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  • अब पंगत में संगत के जरिए कार्यकर्ताओं को एक जुट करेंगी कांग्रेस ?

    अब पंगत में संगत के जरिए कार्यकर्ताओं को एक जुट करेंगी कांग्रेस ?

    भोपाल//आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में सूबे के दोनों ही राजनीतिक दलों ने अपने को झोंक दिया है, कोई भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता। रोज-रोज नई-नई रणनीतियां और दांवपेच सामने आ रहे हैं। सत्ताधारी भाजपा सत्ता हमेशा की तरह इसमें आगे ही दिखाई देती है, इन दिनों सरकारी अमले की मदद से निकाली जा रही विकास यात्राओं के जरिए अपने कार्यकर्ताओं को वह सक्रिय बनाए हुए है । वहींभारत जोड़ो यात्रा के बाद घोषित किया गया हाथ से हाथ जोड़ो अभियान  घोषणा और खबर बन के रह गया।

    कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या संगठन की कमजोरी है। पार्टी की सारी ताकत एकजुटता दिखाने की कोशिश में जाया होती नजर आ रही है राजधानी से लेकर गांव गांव तक पार्टी खेतों में बटी है।

    अब खबर है कि अपने विक्रय कार्यकर्ता को एकजुट करने के लिए पार्टी हर विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं को एक जगह बैठा कर भोजन कराने की रणनीति अपनाने जा रही है पंगत में संगत वाला यह फार्मूला कांग्रेस 2018 में भी आजमा चुकी है जब इसी तरह के आयोजनों में भोजन से पहले नेता और कार्यकर्ताओं को एकजुटता की कसमें दिलाई गई थी।

    फिलहाल कांग्रेस मान रही है कि आगामी चुनाव में उसे सत्ता मिल सकती है और इसके लिए उसके बिखरे कार्यकर्ताओं और नेताओं का एकजुट होना बहुत जरूरी है। इसलिए वह प्राथमिकता से एक जुटता की बात कर कार्यकर्ताओं में जोश भरने का प्रयास करना चाहती है। उसका मकसद अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को यह समझना है कि चुनावी मैदान में जन समर्थन को हम तभी अपनी ओर मोड़ सकेंगे जब हम अपने गिले शिकवे भुलाकर एक जुट होंगे। हमें भाजपा को दिखाना होगा कि हमारी एकता को कम न समझा जाए।

    हर छोटे बड़े कार्यकर्ता नेता से होगी बात

    पार्टी सूत्रों के अनुसार अपने पुराने और आजमाए फार्मूले पर लौटी कांग्रेस हर विधानसभा क्षेत्र में मंडल और सेक्टर से लेकर बूथ स्तर तक के नेताओं और कार्यकर्ताओं से बात कर रही है। जहां आपस में विरोधऔर मनमुटाव की स्थिति है वहां कार्यकर्ताओं को एक जगह बैठा कर यही संकल्प दिलाने की तैयारी हो रही है। कांग्रेस की वचन पत्र समिति के सदस्य वीरेंद्र खोंगल ने कहा बताया कि पिछली बार कार्यकर्ताओं की एकजुटता और मेहनत से पार्टी ने सफलता पाई थी और इस बार भी कांग्रेस को मतदाता का आशीर्वाद प्राप्त होगा और वह सरकार बनाएगी। खोंगल कहा कि प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ हर वर्ग को साथ लेकर चलने वाले नेता है उन पर प्रत्येक प्रदेश की जनता को अटूट विश्वास है।

    अब कमलनाथ भी हर विधान का दौरा करेंगे

    इस बार कांग्रेस सरकार बनाने के लिए कोशिश में कोई भी कमी नहीं रखना चाहती है । वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह प्रतिदिन एक विधानसभा क्षेत्र में पहुंचने  का अभियान शुरू कर चुके हैं और अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ भी हर दिन 1 विधानसभा का दौरा करेंगे जहां वे सभा के बाद  मंडल सेक्टर और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ बैठ कर बात करेंगे। पार्टी में काम करने के दौरान उन्हें कहां क्या समस्या आ रही है इस तरह की बातें व कार्यकर्ताओं उसे करेंगे और उनका पक्ष भी सुनेंगे और उनको हल करने का प्रयास करेंगे ।

  • बाघों पर संकट – देश में डेढ़ माह में 26 बाघों की मौत !

    बाघों पर संकट – देश में डेढ़ माह में 26 बाघों की मौत !

    नई दिल्ली// देश में 1 जनवरी से 11 फरवरी के बीच कुल 26 बाघों की मौत हुई है जो पिछले 3 वर्षों में साल की शुरुआत में बाघों की मौत का सबसे बड़ा आंकड़ा है। सबसे अधिक 9 मौतें मध्य प्रदेश में हुई । इसके बाद महाराष्ट्र में सात राजस्थान में तीन कर्नाटक में दो उत्तराखंड में दो आसाम बिहार और केरल में एक -एक बाघ की मौत हुई है।
    कारणों की तलाश
    फिलहाल सरकार की बाघ संरक्षण से जुड़ी योजनाएं इन मौतों के कारणों की तलाश कर रही है।आम तौर पर कोई अन्य कारण सिद्ध नहीं होने पर हर बाघ की मौत को अवैध शिकार माना जाता है।
    राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पास बाघों की मौत के कारणों के आंकड़े सिर्फ 2020 तक के ही उपलब्ध हैं जो  बताते हैं कि 2020 में अवैध शिकार के कारण कम मौतें हुईं हैं। 2020 में अवैध शिकार के कारण सिर्फ सात बाघों की मौत हुई , जो 2018 की तुलना में काफी कम थे । 2018  में 34 बाघों की मौत हुई थी।।
    पिछले साल इसी अवधि के दौरान 18 मौतें हुई थी और 2021 में 21 मौतें हुई थी। वही पूरे देश में  2020 से अब तक 380 बाघों की मौत हो चुकी है। सबसे अधिक बाघों की मौत 2021 में दर्ज की गई जब 127 बाघों की मौत हुई थी।
    मध्य प्रदेश में ज्यादा मौतें?
    मध्य प्रदेश में 2012 से 2022 के बीच लगभग 270 बाघों की मौत दर्ज की गई है यह आंकड़ा देश में सर्वाधिक है। इसके बाद महाराष्ट्र ( 184 मौत ) और कर्नाटक (150 मौत) का स्थान है।
    दुनिया के बाघों की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी भारत में

    फिलहाल दुनियाभर में साढ़े चार हजार बाघ हैं जिनमें से 2,967 भारत में बताए जाते हैं. प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ  द इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आई यू सी एन) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में बाघों की संख्या 3200 हो गई थी और 2022 में इनकी संख्या 4500 है.
    भारत दुनिया का सबसे अधिक बाघ की आबादी वाला देश है, जहां पूरी दुनिया के 70 फीसदी से ज्यादा बाघ पाए जाते हैं। 2010 में बाघों की संख्या  1,706थी जो  2018 तक बढ़कर 2, 967 पहुंच गई । यह एक उल्लेखनीय वृद्धि मानी जाती है। सरकार ने 2022के आंकड़े जारी नहीं किए हैं, लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि देश में बाघों की आबादी 3000के आंकड़े को पार कर लेगी। भारत में बाघों सबसे ज्यादा मध्य भारत, पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट में पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में दो हजार से ज्यादा बाघ रहते हैं।
    संरक्षण बजट में की गई है कमी
    1973 में बाघों को विलुप्त होने से बचाने और उनके प्राकृतिक आवासों में एक व्यवहार्य आबादी सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की थी ।हाल के वर्षों में इस कार्यक्रम पर होने वाले खर्च में कमी आई है, क्योंकि बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है , 2018-19 में जहां बाघों के संरक्षण पर 323. 44 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे वहीं चालू वित्त वर्ष में केंद्र द्वारा परियोजना पर मात्र 128 करोड खर्च करने का अनुमान है।

