Category: जीवन शैली

  • विदेश जाने की चाह, लेकिन लौटने का इरादा भी… 10 में 8 भारतीय छात्र बोले- पढ़ाई के बाद लौटेंगे वतन

    ऑक्सफोर्ड सर्वे में बदली सोच की तस्वीर: अब विदेश की डिग्री को ‘बसने’ नहीं, ग्लोबल एक्सपीरियंस हासिल करने का रास्ता मान रहे युवा; 49% ने कहा- विदेश जाने का फैसला हमारा अपना

    विदेश मे पढ़ाई के लिए भारतीय छात्रों का रुझान बढ़ रहा है ,लेकिन अब बड़ी संख्या मे छात्र पढ़ाई के बाद भारत लौटकर करियर बनाने की योजना बना रहे है

    नई दिल्ली। विदेश जाना है… लेकिन हमेशा के लिए नहीं! भारतीय युवाओं की विदेश पढ़ाई को लेकर सोच में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के स्टूडेंट ग्लोबल मोबिलिटी इंडेक्स सर्वे में शामिल 81% भारतीय छात्रों ने कहा कि वे विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटना चाहते हैं। यानी करीब 10 में से 8 छात्र विदेशी डिग्री के बाद अपना भविष्य भारत में देख रहे हैं।

    कभी विदेश में पढ़ाई को बेहतर नौकरी और वहीं बसने की पहली सीढ़ी माना जाता था। अब युवा विदेश को शिक्षा, अनुभव, एक्सपोजर और ग्लोबल नेटवर्किंग का ठिकाना मान रहे हैं। पढ़ाई पूरी होगी, अनुभव मिलेगा और फिर उसी अनुभव के साथ भारत लौटकर करियर बनाने की तैयारी है।

    सबसे बड़ा बदलाव: अब पैरेंट्स नहीं, बच्चे तय कर रहे विदेश जाना

    सर्वे में विदेश जाने के फैसले को लेकर भी बड़ा बदलाव सामने आया है। 2025-26 में 49% छात्रों ने कहा कि विदेश जाकर पढ़ाई करने का फैसला उनका अपना था।

    दो साल पहले यह आंकड़ा सिर्फ 29% था। यानी युवाओं में अपने करियर को लेकर निर्णय लेने की स्वतंत्रता तेजी से बढ़ी है।

    विदेश जाने का फैसला खुद लेने वाले छात्र

    2023-24 : 29%

    2024-25 : 34%

    2025-26 : 49%

    यानी 2 साल में फैसला खुद लेने वालों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत अंक बढ़ी।

    10 में 9 के परिवार में पहली बार कोई विदेश पढ़ने जाएगा

    विदेश शिक्षा अब केवल उन परिवारों तक सीमित नहीं है, जहां पहले से कोई विदेश में पढ़ चुका है। सर्वे में करीब 10 में 9 छात्र अपने परिवार में पहली बार विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले होंगे।

    यानी पहली पीढ़ी के विद्यार्थी अब ग्लोबल एजुकेशन की दौड़ में तेजी से शामिल हो रहे हैं। इनके लिए सबसे बड़ा सहारा बना है—इंटरनेट।

    गूगल बना विदेशी यूनिवर्सिटी खोजने का नया ठिकाना

    विदेशी संस्थान चुनने के लिए छात्र एजेंटों से ज्यादा खुद ऑनलाइन रिसर्च कर रहे हैं।

    39% छात्रों को अपनी पसंद का संस्थान गूगल सर्च के जरिए मिला, जबकि 35% ने एजुकेशन एजेंट्स से जानकारी ली।

    भरोसे की बात आई तो भी गूगल सबसे आगे रहा।

    गूगल : 56%

    कॉलेज इवेंट्स : 20%

    इंस्टाग्राम : 9%

    एआई टूल्स : 6%

    यूट्यूब : 5%

    यानी विदेश जाने से पहले अब युवा किसी एजेंट के ऑफिस में बैठकर सिर्फ ब्रोशर नहीं पलट रहे। मोबाइल खोल रहे हैं, गूगल पर सर्च कर रहे हैं, सोशल मीडिया देख रहे हैं और एआई से सवाल पूछ रहे हैं।

    बिजनेस-मैनेजमेंट सबसे पसंदीदा

    विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की पढ़ाई की पसंद भी दिलचस्प है।

    सबसे पसंदीदा क्षेत्र

    बिजनेस-मैनेजमेंट : 75%

    पोस्टग्रेजुएशन : 70%

    हेल्थ और मेडिसिन : 8%

    साइंस : 2%

    इंजीनियरिंग : 1%

    विदेश की डिग्री, भारत में वापसी… आखिर क्यों?

    सर्वे के आंकड़े एक नई कहानी कहते हैं। भारतीय छात्र ग्लोबल एक्सपोजर चाहते हैं, लेकिन अपनी जड़ें छोड़ना जरूरी नहीं समझते।

    विदेश में पढ़ाई अब कई युवाओं के लिए ‘फाइनल डेस्टिनेशन’ से ज्यादा ‘करियर एक्सपीरियंस’ बनती जा रही है।

    यानी सोच कुछ ऐसी है—

    “डिग्री वहां से… अनुभव वहां का… लेकिन करियर अपने देश में।”

    डेटा में छिपी बड़ी तस्वीर

    81% — पढ़ाई के बाद भारत लौटना चाहते हैं49% — विदेश जाने का फैसला खुद लिया10 में करीब 9 — परिवार में पहली बार विदेश पढ़ने जाएंगे56% — जानकारी के लिए गूगल पर सबसे ज्यादा भरोसा75% — बिजनेस-मैनेजमेंट की ओर झुकाव

    बदल रहा है ‘विदेश जाने’ का मतलब

    विदेश जाने की इच्छा कम नहीं हुई है। बल्कि भारतीय युवाओं में ग्लोबल एजुकेशन का आकर्षण बना हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब विदेश जाना ‘वहीं बस जाने’ का पर्याय नहीं रह गया।

    नई पीढ़ी विदेश से सीखना चाहती है, दुनिया देखना चाहती है, अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करना चाहती है और फिर उस अनुभव को भारत में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है।

    यानी मंजिल विदेश नहीं… मंजिल बेहतर करियर है। और रास्ता चाहे जितना लंबा हो, लौटने का रास्ता भारत की ओर भी खुला है।

  • कितनी बार दिल पर दस्तक देता है शिद्दत भरा प्यार..?

    कितनी बार दिल पर दस्तक देता है शिद्दत भरा प्यार..?

    नई दिल्ली// बशीर बद्र की ग़ज़ल की पक्तियां हैं कि

    प्यार की नई दस्तक दिल पे फिर सुनाई दी,

    चाँद सी कोई सूरत ख़्वाब में दिखाई दी।

    किस ने मेरी पलकों पे तितलियों के पर रक्खे

    आज अपनी आहट भी देर तक सुनाई दी।

    जिंदगी  में सभी ने कभी न कभी एक ऐसे पलों  को महसूस जरूर किया होता है जिसमें किसी को देखकर या मिलकर पेट में तितलियां उड़ने का सा अहसास होता है, जिसे प्यार का नाम दिया जाता है। इस  अहसास या अनुभव को लेकर फिल्म गीत  और साहित्य  भरा पड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा जीवन में कितनी बार होता है?

