शिव की स्तुतियां भरी पड़ी हैं।

    शिव के रूप

    पुराणों पुराणों और उसके बाद के साहित्य में शिव की कल्पना योगीराज के रूप में की गई है उनका निवास स्थान कैलाश पर्वत है व्याघ्र चर्म (बाघम्बर) पर बैठते हैं ध्यान में मग्न रहते हैं वे अपने ध्यान और तपोबल से जगत को धारण करते हैं उनके सिर पर जटा जूट है जिसमें द्वितीय का नवचंद्र जड़ित है। 

     इसी जटा से जगत्पावनी गंगा प्रवाहित होती है। ललाट के मध्य में उनका तीसरा नेत्र है, जो अंतर्दृष्टि और ज्ञान का प्रतीक है ,यह प्रलयंकर भी है। इसी से शिव ने काम का दहन किया था। शिव का कंठ नीला है इसलिए मैं नीलकंठ कहलाते हैं समुद्र मंथन में जो विष निकला था उसका पान करके उन्होंने विश्व को बचा लिया था उनके कंठ और भुजाओं में सर्प लिपटे रहते हैं ।वह अपने संपूर्ण शरीर पर भस्म और हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं उनके वामंग में पार्वती विराजमान रहती हैंऔर उनके सामने उनका वाहन नंदी। वे अपने गणों से घिरे रहते हैं। योगीराज के अतिरिक्त नटराज के रूप में भी शिव की कल्पना हुई है वे नाट्य और संगीत के भी अधिक अधिष्ठाता हैं। एक सौ आठ प्रकार के नाटकों की उत्पत्ति शिव से मानी जाती है जिसमें  लास्य और तांडव दोनों ही सम्मिलित हैं। दक्षिणामूर्ति के रूप में भी शिव की कल्पना हुई है यह शिव के जगद्गुरूत्व का स्वरूप है । इस रूप में वे व्याख्यान अथवा तर्क की मुद्रा में अंकित किए जाते हैं। मूर्त रूप के अतिरिक्त अमूर्त अथवा प्रतीक रूप में भी शिव की भावना की गई है इसके प्रतीक को लिंग कहते हैं जो उनके निश्चल ज्ञान और तेज का प्रतिनिधित्व करता है। पुराणों में शिव के अनेक अवतारों का वर्णन है लगता है विष्णु के अवतारों की पद्धति पर यह कल्पना की गई है। प्राय: दुष्टों के विनाश तथा भक्तों की परीक्षा आदि के लिए शिव अवतार धारण करते हैं। शिव पार्वती के विवाह की कथा संस्कृत साहित्य और लोक साहित्य में बहुत प्रचलित है ।
    शिव के भयंकर रूप की कल्पना भी की जाती है पाई जाती है जिसका संबंध उनके विध्वंसक रूप से है । वे शमशान रण क्षेत्र चौराहों (दुर्घटना स्थल) में निवास करते हैं। मुंडमाला धारण करते हैं भूत प्रेत और गणों से घिरे रहते हैं ।वह स्वयं महाकाल( मृत्यु तथा उसके भी काल) हैं जिसके द्वारा महा प्रलय घटित होता है ।
    उनका एक अर्धनारीश्वर रूप है जिसमें शिव और शक्ति के युग्म की कल्पना है इसी प्रकार हरिहर रूप में शिव और विष्णु के समन्वित रूप का भी अंकन है।

  • सीताजी के जन्म की कुछ जानी-अनजानी कथाएं

    सीताजी के जन्म की कुछ जानी-अनजानी कथाएं

    जानकी जयंती पर विशेष

    फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को सीता जी का जन्म उत्सव मनाया जाता है इसे सीता माता की जयंती या जानकी जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष यह 13-14फरवरी को मनाई जा रही है। गौरतलब है कि माता सीता के जन्म जयंती को भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में कुछ हिंदू समुदायों के लिए सीता नवमी के रूप में जाना जाता है और वैशाख महीने अप्रैल-मई में मनाया जाता है।