  • रूद्र से शिव तक का सफर -शिव पूजा की प्राचीनता –

    रूद्र से शिव तक का सफर -शिव पूजा की प्राचीनता –

    शिव रात्रि पर्व पर विशेष

    फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। शिव चतुर्दशी तिथि के स्वामी है आता है उनकी रात्रि में व्रत किए जाने से इस व्रत का नाम शिवरात्रि पड़ा। यद्यपि प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि होती है किंतु फाल्गुन  कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ ( अर्ध रात्रि) में शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था इस कारण यह महाशिवरात्रि मानी जाती है। चतुर्दशी की इस रात्रि के चारों पहर में अलग-अलग विधियों द्वारा भगवान भोलेनाथ की पूजा एवं अभिषेक करने का शास्त्रीय विधान है। हालांकि शिवरात्रि का व्रत इतना जटिल है कि इसे वेद पाठी विद्वान ही यथा विधि संपन्न कर सकते हैं लेकिन यह उतना ही सरल भी है कि विद्वान, अनपढ़, धनी- निर्धन सभी अपनी अपनी सुविधा तथा सामर्थ के अनुसार शिव की पूजा कर सकते हैं ।दयालु आशुतोष भगवान छोटी से छोटी तथा बड़ी से बड़ी सभी पूजा से प्रसन्न होते हैं। शिव पुराण के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा ने इसी दिन रूद्र रूप शिव को उत्पन्न किया था ।
    शिव एवं हिमालय की पुत्री पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था अतः यह शिव और शक्ति के पूर्ण होने की रात्रि भी है।
    शिव एक ही परम तत्व की तीन मूर्तियों (ब्रह्मा विष्णु और शिव )में अंतिम मूर्ति हैं ब्रह्मा का कार्य सृष्टि, विष्णु का कार्य  स्थिति (पालन) और शिव का कार्य संहार करना है। परंतु शैव मत  के अनुसार शिव ही परम तत्व हैं,उनके कार्यों में संहार के अतिरिक्त सृष्टि और स्थिति के कार्य भी सम्मिलित हैं। शिव परम कारुणिक भी है और उनमें अनुग्रह अथवा प्रसाद तथा तिरोभाव (गोपन और लोपन) की क्रिया भी पाई जाती है ।इस प्रकार उनके पांच प्रकार के कार्य हैं। शिव की विभिन्न अभिव्यक्तियों या रूपों से यह कार्य किसी न किसी प्रकार से संबद्ध हैं।
    इनका उद्देश्य भक्तों का कल्याण करना है। शिव विभिन्न कलाओं और सिद्धियों के प्रवर्तक भी माने गए हैं ।संगीत, नृत्य, योग व्याकरण, व्याख्यान , भैषज्य आदि के मूल प्रवर्तक शिव हैं। इनकी कल्पना सब जीव धारियों के स्वामी के रूप में की गई है। इसलिए यह पशुपति, भूपति, भूतनाथ कहलाते हैं। यह सभी देवी देवताओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं अत: महेश्वर और महादेव के रूप में पाए जाते हैं । इनमें माया की अनंत शक्ति है अतः यह मायापती भी हैं। उमा के पति होने से इनका एक पर्याय उमापति है। इनके अनेक विरूद या पर्याय हैं। महाभारत में इसकी एक लंबी सहस्त्रनाम सूची दी हुई है।

    रूद्र से शिव तक का सफर

    शिव की कल्पना की उत्पत्ति और विकास का क्रम वैदिक साहित्य से ही मिलना प्रारंभ हो जाता है। ऋग्वेद में रुद्र की कल्पना में ही शिव की अनेक विशेषताओं और उससे जुड़ी पौराणिक गाथाओं के मूल का समावेश है । इसी प्रकार शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता संहिता (अध्याय 16) में जो शत रुद्री पाठ है उसमें शिव का मूल रूप दिखाई देता है। उसमें शिव को गिरीश यानी पर्वत पर रहने वाला,पशु चर्म धारण करने वाला (कृतिवास) तथा  जटाजूट रखने वाला (कपर्दी) कहा गया है। अथर्ववेद में रूद्र की बड़ी महिमा बताई गई है और उनके लिए भव , शर्व, रुद्र ,पशुपति, उग्र, महादेव और ईशान जैसे नामों का प्रयोग किया गया है। सिंधु घाटी के उत्खनन से जो धार्मिक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं उसमें योगी शिव की भी एक प्रतिकृति है। उत्तर वैदिक साहित्य में शिव रूद्र के पर्याय के रूप में मिलने लगते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद में रुद्र के अनेक नामों में शिवएक है । शांखायन, कौषीतकि आदि ब्राह्मणों ग्रंथो में रुद्र के शिव, महादेव, महेश्वर ईशान आदि  नाम मिलते हैं। शतपथ और कौषीतकि ब्राह्मण ब्राह्मण ग्रंथों में रुद्र का एक अन्य विरुद अशनि भी पाया जाता है। इन आठ विरूदों में से रुद्र, शर्व, उग्र तथा अशनि घोर (भयंकर) रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसी प्रकार भव, पशुपति, महादेव, और ईशान उनके सौम्य (सुन्दर) रूप का। यजुर्वेद में उनके मांगलिक विरुद शंभु और शंकर का भी उल्लेख है।
    शिव की पूजा का विकास किस क्रम में हुआ यह बतलाना कठिन है। किंतु यह निश्चित है कि ईसा पूर्व में ही शैव संप्रदाय का उदय हुआ था। पाणिनी ने अष्टाध्यायी(4.1.115) में शिव उपासकों (शैवों) का उल्लेख किया है।
    शैवमत का मूल रूप ऋग्वेद में रुद्र की कल्पना में मिलता है रुद्र के भयंकर रूप की अभिव्यक्ति वर्षा पूर्व झंझावात के रूप में होती थी रूद्र के उपवास को ने अनुभव किया कि झंझावात के पश्चात जगत को जीवन प्रदान करने वाला शीतल जल बरसता है और उसके पश्चात एक गंभीर शांति और आनंद का वातावरण निर्मित हो जाता है अतः रुद्र का ही दूसरा स्वरूप शिव जनमानस में शुरू हो गया शिव के 3 नाम शंभू, शंकर और शिव प्रसिद्ध हुए इन्हीं नामों से उनकी प्रशंसा और प्रार्थना होने लगी
    पतंजलि ने महाभाष्य में रुद्र और शिव का उल्लेख किया है। महाभाष्य में यह भी कहा गया है कि शिवभागवत अय:शूल (लोहे का त्रिशूल) और दंड अजिन धारण करते थे। पुराणों में (विशेषत: शैव पुराणों में) शिव का विस्तृत वर्णन और शिव तत्व का विवेचन पाया जाता है। संस्कृत साहित्य और अभिलेखों में शिव की स्तुतियां भरी पड़ी हैं।