    जिंदगी में दो बार प्यार होता है” यह एक आम धारणा है, जो अक्सर दो अलग-अलग तरह के प्यार को दर्शाती है: पहला प्यार जो आकर्षण, जुनून या वासना पर आधारित होता है, और दूसरा सच्चा प्यार जो समझ, सम्मान और गहरे जुड़ाव से आता है, जो पहले अनुभव से सीखकर आता है और अधिक परिपक्व होता है; कई लोगों के लिए, पहला प्यार मोहभंग के बाद दूसरा सच्चा प्यार मिलने का अवसर देता है, जिससे वे जीवन में अलग-अलग रिश्तों से सीखते और बढ़ते हैं। 

    पहला प्यार

    यह अक्सर शुरुआती आकर्षण, सुंदरता, या किसी व्यक्ति के गुणों से होता है, जैसा कि किसी तुर्की कहावत में बताया गया है।यह बहुत तीव्र और जुनूनी हो सकता है, जिसमें व्यक्ति दूसरे को अपनी पूरी दुनिया मान लेता है। 

    दूसरा प्यार इसे ट्रु लव भी कहते हैं

    यह अक्सर पहले प्यार के अनुभवों से सीखकर आता है, जहाँ व्यक्ति समझता है कि सच्चा प्यार सिर्फ दिखावे या आकर्षण से नहीं, बल्कि आपसी समझ और समर्थन से बनता है। यह पहले प्यार की तरह ही गहरा हो सकता है, लेकिन यह अधिक परिपक्व और टिकाऊ होता है क्योंकि इसमें अपेक्षाएँ कम और स्वीकृति अधिक होती है। 

    क्यों होता है दूसरा प्यार?

    अनुभव से सीखना: पहला रिश्ता टूटने के बाद व्यक्ति यह सीखता है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं, जिससे वह दूसरे रिश्ते में बेहतर चुनाव कर पाता है।

    परिपक्वता: समय के साथ, लोग भावनात्मक रूप से परिपक्व होते हैं और प्यार को एक अलग नज़र से देखते हैं, जहाँ वे साथी की कमियों को स्वीकार करते हैं और रिश्ते को बेहतर बनाते हैं।

    अलग-अलग रूप: प्यार के कई रूप होते हैं, जैसे माँ-पिता से प्यार, दोस्तों से प्यार, और जीवनसाथी से प्यार; ये सभी अलग-अलग स्तरों पर होते हैं, और हर अनुभव अपने आप में अनूठा होता है। 

    संक्षेप में, “दो बार प्यार” का मतलब अक्सर यह है कि जीवन में आप अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों से अलग-अलग तरह का प्यार अनुभव करते हैं, और दूसरा प्यार अक्सर पहले से मिली सीख का परिणाम होता है, जो गहरा और सच्चा हो सकता है।

    क्या कहता है नया अध्ययन?

    अमेरिका के इंडियाना यूनिवर्सिटी के किन्से इंस्टीट्यूट के एक नए अध्ययन ने इस पर से कुछ पर्दा उठाया है और नतीजा थोड़ा अलग है। इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने 18 से 99 वर्ष की आयु के 10,036 अविवाहितों से सीधा सवाल पूछा कि अपने जीवन में आप कितनी बार जुनूनी (पैशनेट) प्यार में पड़े हैं। अध्ययन के अनुसार औसत जवाब था कि सिर्फ दो बार (सटीक रूप से 2.05 बार) । नतीजों को विस्तार से देखें तो 14 फीसदी लोगों ने कहा कि वे कभी ऐसे जुनूनी प्यार में नहीं पड़े, 28 फीसदी ने कहा एक बार, 30 फीसदी ने दो बार, 17 फीसदी ने तीन बार, और 11 फीसदी ने चार या उससे अधिक बार। 58 फीसदी ने कहा एक या दो बार ही किया जुनूनी हद वाला प्यार . विषमलैंगिक, समलैंगिक, उभयलिंगी सभी में अंतर बहुत मामूली पाया गया।

    उम्र दराज लोगों जुनूनी प्यार का ज्यादा अनुभव

    मजे की बात है कि उम्रदराज लोगों ने युवाओं की तुलना में थोड़ा अधिक बार ऐसे प्यार का अनुभव बताया, यानी क्यूपिड कभी रिटायर नहीं होता। पुरुषों ने महिलाओं की तुलना में थोड़ा अधिक संख्या बताई, लेकिन यह अंतर भी बहुत छोटा था। जुनूनी प्यार किसी भेदभाव को नहीं मानता, यह एक तरह से सबको बराबरी पर ले आता है। थेरेपिस्ट्स के लिए भी यह डेटा अहम है, क्योंकि यह याद दिलाता है कि लगातार आतिशबाजी जैसा रोमांच महसूस करना सामान्य नहीं है। साथीभाव पर आधारित स्थिर और गहरा प्यार वही असली लंबी दौड़ का विजेता है। रिपोर्ट बताती है कि 60 फीसदी सिंगल खुद को बहुत रोमांटिक मानते हैं।

    निष्कर्ष:

    • यह स्टडी बताती है कि ‘सोलमेट’ (एक ही सच्चा प्यार) की धारणा के बजाय, शिद्दत वाला प्यार एक दुर्लभ लेकिन दोहराया जाने वाला अनुभव है.
    • यह प्यार हर किसी के लिए अलग-अलग रूप में आता है, और ज़्यादातर लोगों के लिए यह जीवन में कई बार हो सकता है, न कि सिर्फ एक बार. 

    लोग प्यार में पड़ने की बातें तो लगातार करते हैं, लेकिन यह पहला बड़ा अध्ययन है जिसने दिखाया है कि यह वास्तव में कितना दुर्लभ है। अधिकांश लोगों के लिए यह आतिशबाजी जैसा जुनून जीवन में गिनी-चुनी बार ही आता है फिर जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ लेती है।

    – डॉ अमांडा गेसलमैन

    अध्ययन की प्रमुख लेखिका और किंसे की वैज्ञानिक

  • इस राज्य में लोग मेगा स्टायलिश अंत्येष्टि पर लाखों रूपये खर्च करने को तैयार ?

    इस राज्य में लोग मेगा स्टायलिश अंत्येष्टि पर लाखों रूपये खर्च करने को तैयार ?

    तिरुवनंतपुरम// अभी तक आपने शादी और अन्य समारोहों को भव्य और महंगा होने की बाते सुनी होगीं पर अब लोग अंत्येष्टि को भी भव्य बनाने के लिए खासी रकम खर्च करने को तैयार हैं .

    हिन्दू में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार इन दिनो केरल में अंतिम संस्कार का बाजार फल-फूल रहा है और लोग मेगा स्टाइलिश अंत्येष्टि पर लाखों रुपये तक खर्च करने को तैयार हैं। बढ़ते प्रवासी भारतीयों , विशेषकर ईसाई समुदाय के कारण, केरल में  अत्येष्टि का कार्यक्रम “लार्जर दें लाइफ”  बनाता जा रहा है

    कोरोना महामारी के बाद अंतिम संस्कार सेवाओं में विशेषज्ञता रखने  वाली कई इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां सामने आई हैं . महामारी से पहले केवल कुछ ही कंपनियां थीं जो ये सेवाएं प्रदान करती थीं,पर कोविड के चरम पर कुछ इवेंट मैनेजमेंट फर्मों ने अपने कारोबार को इसके लिए खोल दिया, क्योंकि  विवाह सहित सभी सार्वजनिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

    आम तौर पर ये कंपनियां अंतिम संस्कार की सेवाओं के लिए 50,000 से 10 लाख रुपये के बीच शुल्क लेती हैं, पर अतिरिक्त मांग लागत को बढ़ा देता है । उदाहरण के लिए, एक ताबूत ₹4,500 में उपलब्ध है, लेकिन लकड़ी और अन्य सामान के आधार पर ₹ 1 लाख में भी उपलब्ध है।

    इरिंजलाकुडा की कायरोस फ्यूनरल सर्विस, जिसे गूगल  पर पांच सितारा रेटिंग प्राप्त है, के पास ग्लास पैनल और साटन पर्दे वाले एम्बुलेंस और कस्टम-निर्मित शव वाहन का एक बड़ा बेड़ा है।