     रामायण दशरथ पुत्र राम की कथा ही नहीं वह जनक पुत्री सीता की भी कथा है। रामायण यानी राम का अयन। अयन का शाब्दिक अर्थ प्रयाण या अभियान होता है। वाल्मीकि ने रामायण में कई स्थानों पर जानकी या सीता के लिए ‘रामा’ शब्द का प्रयोग किया है, ऐसे में रामायण शब्द का दो तरह से विग्रह किया जा सकता है- राम का अयन और रामा का अयन । यानी रामायण राम और सीता का समन्वित अयन (अभियान या चरित्र) है । इस प्रकार रामकथा में सीता को राम के समान महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। विद्वानों ने सीता को वाल्मीकि की की अद्भुत और रहस्यमयी सृष्टि माना है।

    पर क्या आप जानते हैं कि पूरे विश्व में लगभग 300 से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं ,जिनमें वर्णित अनेक तथ्य एवं घटनाएं एक दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाते, लेकिन यह भी सत्य है कि इन सभी रामायणों का मूल स्रोत वाल्मीकि रामायण ही है। वाल्मीकि रामायण एकमात्र आधिकारिक एवं सर्वोपरि ग्रंथ है और सभी रचनाकारों ने इसी रामायण को अपना आधार बनाकर अपनी अपनी रामायण की रचनाएं की हैं ।

    भारतीय जनमानस में कई सौ सालों से जो रामायण गहरे तक बैठी हुई है वह गोस्वामी तुलसीदास कृत ” रामचरितमानस ” है और विशेषकर हिंदू जनमानस के मन मस्तिष्क में इस कृति के पात्रों एवं घटनाओं पर अटूट श्रद्धा और विश्वास है ।यह विश्वास इतना अटल है कि इससे इतर वह कुछ कल्पना भी नहीं कर सकते। रामचरितमानस हिंदुओं का एक सबसे पूजनीय ग्रंथ है।

     लेकिन क्या आप यह भी जानते हैं कि विश्व की अन्य भाषाओं  की रामायण में सीता जी का कैसा और किस रूप में वर्णन है? हिंदू जनमानस में सीता जी की जो छवि प्रचलित है उससे अलग छवि इन रामायण में नजर आती है जो इन्हें रहस्यमयी और विवादास्पद भी बनाती है।

     विद्वानों के शोध के अनुसार वाल्मीकि से पहले भी जातक कथाओं के रूप में राम कथाओं का प्रचलन था ,जिसमें राम, लक्ष्मण ,सीता ,दशरथ ,कौशल्या आदि चरित्र थे, लेकिन विद्वानों में अभी भी यह विवाद है कि वाल्मीकि का महाकाव्य पहले रचा गया या जातक कथाएं? यह माना जाता है कि जातक कथाएं पहले रची गई थीं। आइए जाने सीता जी को लेकर अन्य ग्रंथ क्या कहते हैं?

     “दशरथ जातक ” में राम, लक्ष्मण और सीता दशरथ के पुत्र पुत्री हैं । दशरथ बनारस के राजा हैं और उनकी 16हजार पत्नियां है । इसमें सीता हरण आदि की कोई घटना नहीं है। इस कथा में रावण भी नहीं है। इस ग्रंथ में 12 वर्ष बीतने पर राम बनारस लौट कर आते हैं और उनका राज्याभिषेक होता है। सीता sa साम्राज्ञी के पद पर प्रतिष्ठित होती हैं ।अब इस कथा में राम सीता का विवाह कैसे हो जाता है? इस संबंध में विद्वान दिनेश चंद्र सेन कहते हैं कि प्राचीन काल में मिस्रऔर बेबिलोनिया में एक ही परिवार में होने वाले विवाह की प्रथा थी। भारतवर्ष में भी शाक्यों में रक्त  शुद्धता के आग्रह के कारण एक परिवार में विवाह की मान्यता थी। सेन साहब का कहना है कि इस कारण से दशरथ जातक में राम सीता को पति-पत्नी के रूप में दिखाना असंगत नहीं है। लेकिन वह यह भी कहते हैं कि हिंदुओं में इस कथा की स्वीकार्यता कठिन थी। इस कारण वाल्मीकि ने सीता के जन्म की बिल्कुल नई कल्पना की।