    शिव के रूप

    पुराणों पुराणों और उसके बाद के साहित्य में शिव की कल्पना योगीराज के रूप में की गई है उनका निवास स्थान कैलाश पर्वत है व्याघ्र चर्म (बाघम्बर) पर बैठते हैं ध्यान में मग्न रहते हैं वे अपने ध्यान और तपोबल से जगत को धारण करते हैं उनके सिर पर जटा जूट है जिसमें द्वितीय का नवचंद्र जड़ित है। 

     इसी जटा से जगत्पावनी गंगा प्रवाहित होती है। ललाट के मध्य में उनका तीसरा नेत्र है, जो अंतर्दृष्टि और ज्ञान का प्रतीक है ,यह प्रलयंकर भी है। इसी से शिव ने काम का दहन किया था। शिव का कंठ नीला है इसलिए मैं नीलकंठ कहलाते हैं समुद्र मंथन में जो विष निकला था उसका पान करके उन्होंने विश्व को बचा लिया था उनके कंठ और भुजाओं में सर्प लिपटे रहते हैं ।वह अपने संपूर्ण शरीर पर भस्म और हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं उनके वामंग में पार्वती विराजमान रहती हैंऔर उनके सामने उनका वाहन नंदी। वे अपने गणों से घिरे रहते हैं। योगीराज के अतिरिक्त नटराज के रूप में भी शिव की कल्पना हुई है वे नाट्य और संगीत के भी अधिक अधिष्ठाता हैं। एक सौ आठ प्रकार के नाटकों की उत्पत्ति शिव से मानी जाती है जिसमें  लास्य और तांडव दोनों ही सम्मिलित हैं। दक्षिणामूर्ति के रूप में भी शिव की कल्पना हुई है यह शिव के जगद्गुरूत्व का स्वरूप है । इस रूप में वे व्याख्यान अथवा तर्क की मुद्रा में अंकित किए जाते हैं। मूर्त रूप के अतिरिक्त अमूर्त अथवा प्रतीक रूप में भी शिव की भावना की गई है इसके प्रतीक को लिंग कहते हैं जो उनके निश्चल ज्ञान और तेज का प्रतिनिधित्व करता है। पुराणों में शिव के अनेक अवतारों का वर्णन है लगता है विष्णु के अवतारों की पद्धति पर यह कल्पना की गई है। प्राय: दुष्टों के विनाश तथा भक्तों की परीक्षा आदि के लिए शिव अवतार धारण करते हैं। शिव पार्वती के विवाह की कथा संस्कृत साहित्य और लोक साहित्य में बहुत प्रचलित है ।
    शिव के भयंकर रूप की कल्पना भी की जाती है पाई जाती है जिसका संबंध उनके विध्वंसक रूप से है । वे शमशान रण क्षेत्र चौराहों (दुर्घटना स्थल) में निवास करते हैं। मुंडमाला धारण करते हैं भूत प्रेत और गणों से घिरे रहते हैं ।वह स्वयं महाकाल( मृत्यु तथा उसके भी काल) हैं जिसके द्वारा महा प्रलय घटित होता है ।
    उनका एक अर्धनारीश्वर रूप है जिसमें शिव और शक्ति के युग्म की कल्पना है इसी प्रकार हरिहर रूप में शिव और विष्णु के समन्वित रूप का भी अंकन है।

  • सीताजी के जन्म की कुछ जानी-अनजानी कथाएं

    सीताजी के जन्म की कुछ जानी-अनजानी कथाएं

    जानकी जयंती पर विशेष

    फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को सीता जी का जन्म उत्सव मनाया जाता है इसे सीता माता की जयंती या जानकी जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष यह 13-14फरवरी को मनाई जा रही है। गौरतलब है कि माता सीता के जन्म जयंती को भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में कुछ हिंदू समुदायों के लिए सीता नवमी के रूप में जाना जाता है और वैशाख महीने अप्रैल-मई में मनाया जाता है।

     रामायण दशरथ पुत्र राम की कथा ही नहीं वह जनक पुत्री सीता की भी कथा है। रामायण यानी राम का अयन। अयन का शाब्दिक अर्थ प्रयाण या अभियान होता है। वाल्मीकि ने रामायण में कई स्थानों पर जानकी या सीता के लिए ‘रामा’ शब्द का प्रयोग किया है, ऐसे में रामायण शब्द का दो तरह से विग्रह किया जा सकता है- राम का अयन और रामा का अयन । यानी रामायण राम और सीता का समन्वित अयन (अभियान या चरित्र) है । इस प्रकार रामकथा में सीता को राम के समान महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। विद्वानों ने सीता को वाल्मीकि की की अद्भुत और रहस्यमयी सृष्टि माना है।

    पर क्या आप जानते हैं कि पूरे विश्व में लगभग 300 से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं ,जिनमें वर्णित अनेक तथ्य एवं घटनाएं एक दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाते, लेकिन यह भी सत्य है कि इन सभी रामायणों का मूल स्रोत वाल्मीकि रामायण ही है। वाल्मीकि रामायण एकमात्र आधिकारिक एवं सर्वोपरि ग्रंथ है और सभी रचनाकारों ने इसी रामायण को अपना आधार बनाकर अपनी अपनी रामायण की रचनाएं की हैं ।

    भारतीय जनमानस में कई सौ सालों से जो रामायण गहरे तक बैठी हुई है वह गोस्वामी तुलसीदास कृत ” रामचरितमानस ” है और विशेषकर हिंदू जनमानस के मन मस्तिष्क में इस कृति के पात्रों एवं घटनाओं पर अटूट श्रद्धा और विश्वास है ।यह विश्वास इतना अटल है कि इससे इतर वह कुछ कल्पना भी नहीं कर सकते। रामचरितमानस हिंदुओं का एक सबसे पूजनीय ग्रंथ है।

     लेकिन क्या आप यह भी जानते हैं कि विश्व की अन्य भाषाओं  की रामायण में सीता जी का कैसा और किस रूप में वर्णन है? हिंदू जनमानस में सीता जी की जो छवि प्रचलित है उससे अलग छवि इन रामायण में नजर आती है जो इन्हें रहस्यमयी और विवादास्पद भी बनाती है।

     विद्वानों के शोध के अनुसार वाल्मीकि से पहले भी जातक कथाओं के रूप में राम कथाओं का प्रचलन था ,जिसमें राम, लक्ष्मण ,सीता ,दशरथ ,कौशल्या आदि चरित्र थे, लेकिन विद्वानों में अभी भी यह विवाद है कि वाल्मीकि का महाकाव्य पहले रचा गया या जातक कथाएं? यह माना जाता है कि जातक कथाएं पहले रची गई थीं। आइए जाने सीता जी को लेकर अन्य ग्रंथ क्या कहते हैं?