    रिपोर्ट के अनुसार एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं में शव की ड्रेसिंग, लाइव अंतिम संस्कार बैंड, कार्यक्रम की लाइव-स्ट्रीमिंग, ताबूत और कब्र को सजाना और वह सब कुछ शामिल है जो एक परिवार मांग सकता है। मृतक का मेकअप ‘पैकेज’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस तरह की सेवा दे रही कम्पनी कोकोनाडु इवेंट मैनेजमेंट, तिरुवल्ला की संजय जॉर्ज मैथ्यू कहते हैं, “विदेशी रिश्तेदार और मृतक के करीबी लोग शव को अधिक जीवंत रूप में देखना चाहते हैं।” लिपस्टिक और आईशैडो के साथ-साथ फाउंडेशन भी लगाया जाता है। अधिकांश हल्के टच-अप के लिए कहते हैं, लेकिन कई लोग भारी मेकअप के लिए कहते हैं, यह देखते हुए कि यह आखिरी बार होगा जब किसी व्यक्ति को देखा जाएगा।  इसके अलावा अंतिम संस्कार सेवाओं के लिए आम अनुरोध में अक्सर मृतक को ब्लेज़र, सूट या जैकेट जैसी औपचारिक पोशाक पहनाना शामिल होता है, हालांकि कुछ विचित्र  अनुरोध भी होते हैं, जैसे कि मृतक को रे-बैन धूप का चश्मा पहनना।

    ताबूत को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, जरूरत पड़ने पर और मेहमानों को  सुरक्षा प्रदान की जाती है देखभाल के लिए कर्मचारी तैनात किए जाते हैं। चर्च या श्मशान तक जुलूस और उसके बाद दावत की जिम्मेदारी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की होती है।

    त्रिशूर के निवासी पॉल जिफ़ी, जिन्होंने हाल ही में एक अंतिम संस्कार सेवा कंपनी का उपयोग किया है को लगता है कि इस तरह की सर्विस और सहायता व्यावहारिक है.उनका मानना है कि

    एकल या छोटे परिवार या शहर से बाहर से आए परिवार दुखी होते हैं और इस तरह के कई काम अक्सर उनको भारी पड़ सकते हैं । मिस्टर जिफ़ी को लगता है कि मृतक का हल्का मेकअप इसे  गरिमापूर्ण बनाता है, क्योंकि शव को सार्वजनिक श्रद्धांजलि के लिए रखा जाता  है। कंपनी परिवार के सदस्यों से इनपुट लेकर लेती है यह सेवा का एक महत्वपूर्ण पहलू है.

    (हिन्दू में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर )(फोटो हिन्दू से साभार )

  • देश की दो अनफ्रेंडली सिटी मुंबई और दिल्ली ? ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई का सर्वेक्षण तो यही कहता है

    देश की दो अनफ्रेंडली सिटी मुंबई और दिल्ली ? ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई का सर्वेक्षण तो यही कहता है

    नई दिल्ली // आप अपने शहर को छोड़ कर एक बड़े शहर में रहने के लिए जा रहे हैं या जाना चाहते हैं?  और वहां जाकर दोस्त भी बनाना चाहेंगें ?  तो देश के दो शहरों से दूर रहें,  यह शहर हैं मुंबई और दिल्ली . इन शहरों ने दुनिया के सबसे अनफ्रेंडली ‘अमित्रवत’ शहरों की सूची में उच्च स्थान  हासिल किया हैं। ; कम से कम, ऑनलाइन ट्यूटरिंग और लैंग्वेज लेसन प्लेटफॉर्म प्रीप्लाई के एक सर्वेक्षण से तो यही पता चला है। सूची में मुंबई 10 में से 3.91 के स्कोर के साथ चौथे स्थान पर तो  दिल्ली 10 में से 3.27 के स्कोर के साथ छठे स्थान पर है।

    द कम्युनिटी स्पिरिट इंडेक्स: द वर्ल्ड्स फ्रेंडली सिटीज़ फॉर नॉन-नेटिव्स नामक यह सर्वे  53 शहरों में किया गया और इसमें 1,000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था. और मूल्यांकन  गैर-मूल निवासियों के प्रति उनकी मित्रता के आधार पर किया गया था।  विशेष बात यह है  की किसी भी भारतीय शहर ने  फ्रेंडली लिस्ट या “दोस्ताना” सूची में स्थान नहीं बनाया है .

    सूचकांक ने विश्व स्तर पर सबसे अधिक स्वागत करने वाले और अमित्र शहरों को निर्धारित करने के लिए छह प्रमुख मैट्रिक्स पर विचार किया। मेट्रिक्स में आगंतुक वापसी दर, सुरक्षा रेटिंग, एलजीबीटीक्यू + समानता, समग्र खुशी, एक आम भाषा के माध्यम से संचार में आसानी और कर्मचारियों की मित्रता शामिल थी। सर्वेक्षण में पाया गया कि विदेशियों की मित्रता, सहायता और सहनशीलता जैसे कारकों के मामले में मुंबई और दिल्ली ने कम स्कोर किया। मुंबई और दिल्ली में रहने वाले सर्वेक्षण के उत्तरदाताओं ने अपनी कम रेटिंग के कई कारणों का हवाला दिया, जिनमें शामिल हैं: शहरों में बहुत भीड़ और शोर है, जो नए लोगों के लिए भारी हो सकता है। यहाँ लोगों को अक्सर अमित्र और अनुपयोगी के रूप में देखा जाता है। अन्य संस्कृतियों की समझ की कमी है, जिससे भेदभाव हो सकता है। सर्वेक्षण के परिणाम कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक हैं, क्योंकि भारत को अक्सर स्वागत करने वाले और मेहमाननवाज देश के रूप में देखा जाता है। हालांकि, सर्वेक्षण में उन चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है, जिनका भारत के प्रमुख शहरों में रहने पर गैर-मूल निवासियों को सामना करना पड़ सकता है।

    सर्वेक्षण जनवरी से मार्च 2023 तक ऑनलाइन आयोजित किया गया था।

    सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं से मित्रता, सहायता और विदेशियों की सहनशीलता जैसे कारकों के संदर्भ में शहरों को 1 से 10 के पैमाने पर रेट करने के लिए कहा गया।

    मुंबई और दिल्ली ने तीनों कारकों के मामले में कम स्कोर किया।

    सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि मुंबई और दिल्ली गैर-निवासियों के लिए शहरों का स्वागत नहीं कर रहे हैं।

    गैर-मूल निवासियों के लिए मुंबई और दिल्ली को अधिक स्वागत योग्य बनाने के लिए कई चीजें की जा सकती हैं, जैसे कि सांस्कृतिक समझ और सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रमों में निवेश करना, विदेशी कर्मचारियों को अधिक सहायता देना, और नए लोगों के लिए अधिक मित्रवत और सहायक होना।

    डेटा से पता चलता है कि केवल 12% लोगों ने मुंबई को मित्रवत माना, जबकि दिल्ली के लिए यह आंकड़ा 17% से थोड़ा अधिक था। इस बीच, फ्रेंडली स्टाफ श्रेणी के तहत सर्वेक्षण के अनुसार, मुंबई ने 3.91% की रेटिंग हासिल की, जबकि दिल्ली ने 3.27% स्कोर किया। साथ ही, मुंबई को 3.78 का हैप्पीनेस स्कोर प्राप्त हुआ, जबकि दिल्ली ने इस संबंध में 4.01 स्कोर किया।

    दुनिया के शीर्ष 10 मित्र सूची वाले शहर:

    टोरंटो कनाडा)

    ऑस्ट्रेलिया (सिडनी)

    एडिनबर्ग (यूके)

    मैनचेस्टर (यूके)

    न्यूयॉर्क (अमेरिका)

    मॉट्रियल कनाडा)

    मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया)

    सैन फ्रांसिस्को (यूएस)

    डबलिन, आयरलैंड)

    कोपेनहेगन, डेनमार्क)

  • रोज महज  60 सेकंड बदल सकता है आपकी जिन्दगी ।यानि काइज़न: खुद को बेहतर बनाने की जापानी तकनीक

    रोज महज  60 सेकंड बदल सकता है आपकी जिन्दगी ।यानि काइज़न: खुद को बेहतर बनाने की जापानी तकनीक