     लेकिन सीता का जन्म रहस्य के आवरण में हैं जो वाल्मीकि के लिए ही नहीं बल्कि सभी राम कथाओं के लिए समस्या रहा है, सभी राम कथाओं में सीता जन्म की कथा एक सी नहीं है। एक शोध आलेख में बताया गया है कि सिर्फ महाभारत के “रामोख्यान”और विमल सूरी के ” पउमचरिउ” में सीता जनक की वास्तविक पुत्री हैं। संभवत इसका आधार या तो वाल्मीकि रामायण या फिर आदि रामायण हो, जैसा फादर कामिल बुल्के ने अपने शोध में संकेत किया है।

    वाल्मीकि के संस्कृत महाकाव्य और कम्ब के तमिल काव्य में संतान प्राप्ति के लिए एक अनुष्ठान में भूमि पर हल चलाते समय जनक को सीता प्राप्त होती है । इसी का एक और रूप क्षेमेंद्र की “रामायण मंजरी” में मिलता है, जिसमें जनक को आकाशवाणी होती है और वह अप्सरा मेनका को देखकर संतान प्राप्ति की कल्पना करते हैं और फिर हल चलाते समय सीता प्राप्त होती है और उसी आकाशवाणी में बताया जाता है कि वह कन्या मेनका जाया है।

     संघदास के जैन ग्रंथ “वसुदेव हिंदी” में सीता को रावण की पुत्री बताया गया है, क्योंकि ज्योतिष भविष्यवाणी करते हैं कि मंदोदरी-रावण विवाह से उत्पन्न पहली संतान रावण के वंश का नाश कर देगी और जब मंदोदरी एक कन्या को जन्म देती है तो रावण उसे एक पात्र में बंद कर  सुदूर प्रदेश में जाकर गाड़ देते हैं जो जनक के राज्य में हैं । बाद में जनक को यही कन्या मिलती है जिसे वह पुत्री के रूप में पालते हैं ।

    गुणभद्र के “उत्तर पुराण” की कथा अनुसार अलकापुरी के राजा की कन्या मणिवती की तपस्या में रावण विघ्न डालता है तो वह प्रतिज्ञा करती है कि वह रावण कन्या के रूप में जन्म लेकर उससे प्रतिशोध लेगी। बाद में वह मंदोदरी की कन्या के रूप में जन्म लेती है जिसे ज्योतिष ही रावण के लिए अशुभ बताते हैं तब रावण कन्या को एक पात्र में बंद कर मिथिला प्रदेश में गाड़ आता है जो किसानों को मिलती है, जिसे वे जनक को सौंप देते हैं ।

    सीता जन्म की लगभग ऐसी कथाएं तिब्बत रामायण ,चीनी ,तुर्किस्तान की खोटानी रामायण या  संस्कृत के दशावतार में मिलती हैं।

    अद्भुत रामायण में कुछ अंतर है। रावण ऋषियों के रक्त से भरा पात्र मंदोदरी को सावधानी से रखने को देता है और कहता है कि पात्र का द्रव्य ना तो वह स्वयं चखे और ना ही किसी को चखने दे ,लेकिन रावण के साम्राज्य विस्तार के अभियान पर निकलते ही प्राणांत की आशा से मंदोदरी पात्र में रखा द्रव्य पी लेती है लेकिन मरने के स्थान पर वह गर्भवती हो जाती है। लोकोपवाद की आशंका से घबरा कर मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने अपने भ्रूण को जमीन में गाड़ देती है।

    सिंगारवेलु ने अपने अध्ययन में सत्रह रामकथाओं को आधार बनाया है। उनके  निष्कर्षो को देखें –

    1-बारह रामकथाओं में सीता या तो किसी देवी जैसे लक्ष्मी उमा इंद्राणी की अवतार हैं या तपस्वी कन्या जो रावण से प्रतिशोध लेने अवतरित होती है।

    2-वाल्मीकि एवं कंब रामायण में सीता का जन्म चमत्कारिक रूप से पृथ्वी से होता है।

    3-विमलसूरी के पउमचरिउ एवं महाभारत के ‘रामोपख्यान ‘ में सीता जनक की पुत्री हैं।

    4-अधिकतर राम कथाओं में सीता रावण और उसकी पत्नी की कन्या हैं।

    और भी कथाएं सीता के जन्म को लेकर अनेक  रामायणों में अलग अलग तरीके से प्रचलित हैं, जिनका वर्णन ए. के. रामानुजन की “तीन सौ रामायण”नामक पुस्तक में है जो कि वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है। उपरोक्त तथ्य भी इसी पुस्तक पर आधारित हैं।