     “दशरथ जातक ” में राम, लक्ष्मण और सीता दशरथ के पुत्र पुत्री हैं । दशरथ बनारस के राजा हैं और उनकी 16हजार पत्नियां है । इसमें सीता हरण आदि की कोई घटना नहीं है। इस कथा में रावण भी नहीं है। इस ग्रंथ में 12 वर्ष बीतने पर राम बनारस लौट कर आते हैं और उनका राज्याभिषेक होता है। सीता sa साम्राज्ञी के पद पर प्रतिष्ठित होती हैं ।अब इस कथा में राम सीता का विवाह कैसे हो जाता है? इस संबंध में विद्वान दिनेश चंद्र सेन कहते हैं कि प्राचीन काल में मिस्रऔर बेबिलोनिया में एक ही परिवार में होने वाले विवाह की प्रथा थी। भारतवर्ष में भी शाक्यों में रक्त  शुद्धता के आग्रह के कारण एक परिवार में विवाह की मान्यता थी। सेन साहब का कहना है कि इस कारण से दशरथ जातक में राम सीता को पति-पत्नी के रूप में दिखाना असंगत नहीं है। लेकिन वह यह भी कहते हैं कि हिंदुओं में इस कथा की स्वीकार्यता कठिन थी। इस कारण वाल्मीकि ने सीता के जन्म की बिल्कुल नई कल्पना की।

     लेकिन सीता का जन्म रहस्य के आवरण में हैं जो वाल्मीकि के लिए ही नहीं बल्कि सभी राम कथाओं के लिए समस्या रहा है, सभी राम कथाओं में सीता जन्म की कथा एक सी नहीं है। एक शोध आलेख में बताया गया है कि सिर्फ महाभारत के “रामोख्यान”और विमल सूरी के ” पउमचरिउ” में सीता जनक की वास्तविक पुत्री हैं। संभवत इसका आधार या तो वाल्मीकि रामायण या फिर आदि रामायण हो, जैसा फादर कामिल बुल्के ने अपने शोध में संकेत किया है।

    वाल्मीकि के संस्कृत महाकाव्य और कम्ब के तमिल काव्य में संतान प्राप्ति के लिए एक अनुष्ठान में भूमि पर हल चलाते समय जनक को सीता प्राप्त होती है । इसी का एक और रूप क्षेमेंद्र की “रामायण मंजरी” में मिलता है, जिसमें जनक को आकाशवाणी होती है और वह अप्सरा मेनका को देखकर संतान प्राप्ति की कल्पना करते हैं और फिर हल चलाते समय सीता प्राप्त होती है और उसी आकाशवाणी में बताया जाता है कि वह कन्या मेनका जाया है।

     संघदास के जैन ग्रंथ “वसुदेव हिंदी” में सीता को रावण की पुत्री बताया गया है, क्योंकि ज्योतिष भविष्यवाणी करते हैं कि मंदोदरी-रावण विवाह से उत्पन्न पहली संतान रावण के वंश का नाश कर देगी और जब मंदोदरी एक कन्या को जन्म देती है तो रावण उसे एक पात्र में बंद कर  सुदूर प्रदेश में जाकर गाड़ देते हैं जो जनक के राज्य में हैं । बाद में जनक को यही कन्या मिलती है जिसे वह पुत्री के रूप में पालते हैं ।

    गुणभद्र के “उत्तर पुराण” की कथा अनुसार अलकापुरी के राजा की कन्या मणिवती की तपस्या में रावण विघ्न डालता है तो वह प्रतिज्ञा करती है कि वह रावण कन्या के रूप में जन्म लेकर उससे प्रतिशोध लेगी। बाद में वह मंदोदरी की कन्या के रूप में जन्म लेती है जिसे ज्योतिष ही रावण के लिए अशुभ बताते हैं तब रावण कन्या को एक पात्र में बंद कर मिथिला प्रदेश में गाड़ आता है जो किसानों को मिलती है, जिसे वे जनक को सौंप देते हैं ।

    सीता जन्म की लगभग ऐसी कथाएं तिब्बत रामायण ,चीनी ,तुर्किस्तान की खोटानी रामायण या  संस्कृत के दशावतार में मिलती हैं।

    अद्भुत रामायण में कुछ अंतर है। रावण ऋषियों के रक्त से भरा पात्र मंदोदरी को सावधानी से रखने को देता है और कहता है कि पात्र का द्रव्य ना तो वह स्वयं चखे और ना ही किसी को चखने दे ,लेकिन रावण के साम्राज्य विस्तार के अभियान पर निकलते ही प्राणांत की आशा से मंदोदरी पात्र में रखा द्रव्य पी लेती है लेकिन मरने के स्थान पर वह गर्भवती हो जाती है। लोकोपवाद की आशंका से घबरा कर मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने अपने भ्रूण को जमीन में गाड़ देती है।

    सिंगारवेलु ने अपने अध्ययन में सत्रह रामकथाओं को आधार बनाया है। उनके  निष्कर्षो को देखें –

    1-बारह रामकथाओं में सीता या तो किसी देवी जैसे लक्ष्मी उमा इंद्राणी की अवतार हैं या तपस्वी कन्या जो रावण से प्रतिशोध लेने अवतरित होती है।

    2-वाल्मीकि एवं कंब रामायण में सीता का जन्म चमत्कारिक रूप से पृथ्वी से होता है।

    3-विमलसूरी के पउमचरिउ एवं महाभारत के ‘रामोपख्यान ‘ में सीता जनक की पुत्री हैं।

    4-अधिकतर राम कथाओं में सीता रावण और उसकी पत्नी की कन्या हैं।

    और भी कथाएं सीता के जन्म को लेकर अनेक  रामायणों में अलग अलग तरीके से प्रचलित हैं, जिनका वर्णन ए. के. रामानुजन की “तीन सौ रामायण”नामक पुस्तक में है जो कि वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है। उपरोक्त तथ्य भी इसी पुस्तक पर आधारित हैं।

  • यदि म. प्र.में रहते हैं, तो आप 38,000 रू के कर्जे में हैं ?

    यदि म. प्र.में रहते हैं, तो आप 38,000 रू के कर्जे में हैं ?

    भोपाल // मध्य प्रदेश का हर नागरिक  साल के अंत तक राज्य में चुनाव होने तक 38,000 रुपये से अधिक के ऋण के अधीन होगा। देश के प्रमुख दैनिक टाइम्स ऑफ़ इन्डिया में छपी एक खबर के अनुसार राज्य में औसत प्रति व्यक्ति कर्ज पिछले छह वर्षों में तेजी से बढ़ा है। मार्च 2016 के अंत तक यह 13,853 रुपये होने का अनुमान लगाया गया था, जबकि वित्त वर्ष 2013-14 में यह 10,896 रुपये दर्ज किया गया था। पिछले 20 सालों में सरकार ने करीब तीन लाख करोड़ रूपये का कर्ज लिया हैं .