    क्या आपको लगता है कि आलस्य आपके जीवन को बर्बाद कर रहा है? क्या आपने कभी खुद को बेहतर बनाने और बेहतर जीने के लिए आलस्य पर काबू पाने के बारे में कभी सोचा है?  यदि आप अपने जीवन से आलस्य को दूर करना चाहते हैं चाहते हैं तो आलस्य पर काबू पाने के लिए एक जापानी तकनीक है – काइज़न।

    क्या आपने महसूस किया है कि आपका जीवन स्थिर हो गया है ? जीवन में  कोई बदलाव नहीं है । आप जीवन में बदलाव लाने के लिए तय करते हैं कि आप एक फिटनेस की कोशिश करेंगे, या एक नई भाषा सीखेंगे, एक वाद्य यंत्र बजाना सीखंगे या ऐसा ही कोई काम करने की कोशिश करेंगें – लेकिन हर बार आप इसे स्थगित कर देते हैं। आज नहीं कल से करेंगें सोमवार से, अगले महीने या अगले साल भी… आपका संकल्प या लक्ष्य दिन b दिन दूर होता चला जाता है। हम अपने रोज मर्रा के रूटीन से बाहर नही आ पाते , हम बस आराम से प्यार करते हैं,अपने कम्फर्ट जोन को छोड़ नहीं पाते हैं ,वैसे  पुरानी आदतों को छोड़ना और उन्हें नई आदतों या रूटीन में बदलना,ढालना सहज नहीं होता इसमें समय और धैर्य लगता है।

    कुछ करने के लिए खुद को चुनौती देना काफी बड़ा काम है। हम किसी भी काम की शुरुआत में उत्साह से भरे होते हैं पर  धीरे-धीरे वह  फीका पड़ता जाता है । हम तेजी से बहुत कुछ हासिल करने की कोशिश करते हैं, जो इसे और भी कठिन बना देता है। जादू से सपना पूरा होने का इन्तजार करने के बजाय  हमे अपने सपने या इच्छित बात को हासिल करने के लिए कभी कभी योजना बनाने और उस पर विचार करने जी जरूरत होती है .

    तो ऐसा क्यों होता है?

    अपने इरादे पर टिके न रह पाना या आलस का एक निश्चित कारण का पता लगाना असंभव है। यदि बचपन से ही आपके निर्णय हमेशा दूसरों द्वारा लिए जाते रहे हैं, तो संभावना है कि आपको जीवन में अपने उद्देश्य के बारे में या आपके पास जो कुछ भी है उसे बदलने की शक्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं है । मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जो व्यक्ति बहुत प्रेरित नहीं होता है, वह कम समय में किसी भी आदत को विकसित करने में सक्षम नहीं होता है।

    व्यक्ति में आदत विकसित करने में कम से कम 21 दिन लगते हैं। स्थायी आदत बनने में 90 दिन । किसी भी व्यवसाय को करने के लिए कौशल और अनुशासन की आवश्यकता होती है। शुरुआत में छोटे-छोटे कदम उठाना “प्लान्स ग्रोमाड्यो” युवाओं के लिए एक तकनीक है ।  दृढ़ विश्वास और खून में हॉर्मोन के तेज होने के कारण किसी का बीच में रुकना मुश्किल है । चुने हुए रास्ते को बंद करने के लिए इस चरण में अकल्पनीय लगता है जब कोई संभावनाओं से भरा होता है तो उसे इस स्तर पर चुने हुए रास्ते को बंद करने की बात अकल्पनीय लगती है.

    उम्र के साथ, हम बहुत सी आदतें विकसित करते हैं और स्वाद प्राप्त करते हैं।  जीवन उनके कारण गम्भीर जटिलताओं से भर जाता है जिनसे किसी को निपटना होता है। किसी की इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता और अक्सर इच्छा शक्ति कम पड़ जाती है। हम स्वाभाविक रूप से शुरू करते हैं और ट्रैक खो देते हैं क्योंकि काम बोझ बन जाता है, इसलिए उबाऊ हो जाता है। आदतों को पोषण और समर्पण की आवश्यकता होती है।

    रास्ता कहाँ है?

    काइज़न एक अद्वितीय जापानी दर्शन है। जापानी में इसका शाब्दिक अर्थ “निरंतर सुधार” है। “काई” का अर्थ परिवर्तन है, और “ज़ेन” का अनुवाद ज्ञान है। यह उन बदलावों की बात करता है जो प्रवाह में नहीं होते हैं लेकिन परिपक्व अनुभव का प्रतिबिम्ब दिखाते हैं।.  जापान में, इस दर्शन को पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लागू किया गया था। जब कंपनियों को नष्ट कर दिया गया था औरउनके पुनर्जनन की प्रक्रिया को तेज करने के लिए इसे लागू किया गया था। इसे उत्पादन या सहायक प्रक्रियाओं , व्यवसाय, प्रबंधन, व्यक्तिगत लक्ष्यों को प्राप्त करने में लागू किया गया, जिसमे पहली बार में बहुत अधिक लग सकता था.

    जापानी दार्शनिक मसाकी इमाई द्वारा 1986 में लिखी अपनी पुस्तक में इस विचार को विस्तृतरूप में प्रस्तुत किया  इसके बाद “कैज़ेन” की अवधारणा दुनिया भर में फैल गई । उन्होंने समझाया कि इस तरह के दर्शन का अर्थ है – जीवन और उसके सभी क्षेत्रों का पुन: उन्मुखीकरण (reorientation).

    .“एक मिनट का सिद्धांत” क्या है?

    आपके लक्ष्य का मार्ग अब एक मिनट लंबा है ! यह एक प्रबंधन तकनीक है जो निश्चित रूप से सुधार के संकेत बताती है । इस तकनीक का सार यह है कि एक व्यक्ति को एक निश्चित कार्य को एक मिनट के लिए (में)  निपटाना होता है, लेकिन यह हर दिन और एक ही समय पर होना चाहिए। छोटी अवधि से भ्रमित न हों; यह आलस्य को दूर रखने के लिए है। अगर आप किसी काम को करने के लिए आधा घंटा रखने की कोशिश करेंगे तो आप ढेर सारे बहाने बना लेंगे और काम अधूरा रह जाएगा।

    आप एक मिनट के मूल्य पर सवाल उठा सकते हैं। ठीक है, आप एक मिनिट में एक पृष्ठ पढ़ सकते हैं, एक विदेशी भाषा में बोल सकते हैं, व्यायाम कर सकते हैं और अपने उच्चारण में भी सुधार कर सकते हैं! निरंतरता कुंजी है। ऐसा नियमित रूप से करने से आपको खुशी और आत्म-संतुष्टि मिलेगी, इस प्रकार नई उपलब्धियों के लिए प्रेरणा मिलेगी। अगर आप संयोग से चूक गए हैं, तो इसे सोने से पहले या नाश्ते से पहले जरुर करें।

    लंबे समय तक नई चीजें करने की कोशिश करने से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है, इसलिए एक मिनट एक आसान काम लगता है। यदि आप आलस्य पर काबू पाने के बारे में संतुष्ट महसूस करते हैं तो समय बर्बाद करने का अपराध बोध दूर हो जाएगा। बिना किसी झंझट के समय को धीरे-धीरे पांच मिनट से एक घंटे तक बढ़ाएं।

    निरंतर सुधार के लिए एक पैटर्न की आवश्यकता होती है।

    ये कदम आपको काइज़ेन में महारत हासिल करने में मदद करेंगे

    1. मानकीकरण: Standardize:

    एक विशिष्ट और संगठित काम या गतिविधि के लिए एक स्टेंडर्ड प्रक्रिया अपनाया जाना बहुत महत्वपूर्ण और जरुरी है.