    वित्त विभाग के अनुसार, 31 मार्च, 2022 तक मप्र का कुल ऋण 295532.9 करोड़ रुपये से अधिक था। प्रमुख हिस्सा बाजार ऋण से है, जो 174373.2 करोड़ रुपये से अधिक है। मुआवजा और अन्य बांड लगभग 7,360.4 करोड़ रुपये, वित्तीय संस्थानों से ऋण 12,158 करोड़ रुपये से अधिक, केंद्र सरकार से ऋण और अग्रिम 44,675.5 करोड़ रुपये थे। अन्य देनदारियों का हिसाब 22,208.9 करोड़ रुपये और केंद्र सरकार के राष्ट्रीय लघु बचत कोषों को जारी की गई विशेष प्रतिभूतियां लगभग 34,756.7 करोड़ रुपये थीं।

    सरकार कुछ दिनों में 4,000 करोड़ रुपए और कर्ज लेने की औपचारिकताएं पूरी कर लेगी। सूत्रों का कहना है कि पिछले साल इसने अलग-अलग अंतराल पर कर्ज लिया और यह प्रक्रिया इस साल चुनाव तक जारी रहेगी।

    राजपत्र में वर्णित मप्र सरकार की वित्तीय एवं बजटीय स्थिति के अनुसार वर्ष 2020-21 में राजस्व प्राप्तियां 146376.78 करोड़ रुपये थी जबकि वर्ष के लिए राजस्व व्यय 164733.01 करोड़ था, जिससे 18356.23 करोड़ का घाटा हुआ।

    वर्ष 2021-22 के संशोधित अनुमान में, राजस्व प्राप्तियां 171,697.2 करोड़ रुपये रही, जबकि राजस्व व्यय लगभग 177,398.4 करोड़ रुपये था, जिससे 5,701.1 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हुआ। दो साल के खर्च में ज्यादा अंतर नहीं आया, लेकिन प्राप्तियां काफी बढ़ गईं।

    सरकार द्वारा लिए गए ऋण का उपयोग राज्य में लागू होने वाले उत्पादक विकास कार्यक्रमों और परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाता है। यह मुख्य रूप से विकास योजनाओं की लागत वहन करती है। केंद्र से और अन्य स्रोतों से लिए गए ऋणों का उपयोग मुख्य रूप से राज्य के विकास और लाभकारी संपत्तियों के निर्माण जैसे बांधों के निर्माण, परिवहन सेवाओं में सुधार, किसानों, स्थानीय निकायों जैसे तीसरे पक्षों को ऋण प्रदान करने के लिए किया गया था और  बिजली उत्पादन के लिए ऋण देंने में होता है .

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा“धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं”

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा“धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं”

    नई दिल्ली // “धर्मनिरपेक्ष देश में हेट क्राइम के लिए कोई जगह नहीं है।” ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस केएम जोसेफ ने की है । दरअसल, उनके नेतृत्व वाली बेंच एक व्यक्ति द्वारा यूपी पुलिस की निष्क्रियता के खिलाफ दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में शिकायत की गई थी कि वह जुलाई 2021 में नोएडा में हेट क्राइम का शिकार हुआ था। इस मामले में यूपी पुलिस ने घटना के डेढ़ साल बाद ही प्राथमिकी दर्ज की, वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई की तारीख पर केस डायरी पेश करने को कहा। पीठ ने यूपी पुलिस की ‘ढिलाई’ पर ‘दुख’ जताया।

    हेट स्पीच के दुष्परिणामों की ओर इशारा करते हुए जस्टिस जोसेफ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, “जब आप एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहां आप हेट स्पीच को बढ़ावा देते हैं, इसे प्रोत्साहित करते हैं, इसे रोकते नहीं हैं, तो यह बहुत गंभीर बात हो जाती है। इसे अपने जीवन से जड़ से खत्म करना होगा। इसमें कोई जगह नहीं है। अगर यह हेट क्राइम है तो हमें इसका सामने से सामना करना होगा और तेजी से कार्रवाई करनी होगी। हम इसमें लीपापोती नहीं कर सकते। हर राज्य अधिकारी की कार्रवाई कानून के प्रति सम्मान बढ़ाती है।“  जस्टिस जोसेफ ने यह भी कहा, “जब आप कानून के शासन को प्रभावित करते हैं, तो इसका प्रभाव समाज, इसकी राजनीति और सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रुपये में उतार-चढ़ाव का एक कारण, आर्थिक सिद्धांत में, वे इसे कानून और व्यवस्था कहते हैं। कानून और व्यवस्था का मुद्रा पर प्रभाव पड़ता है। हमें इसे रोकना होगा।” राजस्थान की एक हालिया घटना का जिक्र करते हुए जस्टिस जोसेफ ने कहा, “हाल ही में राजस्थान में एक गूंगे आदमी को पीटा गया और फिर पता चला कि वह हिंदू है।” जस्टिस जोसेफ ने चिंताजनक रूप से कहा, “आप इसे अनदेखा नहीं कर सकते हैं। आम आदमी पर इसका असर पड़ता है। हम उनकी सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकते। अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक, कुछ अधिकार ऐसे होते हैं जो मनुष्य में निहित होते हैं। आप एक परिवार में पैदा हुए हैं और उसी में पले-बढ़े हैं। लेकिन हम एक राष्ट्र के रूप में खड़े हैं। आपको इसे गंभीरता से लेना होगा।“ राज्य को सलाह देते हुए जस्टिस जोसेफ ने आगे टिप्पणी की, “समाधान तभी पाया जा सकता है जब आप समस्या को पहचानते हैं। पहला कदम समस्या को पहचानना और स्वीकार करना है। अगर कोई समस्या है तो कानून समाधान प्रदान करता है।” जस्टिस जोसेफ ने कहा, “घृणास्पद भाषण के बारे में आम सहमति बढ़ रही है। अगर कोई व्यक्ति आता है और कहता है कि मैंने टोपी पहनी है, मैं मुस्लिम हूं, मुझ पर आरोप लगाया गया है और दाढ़ी खींची गई है, इस तरह से व्यवहार किया गया है और फिर भी कोई शिकायत दर्ज नहीं की जाती है .. तो यह एक समस्या।” कई बार जस्टिस केएम जोसेफ हेट स्पीच को लेकर चिंता व्यक्त कर चुके हैं।


    दो साल पहले मुस्लिम होने की वजह से व्यक्ति की पिटाई की गई
    साल 2021 में 62 साल के व्यक्ति ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि 4 जुलाई को वह नोएडा के सेक्टर 37 में अलीगढ़ जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था। जब उन्हें कुछ लोगों ने लिफ्ट देने की पेशकश की। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम होने पर टारगेट किया और गाली देते हुए मारपीट की। पीड़ित नोएडा के सेक्टर 37 में एक पुलिस चौकी गया। वहां कोई सीनियर पुलिस अफसर नहीं थे। केवल कांस्टेबल मौजूद थे। इसलिए कोई केस दर्ज नहीं किया गया।

  • पत्रकार फर्जी खबरों पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को अधिकार देने के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहे हैं?

    पत्रकार फर्जी खबरों पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को अधिकार देने के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहे हैं?

    सरकार की अधिकृत सूचना इकाई पीआईबी को सोशल मीडिया मंचों पर फ़र्ज़ी ख़बरों की निगरानी का अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव पर विभिन्न मीडिया संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. इससे पहले एडिटर्स गिल्ड ने कहा था कि फ़र्ज़ी ख़बरों का निर्धारण सिर्फ़ सरकार के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है, इसका नतीजा प्रेस को सेंसर करने के रूप में निकलेगा.

    नई दिल्ली//  संपादकों की शीर्ष संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर उनसे आईटी नियमों में संशोधन को ‘हटाने’ का आग्रह किया है, जो सरकार की मीडिया शाखा ‘पत्र सूचना कार्यालय’ (पीआईबी) की फैक्ट चेकिंग इकाई द्वारा ‘फर्जी’ के रूप में पहचाने गए समाचार या सूचना को हटाने का निर्देश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को देता है. वैष्णव को भेजे गए एक पत्र में गिल्ड ने मंत्रालय से डिजिटल मीडिया के लिए नियामक ढांचे पर प्रेस निकायों, मीडिया संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ परामर्श शुरू करने के लिए कहा, ताकि प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर न किया जा सके.

    समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, गिल्ड ने कहा कि वह प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) को व्यापक अधिकार देने वाले प्रस्तावित संशोधन से ‘बेहद चिंतित’ है.

    पत्र में कहा गया है, ‘यह नई प्रक्रिया मूल रूप से स्वतंत्र प्रेस को दबाने का काम करती है और पीआईबी या तथ्य जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी अन्य एजेंसी को व्यापक अधिकार देगी, ताकि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को ऐसी किसी भी सामग्री को हटाने के लिए मजबूर किया जा सके, जिससे सरकार को परेशानी हो सकती है.’ इस प्रस्तावित संशोधन से इस एजेंसी को व्यापक नियामक शक्तियां देने की मांग की गई है, जो स्पष्ट रूप से अवैध और असंवैधानिक है.’ गिल्ड ने नोट किया कि पीआईबी की भूमिका सरकार के मामलों पर समाचार संगठनों को सूचना प्रसारित करने तक सीमित है .

    गिल्ड ने दोहराया कि प्रक्रियाओं की परवाह किए बिना संशोधन अपने आप में एक अवैध कदम था, क्योंकि पीआईबी के पास किसी भी क्षमता में प्रेस का नियामक होने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है.

    इससे पहले बीते 18 जनवरी को भी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक बयान में इस प्रस्ताव पर गहरी चिंता जताते हुए ने कहा था कि फर्जी खबरों का निर्धारण सिर्फ सरकार के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है, क्योंकि इसका नतीजा प्रेस को सेंसर करने के रूप में निकलेगा.

    दरअसल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बीते 17 जनवरी को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (आईटी नियम) के मसौदे में संशोधन जारी किया, जिसे पहले सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया था.

    इसमें सोशल मीडिया पर गलत, फर्जी या भ्रामक सामग्री की पहचान का जिम्मा पीआईबी या किसी अन्य सरकारी एजेंसी को देने का जिक्र है. इसे ऑनलाइन मीडिया के एक हिस्से ने सरकारी नियंत्रण की कोशिश बताया है.

    इसमें कहा गया है कि पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की फैक्ट-चेकिंग इकाई द्वारा ‘फर्जी (फेक)’ मानी गई किसी भी खबर को सोशल मीडिया मंचों समेत सभी मंचों से हटाना पड़ेगा.

    ऐसी सामग्री जिसे ‘फैक्ट-चेकिंग के लिए सरकार द्वारा अधिकृत किसी अन्य एजेंसी’ या ‘केंद्र के किसी भी कार्य के संबंध में’ भ्रामक के रूप में चिह्नित किया गया है, उसे ऑनलाइन मंचों (Intermediaries) पर अनुमति नहीं दी जाएगी.

    नए संशोधन प्रस्ताव को लेकर विभिन्न मीडिया संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अलावा प्रेस एसोसिएशन, डिजिपब फाउंडेशन ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन जैसे मीडिया संगठनों ने भी सरकार से संशोधन को वापस लेने की मांग की है.

    इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन ने ‘फर्जी समाचार’ पर कार्रवाई करने के लिए पीआईबी को सशक्त बनाने के कदम का विरोध किया और सभी पार्टियों के सांसदों से हस्तक्षेप की मांग की है .  सांसदों को लिखे एक खुले पत्र में, IJU ने सांसदों से “संविधान में निहित सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार” की रक्षा के प्रयासों के लिए अपनी आवाज़ देने की अपील की है। पत्रकारों के निकाय ने ऑनलाइन सामग्री के नियमन के लिए भारतीय प्रेस परिषद की तर्ज पर एक स्वतंत्र निकाय के गठन की भी मांग की है।

    इस बीच इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) ने सरकार से अनुरोध किया कि आईटी नियमों में उस मसौदा संशोधन को वापस लिया जाए, जिसके तहत सोशल मीडिया मंचों के लिए पीआईबी की फैक्ट चैकिंग इकाई द्वारा फर्जी घोषित खबर या सूचना को हटाना जरूरी होगा.संगठन  ने कहा, ‘अपने स्वयं के मामले में न्यायाधीश बनने के लिए कानून बनाकर, सरकार नियमों के एक सेट में प्रस्तावित संशोधन के माध्यम से, जो अन्यथा भी चिंता का कारण बनता है, प्रभावी रूप से आलोचना और यहां तक ​​कि निष्पक्ष टिप्पणी को दबाने के लिए कदम उठा रही है.’

    आईएनएस के अलावा न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (एनबीडीए) ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों के संशोधनों के मसौदे को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि  बिना किसी नियंत्रण और संतुलन के सरकार को इस तरह की शक्तियां प्रदान करने से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गला घोंट दिया जाएगा और मीडिया पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.

    एनबीडीए ने कहा कि समाचार मीडिया को विनियमित करने के लिए पर्याप्त कानून, विनियम और वैधानिक निकाय हैं तथा इस तरह के संशोधन से सरकार द्वारा अत्यधिक विनियमन होगा जो न तो वांछनीय और न ही स्वीकार्य है. एनबीडीए ने कहा, ‘संविधान में इस तरह की सेंसरशिप की परिकल्पना नहीं की गई है.’

    मालूम हो कि इससे पहले डिजिटल मीडिया संगठनों के एक संघ ‘डिजीपब’ ने बीते 19 जनवरी को कहा था कि आईटी नियमों में प्रस्तावित संशोधन संभावित रूप से प्रेस की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाने के लिए एक सुविधाजनक संस्थागत तंत्र बन सकता है.

    इसके अलावा, प्रेस एसोसिएशन ने एक बयान में कहा था, ‘प्रेस काउंसिल पहले से ही फर्जी समाचार की कई शिकायतों पर फैसला कर रही है. पीआईबी जैसी विशुद्ध रूप से सरकारी संस्था को फर्जी समाचार को निर्धारित करने और कार्रवाई करने की शक्ति मिलने से प्रेस काउंसिल का अधिकार, स्वतंत्रता कम हो जाएगी, जो 1966 से सुचारू रूप से काम कर रही है.’

    गौरतलब है कि 2019 में स्थापित पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई, जो सरकार और इसकी योजनाओं से संबंधित खबरों को सत्यापित करती है, पर वास्तविक तथ्यों पर ध्यान दिए बिना सरकारी मुखपत्र के रूप में कार्य करने का आरोप लगता रहा है.

    मई 2020 में  वेब साईट न्यूज़लॉन्ड्री ने ऐसे कई उदाहरण बताए थे, जहां पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई वास्तव में तथ्यों के पक्ष में नहीं थी, बल्कि सरकारी लाइन पर चल रही थी.

    फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के संस्थापक प्रतीक सिन्हा का भी कहना है कि समस्या यह भी है कि पीआईबी किन खबरों का फैक्ट-चेक करने का फैसला करता है और किनको नजरअंदाज करता है.

    उन्होंने वेब साईट न्यूजलॉन्ड्री से कहा था कि , ‘मुद्दा यह है कि पीआईबी फैक्ट चेक इकाई क्या सत्यापित करने का फैसला करती है. यदि आप पीआईबी द्वारा किए गए फैक्ट-चेक देखते हैं तो कुछ अपवादों को छोड़कर वे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचने से बचाने की कोशिश करते हैं. वे उन चुनिंदा खबरों का फैक्ट-चेक करते हैं, जो स्वभाव से राजनीतिक हैं और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए आलोचनात्मक हैं.’