    . 2. मूल्यांकन . Measure:

    की जाने वाली गतिविधि का मूल्यांकन करें कि क्या यह मात्रात्मक डेटा( quantifiable data) का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है, जैसे किसी कार्य को पूरा करने में लगने वाला औसत समय या इसी तरह की अन्य बाते ।

    3. तुलना करें: Compare

    अपनी आवश्यकता के विरुद्ध मापन एक तुलना है जो जीवन के सभी क्षेत्रों में लाभदायक सिद्ध होती है। यह देखा जाना जरूरी है कि क्या यह काम समय लेने वाला है ? क्या आप अपने लक्ष्य के करीब हैं? क्या आपको दूसरा तरीका आजमाना चाहिए?

    4. नया करें: Innovate:

    नए तरीकों की खोज अंतहीन होती है और परिणाम हर बार बेहतर होते हैं। अपने लक्ष्य के लिए स्मार्ट और नये तरीकों को खोजें .( Innovate नवप्रवर्तन)  ठीक गूगल  कर्मचारियों की तरह जो अपना 20% समय नए तरीकों की खोज में लगाते हैं।

    5. दोहराएँ: . Repeat:

    पहले कदम पर वापस जाएं और फिर से शुरू करें।

    काइज़न काम पर स्वामित्व और अधिकार बढ़ाता है। जुनून को मरने नहीं देना बहुत बड़ा काम है।

    हालाँकि, यह प्रेरणा और ऊर्जा के उचित उपयोग का स्रोत है। किसी भी प्रकार की बर्बादी, चाहे वह ऊर्जा हो, समय हो या प्रयास, काइज़न के माध्यम से दूर किया जाता है। एक व्यक्ति स्वचालित रूप से अधिक प्रेरित और केंद्रित हो जाता है। तो फिर इसे अपनाओ और अजमाओ और अपना जीवन बदलो!

  • दुनिया में “दोस्ती में मंदी” की चर्चा – कौन चिंतित है इस मंदी से ?

    दुनिया में “दोस्ती में मंदी” की चर्चा – कौन चिंतित है इस मंदी से ?

    अभी तक आपने आर्थिक मंदी के बारे में सुना होगा , लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में दोस्ती की मंदी की बातें की जा रहीं हैं. इस को लेकर फोर्ब्स के अरबपतियों की लिस्ट में जगह बनाने वाले जीरोधा के को-फाउंडर निखिल कामथ का एक ट्वीट इन दिनों काफी चर्चा में है जिसमें उन्होंने दुनिया में फ्रेंडशिप रिसेशन यानी दोस्ती की मंदी को लेकर चिंता जताई है।  इस अरबपति एन्त्ररोप्रन्युँर ने लोगों से दोस्ती की अहमियत को याद दिलाई है । 

    उन्होंने दोस्ती से जुड़ा एक दिलचस्प रिसर्च भी अपने टि्वटर अकाउंट से शेयर किया है। इस रिसर्च को अमेरिकन पर्सपेक्टिव के रिचर्ड रिब्स ने तैयार किया है. इस रिसर्च सर्वे में कहा गया है कि पूरी दुनिया इस समय फ्रेंडशिप रिसेप्शन या ने दोस्तों की कमी की समस्या से जूझ रही है  । जिसके चलते लोगों के पास करीबी दोस्तों की संख्या कम हो गई है।  निखिल कामथ ने कहा है कि यह एक बड़ा संकट है क्योंकि अकेलापन 1 दिन में 15 सिगरेट पीने के बराबर है।

     जोधा के कोफाउंडर ने  रिसर्च की मुख्य बातें शेयर करते हुए कहा कि दोस्ती जीवन को बदलने वाला रिश्ता  होता है । दार्शनिक तौर पर  एक समुदाय का होना खुशहाली का सबसे बड़ा संकेत माना जाता है। मेरे जीवन में 5 भाई हैं जिनके लिए मैं सब कुछ कर लूंगा ,मैं इसे लेकर गंभीर हूं। 

     निखिल कामथ ने मानवीय संबंधों और उसके महत्व पर भी शेयर किया है इसमें इस बात पर प्रकाश डाला है कि दोस्ती लोगों के जीवन के लिए काफी अहम है रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय बच्चों पर मां बाप का  अधिक फोकस, लगातार शहर बदलने ,ऑफिस पर अधिक फोकस वॉल कर चलो ब्रेकअप के चलते पूरे समूह के साथ अलग होने की समस्याओं के चलते आजकल लोगों के दोस्त कम हो रहे हैं।

    ग्रीक दार्शनिक अरस्तु ने कहा था  मनुष्य सामजिक प्राणी है और दोस्ती सबसे आदर्श रिश्ता. सामाजिकता दोस्ती का महत्वपूर्ण आधार है मनुष्य के कल्याण के लिए मित्रता महत्वपूर्ण होती है । हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में कई कारणों और दबावों ने दोस्ती के बनाने ओए उसे बनाये रखने में मुश्किल होती जा रही है । दोस्ती के महत्व को पहचानते हुए, ज़ेरोधा के सह-संस्थापक निखिल कामथ ने पिछले दिनों लेखक रिचर्ड रीव्स के इस विषय पर एक दिलचस्प दर्शन को साझा किया।

    अमेरिकन पर्सपेक्टिव द्वारा 2021 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया “दोस्ती की मंदी” देख रही है क्योंकि ऐसे लोगों में वृद्धि हुई है जिनके करीबी दोस्तों की कमी है। और यह भविष्य में एक गंभीर संकट बन सकता है क्योंकि अकेलापन एक दिन में 15 सिगरेट पीने के बराबर है।

    दोस्ती में मंदी के कारण

    अमेरिकन पर्सपेक्टिव सर्वे ने चार ऐसे कारणों की ओर इशारा किया जो “मित्रता में गिरावट” का कारण बन रही  हैं – भौगोलिक गतिशीलता (geographic mobility), बच्चे के पालन-पोषण पर माता-पिता का बढ़ता ध्यान(increased parental focus on child rearing )कार्य-केंद्रित संस्कृति (work centric culture ) और रिश्तों का टूटना ( breakdown of relationship ) दोस्ती और दोस्तों समूहों के में कमी ला रहा है.

    अवसरों और नौकरी के संपर्कों की कमी, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव, और उदासी और अकेलेपन की भावनाओं को कम दोस्त होने के कुछ नकारात्मक पहलू के रूप में जाना जाता है ।

    सर्वेक्षण में बताया गया है कि 15% पुरुषों ने एक करीबी दोस्त की कमी को स्वीकार है । जबकि 1990 के दशक में केवल 3% पुरुष ही इसी तरह भावना का अनुभव करते थे .इसके अलावा, कोविड महामारी के दौरान आधी से अधिक महिलाओं का अपने दोस्तों से संपर्क टूट गया ।

    ‘दोस्ती में मंदी’ पर चेतावनी देते हुए, सर्वेक्षण में कहा गया है कि यदि प्रवृत्ति जारी रहती है तो व्यक्ति अधिक अकेला और खराब दृष्टिकोण (atomized indivisual and a dystopian outlook) वाला हो सकता है। हमारे जीवन में मित्रों की संख्या कम होने से “दुख और अस्वस्थता” भी बढ़ेगी ।

    दोस्ती को हमेशा के लिए कैसे बनाए रखें?

    लेखक रीव्स ने अकेलेपन और दोस्ती की मंदी को दूर करने के लिए तीन उपाय साझा किए हैं।

    -“दोस्ती को बनाये रखने के लिए सक्रियता से काम करने के महत्व को पहचानें।

    -मित्रता के लिए हमेशा प्रयास की आवश्यकता होती है, लेकिन पुरस्कार इसके लायक होते हैं।

    -दोस्त और दोस्ती के प्रति सवेदनशील  रहें और एक दोस्त की जरूरत के लिए खुले और तैयार  रहें। और इस बात को स्वीकार करने में संकोच करना छोड़ दें कि जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं दोस्ती की आपकी इच्छा और जरूरत बढती जाती है .

    निखिल कामथ ने ट्विटर पर रीव्स के द फ्रेंडशिप मंदी दर्शन को साझा किया और लिखा, “मेरे जीवन में 5 भाई हैं, मैं जीवन बदलने के लिए सब कुछ करूंगा, गंभीरता से”।

    कितने दोस्त आदर्श होते हैं?

    लेखक रीव्स ने उल्लेख किया है कि पूरे इतिहास में, लगभग 12-15 मित्रों के एक जनजातीय आकार( tribal size) को उचित माना गया है। हालाँकि, लगभग 3-4 करीबी दोस्त होना अक्सर “अर्थपूर्ण सम्बन्ध ” के लिए आदर्श होता है।

    निखिल कामथ के टिविट्स का हिंदी रूपांतर –

    जितना अधिक #दर्शन आप पढ़ते हैं (स्थिर नहीं), एक समुदाय का होना #खुशी का सबसे बड़ा अग्रदूत लगता है (जितना क्षणभंगुर हो सकता है)।

    मेरे जीवन में मेरे 5 भाई हैं जिनके लिए मैं सब कुछ करूंगा, यह जीवन बदलने वाला है, गंभीरता से ♥️ pic.twitter.com/jMxVDKs031

    – निखिल कामथ (@nikhilkamathcio) 26 मई, 2023

  • यह छींक बहुत कुछ कहती है..खोल सकती है आपकी शख्सियत का राज !

    यह छींक बहुत कुछ कहती है..खोल सकती है आपकी शख्सियत का राज !

    आक छी…..यानी छींक। अगली बार जब आप छींक आए तो रुमाल निकालने  या टिशू पेपर उठाने के बाद एक बार सोचे कि आप शरीर की इस अजीब सी हरकत के बारे में कितना जानते हैं? आम तौर पर इस को लेकर लोगों को ना के बराबर जानकारी होती है सिवाय इस अंधविश्वास के कि अगर किसी काम से पहले कोई छींक दे तो वह काम नहीं करना चाहिए, थोड़ा रुक जाना चाहिए। कुछ लोग मानते हैं कि छींकते समय दिल की धड़कन रुक जाती है। पर लोग नहीं जानते की छींक अलग-अलग किस्म की होती है और छींकने का तरीका किसी व्यक्ति की शख्सियत के बारे में काफी कुछ बता देता है।

     छींक और शख्सियत के रिश्ते को जानने से पहले आइए छींक के बारे में और भी कुछ जान लें… छींक हमारे शरीर का अदृश्य से एलर्जी वायरस से छुटकारा पाने का सही का तरीका है। कभी-कभी नाक के अंदर धूल या अन्य कण चले जाते हैं जिसकी वजह से नाक की नर्व में असहजता या खुजली होती है। इन खुजली पैदा करने वाले कणों को बाहर नर्व से बाहर निकालने के लिए छींक आती है। सर्दी जुकाम के दौरान छींक आना आम बात है। छींक एलर्जी, फोटो सिजनिंग सहित कई कारण के कारण आ सकती है।

    ठीक से हृदय गति तो रुकती नहीं हां अलबत्ता सीने पर दबाव बढ़ जाता है और खून का दौरा भी बदल सकता है छींक की स्पीड के बारे में सही जानकारी नहीं है लेकिन यह अनुमान लगाया जाता है कि 100 से 630 किलोमीटर प्रति घंटे गिरफ्तार से छींक आती है और एक छींक के कारण लाखों वायरस हवा में आ जाते हैं।

    आइए अब बात करते हैं छींक और आपकी शख्सियत के रिश्ते के बारे में

    1 अगर आपकी छींक का अंदाज बड़ा और ताकतवर है तो–

    -आप करिश्माई नेता है जो दूसरों पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं।

    -विचारक भी हो सकते हैं जो दुनिया से अलग हटकर सोचने की क्षमता रखते हैं ।

    -आप नए पन के लिए पहल करने वाले हैं और दूसरों को प्रेरित कर सकते हैं ।

    -आप संबंधों को महत्व देते हैं ।

    -आप नए लोगों और नए अवसरों का स्वागत करते हैं। आप आशावादी हैं ।

    आपको लगातार कई बड़ी बड़ी छींके आती हैं जिन्हें लोग नोटिस करते हैं।

    2 अगर आप बिना शोर के इस अंदाज में छींकते हैं कि दूसरों को परेशानी ना हो तो 

    -आप का स्वभाव नर्म और दोस्ताना है और गति आराम भरी।

    -आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है दूसरों से स्नेहिल संबंध आप टकराव से बचने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं ताकि संबंध बना रहे।

     -आप वफादार हैं ,शांत और भरोसेमंद भी हैं।

    3 अगर आप सही सभ्य तरीके से  ना ज्यादा तेज और ना ज्यादा कम रफ्तार से छींकते हैं, साथ ही छींकते समय रुमाल या टिशू का प्रयोग करते हैं तो

    -आप सावधानी बरतते हैं ।

    -तोलमोल कर बोलते हैं और गहराई से सोचते हैं 

    -आप उन गलतियों को भी पकड़ लेते हैं जिन्हें दूसरे नहीं पकड़ पाते।

     -आप बहुत सोच समझकर अच्छी राय देते हैं लेकिन उसे व्यक्त करने का अक्सर अवसर आपको नहीं मिलता।

    -आप हर चीज में समय लेते हैं और नियम के साथ चलते हैं और दूसरों से भी यही उम्मीद रखते हैं।

    4 अगर आपके छींकने का अंदाज बहुत तेज एकदम से और बिना लाग लपेट के है तो

     -आप तेज, निर्णायक और मुद्दे पर रहने वाले व्यक्ति हैं

     -आप आप चाहते हैं कि दूसरे भी ऐसा ही करें ।

    -आप मेहनती और स्पष्ट हैं ।

    -आप दूसरों पर आश्रित रहना पसंद नहीं करते ।

    -आप नेता हैं ।

    -आप  प्रभावी और चीजों को जल्द पूर्ण करने वाले हैं आप पसंद नहीं करते कि दूसरे आप का इस्तेमाल करें।

  • सुकून से जीवन जीने की नई सोच – मिनिमलिज्म

    सुकून से जीवन जीने की नई सोच – मिनिमलिज्म

    आज के दौर में व्यक्ति की जीवन शैलियां तेजी से बदल रही हैं। नए नए आयाम और अवधारणाएं आ रही हैं। लोग उसे अपना भी रहे हैं । ऐसी ही जीवन जीने की एक नई सोच और तरीके का नाम है मिनिमलिज्म। 

    हैरत इलाहाबादी का मशहूर शेर है –

    आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं ,

    सामान सौ बरस का है पल की खबर नहीं।।

     इससे थोड़ा विपरीत है मिनिमलिज्म की सोच।आमतौर पर लोग जीवन में खुद से ज्यादा वस्तुओं को महत्व देते हैं । मिनिमलिज्म सामान से ज्यादा खुद को अहमियत देने की बात करती है।  जीवन को कम से कम चीजों के साथ जीना या बिताना या उतना ही लेना जितना जरूरी है।  फिलहाल हिंदी में इसके लिए कोई शब्द इजाद नहीं हुआ है। यदि सामान्य अर्थों में कहा जाए तो मिनिमलिज्म का मतलब है कम चीजों के साथ जीना या सादा जीवन। हिंदी में  कुछ लोग इसे न्यूनतावाद या न्यूनतावादी सोच भी कहते हैं। आमतौर पर इसे आज पश्चिमी विचारधारा या दृष्टिकोण कहा जा सकता है ,पर यह सिर्फ पश्चिम की सोच कतई नहीं मानी जा सकती क्योंकि हमारे देश में संयम के साथ जीने की बात की जाती रही है। जैन धर्म अपरिग्रह की बात करता रहा है। मिनिमलिज्म या न्यूनताबाद में इस बात की चिंता किए या दुख दुखी हुए बिना कि कोई वस्तु हमारे पास नहीं है जो है उसमें जीना भी कहा जा सकता है यह त्याग करना ही नहीं है बल्कि जो जरूरी है या महत्वपूर्ण है उसी को अपनाना है। कम चीजों के साथ बड़ा जीवन जीना है। आप अपनी जिंदगी में मिनिमलिज्म को किस सीमा तक अपनाते हैं यह आप पर निर्भर करेगा । अधिकतर लोग इसकी शुरुआत अपने घर से करते हैं और उन चीजों को हटाते हैं जिसकी जरूरत नहीं है। 