    उन्होंने कहा था, ‘यह कहना कि केवल पीआईबी फैक्ट-चेकिंग इकाई ही यह तय करेगी कि क्या सच है और क्या झूठ है, बताता है कि केवल सरकार के खिलाफ गलत सूचना को हटाया जाएगा. अन्य सभी गलत सूचनाओं को ऑनलाइन बने रहने की अनुमति होगी.’

    पीआईबी को ऑनलाइन सामग्री की पड़ताल का अधिकार देने पर अगले महीने चर्चा: मंत्री

    इस बीच  इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री चंद्रशेखर मंगलवार को कहा कि सरकार की अधिकृत सूचना इकाई पीआईबी को सोशल मीडिया मंचों पर फर्जी खबरों की निगरानी का अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव पर अगले महीने सभी हितधारकों के साथ चर्चा की जाएगी. हम अगले महीने की शुरुआत में इस पर अलग से चर्चा करेंगे.’

  • एक बार फिर क्यों चर्चा में है पारसनाथ पहाड़ी ?

    एक बार फिर क्यों चर्चा में है पारसनाथ पहाड़ी ?

    पारस नाथ पहाड़ी को मुक्त कराने के लिएआदिवासियों ने शुरू की मारंग बुरु बचाओ यात्रा

    जमशेदपुर// झारखंड राज्य के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पहाड़ी जिस पर जैन समाज का पवित्र तीर्थ स्थल समवेत शिखर स्थित है, एक बार फिर चर्चा और विवादों में है ।अब आदिवासी इस पहाड़ी पर अपना दावा कर रहे हैं उनका कहना है कि यह स्थल संथाल आदिवासियों का सर्वाधिक बड़ा पूजा स्थल है जिससे मरांग बुरु यानी ईश्वर का दर्जा प्राप्त है। पर सरकार ने इसे जैन समुदाय को सौंप दिया है।

    जैन समाज पारसनाथ को पर्यटन स्थल बनाए जाने का विरोध कर रहा है उनकी मांग है कि सम्मेद शिखर जी के 50 किलोमीटर के दायरे में मांस और मदिरा का सेवन और बिक्री प्रतिबंधित की जाए वही आदिवासियों का कहना है कि पारसनाथ पहाड़ी की तलहटी में उनके ईश्वर की पूजा होती है जहां जाहेरथान और माझीथान के रूप में 2 पूजा स्थल हैं और सेहराब तथा वंदना पर्व से पहले वहां मुर्गे और बकरियों की बलि दी जाती है ।आदिवासियों का आरोप है की सरकार ने पूरी पारसनाथ पहाड़ी को जैन समाज को सौंप दिया है जो कि उनका मरांग बुरु है। आदिवासियों के नेता सालखान मुर्मू कहना है कि मरांग बुरु आदिवासियों के लिए अयोध्या के राम मंदिर से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

     पिछ्ले 17 फरवरी को आदिवासी से निकाल अभियान संगठन ने पारसनाथ पहाड़ी को मुक्त कराने के लिए देशभर में “मरांग बुरु बचाओ यात्रा” की शुरुआत की है । यह यात्रा 1 माह तक चलेगी एएसए के अध्यक्ष सलखान मुरमू कहना है कि संगठन के सदस्य असम बिहार उड़ीसा पश्चिम बंगाल और झारखंड के आदिवासी बहुल वाले 50 जिलों में कलेक्टर कार्यालय के बाहर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करेंगे और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन दिए जाएंगे। इन यात्राओं का उद्देश्य पूरे देश का समर्थन प्राप्त करना है।

    10 जनवरी को ‘मरांग बुरु बचाओ’ अभियान के लिए पारसनाथ पहाड़ी पर ‘महाजुटान’ करने का ऐलान किया गया था अपने पुरखों की पारंपरिक धरोहर और आस्था के स्थल से हटाये जाने तथा यहां आकर मांस-मदिरा खाने के विरोध के नाम पर सबके आने पर ही प्रतिबंध लगाने की बात ने आदिवासियों को आक्रोशित कर दिया। उनका कहना था कि यहां कल तक हम इसके घोषित मालिक थे और आज यहां हमारे ही आने जाने पर रोक लगाई जा रही है। इस महाजुटान को संबोधित करते हुए सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा, कल तक हमें विकास के नाम पर विस्थापित किया गया और अब तथाकथित धार्मिक आस्था के नाम पर विस्थापित किया जा रहा है। ऐसा नहीं होने दिया जाएगा।

  • रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    रैसलपुर में पाई गई  दुर्लभ बुद्ध प्रतिमा जिला संग्रहालय में होगी संग्रहित

    इटारसी। इटारसी से लगभग 7 किलोमीटर पर स्थित रैसलपुर ग्राम  के निवासी राजेन्द्र प्रसाद चौधरी के घर के पीछे बाड़े में पाई गई दुर्लभ बौद्ध प्रतिमा अब नर्मदापुरम जिला पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित की जा सकती है, पिछले दिनों  राज्य के  पुरातत्व विभाग के अधिकारी ने पहुंच कर मूर्ति का निरीक्षण किया उनके साथ दा बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक और सदस्य भी थे।

    पुरातत्व विभाग के सीनियर गाइड  हुकुमचंद मलिक ने बताया की यह  मूर्ति पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है  बुद्ध की मूर्ति का यहां मिलना बहुत  दुर्लभ है और पूरे नर्मदापुरम के लिए गौरव की बात है। 

    इस मूर्ति की यहां उपस्थिति की ओर सबसे पहले वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु मिश्र और ख़बर भारतवर्ष की टीम ध्यान आकर्षित करवाया था, इसके बाद द बौद्धिक सोसायटी ऑफ इटारसी के संरक्षक प्रहलाद निकम ने पुरातत्व विभाग से संपर्क कर इस तरफ़ ध्यान आकर्षित किया, 

    क्या है बुद्ध प्रतिमा की विशेषता ?

    ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण एक बुद्ध प्रतिमा है जो  गाँव के ही एक कृषक के बाड़े में एक सीमेंट के छोटे से चबूतरे पर रखी हुई है । इस प्रतिमा का क्षेत्र में होना दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । बलुआ पत्थर से बनी करीब 4 फुट ऊंची और 3 फुट से ज्यादा चौड़ी यह प्रतिमा करीब डेढ़ फुट मोटे शिलाखंड पर उकेरी गई है । मूर्ति में भगवान बुद्ध ध्यानस्थ मुद्रा में है। चेहरा शांत और सौम्य है, केश विन्यास अद्वितीय है । बुद्ध के दोनों और चँवरधारी पुरुष है और सिर के दोनों और दो मालाधारी स्त्री प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से अंकित है । प्रतिमा के ऊपर त्रीछत्र बना हुआ है । प्रतिमा बीच में से टूटी हुई है जिसे जोड़ कर रखा गया है। 

    देवराज बाबा के नाम से होती थी पूजा

    कृषक श्यामसुंदर चौधरी बताते हैं कि उनके भाई राजेंद्र चौधरी के घर के पीछे यह मूर्ति वर्षों से बाड़े में गड़ी हुई थी । इस मूर्ति का ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता था । हमारे पूर्वज  देवराज बाबा के नाम से कई सदियों तक इसकी पूजा करते रहे पर करीब 20 साल पहले जब आसपास की मिट्टी का क्षरण हुआ  तो मूर्ति का सिर दिखाई दिया । जब खुदाई की तो बुद्ध की चार पांच फीट ऊंची प्रतिमा दो टुकड़े में निकली। जिसे हमने चबूतरा बनाकर स्थापित कर दिया है। 

    क्या कभी यहां भव्य मंदिर था ?

    पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र की ज्यादातर प्रतिमाएं 12 वीं शताब्दी की हैं । इस क्षेत्र में बुद्ध की प्रतिमा का मिलना बहुत ही दुर्लभ और आश्चर्यजनक है । उनका अनुमान है कि इस स्थान पर कोई भव्य मंदिर रहा होगा जो किसी कारण से नष्ट हो गया या कर दिया गया हो और उसके अवशेष आज भी यहां बिखरे हैं। जिन्हे संरक्षण की जरूरत है।

    पुरातत्व सम्पदा से भरपूर है यह क्षेत्र

    इटारसी और उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्र पुरातत्वीय अवशेषों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। अंचल में प्राचीन प्रतिमाएं बहुतायत में फैली हुई है जो कलात्मक दृष्टि से बहुत ही प्राचीन और महत्वपूर्ण हैं। अनेक मूर्तियों को तो ग्रामीण सिंदूर आदि पोत कर देवी देवताओं की तरह पूज रहे हैं। ग्राम रेसलपुर में बहुत सी प्रतिमाएं और पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, इसके अलावा गांव में अनेक स्थानों पर प्राचीन मूर्तियां सती शिलाएँ, स्थापत्य खंड, स्तंभ आदि बिखरे पड़े हुए हैं । जिसमें प्रमुख रुप से उमा महेश्वर की प्रतिमा का ऊपरी भाग है इस मूर्ति में पार्वती हाथों में दर्पण है। ऊपर अनेक देव प्रतिमाएं हैं। वक्त के कारण मूर्ति अस्पष्ट हो गई है। गांव के मंदिर प्रांगण में पेड़ के नीचे कई मूर्तियाँ रखी  है।शिव की एक अस्पष्ट और खंडित प्रतिमा है जिसमें वे सर्प पकड़े हुए हैं वही अंबिका की प्रतिमा है।  लगभग 17 वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा मंदिर परिसर में दीवार में जड़ी हुई है । सूंड दाहिनी ओर मुड़ी हुई है। गणेश के  सिर और कान शरीर की तुलना में काफी बड़े हैं। शैली के कारण यह प्रतिमा अन्य प्रतिमाओं से अलग है।  गांव में कई पत्थर के बने स्तंभ यहां-वहां बिखरे हुए हैं । उनमें कई बहुत अच्छी स्थिति में है, जिन पर सुंदर नक्काशी और प्रतिमाएं अंकित हैं । कई स्तंभ जमीन में धँसे हुए हैं और उनके बारे में गांव वालों की अपनी अपनी धारणाएं हैं। कुछ सती स्तंभ है जो बहुत अच्छी स्थिति में है। अन्य प्रतिमाएं भी हैं जिनका संरक्षण किया जाना जरूरी है.

  • लापता हैं देश भर के 50 पुरातात्विक महत्व के स्मारक !

    लापता हैं देश भर के 50 पुरातात्विक महत्व के स्मारक !

    केंद्र सरकार ने संसद में दी जानकारी

    नई दिल्ली // संस्कृति मंत्रालय ने कहा है कि राष्ट्रीय महत्व के कई स्मारक (Monuments) तेजी से शहरीकरण, जलाशयों और बांधों से जलमग्न होने के कारण पिछले कुछ सालों में लापता हो गए.

     देश में केंद्र सरकार की ओर से संरक्षित 50 स्मारक गायब हो गए हैं. केंद्र सरकार ने इस संबंध में संसद में जानकारी दी है. केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया है कि देश के 3,693 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों (Centrally Protected Monuments) में से 50 स्मारक लापता हैं. केंद्र सरकार ने कहा है कि स्मारकों का गायब होना गंभीर चिंता की बात है.

    लापता स्मारकों में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के 11 स्मारक शामिल हैं. इसके साथ ही दिल्ली और हरियाणा में दो-दो स्मारक गायब बताए गए हैं. . इसके अलावा सूची में असम, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड के स्मारक भी शामिल हैं

    विडम्बना यह है कि इस बात की जानकारी केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संसद में साल 2013, 2016, 2017, 2020 और 2022 में भी दो बार दी गई है। इसके बावजूद स्मारकों के गायब होने का सिलसिला जारी है।

    8 दिसंबर को संसद में जानकारी
    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से 8 दिसंबर को परिवहन, पर्यटन और संस्कृति पर संसदीय स्थायी समिति को एक रिपोर्ट के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने 18 मई 2022 को संस्कृति सचिव गोविंद मोहन, एएसआई महानिदेशक वी विद्यावती और कई वरिष्ठ अधिकारियों के विचार सुने थे.

    संसद में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) की ओर से कहा गया, ”यह गंभीर चिंता का विषय है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (संस्कृति मंत्रालय) के संरक्षण में राष्ट्रीय महत्व के कई स्मारक तेजी से शहरीकरण, जलाशयों और बांधों की वजह से जलमग्न होने के कारण पिछले कुछ सालों में लापता हो गए हैं. दूरस्थ स्थानों और घने जंगलों में पता लगाने में दिक्कतों की वजह से कुछ स्मारक गायब हुए हैं”

    क्यों और कहां से लापता हैं स्मारक?
    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के मुताबिक इन स्मारकों में से 14 तेजी से शहरीकरण के कारण खो गए हैं, जबकि 12 जलाशयों या बांधों से जलमग्न हैं. बाकी 24 स्मारकों के स्थान पता नहीं चल रहे(अनट्रेसेबल या जिसका अस्तित्व नहीं रहा) हैं।

    अधिकारियों ने बताया कि इनमें कई स्मारक शिलालेखों से जुड़े थे, जिनका कोई निश्चित स्थान पता नहीं है. इन्हें स्थानांतरित या क्षतिग्रस्त किया जा सकता है और उनका पता लगाना मुश्किल हो सकता है. अधिकारियों ने ये भी कहा कि 1930, 40 और 50 के दशक में केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों की एक बड़ी संख्या की पहचान की गई थी और आजादी के बाद के दशकों में उन्हें संरक्षित करने के बजाय नए स्मारकों की खोज पर ध्यान केंद्रित किया गया था. पहली बार जब स्मारकों का भौतिक सत्यापन किया जा रहा था तो 2013 में पता चला कि 92 स्मारक गायब हैं। इन 92 स्मारकों में से एएसआई 42 की पहचान करने में कामयाब रहा है ।

    रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारियों ने बताया कि आजादी के बाद की सरकारों की प्राथमिकताएं स्वास्थ्य और विकास रही, इसलिए विरासत को भी नजरअंदाज किया गया. अब भी कई बड़े और छोटे स्मारक (Monuments) देखभाल में कमी की वजह से विलुप्त होने के कागार पर हैं.

    (चित्र प्रतीकात्मक है )