    “बिकमिंग मिनिमलिस्ट” के लेखक जोशुआ बेकर के मुताबिक जीवन में जो चीज ज्यादा अहमियत रखती है उस पर फोकस करना और जो चीज बाधा डालती है उन्हें दूर करना ही मिनिमलिस्म है।

    आइए जाने इस शैली के कुछ फायदे और पहलू –

    – गैर जरूरी सामान हटाना या डिक्लटरिंग को अपनाकर आप जीवन में सुकून हासिल कर सकते हैं। जब आप बेकार की चीजों को हटाना शुरू करते हैं तो घर में ज्यादा जगह बन जाती है ,चलने फिरने के लिए पर्याप्त स्थान होता है। सबसे अहम बात यह है कि जिन चीजों से आप बंधा हुआ महसूस करते हैं ,उनसे आजाद हो जाते हैं जो आपको ज्यादा सुकून और शांति दे सकता है।

    -जीवन में मिनिमलिज्म को अपनाकर आप अपने अन्य कामों पर ज्यादा फोकस कर पाते हैं। जब घर में ज्यादा चीजें मौजूद होती है तो ध्यान भी भटकता है और ज्यादा समय इसे संभालने में ही निकल जाता है। इन चीजों को दूर करके आप अनावश्यक तनाव और कुछ हद तक घर के बिल का बोझ भी कम किया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने हर खास काम और खास लोगों पर पूरी तरह से ध्यान दे पाते हैं।

    -चीजों और सुविधाओं से छुटकारा पाकर आप अपने अन्य काम के लिए अपने को तैयार कर लेते हैं । आज जो पैसा चीजें खरीदने ,चीजों को स्टोर करने या चीजों को जमा करने में जाया करते हैं ,वही पैसा बचा भी सकते हैं। कम चीजें होने का मतलब ज्यादा पैसा होना हो सकता है। मिनिमलिस्ट जीवनशैली अपनाकर पैसों पर निर्भरता भी कम की जा सकती है।

    -जब पैसों की जरूरत कब होगी तो काम का बोझ भी नहीं होगा इस तरह आपके पास समय भी बचेगा आप केवल जरूरी चीजों पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे और बचा हुआ समय अपने शौक पूरा करने पर बिता सकें सकेंगे

    -यह माना जाता है कि जिनके पास कम चीजें होती है, वे ज्यादा सेहतमंद और तनाव मुक्त जीवन जीते हैं। जब घर में सामान कम होता है तो शरीर में उर्जा भी ज्यादा रहेगी।

    -जब चीजें कम हो होंगी तो छोटे घर में रहना मुश्किल नहीं लगेगा इस तरह भीआप बहुत पैसा बचा सकते हैं।

     -जिनकी आय कम होती है अक्सर चीजों के प्रति गहरा लगाव रखते हैं। वे चीजों को हटाते नहीं बल्कि पकड़ कर रखते हैं । अगर बचपन अभाव में बीता है तो चीजों का स्वामित्व पाकर खुशी महसूस होती है।

    -मिनिमलिज्म एक चुनाव है। लोग चुन सकते हैं कि वह कैसा जीवन जीना चाहते हैं। वह खुद तय कर सकते हैं कि किस हद तक जाना चाहते।

    -मिनिमलिज्म का मतलब सही चीजें होना है ना की महंगी चीजें होना।  मिनिमलिज्म में ‘क्वालिटी ओवर क्वांटिटी’ बहुत मायने रखता है।

    – मिनिमलिस्ट जीवन बोरिंग या उबाऊ  का ठीक उलट है । जब हम अनावश्यक चीजों से छुटकारा पाते हैं तब यह तय करना आसान हो जाता है कि आगे क्या करना है । कुछ लोग फुल टाइम यात्रा करते हैं तो कुछ अपने परिवार के साथ भरपूर समय बिताते हैं । कम चीजों के साथ जीना आनंद के साथ बड़ा जीवन जीना है।

    तो क्या अब आप अपनाने को तैयार हैं मिनिमलिस्ट का जीवन।

  • कौन से शहर के लोग हैं सबसे ज्यादा भुलक्कड़? ऐसे भी जो  कैब में भूल जाते हैं टीवी से लेकर कमोड तक ?

    कौन से शहर के लोग हैं सबसे ज्यादा भुलक्कड़? ऐसे भी जो कैब में भूल जाते हैं टीवी से लेकर कमोड तक ?

    नई दिल्ली // पिछ्ले दिनों ऊबर ने अपने लोस्ट एण्ड फाउन्ड इन्डैक्स के 2023 संस्करण को जारी किया है, जो सबसे ज़्यादा भूले जाने वाले आइटमों, सबसे ज़्यादा भूलने वाले शहरों और सप्ताह के उन दिनों एवं साल के उस समय के बारे में रोचक जानकारी देता है।

    क्या आप जानते है कि देश में किस शहर के लोग सबसे ज्यादा भुलक्कड़ हैं। कैब प्रोवाइडर ऊबर की लॉस्ट एण्ड फाउन्ड इन्डैक्स 2023 रिपोर्ट इस बारे में रोचक जानकारी देती है । इस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के लोग सबसे ज्यादा भुलक्कड़ है, वह सूची में पहले नम्बर पर है,जबकि मुंबई दूसरे नम्बर पर, हैदराबाद तीसरे और बेंगलुरु चौथे स्थान पर है। यह रिपोर्ट ऊबर के कैब में सामान भूलने के आधार पर तैयार की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल के दौरान देश भर में ऐसे मामले सबसे ज़्यादा पाए गए जब ऊबर में बैठने वाले लोग अपने फोन, बैग, वॉलेट और कपड़ों जैसे आइटम कैब में ही भूल गए, इसके अलावा उपयोगी सामान जैसे पानी की बोतल, चाबी और एक्सेसरीज़ जैसे चश्मा, ज्वैलरी आदि भूलने के मामले भी अधिक संख्या में पाए गए।  लोग अजीब-अजीब चीज़ें कैब में ही छोड़ कर चले गए जैसे झाड़ू, कॉलेज का एडमिट कार्ड या अपने बच्चे का स्ट्रोलर। एक राइडर तो अपनी छड़ी भूल कर चला गया, वहीं एक और राइडर अपना बड़ी स्क्रीन वाला टेलीविजन ही कैब में छोड़ गया।

    शानिवार को लोग सबसे ज्यादा भूले सामान
    इतना ही नहीं यह रिपोर्ट भूलने वाले दिन, समय और रंग के बारे में भी रोचक जानकारी देती है जैसे यह  बताती है कि  लोग सबसे ज़्यादा शनिवार के दिन अपनी चीज़ें कैब में भूलते हैं। इसके बाद रविवार और शुक्रवार का नंबर आता है। मार्च और अप्रैल में लोग ज्यादा भूलते हैं।
      फोन की बात करें तो ऊबर में आईफोन की तुलना में 3 गुना एंड्रोइड फोन भूले गए।   लोगों ने ऊबर में सबसे ज़्यादा रैड कलर के आइटम छोड़े।  शाम के समय तकरीबन 7 बजे के आस-पास लोग सबसे ज़्यादा चीज़ें भूलकर चले गए।

    10 सबसे अजीब चीज़ें जिन्हें राइडर ऊबर में ही भूल कर चले गए
    इस सूची में    टीवी ,वेस्टर्न कमोड,   3 पैकेट दूध और पर्दे,  झाडू ,कॉलेज का एडमिट कार्ड ,छड़ी, इंडक्शन स्टोव, फैमिली कोलाज,हैवी मशीनरी, प्रिंटेड ‘दुपट्टा (स्कार्फ)

    10 सबसे ज़्यादा भूले जाने वाले आइटमों में     फोन, लैपटॉप बैग.वॉलेट,कपड़े,हैडफोन,पानी की बोतल, चश्मा/ सनग्लासेज़, चाबी, ज्वैलरी,घड़ी

    5 रंग के आइटम जो सबसे ज़्यादा भूले जाते हैं    लाल,  नीला, पीला, रोज़, गुलाबी

    उबर के डायरेक्टर (सेंट्रल ऑपरेशंस) नितीश भूषण ने बताया कि इस सालाना सर्वेक्षण के परिणाम बेहद दिलचस्प हैं, जो बताते हैं कि लोग किस तरह का सामान कैब्स में भूलकर चले जाते हैं और कैसे ऐप में ही दिए गए विकल्पों की मदद से उन्हें अपना यह सामान सुरक्षित वापस भी मिल सकता है। उन्होंने कहा कि गर्मियों का सीजन सबसे व्यस्त ट्रैवल सीजन माना जाता है, ऐसे में यह इस रिपोर्ट को जारी करने और इसके माध्यम से लोगों को अलर्ट और अवेयर करने का सबसे अच्छा समय है।

  • इमा कैथल  यानी  500 साल पुराना अनोखा बाज़ार

    इमा कैथल यानी 500 साल पुराना अनोखा बाज़ार

    सिर्फ बाज़ार ही नहीं संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की पूरी कहानी है

     इम्फाल // भारत विविधताओं से भरा देश है. इसका इतिहास,भूगोल,धर्म और संस्कृति का मिल जुल कर कई बार इसे ऐसा रूप दे देती है कि हैरानी होती है . ऐसी ही एक हैरान करने वाली जगह है इमा कैथल

    क्या है इमा कैथल

    इमा कैथल मणिपुर की राजधानी इम्फाल का एक ऐसा बाजार है जो हमारे देश की अनमोल और अनूठी सांस्कृतिक विरासत का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है. इस अनोखे  बाजार की खास बात यह थी कि यहां दुकानदार केवल और केवल महिलाएं हैं । इस बाजार में  पारंपरिक वेशभूषा में हजारों महिलाएं अपनी दुकानें सजाकर बैठती हैं। इस बाजार में करीब 5000 महिलाएं दुकानदारी करती हैं। इसे एशिया का सबसे बड़ा महिला बाजार माना जाता है।

    मैतेई (मणिपुरी) शब्द ‘इमा’ का अर्थ है माँ और ‘कैथल’ का अर्थ है ‘बाज़ार’. इसे नुपी कैथल (महिलाओं का बाज़ार) भी कहते हैं . इस बाज़ार में केवल विवाहित महिलाओं को व्यापार करने की अनुमति है. परम्परा को जीवित रखने के लिए यहाँ पुरुषों को किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि करने की इजाजत नहीं है . 

    संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की कहानी

    इस बाजार का इतिहास 500 साल पुराना है, जो संघर्ष,शौर्य और महिला सशक्तिकरण की पूरी कहानी है ।  माना जाता है कि मणिपुर में 16 वीं शताब्दी में लुलुप-काबा यानी बंधुवा मजदूरी की प्रथा थी, जिसमें 17 से 60 वर्ष के पुरुषों को खेती करने और युद्ध लड़ने के लिए दूर भेज दिया जाता है। ऐसे में महिलाएं ही घर चलाती थी। खेतों में काम करती थी और बोए गए अनाज को बेचती थी। इससे एक ऐसे बाजार की जरूरत महसूस हुई जहां केवल महिलाएं ही सामान बेचती हों। प्रारंभ में यह महिलाओं के लिए घरेलू सामान , करघे उपकरण, खाने की चीजें ,कपड़े आदि उत्पाद बेचने का मुख्य केंद्र बना

     1904 और 1939 में अंग्रेजी शासन के दौर में जब मणिपुर में जबरन आर्थिक सुधार लागू करने की कोशिश की तो इमा कैथल की इन साहसी महिलाओं ने इसका खुलकर विरोध किया। इन महिलाओं ने एक आंदोलन शुरू किया जिसे नुपी लेन (औरतों की जंग) कहा गया। नुपी लेन के दौरान महिलाओं ने अंग्रेजों की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, चक्काजाम और जुलूस आयोजित किए। यह आंदोलन दूसरे विश्र्वयुद्ध तक चलता रहा। इमा कैथल केवल एक बाजार न रहकर मणिपुर की मातृशक्ति का पर्याय बन गया  । आजादी के बाद भी यह सामाजिक विषयों पर चर्चा की एक जगह के रूप में स्थापित हुआ। यह भी कहा जाता है कि प्रिंट मीडिया की अनुपस्थिति में लोग यहां इसलिए भी आते थे ताकि उन्हें आस-पास की खबरें पता चल सकें। इस बाजार में केवल विवाहित महिलाएं ही दुकान चला सकती हैं। इन महिलाओं का अपना एक संगठन भी है जो जरूरत पड़ने पर इन्हें लोन भी देता है।अगर आप यहां रात में आएंगे तो बिजली की रोशनी में महिलाओं के उजले जगमगाते चेहरे आपका मन मोह लेंगे। गजब का आत्मविश्र्वास होता है इन महिलाओं में। आस-पास के चहल-पहल को देखना भी एक अनूठा अनुभव होता है। यहां महिलाओं को पारंपरिक फेनेक (एक तरह की लुंगी जिसे शरीर के निचले हिस्से में पहना जाता है) और ऊपर इनेफिस (एक तरह का शॉल) पहने हुए नजर आती हैं।

    आज ऐसा है बाज़ार

    वर्तमान मैं इमा कैथल परिसर में तीन बड़ी इमारतें हैं। हर इमारत के भूतल इमाओं के लिए निर्धारित किए गए हैं । प्रत्येक मंजिल को बाजार में बेची जाने वाली वस्तुओं के आधार पर अलग-अलग बांटा गया है।  लैमरेल सिदवी इमाया (पुराना बाजार) इस परिसर की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी संरचना है । यहां की दुकानों पर बांस से बनी वस्तुएं ,शुद्ध रुई के धागों और गहनों से लेकर अलग-अलग प्रकार के फल ,फूल मछलियां, मसाले आदि बेचे जाते हैं। 

    पुराना बाजार में मैतेइयो यानी मणिपुरी लोगों की देवी कैथल लैरेंबी और उनके पति लैरेंबा का एक छोटा सा तीर्थ स्थान भी है। मैतेई  लोगों की पौराणिक कथाओं में देवी कैथल लैरेंबी का एक महत्वपूर्ण स्थान है और माना जाता है कि वह कैथल लैरेंबी बाज़ार और महिला वर्ग की रक्षक हैं।

    इमोएनू इमा कैथल या लक्ष्मी बाजार इस परिसर की सबसे छोटी संरचना है। यहां की दुकानों पर पलंग पोश, मच्छरदानी जैसी घरेलू चीजें शाल तथा पारंपरिक पोशाकों जैसे वस्त्र उत्पाद बेचे जाते हैं। इन दुकानों को मणिपुर के अलग-अलग देशज समुदाय से संबद्ध रंग बिरंगी शालों से सजाया जाता है। फूईबी इमा कैथल या नया बाजार में मुख्य रूप से करघे पर बनी वस्तुएं उसमें भी खासतौर पर मैतई लोगों की पारंपरिक पोशाके  बेची जाती हैं, जिसमें विभिन्न तरह के समय साड़ियां और इनाफी शामिल हैं।

    आज इमा कैथल व्यापार और व्यवसाय का एक समृद्ध केंद्र होने के साथ साथ मणिपुर की महिलाओं को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सहभागी होने में सक्षम बनाता है